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भारत
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सरकार ने मेडिकल कॉलेजों की बजाय मंदिरों को प्राथमिकता दी,  इसी का ख़ामियाज़ा यूक्रेन में भुगत रहे हैं छात्र : मेडिकल विशेषज्ञ
विशेषज्ञों का कहना है कि रूस, चीन और पूर्वी यूरोपीय देशों में मेडिकल की डिग्री हासिल करने के लिए जाने वाले भारतीय छात्रों की बड़ी तादाद की मुख्य वजह देश के निजी चिकित्सा संस्थानों की मोटी फीस है।
रवि कौशल
04 Mar 2022
mbbs
प्रतीकात्मक चित्र सौजन्य : टाइम्स ऑफ इंडिया

युद्धग्रस्त यूक्रेन में मेडिकल छात्र नवीन शेखरप्पा की दुखद मौत ने मेडिकल शिक्षा हासिल करने के लिए विदेश पलायन करने वाले भारतीय छात्रों के मसले को शिद्दत से उठाया है। एक अनुमान है कि यूक्रेन के विभिन्न कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में 18,000 भारतीय छात्र एमबीबीएस सहित आगे के विभिन्न पाठ्यक्रमों में नामांकित हैं। लिहाजा, उन सबको बचाने की जरूरत है, क्योंकि रूसी सेना कीव और खार्किव की ओर आगे बढ़ रही है।

केंद्रीय मंत्री प्रहलाद जोशी ने कहा कि विदेशी विश्वविद्यालयों में पढ़ने जाने वालों में 90 प्रतिशत छात्र ऐसे हैं, जो भारत में मेडिकल पाठ्यक्रमों के लिए तय योग्यता परीक्षा पास नहीं कर सकते हैं। भारत में एमबीबीएस कोर्स में दाखिले के लिए, किसी भी छात्र को राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (NEET) पास करनी होती है। इसमें आए स्कोर के आधार पर ही यह तय किया जाता है कोई छात्र सरकारी और निजी चिकित्सा संस्थानों में प्रवेश प्राप्त कर सकता है या नहीं। इसके विपरीत, निवर्तमान छात्रों के दावों से पता चलता है कि चीन, रूस समेत पूर्व सोवियत संघ का हिस्सा रहे देश,अपनी मजबूत चिकित्सा शिक्षा अवसंरचना और सस्ती आर्थिक शुल्क संरचना के लिए भारतीय छात्रों के पसंदीदा गंतव्य बने हुए हैं।

केंद्रीय मंत्री अजित भारती पवार ने राज्यसभा में भाजपा सांसद राकेश सिन्हा के एक सवाल के जवाब में बताया कि देश में कुल 596 मेडिकल कॉलेज हैं, जिनमें से 313 सरकार द्वारा संचालित किए जाते हैं। 283 निजी क्षेत्र के कॉलेज हैं, जो विभिन्न ट्रस्ट/सहकारी समितियों/पंजीकृत कंपनियों के माध्यम से संचालित किए जाते हैं। हालांकि उन्होंने कहा कि सरकारी और निजी कॉलेजों में नवीनतम सीटों की सही-सही तादाद मालूम नहीं है। फरवरी 2021 में राज्यसभा में दिए गए सरकार के एक अन्य जवाब में यह खुलासा हुआ कि देश में सरकारी 55 कॉलेजों में 43,237 सीटें और 66 निजी कॉलेजों में 41,190 सीटें हैं।

