NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
समाज
साहित्य-संस्कृति
भारत
राजनीति
हिंदी में ‘पब्लिक स्फीयर’, संगठन व पत्रिकाएं
समस्त आलोचनाओं के बावजूद लेखक संगठनों ने पत्रिकाएं निकालकर, प्रकाशन कर, सभा-संगोष्ठियां आदि आयोजित कर हिंदी की दुनिया में साहित्यिक मूल्यों के प्रचार-प्रसार का जो ऐतिहासिक काम किया है, उसे भुलाया नहीं जा सकता है।
वैभव सिंह
24 Mar 2019
सांकेतिक तस्वीर
फाइल फोटो

हाल ही में, 16-17 मार्च को प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस) का दो दिवसीय सम्मेलन इलाहाबाद में आयोजित हुआ। प्रलेस एक ऐतिहासिक संगठन है और संभवतः हिंदी की दुनिया में लेखकों का एकमात्र गैर-सरकारी संगठन जो स्वतंत्रता से पहले बना था और आज तक देश के विभिन्न जिलों में उसकी शाखाएं फैली हुई हैं। प्रगतिशील लेखक संघ के समानांतर हिंदी में जनवादी लेखक संघ (जलेस), जनसंस्कृति मंच (जसम), दलित लेखक संघ (दलेस) आदि विभिन्न संगठन लेखकों के मध्य सक्रिय हैं। इन संगठनों को गाहे-बगाहे इस बात के लिए आलोचना का सामना करना पड़ता है कि वे बहुत उदार या लोकतांत्रिक नहीं हैं और लेखकों की गुटबाजी को बढ़ावा देते हैं। वे लेखकों के बीच पुल बनाने का काम करने के स्थान पर उन्हें राजनीतिक दलों की तरह अलग-थलग समूहों में बांटते हैं। या फिर इस बात के लिए आलोचना होती है कि वे साहित्य में ‘लिटरेरीनेस’ की कीमत पर राजनीतिक विचारधाराओं को अनावश्यक रूप से प्रोत्साहित करते हैं। लेखकों की राजनीतिक चेतना उतनी तेजी से विकसित नहीं होती है जितनी तेजी से विचारधाराओं के प्रति कट्टरता। अक्सर देखा गया है कि लेखक संगठन अपने ही बीच के किसी सामान्य लेखक को ताल्सताय, गोर्की, प्रेमचंद, मार्केज बनाकर पेश करते हैं और इससे पाठकों में भ्रम पैदा होता है। लेखक अपने बारे में गलतफहमियां पालकर खुद कुंठित होता है। जरा सी उपेक्षा से वह दूसरों को प्रति क्षोभ से भर जाता है। या संगठनों के पदाधिकारियों का अहं ही महत्त्वपूर्ण बना रहता है। पर इन समस्त आलोचनाओं के बावजूद लेखक संगठनों ने पत्रिकाएं निकालकर, प्रकाशन कर, सभा-संगोष्ठियां आदि आयोजित कर हिंदी की दुनिया में साहित्यिक मूल्यों के प्रचार-प्रसार का जो ऐतिहासिक काम किया है, उसे भुलाया नहीं जा सकता है। इसने हिंदी के व्यापक ‘पब्लिक स्फीयर’ को गढ़ा है। साहित्य का प्रयोग जीवन की आलोचना के लिए करने के लिए भी लोगों को प्रेरित किया और प्रेमचंद ने ठीक यही बात लखनऊ में 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना के मौके पर कही थी। उन्होंने साहित्यकार को बेचैन आत्मा वाला प्राणी मानकर कहा था कि साहित्य का उद्देश्य जीवन की आलोचना करना ही है।

