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हिमालयी हवा में भी घुल रहा ज़हर
जब हवा में प्रदूषण की बात आती है तो ध्यान दिल्ली के ईर्द-गिर्द ही सिमट जाता है क्योंकि प्रदूषण वहां स्मॉग के रूप में नंगी आंखों से दिख रहा है, लेकिन उत्तराखंड के हालात भी अच्छे नहीं हैं।
वर्षा सिंह
29 Nov 2018
UTTRAKHAND
Image Courtesy: hindustan times

उत्तराखंड अपने साफ हवा और पानी के लिए पर्यटकों के बीच प्रसिद्ध है। इको टूरिज़्म की बात करता है। लेकिन उत्तराखंड की आबोहवा भी तेज़ी से बदल रही है। वायु प्रदूषण के आंकड़ों को देखें तो वो दिन दूर नहीं, जब देहरादून में दिल्ली की तर्ज़ पर स्मॉग का ख़तरा खड़ा हो जाएगा। धुंध की चादर अब यहां भी दिखने लगी है।

फिर जब हवा में प्रदूषण की बात आती है तो ध्यान दिल्ली के ईर्द-गिर्द ही सिमट जाता है क्योंकि प्रदूषण वहां स्मॉग के रूप में नंगी आंखों से दिख रहा है, लेकिन दूसरी जगह भी हालात अच्छे नहीं हैं। वायु प्रदूषण के खतरों से हम इसलिए अंजान रहते हैं क्योंकि हवा दिखाई नहीं देती। लेकिन हमारे स्वास्थ्य पर इसका असर जानलेवा होता है। ख़ासतौर पर पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चे और बुजुर्ग इसका बड़ा शिकार होते हैं।

नया शोध जारी

उत्तराखंड में वायु प्रदूषण की स्थिति को लेकर देहरादून की गति संस्था ने शोध पत्र जारी किया है। “इम्पैक्ट ऑफ एयर पॉल्यूशन ऑन ह्यूमन हेल्थ” नाम से जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि हिमालयी क्षेत्र की हवा में भी प्रदूषण का स्तर बेहद तेजी से बढ़ता जा रहा है। जिसका असर सबसे ज्यादा बच्चों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन,  नीति आयोग, इंडिया स्टेट लेवल डिज़ीज बर्डन प्रोफाइल (1990 - 2016) की रिपोर्ट द इंडिया स्टेट लेवल डिज़ीज बर्डन इनिशियेटिव, इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ मेट्रिक्स एंड इवैल्यूएशन रिपोर्ट और परिवार कल्याण मंत्रालय के आंकड़ों के विश्लेषण से ये कहा गया है कि उत्तराखंड में हर वर्ष करीब 65 हजार मौतें होती हैं, इनमें से 6 हजार मौतों की वजह कहीं न कहीं वायु प्रदूषण होता है। वायु प्रदूषण के चलते होने वाली मौत का रिस्क फैक्टर बढ़ रहा है। यानी वायु प्रदूषण का सीधा असर हमारी सेहत पर पड़ रहा है। इन्स्टीट्यूट ऑफ हेल्थ मैट्रिक एंड इवैल्यूएशन के मुताबिक वर्ष 2017 में हुई मौतों की जो पांच बड़ी वजह रहीं, उनमें से चार बीमारियों की प्रमुख वजहों में से एक वायु प्रदूषण भी है।

बढ़ते वाहन एक बड़ी समस्या 

देहरादून शहर जो अपने शांत और ख़ूबसूरत वातावरण के लिए जाना जाता था। जहां लोग रिटायरमेंट के बाद घर बनाकर रहना पसंद करते थे। बीते एक दशक में शहर का मिज़ाज तेजी से बदला है। औद्योगीकरण, अनियमित निर्माण और गाड़ियों की दिन प्रतिदिन बढ़ती संख्या ने शहर की आबो-हवा को भी बदल दिया है। देहरादून के एसपी ट्रैफिक लोकेश्वर सिंह के मुताबिक उत्तराखंड में पर्यटकों के वाहनों से होने वाले प्रदूषण भी एक बड़ी वजह है। वे बताते हैं कि सिर्फ देहरादून में करीब 60 हज़ार से 80 हज़ार के बीच पर्यटकों की गाड़ियां हर रोज़ प्रवेश करती हैं। इसके साथ ही देहरादून की सड़कों पर गाड़ियों की संख्या हर वर्ष बढ़ती जा रही है। राज्य के दूसरे बड़े शहरों का भी यही हाल है। हरिद्वार और ऋषिकेश दोनों ही एयर क्वालिटी इंडैक्स की मॉडरेटली {हवा की गुणवत्ता को मापने के मानकों की एक श्रेणी} कैटेगरी में आते हैं। यानी यहां की हवा भी तेज़ी से बदल रही हैं और प्रदूषण स्तर बढ़ रहा है।

