NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
जनगणना जैसे महत्वपूर्ण कार्य को क्यों टाल रही है सरकार?
सवाल है कि कोरोना महामारी के चलते सरकार का कोई काम नहीं रूका है, तो फिर जनगणना जैसे बेहद महत्वपूर्ण कार्य को हल्के में लेते हुए क्यों टाला जा रहा है?
अनिल जैन
19 Jan 2022
जनगणना जैसे महत्वपूर्ण कार्य को क्यों टाल रही है सरकार?
प्रतीकात्मक तस्वीर। साभार

दुनिया के तमाम देशों में जनगणना के आंकडों का खास महत्व होता है, लिहाजा एक निर्धारित अंतराल पर वहां जनगणना होती है। जनगणना से प्राप्त आबादी, लोगों की आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक स्थिति आदि से संबंधित प्राप्त आंकड़ों के आधार पर वहां की सरकारें अपने लोगों के लिए कल्याणकारी नीतियां और विकास कार्यक्रम बनाती हैं और उन पर अमल करती हैं। भारत चूंकि धर्म, जाति, भाषा आदि मामलों में विविधताओं वाला देश है, इसलिए यहां जनगणना का महत्व और भी बढ़ जाता है।

जनगणना का अभियान हर दस वर्ष में मनाया जाने वाला एक ऐसा राष्ट्रीय उत्सव है, जिसमें देश के हर हिस्से में रहने वाले हर नागरिक की भागीदारी होती है। देश में हर दस साल पर यानी हर दशक के पहले वर्ष में जनगणना होती रही है, लेकिन 2021 में होने वाली जनगणना का काम कोरोना महामारी के नाम पर अभी तक शुरू नहीं हो सका है। भारत में जब से जनगणना का सिलसिला शुरू हुआ है तब से अब तक यह पहला मौका जब निर्धारित समय के बाद भी जनगणना का काम शुरू नहीं हुआ है। सवाल है कि कोरोना महामारी के चलते सरकार का कोई काम नहीं रूका है, तो फिर जनगणना जैसे बेहद महत्वपूर्ण कार्य को हल्के में लेते हुए क्यों टाला जा रहा है?

भारत में जनगणना सिलसिला देश की आजादी के पहले से यानी ब्रिटिश हुकूमत के समय से चला आ रहा है। भारत में पहली जनगणना 1871 में हुई थी। उसके बाद 1941 तक यानी आठ जनगणना ब्रिटिश राज में हुई। देश की आजादी के बाद भी यह सिलसिला जारी रहा और इस लिहाज से 1951 में हुई जनगणना नौवीं जनगणना थी। लेकिन 1947 में देश का बंटवारा होने और आजादी मिलने के बाद की वह पहली जनगणना थी। इस लिहाज से 9 फरवरी की तारीख काफी महत्वपूर्ण है, क्योंकि 1951 में इसी दिन आजाद भारत की पहली जनगणना के लिए काम शुरू किया गया था। इस जनगणना में देश का विभाजन होने के कारण पिछली जनगणना के मुकाबले बहुत से बदलाव आए। भारत का नक्शा बदलने के साथ ही इस जनगणना में हिंदू-मुस्लिम आबादी का अनुपात भी बदल गया।

चूंकि जनगणना का कार्य युद्ध, महामारी, प्राकृतिक आपदा, राजनीतिक असंतोष जैसी स्थितियों में होता रहा है, इसलिए 2011 तक यह सिलसिला निर्बाध रूप से जारी रहा, लेकिन 2021 में महामारी के नाम पर यह सिलसिला थम गया, जो 2022 शुरू होने के बाद भी थमा हुआ है। हालांकि भारत सरकार ने 2021 की जनगणना के लिए 29 मार्च 2019 को अधिसूचना जारी की थी। उस अधिसूचना में कहा गया था कि जनगणना का काम दो चरणों में होगा। पहले चरण अप्रैल से सितंबर 2020 तक मकानों की गिनती होनी थी और उसके बाद नौ फरवरी से आबादी की गिनती की जाना थी। लेकिन मार्च 2020 में कोरोना की महामारी शुरू होने और देशव्यापी लॉकडाउन लागू हो जाने के कारण यह शुरू नहीं हो सका।