gauri.jpg

लेखक संगठनों ने लेखकों को विभिन्न मुद्दों जैसे सांप्रदायिकता, भीड़-हिंसा, अंधविश्वास फैलाने, स्त्रियों के खिलाफ अश्लील टिप्पणियों, जातिगत हिंसा आदि के खिलाफ आंदोलित कर लेखकों की नैतिक चेतना को मांजने-चमकाने व अधिक उद्देश्यपूर्ण बनाने का काम किया है। ये मुद्दे राजनीतिक प्रतीत होते हैं पर लेखक कम से कम उस कालखंड में अपने वक्त की राजनीति से आंख मूंदकर लेखन नहीं कर सकता है, जब राजनीति ने जीवन के हर क्षेत्र पर धौंस व दादागिरी स्थापित कर दी है। लेखक अंततः समाज के लिए लिखता है और जब समाज में राजनीतिक उथलपुथल तीव्र हो तो वह लेखन को राजनीति की छूत से बचाकर नहीं चल सकता है।

इसके अलावा लेखक संगठनों के बारे में यह बात सही नहीं है कि वे अपनी आलोचना नहीं सुनते हैं। गत 16-17 मार्च को इलाहाबाद में आयोजित प्रलेस के सम्मेलन में इसका उदाहरण देखने को मिला। मंच से बाकायदा एक लेखक ने बताया कि वे जब सम्मेलन से बाहर जा रहे थे तो उन्हें सम्मेलन में ही हिस्सा लेने आए एक लेखक कानों में जनेऊ चढ़ाकर लघुशंका से निवृत्त हो दिखाई दिए। उनके कुर्ते के भीतर जनेऊ छिपा हुआ था, पर वे प्रलेस में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेने आए थे। उनकी इस बात से हाल में लोग हंस रहे थे, किसी ने खास बुरा नहीं माना। बल्कि यही माना गया कि लेखकों को अंधविश्वास, प्रतिक्रियावाद या झूठी आस्थाओं का पालन न करने की मिसाल पेश करनी चाहिए। इस सम्मेलन के उद्घाटन में हिंदी के वरिष्ठ कहानीकार उदयप्रकाश ने एक महत्त्वपूर्ण बात कही। वह यह कि इस समय हर चीज की पहचान मिटाई जा रही है। मनुष्य के फिंगरप्रिंट, रेटिना की तरह ही हर शहर व समाज की पहचान होती है, जिसे किसी तानाशाह की जिद या राजनीतिक उद्देश्य के लिए खत्म किया जा रहा है। लेखक को इस सपाटपन, एकरूपता तथा भिन्नता के विनाश की प्रक्रिया से लड़ना होगा। उन्होंने यह भी कहा कि हिंदी में हिंदी साहित्य को केवल विश्वविद्यालयों तक नहीं सीमित करना है, बल्कि उसे समाज तक पहुंचाना चाहिए। उनका कहना था कि अच्छे लेखक वहीं हुए जिन्होंने अपने समाज में बहिष्कार तथा उत्पीड़न को झेला और समझौता नहीं किया। इसलिए लेखक को बहिष्कारों पर गर्व करना होगा। इस आयोजन में उदयप्रकाश, संतोष भदौरिया, विभूतिनारायण राय, राजेंद्र कुमार, सुशीला पुरी, विनोद तिवारी, ऊषा राय, राजेंद्र राव, सोनी पांडे, जमुना बीनी, संध्या नवोदिता, अभिषेक श्रीवास्तव, जाहिद खान, शेखर मलिक, नलिन रंजन सिंह आदि नई व पुरानी पीढ़ी के कई लेखकों के बीच दिलचस्प संवाद भी हुए। लगभग सभी लेखक इस बात पर एकमत थे कि कुकुरमुत्ते की तरह फैले साहित्य-उत्सवों ने साहित्य की संस्कृति को बिगाड़ने का काम किया है। समाज पर जैसा फासीवाद, जातिवाद या पूंजीवाद का आक्रमण हो रहा है, उस दौर में साहित्य का काम उत्सव मनाना नहीं बल्कि लोगों के दुःख, पीड़ा, संकट को व्यक्त करना है। साहित्य को उत्सव बनाकर लोग प्रतिरोध, संघर्ष तथा मुक्ति की भूमिका को छीन लेना चाहते हैं। 

