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भारत
राजनीति
“हमारे जंगल और विश्वविद्यालय वापस दो”
जंगल की ज़मीन से बेदखली और 13 प्वाइंट रोस्टर के खिलाफ आदिवासियों और विश्वविद्यालय शिक्षकों ने मंगलवार को ‘भारत बंद’किया, जिसमें कई राजनीतिक दलों ने भी साथ दिया।
मुकुंद झा
05 Mar 2019
DUTA

देश के कई संगठनों ने मंगलवार को ‘भारत बंद’ का आह्वान किया था, जिसका देश के कई राज्यों में असर भी दिखा। आदिवासियों को उनकी ज़मीन से बेदखल करने और 13 प्वाइंट रोस्टर के खिलाफ आदिवासियों और विश्वविद्यालय शिक्षकों ने इस भारत बंद में बड़ी संख्या में भागीदारी की। इस दौरान राजधानी दिल्ली में आदिवासी, दलित, ओबीसी और छात्र संगठनों ने मंडी हाउस से संसद तक मार्च भी किया। इन लोगों ने सरकार को चेताया कि अगर उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया गया तो वो उन्हें आने वाले चुनावो में उखाडा फेकेंगे।

बिहार समेत कई राज्यों में बंद का असर दिखा। बिहार में इस बंद के समर्थन में माकपा, भाकपा , भाकपा माले, राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी (रालोसपा) भी आगे आईं। इन पार्टियों के कार्यकर्ताओं ने कई स्थानों पर सड़क और रेल मार्ग को रोक कर केंद्र सरकार के विरोध में नारेबाजी की और अपना रोष जाहिर किया।

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हाजीपुर बंद समर्थकों ने महात्मा गांधी सेतु पर जाम कर दिया। आरा में भी बंद समर्थकों ने रेल और सड़क मार्ग को अवरुद्ध कर प्रदर्शन किया। पटना-गया सड़क मार्ग को भी जाम कर दिया गया। सासाराम, नवादा, खगड़िया और गया में भी भीम आर्मी संगठन व विभिन्न राजनीतिक दलों के लोग सड़क पर उतरे और सड़कों पर टायर जलाकर मार्ग जाम किया। पटना में संविधान संघर्ष समिति के कार्यकर्ता भी सड़क पर उतरे।

अन्य रिपोर्टों के मुताबिक इस बंद का असर बिहार के अलावा झारखंड, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक, महाराष्ट्र, छतीसगढ़, पंजाब, तेलंगाना, तमिलनाडु, अंडमान, हिमाचल, नागालैंड में भी दिखा। इन राज्यों में कई जगहों पर सड़कें जाम करने और ट्रेन सेवा को रोका गया है। इस बंद को आरजेडी और वामदलों  के साथ ही कई अन्य दाल जैसे सपा, बसपा , कांग्रेस और आप समेत कई विपक्षी दलों ने अपना समर्थन दिया है|

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बिहार के भाकपा-माले नेता धीरेन्द्र झा ने कहा कि न केवल दलित व पिछड़े समुदाय के आरक्षण में कटौती की जा रही है, बल्कि उन्हें पूरे देश में आवास की जमीन से विस्थापित किया जा रहा है। बिहार में तो खासकर बरसों-बरस से बसे गरीबों को भी बेदखल किया जा रहा है। बिहार में लाखों गरीबों को या तो उजाड़ दिया गया है अथवा उजाड़ने का नोटिस दिया गया है। आजादी के इतने सालों बाद भी हाउसिंग राइट मौलिक अधिकार का दर्जा प्राप्त नहीं कर सका है। आज इसके खिलाफ पूरे राज्य में खेग्रामस के बैनर से लाखों गरीबों ने जिला व प्रखंड मुख्यालयों पर प्रदर्शन किया। सरकार जंगलों में आदिवासियों को उजाड़ रही है और बिहार में दलित-गरीबों को। मोदी की इस कार्पोरेट परस्ती को पूरा भारत देख रहा है और आने वाले दिनों में सबक सिखायेगा।

