NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
नज़रिया
संस्कृति
समाज
साहित्य-संस्कृति
भारत
हिंदी आख़िर किसकी मातृभाषा है?
“भारत में कितने लोग हैं, जो किताबों में पढ़ाई जाने वाली हिन्दी अपने घरों में बोलते हैं? कितने लोगों की मातृभाषा हिन्दी है? आप एक भाषा को मार कर किसी को हिन्दी तक पहुँचा सकते हैं क्या?” 
-
सौजन्य: इंडियन कल्चरल फोरम
26 Jun 2019
हिंदी आख़िर किसकी मातृभाषा है?
Image courtesy Wikimedia Commons

“भारत में कितने लोग हैं, जो किताबों में पढ़ाई जाने वाली हिन्दी अपने घरों में बोलते हैं? कितने लोगों की मातृभाषा हिन्दी है? आप एक भाषा को मार कर किसी को हिन्दी तक पहुँचा सकते हैं क्या?” 
-आएशा किदवई 

कहा जाता है और ये सच भी है कि भारत में हर 5-10 कोस के बाद भाषा बदल जाती है। हमारे संविधान के हिसाब से हमारे देश में 22 भाषाएँ हैं जिनकी क़रीब 400 से भी ज़्यादा बोलियाँ हैं। भारत एक विविध देश है, यहाँ अनेकता में एकता है, यहाँ की विविधता ही इसे महान देश बनाता है; ऐसी बातें आपने सुनी ही होंगी, लेकिन यही बातें तब ग़ायब हो जाती हैं, जब देश के दक्षिणी इलाक़े के लोगों को ज़बरदस्ती "हिन्दी" बोलने के लिए  कहा जाता है । ये विविधता तब ख़त्म हो जाती है, जब हम 130 करोड़ लोगों के देश की सभी भाषाओं-बोलियों को भूल कर सिर्फ़ हिन्दी पर सारा ध्यान केन्द्रित कर देते हैं।

हिन्दी-उर्दू, हिन्दी भाषी-ग़ैर हिन्दी भाषी ये लड़ाइयाँ नई नहीं हैं, ये वो बातें नहीं हैं जो आज तक कभी सुनी न गई हों, लेकिन इस सब के बीच समझने और जानने वाली बात ये है कि दरअसल "हिन्दी" बोली कहाँ जाती है, और हिन्दी को 29 राज्य और 7 केन्द्र्शाषित प्रदेशों के देश में लागू कर देना कितना सही है? 

हम जानते हैं कि देश में एक "हिन्दी बेल्ट" है, जो मध्य-उत्तर भारत का इलाक़ा है, यानी मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड, झारखंड और हरियाणा; और इन्हीं इलाक़ों में माना जाता है कि हिन्दी बोलने वाले लोग मौजूद हैं। लेकिन देखने और समझने वाली बात ये है कि क्या ये लोग हिन्दी बोलते भी हैं? नहीं!

मातृभाषा किसे कहते हैं? जो आप अपनी माँ या अपने परिवार के सामने बोलते हों, यहाँ ये सवाल उठता है कि ये भाषा हिन्दी, जिस भाषा में मैं लिख रहा हूँ; वो भाषा कितने लोग अपने घरों में बोलते हैं? 
हमें ये समझने की ज़रूरत है कि तथाकथित "हिन्दी बेल्ट" की भाषा हिन्दी नहीं थी। उनकी भाषाएँ वो थीं, जो वे अपने घरों में बोलते थे। हिन्दी तो हमें स्कूल में सिखाई गई थी। 