प्रलेस के इस दो दिन के आयोजन में एक बात तो साबित हुई। वह यह कि इस समय हिंदी में लेखन के प्रति नई पीढ़ी में आशाजनक उत्साह है। छोटे शहरों तथा पिछड़े इलाकों से निकली एक पूरी पीढ़ी है जो हिंदी में लेखन के बलपर समाज व संस्कृति के विकास में योगदान देना चाहती है। वह भारत की संस्कृति को उदार, न्यायपूर्ण व लोकतांत्रिक बनाने के लिए हिंदी का रचनात्मक इस्तेमाल करने की सदिच्छा से प्रेरित है। उसके मन में हिंदी को लेकर सम्मान है, जो इन दिनों नकली, संवेदनहीन व संकीर्ण मध्यवर्ग में नहीं नजर आता है। नौकरियों और व्यवसायिक अंग्रेजी स्कूलों ने इस मध्यवर्ग की हालत बहुत दयनीय बना दी है। वह अपनी भाषा की जमीन पर खड़ा नहीं हो पा रहा है और अंग्रेजी को कभी अपना समझ नहीं पाता है। इस तरह भाषा के मामले में वह ऐसा संत्रस्त वर्ग लगता है जिसके भाषिक मुहावरे, कथाएं, स्मृतियां, आत्मविश्वास सभी को कोई लूट ले गया है। दुर्भाग्य से वह खुद को लुटा-पिटा बनाकर भी मुस्कराता फिर रहा है। ऐसे में हिंदी के रचनाकारों की भूमिका ज्यादा स्पष्ट हो चुकी है। समाज के बहुत सारे सत्य अपनी अभिव्यक्ति के लिए लेखकों पर आश्रित होते हैं। इसी प्रकार समाज के बहुत सारे छल-छद्म व कमीनापन भी किसी बड़े लेखक का इंतजार करता है ताकि उसे संजीदगी से साहित्य में व्यक्त होने का मौका मिले। जाहिर है कि किसी समाज में ये दोनों ही काम उन लेखकों के ही जिम्मे होते हैं, जिन्होंने आम जनों की भाषा में लिखना स्वीकार किया है। सौभाग्य से हिंदी की दुनिया अंग्रेजी के सारे हमलों के बावजूद लेखकों से भरी पूरी दुनिया है। इसीलिए हिंदी का रचना संसार पहले की तुलना में अधिक विषयों को लेखन की दुनिया में शामिल कर पा रहा है। महानगरों में हिंदी की दुर्दशा पहले भी होती रही है। पर इन महानगरों की सीमा से बाहर हिंदी लेखकों में पहले सी स्फूर्ति, जीवंतता व सारी आपसी ईष्याओं के बावजूद एकता को देखकर खुशी मिलती है। एक समय यह कहा जाता था कि हिंदी के लेखन को अन्य भाषाओं के लेखकों से संवाद करना चाहिए। पर इस समय तो यह बड़ी चुनौती है कि हिंदी के रचनाकार खुद आपस में ठीक से संवाद करने में रुचि प्रकट करें। वे स्पर्धा, होड़, अहं से बाहर निकलकर आपस में जुड़ें और नए मंचों को खड़ा करें। वे आपस में संवादरत होंगे तो अन्य भाषाओं के लेखन से भी जुड़ना चाहेंगे। 

