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फ़्रांस में खेलों में हिजाब पर लगाए गए प्रतिबंध के ज़रिये हो रहा है विभाजनकारी, भेदभावपूर्ण और ख़तरनाक खेल
फ़्रांस में धर्मनिरपेक्षता को बरक़रार रखने के लिए खेलों में हिजाब और दूसरे "सुस्पष्ट धार्मिक चिन्हों" पर प्रतिबंध लगाने की कवायद पूरी तरह से पाखंड, भेदभाव और राजनीतिक हितों से भरी नज़र आती है। आख़िरकार यह महिलाओं से उनके फ़ैसले का अधिकार छीनेगी। यह अधिकार, उदारवादियों के लोकतांत्रिक अधिकारों के भ्रम से कहीं दूर है।
देबांगना चैटर्जी
09 Feb 2022
फ़्रांस

यह तकरीबन एक दशक पहले हुआ था। लेकिन इसकी यादें अब तक हमारी सामूहिक चेतना में मौजूद हैं। हमें यह याद दिलाने की जरूरत नहीं है कि जब फीफा ने ईरानी महिला फुटबॉल टीम से 2011 में जॉर्डन की टीम के ख़िलाफ़ वर्ल्ड कप क्वालिफायर मैच छीना था, तो इन महिला खिलाड़ियों को क्या गंवाना पड़ा था। यह केवल दुनिया के सबसे बड़े खेल उत्सव में खेलने से चूकने का मामला नहीं था। ना ही यह खेल के मैदान पर हारने का मामला था। उस दिन आंखों में आंसू लिए उन महिलाओं को खेल के मैदान पर नहीं हारना पड़ा। उन्हें अपमान सहना पड़ा, जबकि उनकी हिजाब में तस्वीरें उस तूफान का हिस्सा बन गईं, जो आज भी जारी है।

जिस खेल भावना, समावेशी रवैये और फुटबाल की जिस खूबसूरती का जिक्र किया जाता है, उस दिन फुटबाल में यह सबकुछ गंवाया गया। उस घटना ने बताया कि खेल सिर्फ़ एक आयाम वाले खेल नहीं होते, बल्कि इनमें कई सामाजिक प्रतिबंधों का विस्तार भी होता है। खासकर महिलाओं के मामले में तो यह ज़्यादा लागू होता है।

हमें यह याद दिलाने की जरूरत नहीं है कि 5 जून, 2011 को कौन हारा था। खेलों में हिजाब को लेकर एक बार फिर तूफान आया है। इस बार यह फ्रांस में हो रहा है। और इस बार यह सिर्फ़ भेदभावकारी तर्क नहीं है, जिसका उपयोग पूर्ण प्रतिबंध लगाने के लिए किया गया है।

यह 2022 है! मौजूदा विवाद तब शुरू हुआ, जब फ्रांस की संसद ने हिजाब और धार्मिक पहचान स्पष्ट करने वाले दूसरे चिन्हों पर देश में खेल की प्रतिस्पर्धाओं में प्रतिबंध लगा दिया। यह नहीं भूलना चाहिए कि 2011 के बाद फीफा और अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक संघ ने प्रतिस्पर्धाओं में हिजाब के उपयोग पर प्रतिबंध हटा दिया था। इसलिए फ्रांस द्वारा लगाया गया प्रतिबंध ने देश को इसके मुस्लिम अल्पसंख्यकों के खिलाफ़ खड़ा कर दिया है। इस प्रतिबंध का उद्देश्य धर्मनिरपेक्षता और राष्ट्रीय पहचान के मूल्यों को मजबूत करना था। लेकिन अब इस पर संशय है, क्योंकि अब सवाल पैदा हो गया है कि इस धार्मिक चिन्ह की स्पष्टता का स्तर कैसे तय किया जाएगा? स्पष्टता की परिभाषा विवादित और बेहद आलोचना भरी है। यह वास्तविकता है कि किसी ईसाई क्रॉस पेडेंट को खेल के मैदान पर स्पष्ट धार्मिक चिन्ह नहीं माना जाता है, जबकि यह खुल्लेआम ईसाई धार्मिकता का प्रतीक है। जबकि हिजाब को सुस्पष्ट धार्मिक चिन्ह माना जा रहा है। दरअसल यहां मामला सिर्फ़ धार्मिक चिन्ह का नहीं है, बल्कि मसला यहां उस चिन्ह का किस धर्म से संबंध है, इस चीज का है।