कोरोना की दूसरी लहर के बाद धीरे-धीरे दूसरी सभी गतिविधियां शुरू हो गईं, चुनाव भी होने लगे और बड़ी-बड़ी चुनावी रैलियां और रोड शो भी हुए, कुंभ मेले सहित कई बड़े धार्मिक-राजनीतिक आयोजन भी हुए लेकिन जनगणना का काम शुरू नहीं हो सका। जनगणना का काम नहीं होने से जाहिर है कि सरकार के पास आबादी और उससे जुडे अन्य मामलों के वास्तविक आंकड़े नहीं हैं। निश्चित रूप से इसका असर सरकार की कल्याणकारी योजनाओं के अमल पर हो रहा होगा। सरकार को कई नीतियां और योजनाएं आबादी शहरी और ग्रामीण वर्गीकरण के आधार पर बनानी होती है। इसके अलावा आबादी की सामाजिक-आर्थिक स्थितियों के आंकड़े भी सरकार के पास होना चाहिए। इस सिलसिले में पिछले कुछ सालों से जातीय आधार पर जनगणना की मांग भी लगातार हो रही है, जिस पर पूर्ववर्ती यूपीए सरकार का रवैया भी टालमटोल था और इस सरकार ने तो इस मांग को सिरे से ही खारिज कर दिया है। जाहिर है कि यह सब जानकारी नहीं होने पर सरकार के सारे काम तदर्थ या अनुमानित आंकड़ों के आधार पर ही होते हैं और उसकी योजनाओं का लाभ वास्तविक रूप से जरुरतमंद लोगों तक नहीं पहुंच पाता है।

पिछले साल मार्च में सरकार की ओर से जनगणना के लिए एक वैकल्पिक समय सीमा बताई गई थी, जिसके मुताबिक 2021-22 में मकानों की गिनती होनी थी और 2022-23 में लोगों की गिनती, अनुसूचित जाति (एससी)-अनुसूचित जनजाति (एसटी) का डाटा, भाषा, शिक्षा, साक्षरता, आर्थिक गतिविधियों आदि के बारे में जानकारी जुटाने का काम प्रस्तावित था। सरकार ने कहा था कि जनगणना संबंधी अंतरिम आंकड़े 2023-24 में जारी कर दिए जाएंगे। अब साल 2021 खत्म हो चुका है और 2022 की शुरुआत हो चुकी है लेकिन जनगणना के प्रारंभिक चरण यानी मकानों की गिनती का काम भी शुरू नहीं हो सका है।

देश को आजाद हुए 75 वर्ष पूरे हो चुके हैं। मौजूदा सरकार का दावा है कि कमजोर तबकों का जीवन स्तर ऊंचा उठाने और अन्य लोक कल्याण संबंधी जितने काम पिछले 70 साल में नहीं हुए, उससे ज्यादा काम उसने महज 6-7 साल में ही कर दिए हैं। लेकिन जनगणना शुरू कराने को लेकर उसके टालू रवैये से अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह सरकार विकास, सामाजिक न्याय और समाज कल्याण को लेकर कितनी गंभीर है! वैसे भी जब कोई सरकार अपनी पूर्ववर्ती सरकारों की शुरू की गई योजनाओं के नाम बदलने, उसके द्वारा शुरू की गई विकास परियोजनाओं को अपनी बता कर उनका उद्घाटन करने तथा शहरों, सड़कों, इमारतों और रेलवे स्टेशनों का नाम बदलने को ही विकास समझती हो तो उसके लिए जनगणना के आंकड़े कोई मायने नहीं रखते।

हालांकि अभी भी केंद्र सरकार यही कह रही है कि वह 2021 की जनगणना कराएगी, लेकिन सूत्रों के हवाले से खबर यह भी आ रही है कि सरकार कोरोना वैक्सीनेशन के आंकड़ों से हासिल जनसंख्या के आंकड़े को ही जनगणना का आंकड़ा मान सकती है। अगर सरकार ऐसा करती है और यह निश्चित ही बहुत अनर्थकारी और देश के लोगों की आंखों में धूल झोंकने वाला काम होगा। क्योंकि वैक्सीनेशन के आंकड़ों से सिर्फ आबादी की संख्या ही पता चलेगी, जबकि विधिवत और पारंपरिक तरीके से होने वाली जनगणना से कई तरह के आंकड़े मिलते हैं, जिनके आधार पर ही केंद्र और राज्य सरकारें अपनी नीतियां और जनकल्याणकारी योजनाएं बनाती हैं। अभी 2011 की जनगणना के आंकड़ों और उसके आधार पर लगाए अनुमानों से ही काम चल रहा है।

