NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
हिमालयी हवा में भी घुल रहा ज़हर
जब हवा में प्रदूषण की बात आती है तो ध्यान दिल्ली के ईर्द-गिर्द ही सिमट जाता है क्योंकि प्रदूषण वहां स्मॉग के रूप में नंगी आंखों से दिख रहा है, लेकिन उत्तराखंड के हालात भी अच्छे नहीं हैं।
वर्षा सिंह
29 Nov 2018
UTTRAKHAND
Image Courtesy: hindustan times

उत्तराखंड अपने साफ हवा और पानी के लिए पर्यटकों के बीच प्रसिद्ध है। इको टूरिज़्म की बात करता है। लेकिन उत्तराखंड की आबोहवा भी तेज़ी से बदल रही है। वायु प्रदूषण के आंकड़ों को देखें तो वो दिन दूर नहीं, जब देहरादून में दिल्ली की तर्ज़ पर स्मॉग का ख़तरा खड़ा हो जाएगा। धुंध की चादर अब यहां भी दिखने लगी है।

फिर जब हवा में प्रदूषण की बात आती है तो ध्यान दिल्ली के ईर्द-गिर्द ही सिमट जाता है क्योंकि प्रदूषण वहां स्मॉग के रूप में नंगी आंखों से दिख रहा है, लेकिन दूसरी जगह भी हालात अच्छे नहीं हैं। वायु प्रदूषण के खतरों से हम इसलिए अंजान रहते हैं क्योंकि हवा दिखाई नहीं देती। लेकिन हमारे स्वास्थ्य पर इसका असर जानलेवा होता है। ख़ासतौर पर पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चे और बुजुर्ग इसका बड़ा शिकार होते हैं।

नया शोध जारी

उत्तराखंड में वायु प्रदूषण की स्थिति को लेकर देहरादून की गति संस्था ने शोध पत्र जारी किया है। “इम्पैक्ट ऑफ एयर पॉल्यूशन ऑन ह्यूमन हेल्थ” नाम से जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि हिमालयी क्षेत्र की हवा में भी प्रदूषण का स्तर बेहद तेजी से बढ़ता जा रहा है। जिसका असर सबसे ज्यादा बच्चों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन,  नीति आयोग, इंडिया स्टेट लेवल डिज़ीज बर्डन प्रोफाइल (1990 - 2016) की रिपोर्ट द इंडिया स्टेट लेवल डिज़ीज बर्डन इनिशियेटिव, इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ मेट्रिक्स एंड इवैल्यूएशन रिपोर्ट और परिवार कल्याण मंत्रालय के आंकड़ों के विश्लेषण से ये कहा गया है कि उत्तराखंड में हर वर्ष करीब 65 हजार मौतें होती हैं, इनमें से 6 हजार मौतों की वजह कहीं न कहीं वायु प्रदूषण होता है। वायु प्रदूषण के चलते होने वाली मौत का रिस्क फैक्टर बढ़ रहा है। यानी वायु प्रदूषण का सीधा असर हमारी सेहत पर पड़ रहा है। इन्स्टीट्यूट ऑफ हेल्थ मैट्रिक एंड इवैल्यूएशन के मुताबिक वर्ष 2017 में हुई मौतों की जो पांच बड़ी वजह रहीं, उनमें से चार बीमारियों की प्रमुख वजहों में से एक वायु प्रदूषण भी है।