हालांकि, 8.7 लाख उम्मीदवारों ने नीट क्वालीफाई किया था। नीट के माध्यम से कांउसलिंग के पात्र होने के लिए किसी भी उम्मीदवार को कुल 720 अंकों में से 138 अंक प्राप्त होना चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि नीट की वर्तमान संरचना समाज के समृद्ध वर्ग के पक्ष में अत्यधिक झुकी हुई है। उम्मीदवारों को नीट की परीक्षा पास करने के लिए तैयारी करने के लिए कोचिंग की जरूरत पड़ती है, जहां उन्हें लाखों रुपये की फीस चुकानी होती है। नीट में कम अंक पाने वाले छात्रों को निजी कॉलेजों में दाखिला मिल सकता है बशर्तें कि वे चार वर्षीय पाठ्यक्रम के लिए 1 करोड़ रुपये का भारी शुल्क भुगतान करने के इच्छुक हैं। इसकी तुलना में पूर्वी यूरोपीय के देश मेडिकल छात्रों की ट्यूशन फीस, आवास और भोजन मद में मात्र 25-35 लाख रुपये ही लेते हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि इस पूरी घटना के पीछे देश के निजी संस्थानों द्वारा मोटी फीस की वसूली मुख्य वजह बनी हुई है। इस बारे में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एजुकेशन प्लानिंग एंड एडमिनिस्ट्रेशन द्वारा प्रकाशित मधुरिमा नंदी और रामा बारू की लिखी किताब "स्टुडेंट मोबालिटि इन हायर एजुकेशन-दि केस ऑफ इंडियन स्टुडेंट स्टडिइंग मेडिसीन इन चाइना" में सुझाव दिया गया है कि  "जो लोग देश के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में दाखिला पाने में असमर्थ हैं और यहां के निजी कॉलेजों में ट्यूशन फीस का भी भुगतान करने में असमर्थ हैं, वे ज्यादातर छात्र रूस, यूक्रेन और मध्य एशियाई देशों का रुख करते हैं। उनमें से अधिकतर चीन के लिए अपना रास्ता खोजते हैं, जिसके अलग-अलग प्रांतों ने फीस की दर भिन्न-भिन्न है। एक अनुमान के आधार पर, पेइचिंग में एक छात्र एमबीबीएस कोर्स की सब मिलाकर छह साल की पढ़ाई में सभी लागतों सहित लगभग 50-60 लाख रुपये खर्च करता है। यहां चीन के अन्य प्रांतों के कॉलेजों की तुलना में लागत सबसे अधिक होगी क्योंकि पेइचिंग राजधानी शहर है, जहां का रहन-सहन महंगा है। यही बात चीन के दूसरे शहर शंघाई के बारे में कही जा सकती है।"

"इसकी तुलना में, भारत में किसी निजी मेडिकल कॉलेज में एक सीट के लिए लागत बहुत अधिक है और कहीं-कहीं तो 4 लाख से लेकर 40 लाख रुपये केवल फीस मद में देना पड़ता है। इसके बाद, रहन-सहन और कुछ अन्य छिपी लागतें होती हैं सो अलग। कई कॉलेज कैपिटेशन फीस भी लेते हैं, जहां डोनेशन दे कर कोई छात्र एक सीट खरीदता है। हालांकि यह अवैध है लेकिन यह प्रथा अभी भी प्रचलित है,“अध्ययन में कहा गया है।

देश में महंगी निजी चिकित्सा शिक्षा की जड़ें भी अनियमित शुल्क संरचना और दंडमुक्ति में है, जिनका फायदा ये कॉलेज उठाते हैं। मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) पर राज्यसभा की 92वीं स्थाई समिति की रिपोर्ट में पाया गया कि प्राइवेट कॉलेज अपने संस्थान की मान्यता दिलाने और उसके बाद सीटों की संख्या बढ़ाने के लिए एमसीआई के पूर्ववर्ती कई सदस्यों को रिश्वत देते थे। इसी तरह, रिपोर्ट ने किसी मेडिकल कॉलेज शुरू करने के लिए 20 एकड़ जमीन होने ही होने जैसे कठोर नियम बनाने के लिए भी प्राधिकरण की आलोचना की।

