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क्या हुआ जब ब्रेख़्त से मिलने पहुँचे हबीब तनवीर?
नाट्य जगत के ग्लोब को अपनी उंगलियों से नचाने वाले हबीब तनवीर ने 8 जून 2009 को भोपाल में अंतिम सांस ली थी। उनकी 11वीं पुण्यतिथि पर पेश है आपके बीच हबीब साहब और ब्रेख़्त से जुड़ी कुछ दिलचस्प बातें।
आमिर मलिक
14 Jun 2020
हबीब तनवीर
Image Courtesy: Iwmbuzz

नाटक अपने आप में सारी दुनिया समोए होता है। नाटक की इसी ख़ूबी पर शेक्सपियर ने कहा था, “ ऑल द वर्ल्ड इज़ आ स्टेज”। इस कथन के लगभग चार शताब्दी बाद, भारत में हबीब तनवीर ने जन्म लिया। उनके नाटक का ज़िक्र करके ऐसा लगता है मानो दुनियाभर के रंगमंच एक ही रंगमंच पर आ गए हों। 

हबीब ने हमेशा ज़मीनी स्तर पर रहते हुए, शोषितों के बारे में सोचा और कहीं ना कहीं अपना जीवन ही शोषितों को समर्पित कर दिया। उन्होनें कहा था, “मैंने संस्कृति के विभाजन को आसान कर दिया है। इसे दो भागों में बांटा है—उत्पीड़क कि संस्कृति और पीड़ित की संस्कृति। यह तय आपको करना होगा कि आप किस पक्ष के हैं- ज़ालिम या मजलूम?” 

हबीब तनवीर निर्देशक, अभिनेता, शिक्षक, प्रबंधक और कवि थे, उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो में भी काम किया, फ़िल्मों के लिए कुछ गीत लिखे और अभिनय किया। इप्टा और प्रगतिशील लेखक संघ से भी जुड़े रहे। 

हबीब अपने साथ थिएटर को नई ऊंचाइयों तक ले गए। उन्होने पोंगा पंडित, चरणदास चोर, गांव नाम ससुराल मोर नाम दामाद, बहादुर कलारिन, शाजापुर कि शांतिबाई और न जाने कितने अन्य नाटकों में शोषितों के हक के लिए आवाज़ उठाई और समाज में प्रचलित अंधविश्वास और अन्य बुराइयों के ख़िलाफ़ मुखर रहे।

उनपर लिखी किताब ‘हबीब तनवीर टोवॉड्स एन इन्क्लूसिव थिएटर’ में अंजुम कत्याल एक किस्सा सुनाती हैं: हबीब 1950 के दशक में यूरोप भ्रमण पर थे। मुश्किल से जेब में कुछ पाउंड होंगे। तभी एक युवा अल्जीरियाई उनके पास आए और निशानी स्वरूप उनका फाउंटेन-पेन और जेब में रखे दस पाउंड मांगने लगे। 

तभी हबीब ने कहा, “क्या तुम गीत सुनना चाहोगे?” उसने हां में सिर हिलाया। हबीब ने फिर पूछा,  तुम मुझे कोई अल्जीरियाई गीत सुना सकते हो?” उसने कहा हां। इसके बाद ऐसा ही हुआ। हबीब ने अल्जीरियाई गीत सुना, उसको याद रखा और निशानी के तौर पर उस युवा को एक छत्तीगढिय़ा लोकगीत सुनाया, समझाया। संस्कृति से इतना लगाव था हबीब तनवीर को। 

छत्तीसगढ़ के रायपुर के लिए एक सितंबर 1923  का दिन बड़ा खुशगवार रहा होगा। इसी दिन हबीब अहमद खान जोकि बाद में हबीब तनवीर के नाम से मशहूर हुए, पैदा हुए थे। शुरुआती पढ़ाई रायपुर में करने के बाद वो अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय आ गए। इन्हीं सब जगहों पर उनकी संगीत, कविता और लेखन में दिलचस्पी बढ़ी। सन् 1945 में वो बॉम्बे (मुंबई) गए, यहां लेखन, पत्रकारिता और थियेटर की तरफ़ रुझान हुआ। 