हिजाब पर चल रहा विमर्श कई परतों में है। चलिए शुरुआत यहां सबसे बड़े सवाल- पहचान के मुद्दे से करते हैं। यहां जिन खिलाड़ियों को निशाना बनाया जा रहा है, वे दोहरी पहचान लेकर चल रहे हैं। वे महिलाएं हैं, ऊपर से मुस्लिम। कम शब्दों में कहें तो यहां दोहरी वंचना का खेल चल रहा है। मतलब लैंगिक आधार पर भेदभाव और इस्लाम से घृणा पर आधारित वंचना का। फिर जब लैंगिक आधारित इस वंचना को एक साफ़ दिखने वाले मुस्लिम प्रतीक हिजाब से ईंधन मिलता है, तो इससे "हिजाबोफोबिया या हिजाब से घृणा" का जन्म होता है। दूसरे शब्दों में कहें तो यहां हिजाब से पैदा होने वाली डर की भावना की ओर संकेत है; जबकि यह भावना बेहद भ्रामक है। बल्कि इससे हिजाब पर जारी पूरा विमर्श ख़तरे में आ जाता है।

फ्रांस में हिजाब का विमर्श बहुत पुराना है। फ्रांस द्वारा हिजाब पर प्रतिबंध लगाने की कवायद का नेतृत्व करना नया नहीं है, यह कई देशों में जारी है, लेकिन वैश्विक स्तर पर यह मुस्लिमों से घृणा या इस्लामोफोबिया की राजनीति का प्रतीक बन गया है। फ्रांस में यह विमर्श 1989 में तब शुरू हुआ, जब उत्तर अफ्रीकी मूल की तीन लड़कियों को हिजाब ना हटाने के चलते स्कूल में प्रवेश से रोक दिया गया। 2004 में 9/11 के हमले के बाद आंतक के खिलाफ़ वैश्विक लड़ाई के दौर में फ्रांस ने अति धार्मिक पहचान स्पष्ट करने वाले चिन्हों पर प्रतिबंध लगा दिया। तब कहा गया कि इससे फ्रांस के धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों का हनन होता है। 2010 में निकोलस सर्जी की सरकार ने एक नया कानून बनाकर मुस्लिम कपड़ों के साथ चेहरे को छुपाने वाले कपड़ों पर प्रतिबंध लगा दिया। हिजाब पर चलने वाले किसी भी विमर्श में अब भी इस प्रतिबंध का जिक्र आता है। लेकिन इस प्रतिबंध का यूरोप के दूसरे देशों में भी प्रभाव और प्रसार हुआ।

कई यूरोपीय देशं ने जल्द ही फ्रांस के रास्ते पर चलना शुरू कर दिया। ना केवल यूरोप बल्कि यूरोप के मॉडल पर आधुनिक राज्य प्रणाली का पालन करने वाले कई गैर-यूरोपीय देशों ने भी इस प्रतिबंध को लागू कर दिया। कई बार राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला दिया गया। यहां तक कि आज भारतीय शैक्षणिक संस्थानों में भी यही तर्क प्रभावशाली है।

बल्कि इस हिजाब को पहनने वाली महिलाओं की संख्या देखें, तो इससे हमें प्रतिबंध की इस पूरी कवायद का दोहरा रवैया दिखाई दे जाता है। जब 2010 में फ्रांस में बुरके पर प्रतिबंध लगाया गया, तब वहां 47 लाख की मुस्लिम आबादी में सिर्फ़ 1900 महिलाएं ही इसका उपयोग कर रही थीं। यह आधिकारिक आंकड़ा है। अब इससे एक बेहद अहम सवाल खड़ा होता है: यहां राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए कितना ख़तरा है, क्या वाकई में यहां कोई ख़तरा है भी या नहीं? वास्तविकता यह है कि धर्मनिरपेक्षता के राजनीतिक सिद्धांत से परे, फ्रांस में धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा सामाजिक तत्वों से प्रभावित होकर चल रही है। इसलिए फ्रांस की धर्मनिरपेक्षता पर प्रवासियों के आगमन, प्रवासियों के खिलाफ़ उपज रही भावनाओं और दक्षिणपंथी दलों से प्रभाव पड़ रहा है। बाकी की दुनिया में भी ऐसा ही कुछ हो रहा है।

यहां चिता करने वाली बात यह है कि फ्रांस में शैक्षणिक संस्थानों में प्रतिबंधों पर जो रस्साकसी चल रही थी, वह अब खेल में भी आ रही है।

जब अंतरराष्ट्रीय खेल की बात होती है, तो महिलाएं "संस्कृति" बनाम् "एकरूपता" की जंग में फंस जाती हैं। यह उन्हें दोनों तरफ से खींचता है और उन्हें खेल से दूर करता है। हिजाबोफोबिया को दोहरी धार, खेलों में महिलाओं की पोशाकों में एकरूपता के पश्चिमी दुनिया के मत और कुछ इस्लामी देशों द्वारा खिलाड़ियों पर सांस्कृतिक पोशाक अनिवार्य करने से उपजती है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि ईरान की पहली ट्राईएथलीट शिरीन गिरामी को अपने शरीर को पूरा ढंकने के सरकारी नियम और सरकारी अनुमति के बाद ही वर्ल्ड चैंपियनशिप 2013 में खेलने को मिला था। लेकिन यह भी सच है कि खेलों में हिजाबोफोबिया का पश्चिमी देशों द्वारा अंतरराष्ट्रीय खेलों के मानकीकरण से ज़्यादा लेना-देना है।

