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अब किसानों के संघर्षों के साथी नहीं रहे जुझारू देवीलाल के वारिस!
किसानों से हमदर्दी के नाम पर हरियाणा का चौटाला खानदान अपने आप को तमाम गतिविधियों के जरिए सबसे आगे रखता रहा है और इसी बूते सत्ता में भागीदार है, लेकिन अब उसी ने किसानों के मुद्दों को चोट पहुंचाई है।
यूसुफ़ किरमानी
11 Sep 2020
 ट्रैक्टर से पहुंचे दुष्यंत चौटाला
(फाइल फोटो) 2017 में संसद के सत्र में शामिल होने के लिए ट्रैक्टर से पहुंचे दुष्यंत चौटाला। 

हरियाणा में कुरुक्षेत्र के पीपली में किसानों को बेरहमी से पीटे जाने से वो चेहरे बेनक़ाब हो गए जो किसानों से हमदर्दी का दम भरते नजर आते थे। किसानों से हमदर्दी के नाम पर हरियाणा का चौटाला खानदान अपने आप को तमाम गतिविधियों के जरिए सबसे आगे रखता रहा है और इसी बूते सत्ता में भागीदार है, लेकिन अब उसी ने किसानों के मुद्दों को चोट पहुंचाई है।

क्या किसी को 15 दिसंबर 2017 की वो तस्वीर याद है जिसमें तत्कालीन आईएनएलडी (इंडियन नेशनल लोकदल) सांसद दुष्यंत चौटाला ट्रैक्टर पर बैठकर शीतकालीन सत्र में हिस्सा लेने संसद भवन पहुंच गए थे। तब दुष्यंत ने बताया था कि किसानों की समस्याओं की तरफ ध्यान आकर्षित करने के लिए उन्होंने संसद तक ट्रैक्टर चलाया है। इसके बाद दुष्यंत ने कई बार इस ट्रैक्टर को हथियार बनाया। कभी वो वोट डालने ट्रैक्टर से गए, कभी रैली को संबोधित करने ट्रैक्टर से गए। किसानों को दुष्यंत में उम्मीद की लौ दिखी। परिवार में विवाद होने के बाद दुष्यंत ने अलग से जननायक जनता पार्टी (जेजेपी) बनाई। किसान मतदाताओं ने चौधरी देवीलाल का वारिस समझकर जेजेपी को पिछले विधानसभा चुनाव में खूब सारे वोट दिए। किसानों के वोट ने दुष्यंत चौटाला को इन हालात में ला दिया कि वो भाजपा से सौदेबाजी कर सके और डिप्टी सीएम का पद हासिल कर लिया। लेकिन क्या इनकी मंजिल यहीं तक थी। यही सवाल किसान पूछते हैं क्योंकि सत्ता और पद पाने के बाद दुष्यंत किसानों को लगभग भूल गए।

पीपली में जब गुरुवार, 10 सितम्बर को किसान पीटे जा रहे थे तो दुष्यंत के भाई दिग्विजय चौटाला ट्वीट करके और मीडिया में बयान देकर नकली हमदर्दी जता रहे थे। दिग्विजय ने कहा कि पीपली में किसानों को पीटे जाने की घटना निन्दनीय है। हम किसानों का दर्द अपना समझते हैं। इस घटना की जांच होनी चाहिए। लेकिन दुष्यंत चौटाला का इस घटना को लेकर कोई बयान नहीं आया जबकि डिप्टी सीएम की नजर राज्य के चप्पे चप्पे के घटनाक्रम पर होनी चाहिए।

किसान पिछले दस दिनों से अपने आंदोलन की घोषणा कर रहे थे। मुख्यमंत्री के आदेश पर कोरोना की आड़ में किसानों के आंदोलन पर पाबंदी लगा दी गई। किसान फिर भी जब 10 सितंबर के प्रदर्शन के लिए अड़े रहे तो कुरुक्षेत्र और पीपली में धारा 144 लगा दी गई। लगभग सभी अनाज मंडियों में पुलिस तैनात कर दी गई। हरियाणा के विभिन्न हिस्सों से पीपली आ रहे किसानों को रोककर नजरबंद कर दिया गया।

घटना को एक दिन बीत चुका है लेकिन सरकार की तरफ से किसानों से बातचीत की कोई पहल नहीं हुई है। चौटाला खानदान के दूसरे वारिस और आईएनएलडी के सर्वेसर्वा अभय सिंह चौटाला ने भी ट्वीट करके किसानों से हमदर्दी जता दी। उन्होंने कहा कि हम किसानों की लड़ाई लड़ेंगे लेकिन किस तरह से लड़ेंगे, उसका कोई खाका अपने बयान में पेश नहीं किया है। इस तरह किसानों का देवीलाल के वारिसों से अब मोह पूरी तरह भंग हो चुका है।

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पीपली में जुटे किसान क्या चाहते थे