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि "समिति के समक्ष उपस्थित कई विशेषज्ञों ने कहा कि कॉलेज चलाने के लिए जमीन, परीक्षा हॉल, परीक्षा हॉल का आकार, पुस्तकालय आदि जैसी बुनियादी आवश्यकताओं को अपरिहार्य बनाने की प्रक्रिया बहुत ही तर्कहीन और कठोर हैं। बुनियादी ढांचे की आवश्यकताओं में लचीलापन लाने की तत्काल आवश्यकता है। यह तर्क दिया गया कि अवसंरचना आवश्यकताओं में लचीलापन चिकित्सा शिक्षा की लागत को कम करेगा, जो छात्रों पर एक बड़ा बोझ लाद देता है। समिति के समक्ष पेश हुए एक विशेषज्ञ ने कहा कि मेडिकल कॉलेज खोलने के लिए 20 एकड़ जमीन की शर्त रखी गई है, उस जमीन की आज की लागत लगभग 500 करोड़ रुपये है। इसीसे मेडिकल कालेज उच्च कैपिटेशन शुल्क वसूलते हैं और गरीब परिवारों के प्रतिभाशाली बच्चे इसे न चुका पाने की वजह से चिकित्सा शिक्षा पाने के मौके से वंचित रह जाते हैं।"

हालांकि, सरकार एक केंद्रीय प्रायोजित योजना में भी दिशा-निर्देशों के इसी प्रावधान के साथ आगे बढ़ी है, जिसके माध्यम से वह मौजूदा जिला/रेफरल अस्पतालों को जोड़कर नए मेडिकल कॉलेज स्थापित करना चाहती है। मेडिकल कॉलेज शुरू करने के लिए अर्हता मानदंडों के तहत, कहा गया है कि आवेदक के पास खुद का "एक भूखंड होना चाहिए जो 20 एकड़ से कम का नहीं हो या आवेदक के पास 99 साल के लिए लीज पर लिया गया भूखंड का अधिकार हो, जिस पर मेडिकल कॉलेज का निर्माण किया जाना है।"

जनस्वास्थ्य अभियान हरियाणा के आरएस दहिया ने न्यूजक्लिक से बात करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस मामले में स्पष्ट मानदंड तय किए जाने के बावजूद राज्य सरकारें फीस का अब तक नियमन नहीं कर सकीं हैं।

"उदारीकरण के बाद, हम निजी क्षेत्र में एक जोर पाते हैं, जहां कोई भी निजी संस्थानों से यह पूछने की हिम्मत नहीं करता है कि क्या छात्रों को चिकित्सा शिक्षा प्राप्त करने के लिए वास्तव में करोड़ों रुपये में फीस का भुगतान करने की आवश्यकता है। अगर इन छात्रों का परिवार करोड़ों रुपये फीस चुकाने पर खर्च करता है, तो जाहिर है कि वे इस रकम को मरीजों के दिए जाने इलाज से ही वसूलेंगे। दूसरा, सरकार स्वास्थ्य सेवाओं को सुचारु रखने में दिलचस्पी नहीं रखती है। मैं इसके कई उदाहरण गिना सकता हूं। अकेले हरियाणा के जिलों में सामुदायिक और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में सेवारत चिकित्सा अधिकारियों की निर्धारित संख्या की आधी है। सरकार प्रत्येक जिले में एक मेडिकल कॉलेज खोलने की बात कर रही है, लेकिन यह मुख्य रूप से सार्वजनिक - निजी भागीदारी (पीपीपी) मॉडल पर खुलना है, जो शायद ही कोई फल देगा। हमारे कई डॉक्टर दिल्ली गए क्योंकि उन्हें वहां अच्छा रोकडा मिला। इन सबसे ऊपर, सरकार करों की वसूली से मंदिर बनाने के बारे में अधिक चिंतित है, पर मेडिकल कॉलेज की उसे चिंता ही नहीं है!"

अंग्रेजी में मूल रूप से लिखे लेख को पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें

Government Prioritised Temples Instead of Medical Colleges, Students Paying for it in Ukraine: Medical Experts

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Liberalisation
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