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ज़रा सोचिए, सरकारी चावल का इस्तेमाल सैनिटाइज़र में हो या ग़रीबों की भूख मिटाने में!
जब कोरोना से निपटने में भी सामान्य साबुन कारगर है तो सरकार हैंड सैनिटाइज़र बनाने का फैसला क्यों ले रही है? जबकि इस समय लॉकडाउन के चलते देशभर में हर जगह ग़रीब, मज़दूरों के सामने भूख का संकट है।
अजय कुमार
22 Apr 2020
hand sanitaizer

सरकार की प्राथमिकताएं क्या हैं? इससे भी सरकार की नीयत का पता चलता है। सरकारी गोदाम अनाज से पटा पड़ा है, लेकिन दूसरी तरफ़ बहुत लोग भूख से मरने के कगार पर पहुँच रहे हैं। खाने के लिए मारपीट की ख़बरें आ रही हैं। बिहार के एक इलाके से खबर आ रही है कि भूख वजह से बच्चे मेढ़क खा रहे हैं। उत्तर प्रदेश में प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र में ग़रीब भूखे बच्चे घास ही चबा जाते हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ का अनुमान है कि लॉकडाउन की वजह से दुनिया भर की भुखमरी में दो गुने का इजाफा होने वाला है। ऐसे में आप सोच सकते हैं कि कोरोना के दौर में सरकार की प्राथमिकता क्या होनी चाहिए?  

भुखमरी से लोगों को बचाने की जगह केंद्र सरकार (पेट्रोलियम मंत्रालय) ने फैसला लिया है कि सरकारी गोदामों में पड़े सरप्लस चावल यानी अतिरिक्त चावल का इस्तेमाल हैंड सैनिटाइज़र के लिए ज़रूरी इथेनॉल बनाने में किया जाएगा। कैबिनेट मंत्री रामविलास पासवान ने कहा कि यह फैसला सोच समझकर लिया गया है। सरकार ने लम्बे समय का सोचकर यह फैसला लिया है। उनका कहना है कि “क्या सैनिटाइज़र का इस्तेमाल करने का हक़ केवल अमीरों का है? अगर अधिक उत्पादन होगा तभी ग़रीबों को आसानी से सैनिटाइज़र मिल पाएगा।”

हालांकि ग़रीब वर्ग के हित में ही इस फ़ैसले की आलोचना हो रही है। केरल के स्वास्थ्य मंत्री थॉमस इसाक ने भी केंद्र के इस फैसले की आलोचना की और कहा कि जब हाथ साफ़ करने का साबुन इस्तेमाल किया जा सकता है और साबुन कारगर है तो सरकार हैंड सैनिटाइज़र बनाने का फैसला क्यों ले रही है?

इस फैसले को सुनाते हुए सरकार ने इस नियम का हवाला दिया है कि राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति 2018 के तहत अगर एक फसल वर्ष में कृषि एंव किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा अनुमानित मात्रा से ज्यादा खाद्यान्न की आपूर्ति हो तो, यह नीति अनाज की इस अतिरिक्त मात्रा को राष्ट्रीय जैव ईंधन समन्वय समिति की मंजूरी के आधार पर इथेनॉल में बदलने की मंजूरी देगी।  

इसी आधार पर राष्ट्रीय जैव-ईंधन समन्वय समिति (National Biofuel Coordination Committee) की बैठक में भारतीय खाद्य निगम (FCI) के पास उपलब्ध अतिरिक्त चावल को इथेनॉल में बदलने और उसका उपयोग अल्कोहल आधारित सैनिटाइजरों के निर्माण और पेट्रोल में मिलाने के लिए करने को मंजूरी दी गई।  

इस तरह से देखा जाए तो आम परिस्थितियों के लिए यह फैसला सही है। नियम के तहत है। लेकिन इस समय हम कोरोना के संकट से गुजर रहे हैं और तब तक यह संकट जारी रहेगा जब तक इलाज मिल नहीं जाता। इसका मतलब है कि एक लम्बे दौर के लिए हमें दो परेशानियों के बीच संतुलन बिठाना है। पहला यह है कि अनाज रहते हुए लोग भूख से न मरे और हैंड सैनिटाइज़र की कमी की वजह से संक्रमण न फैले। इन दोनों के बीच प्राथमिकता भी तय करनी है।  

कोरोना से मिले आंकड़ें यह नहीं बताते हैं कि संक्रमण होते ही कोई मर जाता है। बल्कि मरने की दर बहुत कम है। भारत में तो कोरोना की मृत्यु दर  3.3 फीसदी है। लेकिन जो भूख से गुजरता है। वह हर दिन मरने की हालत से भी गुजरता है और अंत में मर जाता है। इसलिए सरकारी गोदाम में पड़े अनाज भंडारों का सरकार सही इस्तेमाल करना चाहती है तो उसकी प्राथमिकता हैंड सैनिटाइज़र की बजाय लोगों में अनाज बांटना होना चाहिए।  