बढ़ते वाहन एक बड़ी समस्या 

देहरादून शहर जो अपने शांत और ख़ूबसूरत वातावरण के लिए जाना जाता था। जहां लोग रिटायरमेंट के बाद घर बनाकर रहना पसंद करते थे। बीते एक दशक में शहर का मिज़ाज तेजी से बदला है। औद्योगीकरण, अनियमित निर्माण और गाड़ियों की दिन प्रतिदिन बढ़ती संख्या ने शहर की आबो-हवा को भी बदल दिया है। देहरादून के एसपी ट्रैफिक लोकेश्वर सिंह के मुताबिक उत्तराखंड में पर्यटकों के वाहनों से होने वाले प्रदूषण भी एक बड़ी वजह है। वे बताते हैं कि सिर्फ देहरादून में करीब 60 हज़ार से 80 हज़ार के बीच पर्यटकों की गाड़ियां हर रोज़ प्रवेश करती हैं। इसके साथ ही देहरादून की सड़कों पर गाड़ियों की संख्या हर वर्ष बढ़ती जा रही है। राज्य के दूसरे बड़े शहरों का भी यही हाल है। हरिद्वार और ऋषिकेश दोनों ही एयर क्वालिटी इंडैक्स की मॉडरेटली {हवा की गुणवत्ता को मापने के मानकों की एक श्रेणी} कैटेगरी में आते हैं। यानी यहां की हवा भी तेज़ी से बदल रही हैं और प्रदूषण स्तर बढ़ रहा है।

पीएम 10 का ख़तरनाक स्तर

उत्तराखंड पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़ों के मुताबिक हवा में प्रदूषित कण पीएम 10 का स्तर वर्ष 2017 में औसतन देहरादून में 231.06 रहा, ऋषिकेश में 132.727, हरिद्वार में 99.229 और हल्द्वानी 123.722 रहा। मानकों के मुताबिक पीएम 10 का स्तर 40-60 माइक्रो ग्राम प्रति घन मीटर होना चाहिए। इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि देहरादून जैसे इको सेंसेटिव ज़ोन में शामिल जगह की हवा कितनी ज़हरीली है।

देहरादून में प्रदूषण की एक बड़ी वजह यहां डीज़ल से चलने वाले ऑटो-टैंपों भी हैं। जिनका रखरखाव ठीक से नहीं होता और वे हवा में ज़हरीली गैसे तेज़ी से मिलाते हैं। लेकिन सिर्फ औद्योगिक और वाहनों के चलते होने वाला प्रदूषण ही नहीं बल्कि घरों में इस्तेमाल होने वाला ठोस ईंधन भी देहरादून के ग्रामीण इलाकों में प्रदूषण की एक बड़ी वजह है। राज्य के ग्रामीण क्षेत्र मुक्तेश्वर में वायु प्रदूषण को लेकर एक अध्ययन किया गया। यहां की हवा में एयरोसोल की मात्रा पायी गई। धुआं एक किस्म का एयरोसोल ही है, जो हमारी सेहत को प्रभावित करता है। मुक्तेश्वर में गर्मियों और मानसून के बाद पीएम 2.5 का स्तर और एयरोसोल दोनों ही शाम के समय ज्यादा पाये गये। इसकी वजह घरों में लकड़ी से जलने वाला चूल्हा या गर्माहट के लिये जलायी जाने वाली लकड़ियां हैं। ये घर के अंदर की वायु को प्रदूषित करती हैं।

जल्द दिल्ली जैसा हो जाएगा देहरादून?

देहरादून में फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट के मेडिकल ऑफिसर डॉक्टर रिमांत गुप्ता चेताते हैं कि यदि वायु प्रदूषण से निपटने के लिए जरूरी कदम नहीं उठाए गये तो देहरादून की स्थिति भी दिल्ली जैसी हो सकती है। डॉक्टर रिमांत भी इस शोध से जुड़े हैं। उन्होंने राजधानी के कई डॉक्टरों से भी इस बारे में बात की। उनका कहना है कि छोटे बच्चों में सर्दी, जुकाम, खांसी, गले की खराश, आंखों में जलन जैसी समस्याओं की वजहों में से एक वायु प्रदूषण भी है। डॉ. रिमांत कहते हैं कि सरकार को नीति बनाकर इस दिशा में प्रयास करने चाहिए। साथ ही लोगों को भी जागरुक करने की जरूरत है।

इस वर्ष डब्ल्यू-एच-ओ ने दुनिया के बीस सबसे प्रदूषित शहरों की सूची जारी की थी। जिसमें से 14 उत्तर भारत में थे। हिमालयी राज्य की चिंता इसलिए भी बड़ी है क्योंकि श्रीनगर (जम्मू-कश्मीर) इस सूची में दसवें स्थाने पर था। उत्तराखंड के देहरादून, हरिद्वार, ऋषिकेश, हल्द्वानी जैसे शहरों में जिस तेजी से वायु प्रदूषण बढ़ रहा है, ये वक्त संभलने और सही कदम उठाने का है।

Uttrakhand
pollution
Air Pollution
Environmental Pollution
himalaya
BJP Govt

Related Stories

वर्ष 2030 तक हार्ट अटैक से सबसे ज़्यादा मौत भारत में होगी

बच्चों को कौन बता रहा है दलित और सवर्ण में अंतर?