मैं एक सीबीएसई स्कूल से पढ़ा हूँ, अंग्रेज़ी माध्यम का स्कूल; मेरे जैसे कई लोग इस बात से इत्तेफ़ाक़ रखेंगे कि सीबीएसई के स्कूलों में इंग्लिश में बात ना करने पर फ़ाइन लगाया जाता था, और हम सब लोग इससे डरते थे। हालांकि भाषा सिखाने पर कोई ज़ोर नहीं था, लेकिन इंग्लिश बोलनी ज़रूरी थी। इस तरह की बातों से पता चलता है कि इंग्लिश को "एलीट" ज़बान की तरह पेश किया गया है, क्योंकि ये वो ज़बान है जो अंग्रेज़ बोलते थे। वो अंग्रेज़ जिन्होंने हम पर 200 साल तक राज किया, और क्योंकि उन्होंने हम पर राज किया था, तो उनकी भाषा उच्च स्तर की मान ली गई है; और अंग्रेज़ी में बात ना कर पाने वालों पर और हिन्दी में बात करने वालों पर जुर्माना लगाया जाता है।

सीबीएसई से एक स्तर नीचे होते हैं इस "हिन्दी बेल्ट" के हिन्दी माध्यम के स्कूल, जहाँ अंग्रेज़ी पर तो उतना ज़ोर नहीं दिया जाता है, लेकिन हिन्दी पर ज़ोर दिया जाता है। एक सच ये भी है कि आर्थिक स्तर पर कमज़ोर लोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में भेजते हैं, और उनमें से ज़्यादातर लोग अपनी मातृभाषा में बात करते हैं; और उन्हें स्कूल में हिन्दी में बात करने को कहा जाता है। 
यहाँ हिन्दी "एलीट" भाषा बन जाती है, और अंग्रेजी की जगह ले लेती है। 

हिन्दी बोलने वाले लोग और तथाकथित राष्ट्रवादी लोग, हिंदुस्तान का "एकीकरण" करना चाहते हैं। मौजूदा सरकार इस मामले में सबसे आगे बढ़ कर हिस्सा लेती आ रही है। इसका उदाहरण यूँ समझा जाए कि दक्षिण भारत की भाषाओं: तेलुगू, तमिल, कन्नड़ और मलयालम को, हिन्दी भाषियों द्वारा एक बाहर की भाषा के रूप में देखा जाता है, और बीजेपी सरकार और अन्य धार्मिक संगठनों ने लगातार ग़ैर-हिंदीभाषियों पर हिन्दी को थोपा है। जब अटल बिहारी वाजपेयी देश के प्रधानमंत्री थे, वे संयुक्त राष्ट्र में जा कर हिन्दी में स्पीच देते थे, जिस बात का दंभ आज भी भरा जाता है। इसी कड़ी में जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने भी विदेश जा कर हिन्दी में स्पीच दीं, जिस बात पर भी लोग ख़ुश हुए। बीजेपी के पिछले कार्यकाल में इस बात को बढ़ा-चढ़ा दिखाया गया कि हिन्दी भारत की मात्रभाषा है, और हर प्रधानमंत्री को हिन्दी में ही अपना व्याख्यान देना चाहिए; जिस पर शशि थरूर ने संसद में कहा कि हिन्दी हमारी मातृभाषा नहीं है, और अगर कोई प्रधानमंत्री हिन्दी भाषी नहीं है, तो वो क्यों हिन्दी में बात करे? संविधान ने हमें अपनी भाषा बोलने का अधिकार दिया है। 

हिन्दी को "थोपने" की ये रणनीति नई नहीं है। हिन्दी भाषी तबक़े ने हमेशा से हिन्दी को बढ़ा-चढ़ा कर दिखाया है और इस कड़ी में देश की अन्य सभी भाषाओं को नकारा है, सभी बोलियों को नकारा है। 

ये "एकीकरण" का ख़्वाब दरअसल उस सोच का प्रभाव है जो अंग्रेज़ों ने अपने राज के दौरान हम पर थोपी थी, कि सबकी भाषा अंग्रेज़ी हो! जबकि भारत जैसे देश में जहाँ संस्कृति, सभ्यता इतनी पुरानी और इतनी विविध है, ये सोचते हुए भी अजीब सा लगता है कि सिर्फ़ एक भाषा बोली जाएगी। 

हिन्दी से दिक़्क़त नहीं है, अपनी भाषा से प्यार है! 