पीएम 10 का ख़तरनाक स्तर

उत्तराखंड पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़ों के मुताबिक हवा में प्रदूषित कण पीएम 10 का स्तर वर्ष 2017 में औसतन देहरादून में 231.06 रहा, ऋषिकेश में 132.727, हरिद्वार में 99.229 और हल्द्वानी 123.722 रहा। मानकों के मुताबिक पीएम 10 का स्तर 40-60 माइक्रो ग्राम प्रति घन मीटर होना चाहिए। इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि देहरादून जैसे इको सेंसेटिव ज़ोन में शामिल जगह की हवा कितनी ज़हरीली है।

देहरादून में प्रदूषण की एक बड़ी वजह यहां डीज़ल से चलने वाले ऑटो-टैंपों भी हैं। जिनका रखरखाव ठीक से नहीं होता और वे हवा में ज़हरीली गैसे तेज़ी से मिलाते हैं। लेकिन सिर्फ औद्योगिक और वाहनों के चलते होने वाला प्रदूषण ही नहीं बल्कि घरों में इस्तेमाल होने वाला ठोस ईंधन भी देहरादून के ग्रामीण इलाकों में प्रदूषण की एक बड़ी वजह है। राज्य के ग्रामीण क्षेत्र मुक्तेश्वर में वायु प्रदूषण को लेकर एक अध्ययन किया गया। यहां की हवा में एयरोसोल की मात्रा पायी गई। धुआं एक किस्म का एयरोसोल ही है, जो हमारी सेहत को प्रभावित करता है। मुक्तेश्वर में गर्मियों और मानसून के बाद पीएम 2.5 का स्तर और एयरोसोल दोनों ही शाम के समय ज्यादा पाये गये। इसकी वजह घरों में लकड़ी से जलने वाला चूल्हा या गर्माहट के लिये जलायी जाने वाली लकड़ियां हैं। ये घर के अंदर की वायु को प्रदूषित करती हैं।

जल्द दिल्ली जैसा हो जाएगा देहरादून?

देहरादून में फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट के मेडिकल ऑफिसर डॉक्टर रिमांत गुप्ता चेताते हैं कि यदि वायु प्रदूषण से निपटने के लिए जरूरी कदम नहीं उठाए गये तो देहरादून की स्थिति भी दिल्ली जैसी हो सकती है। डॉक्टर रिमांत भी इस शोध से जुड़े हैं। उन्होंने राजधानी के कई डॉक्टरों से भी इस बारे में बात की। उनका कहना है कि छोटे बच्चों में सर्दी, जुकाम, खांसी, गले की खराश, आंखों में जलन जैसी समस्याओं की वजहों में से एक वायु प्रदूषण भी है। डॉ. रिमांत कहते हैं कि सरकार को नीति बनाकर इस दिशा में प्रयास करने चाहिए। साथ ही लोगों को भी जागरुक करने की जरूरत है।

इस वर्ष डब्ल्यू-एच-ओ ने दुनिया के बीस सबसे प्रदूषित शहरों की सूची जारी की थी। जिसमें से 14 उत्तर भारत में थे। हिमालयी राज्य की चिंता इसलिए भी बड़ी है क्योंकि श्रीनगर (जम्मू-कश्मीर) इस सूची में दसवें स्थाने पर था। उत्तराखंड के देहरादून, हरिद्वार, ऋषिकेश, हल्द्वानी जैसे शहरों में जिस तेजी से वायु प्रदूषण बढ़ रहा है, ये वक्त संभलने और सही कदम उठाने का है।

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