उत्तराखंड: क्षमता से अधिक पर्यटक, हिमालयी पारिस्थितकीय के लिए ख़तरा!

मध्यप्रदेशः सागर की एग्रो प्रोडक्ट कंपनी से कई गांव प्रभावित, बीमारी और ज़मीन बंजर होने की शिकायत

बिहार की राजधानी पटना देश में सबसे ज़्यादा प्रदूषित शहर

बनारस में गंगा के बीचो-बीच अप्रैल में ही दिखने लगा रेत का टीला, सरकार बेख़बर

दिल्ली से देहरादून जल्दी पहुंचने के लिए सैकड़ों वर्ष पुराने साल समेत हज़ारों वृक्षों के काटने का विरोध

साल 2021 में दिल्ली दुनिया की सबसे प्रदूषित राजधानी थी : रिपोर्ट

विश्व जल दिवस : ग्राउंड वाटर की अनदेखी करती दुनिया और भारत

ग्राउंड रिपोर्ट: महंगाई-बेरोजगारी पर भारी पड़ी ‘नमक पॉलिटिक्स’


बाकी खबरें

  • bhasha singh
    न्यूज़क्लिक टीम
    किसान आंदोलन की वजह से घर-घर चक्कर काट रहे हैं गृह मंत्री : धर्मेंद्र मलिक
    29 Jan 2022
    जाटलैंड यानी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान आंदोलन ने कितनी बदली है तस्वीर, क्या चलेगा भाजपा का सांप्रदायिक कार्ड, इस पर वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने बात की भारतीय किसान यूनियन के अहम चेहरे और मीडिया…
  • uttarpradesh
    रवि शंकर दुबे
    यूपी चुनाव: जिसके सर होगा पूर्वांचल का हाथ, वही करेगा यूपी में राज!
    29 Jan 2022
    देश का सबसे बड़ा सियासी सूबा उत्तर प्रदेश हर बार यही सोचता है कि इस बार तो विकास पर चुनाव होंगे, लेकिन गाड़ी आकर आखिरकार जातिवाद पर ही अटक जाती है, ऐसे में पूर्वांचल का जातीय समीकरण हर बार राजनीतिक…
  • chunav chakra
    न्यूज़क्लिक टीम
    उत्तराखंड 2022: क्या खदबदा रहा है पहाड़ के भीतर, पहाड़ की सियासत, पहाड़ के सवाल
    29 Jan 2022
    सन् 2000 में उत्तर प्रदेश से अलग होकर बना उत्तराखंड राज्य आज तक अपनी तकदीर नहीं बदल पाया। हर बार इस आशा में सरकार बदलता है कि शायद इस बार अच्छा होगा...लेकिन इसके अच्छे दिन नहीं आते। भाजपा और कांग्रेस…
  • GANDHI JI
    राजेंद्र शर्मा
    कटाक्ष: टीवी स्टूडियो में गांधी जी के साथ महाबहस
    29 Jan 2022
    बापू मुस्कुरा के बोले— मुझे तो इतने साल पहले मारा जा चुका है। फिर आप मुझे मारने के लिए अब क्यों परेशान हो रहे हैं?
  • Bundelkhand
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    यूपीः योगी सरकार के 5 साल बाद भी पानी के लिए तरसता बुंदेलखंड
    29 Jan 2022
    उत्तर प्रदेश को बुंदेलखंड स्पेशल पैकेज के तहत जितना पैसा दिया गया उसका 66% यानी 1445.74 करोड़ रुपये का इस्तेमाल पानी का संकट दूर करने के लिए किया गया लेकिन स्थिति नहीं बदली।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License