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भारत
राजनीति
हमें स्कीम वर्करों की अखिल भारतीय हड़ताल को तव्वजो क्यों देनी चाहिए
50 लाख से अधिक स्कीम श्रमिक मुख्यत महिलायें जो विभिन्न केंद्रीय सरकार की योजनाओं के तहत आवश्यक सेवाएँ देती हैं हड़ताल के ज़रिए अपना विरोध दर्ज करेंगी।
न्यूज़क्लिक
16 Jan 2018
Translated by महेश कुमार
Workers' Protest

17 जनवरी को केंद्र सरकार की योजनाओं के तहत काम कर रहे 50 लाख से अधिक श्रमिक देश भर में हड़ताल में भाग लेंगे और पूरे देश के जिला मुख्यालयों के सामने प्रदर्शन करेंगे। इसका आह्वान 10 केंद्रीय ट्रेड यूनियनों ने संयुक्त रूप से किया है।

एक करोड़ से ज्यादा श्रमिक- जो मुख्यत: महिलाएँ हैं- जो स्वास्थ्य, पोषण और शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में देश की आबादी के लिए आवश्यक देखभाल-सुविधा प्रदान करती हैं।

लेकिन इन महिलाओं को 'श्रमिकों' के रूप में मान्यता नहीं दी गयी है - जाहिर तौर पर, इसलिए क्योंकि वे 'नियमित' सरकारी नौकरियों के बजाय केंद्र सरकार द्वारा चलाए गई विभिन्न 'योजनाओं' के तहत कार्यरत हैं।

इसके आलावा इन योजना कर्मचारियों को 'स्वयंसेवक' या 'कार्यकर्ता' माना जाता है।

न केवल उन्हें अपनी सेवाओं के लिए कम मज़दूरी मिलती हैं, जबकि आमतौर पर नियमित कर्मचारियों की तुलना में वे अधिक काम करती है, और उन्हें न्यूनतम मजदूरी भी नहीं मिलती हैं, उन्हें वेतन की नियमितता से भी वंचित किया जाता है। कहने की जरूरत नहीं है कि, उन्हें सरकार के श्रमिकों को दिए जाने वाले अन्य लाभों में से भी कोई लाभ नहीं मिलता है।

इन स्कीम श्रमिकों में लगभग 27 लाख आंगनवाड़ी, मिनी आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और एकीकृत बाल विकास सेवा योजना (आईसीडीएस) के तहत मिड-डे मील (एमडीएम) योजना के तहत लगभग 28 लाख श्रमिक शामिल हैं, लगभग 10 लाख आशा (मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता ) एनएचएम के तहत राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के अंतर्गत और साथ ही 2-3 लाख सहायक नर्स मिडवाइव्स (एएनएम) के श्रमिकों के साथ-साथ यूएसएचए (शहरी सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता) इसके अलावा, लाखों शिक्षा योजनाओं जैसे सर्व शिक्षा अभियान (एसएसए), राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम), राष्ट्रीय बाल श्रम परियोजना (एनसीएलपी), लघु बचत योजनाएं आदि के तहत काम कर रहे हैं।

इन श्रमिकों का विशाल बहुमत महिलाएं हैं, खासकर आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं, आशा/यूएचएचए कार्यकर्ता, एएनएम और एमडीएम श्रमिक।

ये महिला श्रमिक देखभाल सेवाएं प्रदान करते हैं, जिनके बिना देश में उत्पादन और सामाजिक प्रजनन में रुकावट आ जाएगी।

आईसीडीएस के तहत आंगनवाड़ी कार्यकर्ता उन बच्चों के विकास के लिए ज़िम्मेदार हैं, जो कि सबसे सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित पृष्ठभूमि से आते हैं – नई जच्चा-बच्चा  और उम्मीद वाली मां की देखभाल के साथ-साथ शिशुओं के पूरक पोषण, स्वास्थ्य सेवा, पूर्व-विद्यालय शिक्षा आदि का भी देखभाल करती हैं।

इसी तरह, आशा कार्यकर्ता गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण हैं, वे उनकी पहचान करती हैं और सुनिश्चित करते हैं कि वे आवश्यक चिकित्सा देखभाल प्राप्त करें। वे यह भी सुनिश्चित करते हैं कि ये गर्भवती महिलाओं को संस्थागत वितरण प्राप्त हो, जिसके लिए उन्हें दिन या रात में किसी भी अजीब समय महिला के साथ में आशा श्रमिक को साथ आने की आवश्यकता होती है।

एएनएम के लिए, वे उप-केंद्रों पर काम करते हैं, इसलिए उन्हें समुदाय और स्वास्थ्य सेवाओं के बीच संपर्क का पहला बिंदु माना जाता है।

लेकिन इन महत्वपूर्ण सेवाओं के अलावा - जो पूरे देश में महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य की रीढ़ की हैं- उन्हें अन्य कामोंयों की लंबी सूची भी दी जाती है, जैसे सर्वेक्षण करना, आदि। उन्हें इन सेवाओं को देने के साथ-साथ अपनी नियमित सेवाओं का प्रदर्शन करना भी आवश्यक है।