इसके बाद हबीब यूरोप में गए, थियेटर देखते और लंदन के ‘रॉयल अकादमी ऑफ ड्रामेटिक आर्ट्स’ (राडा) में और ब्रिस्टल ओल्ड विक थियेटर में पढ़ाई शुरू की। इस यात्रा के लिए डॉक्टर ज़ाकिर हुसैन ने उनकी आर्थिक मदद की। इसके बाद वो जब मशहूर जर्मन नाटककार, लेखक और कवि बर्तोल्त ब्रेख्त से मिलने गए तो पता चला कि कुछ ही महीने पहले उनकी मृत्यु हो चुकी है। 

ब्रेख्त ने अपनी पत्नी एवम् साथी हेलेन विगेल के साथ नाट्य मंडली बर्लिन एन्सेंबल बनाया था। इसे संयोग ही कहिए कि हबीब ने भी अपनी पत्नी और साथी मोनीका मिसरा के साथ 'नया थिएटर' की रचना की। वो अपने समय के प्रचलित धारणा के ख़िलाफ़ गए और कहा कि कला एक दूसरे से जुड़ी हुई है। संगीत और नाटक का चोली दामन का साथ है। 

जब नाटक में लोकगीत का प्रयोग किया जाता, तो वो गीत ये बताते कि ये ग़लत है और ये सही। दर्शक को सही चुनने पर मजबूर होना पड़ता। हबीब ने देखा ब्रेख्त जब संगीत का उपयोग करते हैं तो वो दो गीत देते हैं, दोनों दो धुरी पर और दर्शक को सोचने पर मजबूर होना पड़ता है। हबीब भारतीय नाटक में ये शैली लेकर आए। उनके नाटक पर आज भी लोग सोचने पर मजबूर होते हैं और ख़ुद फ़ैसला करते हैं। हबीब कुछ नहीं कहता।

जब हबीब अपने कैरियर कि शुरूआत कर रहे थे, तब फॉक (लोकगीत) प्रचलन में ही नहीं था। थियेटर में फॉक को लेकर आने और उसको एक "मॉडर्न" रूप में ज़िन्दा रखने का श्रेय हबीब तनवीर को जाता है। अपने थियेटर को भले ही उन्होंने मॉडर्न कहा पर परंपरा से उनका लगाव जग-ज़ाहिर है। वो ख़ुद कहते हैं, “परंपरा मॉडर्न ज़माने की गाड़ी है। इसको रचनात्मक ढंग से उपयोग करना होगा।”

उदाहरणार्थ पोंगा पंडित लें। आज भी भारत में छुआछूत धड़ल्ले से जारी है। दलितों को मंदिरों में प्रवेश मात्र से जान गंवानी पड़ती है। हबीब ने पोंगा पंडित नामक एक प्ले लिखा जिसमें एक “भंगण” मंदिर में प्रवेश करती है और हर चीज़ को छू देती है और जिसे भी वो छू दे, पंडित उसे अपवित्र कह देता है। उन “अपवित्र” चीज़ों को वो भंगण उठा कर बाहर ले आती है ताकि वो ख़ुद एक मंदिर बना सके। इतने रचनात्मक प्ले को उस समय के हिंदूवादी संगठनों ने बुरा भला कहा, जारी प्ले के बीच तोड़फोड़ मचाई।

हबीब कहां हार मानने वालों में से थे। उन्होनें और नाटक लिखे जिसे वो अलग अलग शहरों में लेकर गए। कहीं स्वागत हुआ, कहीं वही तोड़फोड़। आगरा बाज़ार अपने आप में विशेष था, क्यूंकि इसमें बिल्कुल देसी भाषा का प्रयोग था और कवि नज़ीर अकबराबादी के उन अश'आर पर आधारित था जो उन्होंने बाज़ार में सामान बेचने वालों की फरमाइश पर लिखे थे। 

हबीब अपने वक़्त के महानतम नाटककारों के बीच काम कर रहे थे। इब्राहीम अल्काज़ी, असग़र वजाहत, उत्पल दत्त, सत्यदेव दुबे, बी.वी.कारंत कुछ नाम हैं जिनके बीच काम करते हुए हबीब ने अपनी अलग दुनिया बनाई। उन्होंने जन नाट्य मंच के लिए कुछ नाटक लिखे, जिनमें से प्रमुख था— एक औरत हाइपाथिया भी थी। ये लिखी गई थी चौथी शताब्दी की अलेक्जेंड्रिया की एक गणितज्ञ औरत पर जिसे क्रिश्चियन कट्टरपंथियों ने लिंच कर दिया था। 