एक सवाल यह भी उठता है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि सरकारी गोदामों में बहुत अधिक अनाज सड़ चुका है। यह सड़ा हुआ अनाज किसी काम का नहीं है तो सरकार यह फैसला ले रही है कि इसका इस्तेमाल हैंड सैनिटाइज़र बनाने में हो। यानी अपनी लापरवाही किसी को बतानी भी न पड़े और ‘जनहित’ की बात भी हो जाए। लेकिन सरकार को यह साफ बताना चाहिए कि कितने चावल का इस्तेमाल वह हैंड सैनिटाइज़र बनाने में करेगी? क्या यह सड़ा हुआ चावल है या साफ-सुथरा चावल है? अगर सड़ा हुआ चावल है तो यह सड़ा कैसे? अगर अच्छा चावल है तो क्या अच्छे चावल का इस्तेमाल इथेनॉल बनाने लिए किया जाना चाहिए या भूखे लोगों को भूख से बचाने के लिए किया जाना चाहिए? सरकार को इसके बारें में साफ़ तौर पर बताना चाहिए कि वह कैसे और कितने चावल का इस्तेमाल इथेनॉल बनाने लिए कर रही है?

चूँकि विषय सरकारी गोदाम में पड़े अनाज के सही वितरण से जुड़ा हुआ है तो बात भुखमरी पर भी कर लेते हैं। भारत की तकरीबन 22 फीसदी आबादी गरीबी रेखा से नीचे रहती है। साल 2019 की ग्लोबल हंगर इंडेक्स की रैंकिंग में कुल 117 देशों के बीच भारत 102 नम्बर पर आता है। अनुमान है कि भारत में तकरीबन 15 करोड़ लोग भूखे पेट सोते हैं। इस तरह तकरीबन 19 करोड़ लोगों को पेट भर खाना नहीं मिलता है। यह आम दिनों की बात है अब इसमें कोरोना वायरस का कहर भी जोड़िये।

सेंटर फॉर मॉनटरिंग फॉर इकॉनमी का हालिया आंकड़ा है कि करीब 12 करोड़ भारतीयों ने रोजगार गंवाया है। मान लीजिए कि इनमें से 8 करोड़ लोग ऐसे हैं कि उन्हीं की कमाई पर उनके परिवार का भरण-पोषण निर्भर है। इसका मतलब हुआ कि देश के 25 करोड़ परिवारों में से एक तिहाई परिवार के पास अभी जीविका का संकट आन खड़ा हुआ है। यह वह तस्वीर है, जिसे आप सोचते हुए खाना खाएंगे तो बड़ी मुश्किल से निवाला मुंह में जाएगा। 

ऐसे में सरकारी मदद की सबसे अधिक जरूरत होती है। यह लोग भूख से न मर जाए, इससे पहले इन लोगों तक अनाज पहुंचाना जरूरी है। अमर्त्य सेन कहते हैं कि भूखमरी की स्थिति अनाज की कमी से पैदा नहीं होती हैं। अनाज के कुप्रबंधन से पैदा होती है। आसान भाषा में समझिये तो कहने का मतलब यह कि घर में खाना है लेकिन परिवार के मुखिया ने ऐसी व्यवस्था बनाई है कि घर का सबसे कमजोर इंसान भूख से तड़प रहा है। उसे खाना नहीं मिल रहा है और वह मरने के कगार पर है।  

देश के लिहाज से देखें तो लोगों के पास राशन कार्ड नहीं होते। जिनके पास राशन कार्ड होते हैं, उन्हें भी निर्धारित मात्रा में अनाज नहीं मिल पाता है। राशन बांटने वाली दुकाने कई-कई दिनों तक बंद रहती हैं। राशन खरीदने के लिए अधिक पैसा देना पड़ता है। एक अनुमान के मुताबिक तकरीबन 54 फीसदी लोगों को सरकार द्वारा महीने का निर्धारित 35 किलो आनाज भी नहीं मिल पाता है। तकरीबन 70 फीसदी लोगों को अधिक दाम देकर सरकार से अनाज खरीदना पड़ता है।  