हरियाणा के किसान उन तीन अध्यादेशों का विरोध कर रहे हैं, जिन्हें हाल ही में केंद्र की मोदी सरकार ने पास किया है। किसानों का ऐसा आंदोलन सिर्फ हरियाणा में ही नहीं हो रहा है। पंजाब के किसान भी इस मुद्दे पर आंदोलन कर रहे हैं। मोदी सरकार एक अध्यादेश का जोरशोर से प्रचार कर लाई थी - वन नेशन-वन मार्केट यानी एक देश और एक बाजार। सुनने में अच्छा लगने वाला शब्द है लेकिन दरअसल, इसकी आड़ में किसानों की मौत का परवाना साबित होने वाला है यह अध्यादेश। इससे फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य तय किया जाना खत्म हो जाएगा। इस कानून के तहत व्यापारी किसानों से बाहर ही उनकी उपज का सौदा कर लेंगे। किसानों की उपज मंडी में कभी पहुंचेगी ही नहीं।

अभी बाजार में क्या होता है कि किसानों की उपज सालभर तक मंडी में आती रहती है और रेट घटते बढ़ते रहते हैं। नया कानून सारा फायदा व्यापारियों के हाथों में दे रहा है। इससे कॉन्ट्रैक्ट फॉर्मिंग बढ़ेगी। यानी व्यापारी फसल आने से पहले ही किसानों के खेत बुक कर लेंगे। शुरू में किसानों को मुंहमांगी कीमत मिलेगी लेकिन बाद में किसानों की कमर तोड़ दी जाएगी। रिलायंस और अडानी कॉन्ट्रैक्ट फॉर्मिंग में उतरने की घोषणा पहले ही कर चुके हैं।

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मोदी सरकार ने दूसरे अध्यादेश के जरिये आवश्यक वस्तु अधिनियिम 1955 को बदल दिया है। इससे फूड प्रोसेसिंग में जुटी रिलायंस और अदानी की कंपनियों को सीधा फायदा होगा। इसके तहत स्टाक की निश्चित सीमा खत्म कर दी गई है। यानी रिलायंस या अडानी प्याज और आलू का चाहे जितना स्टाक कर लेंगे। कई अनाज, दालों, खाद्य तेल को आवश्यक वस्तु अधिनियिम से बाहर करके इसके स्टाक की सीमा खत्म कर दी गई है। यानी व्यापारी एक बार सस्ते में किसानों से उनकी उपज खरीदकर बड़े पैमाने पर स्टाक कर लेंगे और उसकी कीमत अपने हिसाब से तय करेंगे। मसलन अडानी फॉरच्यून रिफाइंड तेल बेचता है। यह तेल सूरजमुखी के फूलों और अन्य चीजों से तैयार होता है। अब अडानी को किसानों से सूरजमुखी के फूल खरीदकर उन्हें स्टाक करने की खुली छूट होगी। फॉरच्यून रिफाइंड आयल इस देश में बहुत बड़ा ब्रैंड बन चुका है।

एक और खतरनाक अध्यादेश मोदी सरकार लाई है, जिसे फॉरमर्स एग्रीमेंट आन प्राइस एश्योरेंस एंड फॉर्म सर्विस आर्डिनैंस। इसके जरिए बड़ी कंपनियां किसानों से अनुबंध कर उनके खेतों को अपने कब्जे में ले लेंगी। किसान सिर्फ अपने खेत पर मजदूर बनकर रहेगा। यूपी और महाराष्ट्र के आम उत्पादकों के साथ यह खेल हो चुका है। मलीहाबाद (लखनऊ) का दसहरी आम पूरी दुनिया में मशहूर है लेकिन बाजार में इसकी कीमत और उपलब्धता रिलायंस तय करता है। मलीहाबाद और आसपास के गांव में आम उत्पादक सिर्फ बाग की रखवाली करते हैं। भारत की मंडियों में बिकने वाला दसहरी, लंगड़ा, चौसा, तोतापरी आम भी अब रिलायंस से खरीदकर बेचा जाता है।

हरियाणा और पंजाब में किसान बड़े काश्तकार हैं। इन तीनों अध्यादेशों से सबसे ज्यादा नुकसान में रहेंगे। इसलिए सबसे ज्यादा विरोध इसी बेल्ट में हो रहा है। भाजपा ने किसानों के आंदोलन को कांग्रेस प्रायोजित बताकर इसे दूसरा रंग देना चाहा लेकिन इस आंदोलन से कांग्रेस का कोई संबंध नहीं है। हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा और रणदीप सुरजेवाला ने इसे नैतिक समर्थन दिया था और एक-दो ट्वीट किसानों के हक में किये थे। इससे ज्यादा उनका इस आंदोलन से कोई वास्ता नहीं है। इसे पूरी तौर पर भारतीय किसान यूनियन (चढ़ूनी) चला रहा है।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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