कट्टरपंथ से हबीब को बड़ी कोफ्त होती। वो अंधविश्वास और अवैज्ञानिकता पर भी मुंह-भोंह सिकोड़ लेते। उन्होंने असग़र वजाहत की 'जिस लाहौर नई देखिआ ओ जन्मा ही नई' को कई बार परफॉर्म किया। नाटक राज रक्त, और प्रेमचंद की लेखनी पर आधारित 'मोटेराम का सत्याग्रह' कुछ ऐसा ही बताती है। बाबरी मस्जिद विध्वंस पर भी उन्होंने प्ले किए और हिर्मा की अमर कहानी में उन्होंने बताया कि आदिवासियों के लिए विकास के वास्तविक अर्थ क्या है। 

सन् 1971 में उन्होंने नाटक इंदिरा लोकसभा के द्वारा इंदिरा गांधी के लिए कैंपेन किया, जिसके बाद उनको राज्यसभा का मेंबर चुन लिया गया। इमरजेंसी के बाद भी वहीं बने रहे। उनको एक दशक लगा जब वो कांग्रेस के ख़िलाफ़ बोलने लगे। निर्देशक सुधनवा देशपांडे द हिंदू के एक लेख में बताती हैं कि हबीब पर संघ परिवार का लगातार हमला, और शायद कांग्रेस कट्टरपंथियों द्वारा सफ़दर की हत्या के बाद हबीब की वामपंथ से नजदीकी उनको कम्युनिस्ट विचारधारा का हीरो बनाती है। 

हबीब को सच से बड़ा प्रेम था और शब्द गुरु की वो बड़ी इज्ज़त करते थे। अपने मशहूर प्ले चरणदास चोर में उन्होंने लिखा— 

गुरु ये बताते हैं 

कि सच का पथ इतना महान है

कि कुछ ही हैं

जो इसपर चल पाते हैं।


इसी में आगे उन्होंने लिखा—

एक मामूली चोर मशहूर हो गया है

कैसे?

सिर्फ़ सच बोलकर।

हिर्मा की अमर कहानी में उन्होंने ब्रेख़्त के विरोधाभास को उपयोग किया और सिर्फ़ सवाल किए, कोई जवाब नहीं दिया। ऐसा लगता है ब्रेख्त को उन्होंने अपना गुरु मान लिया था। शाजापुर कि शांतिबाई उन्होंने ब्रेख्त के नाटक गुड पर्सन ऑफ शेट्जुआं पर आधारित किया था। 

एक बार और ये कहना ग़लत नहीं होगा कि 'मिट्टी की गाड़ी' पर चढ़कर उन्होंने संस्कृत नाटक को आम लोगों तक पहुंचाया। वो कहते रहे कि संस्कृत भाषा के विद्वान पंडित भी मृच्छकटिकम को नहीं समझ सके। ये आम लोगों का नाटक था ना कि किसी राजा का। इसकी शैली पर “विद्वानों” ने आपत्ति जताई पर हबीब डटे रहे। 

हबीब ने कहा था: हमने पूँजीवाद के परिणामस्वरूप हुए विकास से क्या पाया? तकनीक ने साइंस को पछाड़ा, दुनिया को विषैला कर दिया। पेट्रोल पर लड़ाई हुई, बाज़ार के लिए लड़ाई, जन संहार करने वाले हथियार की लड़ाई छिड़ी, कट्टरपंथी कारणों से युद्ध हुए, राजकीय आतंकवाद, कला-गोरा भेद हुआ, नस्लीय युद्ध हुए, अफ्रीका में, एशिया, पूर्वी यूरोप, लातिन अमेरिका में युद्ध ने कोहराम मचा दिए। ऐसे विकास से हमने केवल युद्ध, युद्ध और युद्ध पाया। 

ये दिखाने के लिए की दुख कितना मार्मिक है, कई बार उस दुख को फिर से जीना होता है। ज़हरीली हवा लिखकर उन्होंने उन्होंने भोपाल गैस त्रासदी को फिर से जिया था। नाट्य जगत के ग्लोब को अपनी उंगलियों से नचाने वाले हबीब तनवीर ने 8 जून 2009 को भोपाल में अंतिम सांस ली। हवा आज भी ज़हरीली है। 

इस बार यूरोप से कोई नाटककार भारत नहीं आया। 

Habib Tanvir
Contemporary Indian theatre
The Legend
11th death anniversary

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