"अंतरराष्ट्रीयता" का विचार ज़्यादातर पश्चिमी भावनाओं को सहूलियत देता है। इसलिए जब खेलों में महिलाओं की पोशाक की बात आती है, तो खुद के शरीर को पूरा ढंककर गतिविधियों में हिस्सा लेने वाली महिलाएं जो राज्य के नियमों का पालन कर रही होती हैं या फिर सामाजिक प्रतिबंधों का या खुद की धार्मिक भावनाओं का, उन्हें खेल से दूर रहना पड़ता है। यह पाखंड तब नज़र आता है, जब खेलों में ज़्यादा छोटे कपड़े पहनने का सुझाव अक्सर ही अंतरराष्ट्रीय प्रशासनिक संस्थाओं के उच्च पदाधिकारी दे रहे होते हैं, जो अपने दर्शकों की संख्या बढ़ाने के लिए ऐसा कर रहे होते हैं।

हिजाब मे रहने वाली महिलाओं को अक्सर खेलने से रोक दिया जाता है। इसके लिए उनके धार्मिक चिन्ह की अतिस्पष्टता, जो धर्मनिरपेक्षवाद के विरोधाभास में जाती है, उसका तर्क दिया जाता है। या फिर महिला खिलाड़ियों के आराम और सुरक्षा का हवाला दिया जाता है। धार्मिक चिन्हों वाले तर्क का कोई आधार नहीं है, क्योंकि अक्सर पुरुष खिलाड़ी धार्मिक संकेत देते हैं या फिर टैटू (गुदना) बनवाने के क्रम में कई धार्मिक चिन्ह बनावाते हैं। ईसाई क्रॉस खिला़ड़ियों में बहुत आम है। फिर पहलवानी जैसे कुछ खेलों में सुरक्षा का तर्क सही भी हो सकता है, जिसमें गर्दन से खिलाड़ी को पकड़ना होता है, लेकिन ज़्यादातर खेलों के लिए हिजाब से कोई गतिरोध पैदा नहीं होता। आखिर अगर कोई महिला अपने हिजाब के साथ या उसके बिना खेलना चाहती है, तो किसी बाहरी को उसपर प्रतिबंध क्यों लगाना चाहिए? हालांकि अंतरराष्ट्रीय खेलों में महिलाओं को हिजाब के साथ खेलने देने की अनुमति देना कुछ हद तक उनके ऊपर राज्य या समाज द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों को वैधानिक बनाता है, लेकिन कड़े पोशाक नियमों द्वारा किसी महिला की महत्वकांक्षाओं को दबाना उसके अधिकारों का उल्लंघन है।

कम शब्दों में कहें तो चाहे फ्रांस हो या फीफा, चाहे ईरान हो या भारत, चाहे कनाडा हो या कर्नाटक, चाहे शिक्षा, कला हो या खेल, हिजाब से घृणा एक मुस्लिम महिला के सपनों को तोड़ती है, उनके पंखों को मरोड़ देती है और उनसे एक सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार छीनती है। 1990 से हिजाब पर जारी विवाद ना केवल बीते सालों में लगातार जारी रहा है, बल्कि यह देशों के सीमाओं से परे जाकर फैला है। यब एक ऐसी धर्मनिरपेक्षता को थोपता है, जिसमें उदारवादी लोकतांत्रिक सहिष्णुता के मूल्य नदारद हैं। यह पूरी तरह अलोकतांत्रिक है, क्योंकि इसमें महिलाओं को समाहित करने की जिम्मेदारी पूरी तरह "दूसरों" पर छोड़ दी जाती है और पोशाक के एक हिस्से को आतंक का पर्याय बनाकर पेश किया जाता है।

कुलमिलाकर हिजाबोफ़ोबिया के दो पहलू हैं। यह महिलाओं को परदेदारी से जबरदस्ती मुक़्त करवाने और जबरदस्ती पर्देदारी करवाने के बीच झूलता है। जबरदस्ती पर्देदारी से मुक्त कराना ऐतिहासिक तौर पर साम्राज्यवादी नैतिकता और पुरुषों की मसीहावादी भावना का प्रतीक है। वहीं जबरदस्ती पर्देदारी करवाना प्रतिक्रियावादी कोशिश है। यहां महिलाओं का वर्तमान और उनका भविष्य, उनके शरीर पर नियंत्रण पर जारी युद्ध में फंसा हुआ है। आखिर में यह महिलाओं से उनके द्वारा लिए जाने वाले फ़ैसले के अधिकार को छीन रहा है; यह वह अधिकार हैं जो लोकतांत्रिक अधिकारों के उदारवादी भ्रम से परे हैं।

लेखक जेएआईन (जल्द यूनिवर्सिटी) में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं और उनकी विशेषज्ञता लैंगिक व सांस्कृतिक अध्ययन के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय राजनीति में है।

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।

Hijabophobia and More: France Playing a Divisive, Discriminative, and Dangerous Game With Ban of Hijab in Sport

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