आईसीएफ़ ने इस बारें में आएशा किदवई से बात करी तो उन्होंने कहा, “अगर मैं किसी को लिखना-पढ़ना सिखा रही हूँ, तो अपनी ज़बान के साथ-साथ उसे हिन्दी पढ़ाऊँ तो उसमें क्या ग़लत है? ऐसे में उस बच्चे को हिन्दी तक सही तरीक़े से पहुँच पाने का मौक़ा मिलेगा, क्योंकि मैं अपनी भाषा के ज़रिये जाऊँगी। ये एकदम यूरोपियन सोच है कि हम एक ही ज़बान बोलें। संविधान में लिखा है कि मुझे मेरी भाषा में शिक्षा हासिल करने का अधिकार है, पर अगर मेरी मातृभाषा को भाषा का दर्जा ही नहीं दिया जाएगा, मुझ पर हिन्दी थोपी जाएगी, अगर हर भाषा को हिन्दी कहा जाएगा, तो मेरी भाषा तो लुप्त ही हो गई।" 
 
आएशा किदवई ने बताया कि हिन्दी बेल्ट में रहने वाले, अवधी हरयाणवी भोजपुरी मैथिली बोलने वाले लोगों को हिन्दी तक पहुँचाने के लिए किन ज़रियों का इस्तेमाल किया जाता है, वो हमारी शिक्षा व्यवस्था में एक बड़ी दिक़्क़त है। 

बीते दिनों हिन्दी के एक लेखक-आलोचक प्रभात रंजन ने कहा था, “भोजपुरी शिष्ट लोगों की भाषा इसलिए नहीं बन पाई क्योंकि इसमें गालियाँ बहुत ज़्यादा हैं।"

ये ऐसी वाहियात बात है जिस पर कोई बात करना बेईमानी सा लगता है लेकिन आप पैटर्न को समझिये; मैं इसे एक चाल कहूँगा कि हिन्दी थोपने के लिए देश की जनता को उसकी अपनी भाषा से नफ़रत करवा दी जाए। ये बातें अक्सर कही जाती हैं कि हरियाणवी, भोजपुरी, अवधी और अन्य भाषाएँ फूहड़ हैं, ये लट्ठमार हैं, इनमें गालियाँ हैं। इस यूरोपियन सोच का असर ये होता है कि आम आदमी भी अपनी भाषा से नफ़रत करने लगता है। 

मैं अगर बिहार के गाँवों के बारे में बात करूँ, तो शिक्षा व्यवस्था नेताओं, मीडिया ने लगातार हिन्दी और अंग्रेज़ी को इतना बड़ा बताया है कि आज एक आम परिवार के माँ-बाप अपने बच्चों को कहते हैं, “nose में से finger out करो तो!” इन माँ-बाप को ये लगने लगता है कि भोजपुरी या और कोई भाषा फूहड़ है, "गँवार" है। 

आएशा किदवई कहती हैं, "जब इन भाषाओं को बुरा कहा जाता है तो हम ये भूल जाते हैं कि हमारा आगाज़ी साहित्य अवधी में लिखा गया था; कबीर, अमीर खुसरो ने कभी हिन्दी नहीं लिखी थी।"

शेक्सपियर की भाषा में कहें तो, “Not that I love Hindi less, but that I love my mother-tongue more!” 

आएशा किदवई कहती हैं, “जब हम समय के साथ और लोकतांत्रिक हो चुके हैं, तो हमें ये भेद-भाव बहुत पीछे छोड़ देना चाहिए। हमारी शिक्षा-व्यावस्था ऐसी होनी चाहिए कि हमें हर भाषा पढ़ने का अधिकार रहे। किसी पर कोई भाषा क्यों थोपी जाए? अगर मैं 'ज़' नहीं बोल पाती हूँ, तो क्या वो ग़लती है? आपने तो मेरी भाषा पर ध्यान ही नहीं दिया ना!”