शिक्षक और छात्रों का दिल्ली में मार्च

आदिवासी और आदिवासियों को उनके अधिकारों के संरक्षण की मांग और 13 प्वाइंट रोस्टर के खिलाफ बुलाए गए बंद का समर्थन करते हुए दिल्ली में छात्रों, शिक्षकों, दलित आदिवासी संगठनों के साथ ही कई युवा संगठनों ने ‘संविधान बचाओ-देश बचाओ’ नारे के साथ दिल्ली में संसद मार्च किया, जिसमें हज़ारों की संख्या में लोग शामिल हुए। इस मार्च में डूटा के साथ ABVP  को छोड़ सारे छात्र संगठन शामिल हुए। इसके आलावा कांग्रेस की नेता और दिल्ली की पूर्व मंत्री डॉ. किरण वालिया, आरजेडी के राज्यसभा सांसद मनोज झा, आप के नेता और दिल्ली के कैबिनेट मंत्री राजेंद्र पाल सिंह गौतम, माकपा के पोलित ब्यूरो सदस्य नीलोत्पल बसु के आलावा कई अन्य राजनीतिक दलों के नेता इस मार्च में शामिल हुए।

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जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्र सैफुल्ला हाथ में संविधान लेकर इस प्रतिरोध मार्च में शमिल हुए। हमने उनसे बात की और पूछा कि वो हाथ में संविधान लेकर क्यों मार्च कर रह रहे है? इस पर उन्होंने जो कहा वो यह था कि ये सरकार न केवल दलित आदिवासी पर हमला कर रही है, बल्कि ये हमारे संविधान को ही खत्म करना चाहती है। यह हमने देखा भी है कि इसी जंतर-मंतर पर भाजपा और संघ के लोगो ने संविधान को जलाया था, हम उन्हें बताने आये है कि आप ऐसे हमारे संविधान को ख़त्म नहीं कर सकोगे, जब तुम इस पर हमला करोगे तो हम इस संविधान में दिए गए विरोध और समानता के अधिकार को लेकर मार्च करेंगे। उन्होंने कहा ‘मनुवाद का एक जवाब संविधान जिंदाबाद।’

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इसके अलावा दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षक केदार नाथ मंडल जिनका हौसला और जज्बा देखने लायक था। उनकी उपस्थिति सभी को आंदोलित कर रही थी। वे अपनी शारीरिक अक्षमताओं के बावजूद इस पूरे मार्च में पूरी हिम्मत के साथ चल रहे थे। उन्होंने कहा यह समय सबको एकजुट होकर इस संविधान को बचाने का है। ये सरकार दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक, पिछड़ा विरोधी है। खुद मोदी OBC  बताकर चुनाव लड़े और जीते भी लेकिन जबसे वो जीते हैं वो लगातार दलित आदिवासी, पिछड़ा विरोधी ही काम कर रहे हैं। अभी लड़ने की जरूरत है अगर अभी नहीं लड़े तो वो  हज़ारो सालो में आदिवासी और दलित जिन्हे कुछ अधिकार मिल सके है उसे भी छीन लेंगे। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि ये सरकार संविधान से नहीं बल्कि नागपुरिया विधान देश में लागू करना चाहती है। 

पूरा मामला क्या है?

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने कई ऐसे आदेश दिए जिससे देश के दलित खासतौर पर आदिवासियों के अधिकार गंभीर रूप से प्रभावित हुए हैं। इन सभी पर सरकार का रुख भी ठीक नहीं रहा। इसी को लेकर लोगों में भारी रोष है। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने 21 राज्यों के 12 लाख आदिवासियों को जंगल छोड़ने का आदेश दिया है। ये आदिवासी वनाधिकार कानून के तहत अपना दावा साबित नहीं कर पाए हैं। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश पर स्टे लगा दिया है, लेकिन सरकार ने इस पूरे मामले की सुनवाई में लोगों का और अपना पक्ष रखने के लिए वकील तक नहीं भेजा था, जो सरकार की मंशा पर सवाल खड़े करता है। 

इसी तरह सुप्रीम कोर्ट ने विश्वविद्यालयों की नियुक्ति में विभागवार आरक्षण के अपने फैसले के खिलाफ दायर केंद्र और यूजीसी की पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी है।  इसके खिलाफ शिक्षकों और छात्रों में गुस्सा है।  आज सभी की मांग थी की दोनों ही मामलों में सरकार अध्यादेश लाए। 

आम चुनावों से पहले सरकार भी किसी प्रकार का जोखिम नहीं उठाना चाहती है। इसलिए बंद के दौरान  केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने आंदोलनकारियों से भारत बंद वापस लेने की अपील की।  उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय को एक यूनिट माना जाएगा और सरकार 200 प्वाइंट रोस्टर के पक्ष में है। जावड़ेकर ने यहां तक कहा कि दो दिन के भीतर आन्दोलनकारियों को जरूर न्याय मिलेगा। अब तक देखना है कि आंदोलन के दबाव में सरकार क्या कदम उठाती है।

  इसे भी पढ़े :-“हम भारत के मूल निवासी आदिवासी ,जंगल ख़ाली नहीं करेंगे”

 

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