प्रलेस के इस ऐतिहासिक सम्मेलन के कुछ ही दिन पूर्व 16-17 फरवरी को कोलकाता में भारतीय भाषा परिषद के सौजन्य व हिंदी के ख्यातिप्राप्त आलोचक शंभूनाथ जी के प्रयासों से साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादकों का भी बड़ा सम्मेलन हुआ था। इसमें भी कई छोटे-बड़े शहरों से निकलने वाली हिंदी की लघु पत्रिकाओं के संपादक शामिल हुए और दो दिन तक काफी विचार विमर्श चलता रहा। खराब किस्म के, संदिग्ध पैसे के दम पर चलने वाले इन साहित्य-उत्सवों के दौर में इन ऐतिहासिक महत्व के सम्मेलनों के बारे में जिस प्रकार से लोगों को बताया जाना चाहिए, वह नहीं बताया जाता है। हिंदी की लघु पत्रिकाओं की सामान्य दिक्कत है कि ब्लॉग व इंटरनेट के कारण उनका पाठक वर्ग विघटित हो रहा है। किसी लेखक को प्रतिष्ठा दिलाने या उससे श्रेष्ठ लेखन करवाने में उनकी भूमिका पहले की तुलना में घटी है। पर यह भी सच्चाई है कि पत्रिका में छपी सामग्री का मान-सम्मान या मूल्य आज भी साइबर दुनिया के मुकाबले अधिक है। बहुत सारी सामग्री ब्लॉग या सोशल मीडिया पर छपने के बावजूद अंततः वह हिंदी की किसी प्रतिष्ठित पत्रिका में ही रचना प्रकाशित करा कर स्वयं को साहित्य की दुनिया का असली नागरिक महसूस कर पाता है। इस सम्मेलन में आरंभिक सत्र में शंभूनाथ ने कहा कि हिंदी में मिशनरी भाव या बड़ा उद्देश्य रखकर ही लघु पत्रिकाओं का संपादन सफलतापूर्वक किया जा सकता है। सम्मेलन में बंगला भाषी विद्वान जवहर सरकार आए थे। उद्घाटन के बाद उन्होंने मुझे एक मेल भेजी जिसमें उन्होंने सम्मेलन की बहुत प्रशंसा की पर एक बात लिखी जिसनें काफी दिनों तक सोचने के लिए विवश किया। उन्होंने बताया कि इस लघु पत्रिका सम्मेलन में शरीक होने से पहले उनके मन हिंदी भाषियों की हिंदी, हिंदू, हिन्दुस्तान का नारा देने वाले संकीर्णमना व्यक्ति की छवि थी। पर सम्मेलन में हुई चर्चा तथा वाद-विवाद से यह छवि भंग हुई है और हिंदी भाषियों के प्रति यह छवि टूटने से उन्हें भी प्रसन्नता हुई है। यह हतप्रभ करने वाली टिप्पणी थी क्योंकि हिंदी में प्रगतिशील व मानवतावादी लेखन की परंपरा अब काफी पुरानी हो चुकी है। पर अभी भी लोग हिंदी क्षेत्र के पिछड़ेपन, सांप्रदायिकता, जहालत व अत्यधिक राजनीति के आधार पर अंदाजा लगाते हैं कि हिंदी लेखन भी इन्हीं दुर्गुणों से ग्रस्त होगा। या फिर हिंदी के मन में भारत के बहुलतावादी चरित्र के प्रति स्वीकृति का भाव नहीं है। जाहिर है कि अन्य भाषा के लोग हिंदी साहित्य को नहीं पढ़ रहे हैं। खुद हिंदी भाषी लोग जब अपनी भाषा के साहित्य को नहीं पढ़ रहे हैं तो अन्य भाषा के लोग तो क्यों पढ़ेंगे। ऐसे में हिंदी व उसका साहित्य दोनों ही बहुत सारी दुर्भावनाओं, पूर्वग्रहों का भी शिकार हो रहा है। इसके प्रति हिंदी साहित्यकारों को सजग रहना होगा। उन्हें अपने लेखन के जरिए इस पूर्वग्रह को तोड़ना होगा कि हिंदी के राज्यों में जैसीकस्बाई मानसिकता या सामाजिक बुराइयां हैं, हिंदी का लेखक उनसे जूझ नहीं रहा है। उसे आगे बढ़कर विश्वास दिलाना होगा कि वह अपने ही समाज से एक जीवन-मरण के संघर्ष में उलझा है। वह खुद हिंदी के नाम पर चलते छल-प्रपंच या घटिया राजनीति को नकारता है। हिंदी की लघु पत्रिकाओं को हिंदी में फैली पुरस्कारों व सत्ता प्रतिष्ठानों के वर्चस्व को कमजोर करना होगा। वह इसलिए क्योंकि यही वे चीजें हैं जो हिंदी को सम्मान कम दिलाती हैं, उसकी बदनामी का सबब ज्यादा बनती हैं। जब मुख्यधारा की पत्रकारिता ने साहित्य को लगभग उपेक्षित कर दिया है, तब हिंदी की लघु पत्रिकाएं ज्यादा अहम हो गई हैं। इन पत्रिकाओं को अब विकसित कर हम साहित्य का विकास कर सकते हैं, वरना साहित्य की जरूरत तो लोगों को होगी लेकिन वह उपलब्ध न हो सकेगा। ठीक वैसे ही जैसे सस्ती दवा, शुद्ध पानी, साफ हवा, बगीचे की जरूरत तो सभी को है, पर उसे दिनोदिन दुर्लभ बना दिया गया है।

