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भारत
राजनीति
हिंसा ने बनाया राज्य के पंचायत चुनावों को दागदार
पश्चिम बंगाल में बुनियादी लोकतांत्रिक संस्थाओं पर प्रहार!
एस. एम. सेराज अली
18 May 2018
West Bengal

पश्चिम बंगाल के पंचायत चुनावों ने भारतीय लोकतंत्र पर गहरा धब्बा लगाया है. अब जबकि पंचायत चुनावों के वोटों की गिनती की तारीख करीब आ रही है, राज्य में हुई चुनावी हिसा में अबतक कुल 23 लोग मारे गये हैं और 100 से ज्यादा घायल हुए हैं.

राज्य के 19 जिलों में कड़ी सुरक्षा के बीच पुनर्मतदान के आदेश दिए जा चुके हैं, और हिंसा अभी भी जारी है. एएनआई के एक वीडियो में मालदा जिले के रतुआ क्षेत्र में अपराधियों को हथियार लहराते हुए एक मतदान केंद्र पर कब्ज़ा जमाते हुए देखा गया.

पुनर्मतदान से पूर्व, व्यापक रूप से हिंसा और बूथ - कब्ज़ा की घटनायें हुईं. मुर्शिदाबाद में, आपसी झड़पों के बाद मतपत्रों को एक तालाब में फेंक दिया गया जिसकी वजह से वहां मतदान रोकना पड़ा.

इससे कुछ घंटे पहले, दक्षिणी 24 परगना जिले के नामखाना गांव में एक सीपीएम समर्थक और उसकी पत्नी को उनके घर में जिंदा जला दिया गया.

एक अन्य मतदान केंद्र पर, तृणमूल कांग्रेस के एक मंत्री को एक विपक्षी उम्मीदवार, जिसे उन्होंने बाद में भाजपा का ‘एजेंट’ करार दिया और उसपर बूथ – कब्ज़ा करने का आरोप लगाया, को थप्पड़ मारते हुए तस्वीरों में कैद किया गया.

इसके कुछ ही देर बाद, साधनपुर अम्दांगा में हुए एक बम विस्फोट में 20 लोग घायल हुए.

द सिटिज़न से बात करते हुए पश्चिम बंगाल के विधि एवं न्याय मंत्री मलय घटक ने कहा, “बगैर किसी विश्वसनीय सूचना के मैं भी प्रतिक्रिया नहीं दे पाऊंगा. टेलीविज़न समाचारों में 2 – 5 बूथों के बारे में दिखा रहे हैं और उसे ही बार – बार दोहरा रहे हैं. जबतक हम पुष्टि न कर लें, हम कुछ नहीं कर सकते. कुल 572 बूथों के बारे में शिकायतें थीं, वहां पुनर्मतदान कराया जा रहा है. पुनर्मतदान हो जाने दीजिए, हमें विश्वसनीय सूचना हासिल कर लेने दीजिए, उसके बाद ही हम प्रतिक्रिया दे पायेंगे. हम किसी तस्वीर या अख़बार की ख़बर पर प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त कर सकते.”

हालांकि, द सिटिज़न के साथ एक बातचीत में सीपीएम के वरिष्ठ नेता मोहम्मद सलीम ने बताया, “यह पंचायत चुनावों के वोटों का एक अभूतपूर्व एवं संगठित लूट था, जोकि लोकतांत्रिक संस्थाओं को ध्वस्त कर देने के लिए पर्याप्त था. मुख्यमंत्री के सनक को पूरा करने के लिए नामांकन से लेकर पुनर्मतदान की प्रक्रिया तक पुलिस एवं चुनाव आयोग की शह पर संगठित अपराधियों का बोलबाला रहा. सरकार इससे इंकार कर रही है क्योंकि उसने उन सभी लोगों को सलाखों के पीछे कैद कर रखा है, जो इन प्रयासों का या तो विरोध कर रहे थे या उसे रोकने की कोशिश कर रहे थे.”

उन्होंने आगे कहा, “पुनर्मतदान का आदेश भी सिर्फ उन्हीं इलाकों में दिया गया है जहां तृणमूल कांग्रेस वोट पाने में असफल रही है, न कि उन इलाकों में जहां मांग की जा रही थी. हत्यारों को गिरफ्तार नहीं किया जा रहा है, लेकिन उनकी हरकतों का विरोध करने वालों को पुलिस द्वारा झूठे मामलों में फंसाया जा रहा है.”

हिंसा के माहौल में होने वाला कोई चुनाव भला कितना प्रासंगिक होगा?

सुप्रीम कोर्ट के वकील अभीक चिमनी ने बताया, “इस बारे में कानून बहुत स्पष्ट है. किसी चुनाव में बूथ – कब्ज़ा या धमकाने की घटना होने पर जन प्रतिनिधित्व कानून, 1951 की धारा 100 के तहत उसे अवैध घोषित किया जा सकता है.”

मोहम्मद सलीम ने कहा, “ पश्चिम बंगाल की जनता राजनीतिक रूप से जागरूक है और वो लोकतांत्रिक अधिकारों के दमन को सहन नहीं करेगी और उसका विरोध करेगी. पंचायती संस्थाओं को यहां ध्वस्त किया जा रहा है. राज्य चुनाव आयोग और राज्य प्रशासन से लोगों का भरोसा उठ गया है.”

Courtesy: The Citizen,
Original published date:
17 May 2018
West Bengal
panchayat polls
communal violence

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