दरअसल वैक्सीनेशन के आंकड़े किसी भी तरह जनगणना के आंकड़ों का विकल्प नहीं हो सकते। जनगणना के आंकड़ों से देश की जनसंख्या के साथ ही जनसंख्या बढ़ने या घटने की दर, जनसंख्या का घनत्व, धर्म आधारित जनसंख्या और लिंगानुपात संबंधी जानकारी मिलती है। मकानों की संख्या का पता चलता है। इन्हीं आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि कितने लोगों के पास अपना स्वयं का मकान है, कितने लोग किराए के मकान में रहते हैं, कितने लोग कच्चे या पक्के मकानों में रहते हैं और कितने लोग बेघर हैं या झुग्गी बस्तियों में रहते हैं। इसके अलावा अनुसूचित जाति-जनजाति की आबादी के आंकड़े पता चलते हैं। लोगों की सामाजिक आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति के साथ ही देश में साक्षरता के बारे में भी जानकारी मिलती है। जनगणना से ही यह भी पता चलता है कि विभिन्न प्रदेशों में मातृभाषा और दो अन्य भाषाओं की स्थिति क्या है। वैक्सीनेशन के आंकडों से सिर्फ लोगों की संख्या का ही पता चलेगा। इसलिए वैक्सीनेशन के आंकडे किसी भी सूरत में जनगणना के आंकड़ों का विकल्प नहीं हो सकते। और यही नहीं वैक्सीन भी अभी देश की पूरी आबादी को नहीं दी जा रही है। 15 से 18 वर्ष आयु के युवाओं के वैक्सीनेशन का काम ही अभी शुरू हुआ है। जबकि जनगणना में तो 0 से 15 वर्ष की आबादी भी गिनी जानी है।

वैसे असल सवाल यही है कि सरकार के बाकी सारे काम कोरोना महामारी के बीच भी होते रहे हैं। राज्यों में विधानसभा और स्थानीय निकायों के चुनाव तथा चुनावी रैलियां भी महामारी के दौरान नहीं रूकी हैं तो फिर जनगणना टालने का क्या मतलब है? जनगणना के काम में तो भीड़ भी नहीं जुटती है। सरकार जिस तरह चुनावी प्रक्रिया में शामिल सरकारी कर्मचारियों को फ्रंटलाइन वर्कर मान कर उन्हें वैक्सीन का प्रीकॉशन डोज लगवा रही है, उसी तरह से जनगणना करने वाले कर्मचारियों को भी प्रीकॉशन डोज लगा कर काम शुरू कराया जा सकता है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

census
UP ELections 2022
BJP

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

गुजरात: भाजपा के हुए हार्दिक पटेल… पाटीदार किसके होंगे?


बाकी खबरें

  • Sustainable Development
    सोनिया यादव
    सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करने में भारत काफी पीछे: रिपोर्ट
    03 Mar 2022
    एनुअल स्टेट ऑफ इंडियाज एनवायरमेंट 2022 रिपोर्ट के मुताबिक सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करने में भारत फिलहाल काफी पीछे है। ऐसे कम से कम 17 प्रमुख सरकारी लक्ष्य हैं, जिनकी समय-सीमा 2022 है और धीमी गति…
  • up elections
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    पूर्वांचल की जंग: 10 जिलों की 57 सीटों पर सामान्य मतदान, योगी के गोरखपुर में भी नहीं दिखा उत्साह
    03 Mar 2022
    इस छठे चरण में शाम पांच बजे तक कुल औसतन 53.31 फ़ीसद मतदान दर्ज किया गया। अंतिम आंकड़ों का इंतज़ार है। आज के बाद यूपी का फ़ैसला बस एक क़दम दूर रह गया है। अब सात मार्च को सातवें और आख़िरी चरण के लिए…
  • election
    न्यूज़क्लिक टीम
    यूपी चुनाव: बस्ती के इस गांव में लोगों ने किया चुनाव का बहिष्कार
    03 Mar 2022
    बस्ती जिले के हर्रैया विधानसभा में आधा दर्ज़न गांव के ग्रामीणों ने मतदान बहिष्कार करने का एलान किया है। ग्रामीणों ने बाकायदा गांव के बाहर इसका बैनर लगा दिया है। ग्रामीणों का कहना है कि जब तक उनकी…
  • gehariyaa
    एजाज़ अशरफ़
    गहराइयां में एक किरदार का मुस्लिम नाम क्यों?
    03 Mar 2022
    हो सकता है कि इस फ़िल्म का मुख्य पुरुष किरदार का अरबी नाम नये चलन के हिसाब से दिया गया हो। लेकिन, उस किरदार की नकारात्मक भूमिका इस नाम, नामकरण और अलग नाम की सियासत की याद दिला देती है।
  • Haryana
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    हरियाणा: आंगनबाड़ी कर्मियों का विधानसभा मार्च, पुलिस ने किया बलप्रयोग, कई जगह पुलिस और कार्यकर्ता हुए आमने-सामने
    03 Mar 2022
    यूनियन नेताओं ने गुरुवार को कहा पंचकुला-यमुनानगर राष्ट्रीय राजमार्ग पर बरवाला टोल प्लाजा पर हड़ताली कार्यकर्ताओं और सहायकों पर  हरियाणा पुलिस ने लाठीचार्ज  किया।  
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License