पिछले साल जून के महीने में फूड कॉर्पोरेशन ऑफ़ इण्डिया के गोदाम में तकरीबन 8 करोड़ टन अनाज पड़ा हुआ था। इस साल मार्च के महीने के अंत तक  तकरीबन 7.7 करोड़ अनाज पड़ा हुआ है। यहाँ समझने वाली बात यह है कि सरकार के गोदाम  में जितना अनाज होना चाहिए, उससे तकरीबन 3 गुना अधिक अनाज इस समय रखा हुआ है। रबी की फसल की कटाई के बाद इसमें और अधिक इजाफा होगा। इसलिए  सरकार के पास अनाज की कमी नहीं है। सरकार अगर चाहे तो आठ करोड़ परिवारों में से हर एक परिवार को एक-एक टन अनाज मुहैया करवा दे। इसलिए सरकार द्वारा दिए रिलीफ पैकेज में दस किलो अनाज का बंटवारा करना कोई बड़ी बात नहीं है।  

लेकिन सरकार यह कदम उठा क्यों नहीं रही है। भारत के सभी प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री जैसे कि रघुराम राजन, ज्यां द्राज, अभिजीत बनर्जी, प्रभात पटनायक सबका कहना है कि सरकार को सरकारी गोदाम में रखे अनाज को बिना राशन कार्ड की वैधता के लोगों में बांटने का काम करना चाहिए। कोरोना का संकट लंबा चलेगा। हो सकता है कि अगले छह महीने के लिए भारत की बड़ी आबादी के पास दो वक्त की रोटी का कोई सहारा न हो।  

अर्थशास्त्री ज्यां द्रांज ने इंडियन एक्सप्रेस में इस विषय पर लिखा है कि 'क्यों सरकार अनाज का भंडार रहते हुए गरीबों में अनाज बांटने का फैसला नहीं ले रही है'। ज्यां द्राज लिखते हैं कि सरकार मिनिमम सपोर्ट प्राइस पर लोगों से अनाज खरीदती है और बहुत कम दामों में लोगों में अनाज बांटती है। इन दोनों के अंतर को ही फूड सब्सिडी कहा जाता है। फूड सब्सिडी को सरकारी खातों में तभी दर्ज किया जाता है जब केंद्र द्वारा अनाज के स्टॉक को बाँटने के लिए रिलीज कर दिया जाता है। इस लिहाज से कोरोना वायरस के रिलीफ पैकेज में 40 हजार करोड़ रुपये फूड सब्सिडी पर खर्च किया गया है। लेकिन हकीकत यह है कि अनाज का स्टॉक अधिक था। यहीं से अनाज रिलीज किया गया है। इसमें सरकार का एक भी रुपये खर्च नहीं हुआ है। केवल खाता-बही में चालीस हजार करोड़ रुपये दर्ज किए गए हैं। सरकार के लिए बस यही एक परेशानी है कि खाता-बही में अनाज की लागत दर्ज की जाती है। यानी बहुत अधिक अनाज बांटने पर सरकारी खातों में बहुत अधिक लागत दिखाई जाएगी। भारत का राजकोषीय घाटा अधिक दिखेगा। क्रेडिट एजेंसिया भारत को कमजोर कहेंगी। सरकार अनाज रिलीज करने में इसलिए आनाकानी करती हैं।  

तकरीबन 12 करोड़ लोगों के पास कोई राशन कार्ड नहीं है। बेतहाशा स्टॉक से तो यह भी साफ है कि बिना राशन कार्ड वालों को भी सरकार मुफ्त में अनाज दे सकती है। लेकिन यहाँ भी खाता-बही की परेशानी सरकार के लिए और सरदर्द बन जाती है। जिनके पास राशन कार्ड नहीं है, वो सरकार के पब्लिक डिस्ट्रीब्युशन सिस्टम (पीडीएस) के भागीदार नहीं है। इसलिए जब सरकार उन्हें अनाज देगी तो बाजार मूल्य पर अनाज की दर खाता-बही में दिखाई जाएगी। इसलिए घाटा और अधिक दिखेगा। कहने का मतलब इतना है कि न फिटकरी लगना है और न चूना सरकार केवल राजकोषीय खाते में बढ़ोतरी के डर से अनाज बांटने से कदम पीछे कर रही है।  

इसलिए इस मुसीबत की घड़ी में सही कदम तो यही होगा कि सरकार राशन कार्ड जैसी शर्तों पर ध्यान दिए बिना सबके लिए अनाज मुफ्त कर दे। कम्युनिटी किचेन की संख्या बढ़ा दे। ऐसा करने से भूख के कगार पर पहुंच रहे लोगों का डर तो थोड़ा कम होगा ही साथ में अनाज की वजह से बढ़ने वाली महंगाई दर में भी कमी आएगी। लेकिन सरकार ऐसी प्राथमिकताएं पर ध्यान देने की बजाए यह कह रही है कि सरप्लस चावल का इस्तेमाल हैंड सैनिटाइज़र बनाने में होगा।  

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