(लेखक हिन्दी के प्रसिद्ध आलोचक हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

hindi literature
Literature and society
culture
politics
writer
Progressive Writers Movement
प्रलेस
जलेस
जसम
दलेस

Related Stories

गणेश शंकर विद्यार्थी : वह क़लम अब खो गया है… छिन गया, गिरवी पड़ा है

रवींद्रनाथ टैगोर साहित्य पुरस्कार 2021, 2022 के लिए एक साथ दिया जाएगा : आयोजक

नहीं रहे अली जावेद: तरक़्क़ीपसंद-जम्हूरियतपसंद तहरीक के लिए बड़ा सदमा

सोचिए, सब कुछ एक जैसा ही क्यों हो!

मंगलेश डबराल नहीं रहे

नफरत और घृणा की राजनीति के खिलाफ सांस्कृतिक संघर्ष की जरूरत

हर एक दिल में है इस ईद की ख़ुशी...

बांदीपोरा रेप केस : "सामाजिक ताने बाने और संस्कृति पर काला धब्बा"

“देश की विविधता और बहुवचनीयता की रक्षा करना ज़रूरी है”

फिल्मकारों के बाद लेखकों की अपील : नफ़रत की राजनीति के ख़िलाफ़ वोट करें


बाकी खबरें

  • cartoon
    आज का कार्टून
    किसान आंदोलन का एक साल: ...अब MSP का पहाड़ तोड़ना बाक़ी है
    26 Nov 2021
    रस्ता हो जाता है परबत सागर में भी, जब जज़्बा होता है, जब हिम्मत होती है।
  • Police Turkey fired tear gas to stop female protesters
    एपी
    तुर्की में पुलिस ने महिला प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए दागे आंसू गैस के गोले
    26 Nov 2021
    महिलाओं के खिलाफ अत्याचार के उन्मूलन के लिए 25 नवंबर को मनाए जाने वाले अंतरराष्ट्रीय दिवस के उपलक्ष्य में इस्तांबुल की मुख्य सड़क इस्तिकलाल पर मार्च निकाला गया।
  • Siberia
    एपी
    रूस के साइबेरिया में कोयला खदान में आग लगने से 52 लोगों की मौत : रूसी मीडिया
    26 Nov 2021
    दक्षिण-पश्चिमी साइबेरिया के केमेरोवो क्षेत्र में घटना के वक्त लिट्सव्याजहन्या खदान में कुल 285 लोग थे और ‘वेंटिलेशन सिस्टम’ के माध्यम से खदान में धुआं जल्दी ही भर गया। इससे पहले, बचाव दल ने 239…
  • constitution
    भाषा
    संवैधानिक संस्थाओं पर निरंतर आघात कर रही भाजपा सरकार: कांग्रेस
    26 Nov 2021
    कांग्रेस और कई अन्य विपक्षी दलों के सांसद आज संविधान दिवस के कार्यक्रम में शामिल नहीं हुए।
  • Akhilesh Yadav
    अब्दुल अलीम जाफ़री
    उत्तर प्रदेश में सपा-आरएलडी के गठबंधन के बाद बीजेपी को नहीं मिलेगा स्पष्ट बहुमत - विशेषज्ञों का दावा
    26 Nov 2021
    अखिलेश और जयंत की साझेदारी से जाट और मुस्लिम क़रीब आ सकते हैं और इससे बीजेपी का संतुलन ख़राब हो सकता है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License