और फिर, जब आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को नियमित वेतन के बजाय 'मानदेय' के रूप में एक राशि दी जाती है, आशा कामगारों को तो वह भी भुगतान नहीं किया जाता है। उन्हें काम के हिस्से के आधार पर प्रोत्साहन (मानदेय)मिलता है, आप जितना ज्यादा काम करते हैं, तो आपको उतना ज्यादा भुगतान मिलता है, जोकि वह भी काफी कम होता है। इस सब के ऊपर, बजट में कटौती की जा रही और इसकी वजह से विभिन्न योजनाएं खटाई में पड़ गयी हैं।

ऑल इंडिया फेडरेशन ऑफ आँगनवाड़ी श्रमिकों और हेल्पर्स की महासचिव ए आर सिंधु ने कहा, "बजट में कटौती के चलते योजनाओं का काम प्रभावित हो रहा है।"

"2015-16 के केंद्रीय बजट में, केंद्र ने आईसीडीएस के लिए बजट आवंटन को 2015-16 में 8335.77 रुपये की कटौती कर दी है। पिछले वर्ष से 18,195 करोड़ रूपए से एमडीएम योजनाओं के लिए आवंटन 13 हजार करोड़ से घटाकर 9 हजार करोड़ कर दिया गया है।"

यह समझना महत्वपूर्ण है कि इन योजनाओं के जरिये, सरकार श्रमिकों और नागरिकों दोनों को बदल रही है।

जैसा कि सीआईटीयू की अध्यक्ष डॉ के. हेमलता ने पहले बताया है कि शिक्षा, स्वास्थ्य, भोजन और पोषण जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में लोगों की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए हमारे देश के विकास के लिए ये सेवाएँ अनिवार्य है। हालांकि, इन सेवाओं को लोगों को अधिकार और अधिकार के रूप में प्रदान करने के बजाय, सरकार अपने प्रावधानों के लिए 'योजनाएं' शुरू करने का चयन करती है। वे कहते हैं कि न केवल इन योजनाओं को किसी भी समय अस्थायी उपायों के रूप में बंद किया जा सकता है, बल्कि सरकार इन योजनाओं के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन भी नहीं प्रदान कर रही है।

दूसरी ओर, श्रमिकों को स्पष्ट रूप से धोखा दिया जा रहा है और उनका शोषण किया जा रहा है।

सबसे बड़ा तथ्य यह है कि इन श्रमिकों में से ज्यादातर महिलाएं हैं, इसलिए पितृसत्तात्मक धारणा है कि वैसे भी देखभाल-सुविधा "महिला का काम" है और इसलिए इसके लिए बहुत ज्यादा जिम्मेदारी उठाने की जरूरत नहीं है। इसलिए कि वे नियमित मजदूरी के लायक नहीं हैं और यह उनके काम की प्रकृति है और दी जा रही राशी उसी के अनुरूप हैं। वैचारिक दबाव के इस पहलू के चलते इन योजना कर्मचारियों को अदृश्य बनाने की सरकार द्वारा एक भरसक कोशिश है।

मई 2013 में, भारतीय श्रम सम्मेलन (आईएलसी) के 45 वें सत्र ने सिफारिश की थी कि केंद्र सरकार योजना कर्मचारियों को श्रमिकों की पहचान करे, उन्हें न्यूनतम मजदूरी दी जाए और उन्हें पेंशन सहित सामाजिक सुरक्षा लाभ प्रदान किया जाए और उन्हें संगठित होने का अधिकार भी मिले ताकि वे सामूहिक तौर आर अपने अधिकारों के लिए लड़ सकें।

योजना कर्मचारियों के आंदोलन की मांग है कि:

45 वीं आईएलसी की सिफारिशों को लागू करें कि योजना कर्मचारियों को श्रमिकों के रूप में मान्यता दी जाए, न्यूनतम मजदूरी 18,000 रुपये से कम न हो और मासिक पेंशन सहित सामाजिक सुरक्षा, जो कि 3000 रुपये से कम न हो। योजना कर्मचारियों को कर्मचारी भविष्य निधि (ईपीएफ) और कर्मचारी राज्य बीमा (ईएसआई) के अंतर्गत लाना चाहिए।

2) केन्द्रीय प्रायोजित योजनाओं के लिए केंद्रीय बजट 2018-19 में पर्याप्त वित्तीय आवंटन जिसके अंतर्गत इन श्रमिकों को कार्यरत किया गया है- जिसमें आईसीडीएस, एमडीएमएस, एनएचएम, एसएसए, एनसीएलपी आदि शामिल हैं-यह सुनिश्चित करने के लिए कि श्रमिकों की मजदूरी में न केवल न्यूनतम मजदूरी स्तर पर भी पर्याप्त बुनियादी सुविधाओं और गुणवत्ता सेवाओं के साथ योजनाओं का सार्वभौमिकरण प्राप्त हो।

3) किसी भी रूप में योजनाओं का निजीकरण न हो और किसी भी हालत में नकदी हस्तांतरण के जरिए लाभार्थियों का बहिष्करण न हो। मोदी सरकार इन योजनाओं का निजीकरण करने की कोशिश कर रही है, उदाहरण के लिए एमडीएम योजना में, और वेदांत, जेपी सीमेंट्स, नंदी फाउंडेशन, इस्कॉन आदि जैसे कॉर्पोरेट्स और एनजीओ को शामिल किया गे हैं, इस पर रोक लगनी चाहिए।

यही कारण है कि आगामी 17 जनवरी को राष्ट्रव्यापी विरोध देश के लिए महत्वपूर्ण ही नहीं है बल्कि ऐतिहासिक है।

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