जिसे हम तथाकथित हिन्दी-बेल्ट बोलते हैं, मैं वहीं से ताल्लुक़ रखता हूँ। हिन्दी, जो कि सिर्फ़ एक "एलीट" आधिकारिक ज़बान है, वो मुझ पर थोप दी जाए, किसी पर भी थोप दी जाए; तो हमारे अधिकारों, हमारी संस्कृति का हनन हो रहा है। 

कोई भी किसी भी भाषा को सीख लेगा, लेकिन किस क़ीमत पर? क्या कोई हिन्दी इसलिए सीखे कि उसे हुक्मरान कह रहे हैं, कि उसकी मातृभाषा फूहड़ है!

hindi imposition
India
Unity in Diversity
urdu
Modi Govt

Related Stories

ख़बरों के आगे-पीछे: भाजपा में नंबर दो की लड़ाई से लेकर दिल्ली के सरकारी बंगलों की राजनीति

कार्टून क्लिक: आधे रास्ते में ही हांफ गए “हिंदू-मुस्लिम के चैंपियन”

एक व्यापक बहुपक्षी और बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता

हम भारत के लोग: समृद्धि ने बांटा मगर संकट ने किया एक

जानिए: अस्पताल छोड़कर सड़कों पर क्यों उतर आए भारतीय डॉक्टर्स?

भारत और अफ़ग़ानिस्तान:  सामान्य ज्ञान के रूप में अंतरराष्ट्रीय राजनीति

रसोई गैस के दाम फिर बढ़े, महंगाई की जबरदस्त मार

कभी रोज़गार और कमाई के बिंदु से भी आज़ादी के बारे में सोचिए?

स्पायवेअर अर्थात जासूसी सॉफ्टवेयर – जनतंत्र के ख़िलाफ़ नया हथियार!

पेटेंट बनाम जनता


बाकी खबरें

  • covid
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटो में क़रीब ढाई लाख नए मामले, एक्टिव मामले 11 लाख के पार 
    13 Jan 2022
    देश में 24 घंटों में कोरोना के 2,47,518 नए मामले सामने आए हैं। और एक्टिव मामलों की संख्या बढ़कर 11 लाख 17 हज़ार 531 हो गयी है।
  • election
    अजय कुमार
    चंद रुपए खाते में डालकर वोट हड़पने की रणनीति आम क्यों हो गई है?
    13 Jan 2022
    चंद रुपए खाते में डालने और चंद राहतें पहुंचाने वाली भाजपा, आम आदमी पार्टी से लेकर समाजवादी पार्टी की रणनीति का क्या मतलब है?
  •  Catholic Association of Goa
    सबरंग इंडिया
    कैथोलिक एसोसिएशन ऑफ गोवा ने अधिकारियों से सेंट जोसेफ वाजो पर्व के दौरान शांति सुनिश्चित करने को कहा
    13 Jan 2022
    पारंपरिक उत्सव 16 जनवरी को आयोजित होने वाला है, हालांकि, ऐसी आशंकाएं हैं कि कुछ "दक्षिणपंथी संगठन शरारत कर सकते हैं"
  • KHOJ KHABER
    खोज ख़बर: स्वामी प्रसाद मौर्य तो झांकी है, पिक्चर अभी बाक़ी है, मोदी जी?
    12 Jan 2022
    खोज ख़बर में वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने भाजपा नेता, योगी सरकार में मंत्री ओबीसी नेता स्वामी प्रसाद मौर्य के इस्तीफ़े को पिछले कुछ समय से भाजपा का साथ छोड़ रहे नेताओं की घटना के साथ जोड़ते हुए बताया…
  • कोरोना काल में भी वेतन के लिए जूझते रहे डॉक्टरों ने चेन्नई में किया विरोध प्रदर्शन
    एम.ओबैद
    कोरोना काल में भी वेतन के लिए जूझते रहे डॉक्टरों ने चेन्नई में किया विरोध प्रदर्शन
    12 Jan 2022
    कोरोना काल में अपनी जान की बाज़ी लगा देने वाले डॉक्टरों को वेतन भुगतान में देरी को लेकर जूझना पड़ा है। यह सिलसिला अब भी जारी है। चेन्नई के डॉक्टरों को तीन महीने से वेतन नहीं मिला जिसकी वजह से उन्हें…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License