NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
हिंदुत्ववादी सरकार में हिन्दू संतों का अपमान
एक हिंदुत्ववादी सरकार के शासन काल में गंगा के संरक्षण के मुद्दे पर साधु अपनी जान की बाजी लगाए हुए हैं और सरकार ही नहीं समाज भी इतना संवेदनशील नहीं कि उनके साथ सहानुभूति भी दिखा सके।इसके बजाए उल्टे उन लोगों को बदनाम करने की कोशिश की जा रही है, जो गंगा संरक्षण के मुद्दे लड़ाई लड़ रहे हैं।
संदीप पांडेय
13 Mar 2020
हिन्दू संतों का अपमान

हरिद्वार में एक आश्रम है जिसका नाम है मातृ सदन। यह बाक़ी आश्रमों से एकदम अलग है। हरिद्वार में आने वाले आम तीर्थयात्री यहाँ नहीं आते। यहाँ सिर्फ पर्यावरण के प्रति जागरूक लोग ही आते हैं। इसलिए यहाँ ज्यादा दान दक्षिणा भी नहीं आती। हरिद्वार के बाकी आश्रमों की तरह यहाँ आलीशान भवन या गाड़ियां नहीं दिखाई पड़ेंगी।

पिछले करीब दो दशकों में अब तक मातृ सदन गंगा में अवैध खनन, बड़े बांधों आदि मुद्दों के खिलाफ, 63 अनशन आयोजित कर चुका है। मातृ सदन के तीन संत पहले ही गंगा  के मुद्दे पर क़ुरबानी दे चुके हैं जिसमें स्वामी गोकुलानंद की 2003 में खनन माफिया ने हत्या करवा दी, स्वामी निगमानंद सरस्वती की 2011  में 115 दिनों के अनशन के पश्चात मौत हुयी और प्रख्यात प्रोफेसर गुरु दास अग्रवाल, जो स्वामी ज्ञान स्वरुप सानंद के नाम से भी जाने जाते थे, की 2018 में 112 दिनों के अनशन के बाद मौत हो गयी। मातृ सदन का मानना है की शेष दो संतों की भी शासन-प्रशासन ने ही अस्पताल में साजिशन हत्या करवाई है।

प्रोफेसर अग्रवाल की मौत के बाद ब्रह्मचारी आत्मबोधानंद अनशन पर बैठे किन्तु वाराणसी में 2011 में पिछले लोक सभा चुनाव के दो हफ्ते पहले राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के महानिदेशक राजीव रंजन मिश्रा ने 115 दिनों के बाद उनका अनशन खत्म कराया ताकि नरेंद्र मोदी के चुनाव से पहले साल भर में दूसरे साधु की मौत से बवाल न खड़ा हो जाये।

ब्रह्मचारी आत्मबोधानंद का अनशन ख़त्म कराने से पहले किये गए वायदे पूरा न होने पर मातृ सदन की ओर से  15 दिसंबर 2019 से साध्वी पद्मावती, जो आश्रम के इतिहास में पहली महिला संत हैं जिन्होंने तपस्या का संकल्प लिया, का अनशन शुरू हुआ। 30 जनवरी 2020 को साध्वी को पुलिस आश्रम से उठा ले गयी और दून अस्पताल में भर्ती करा दिया। साध्वी के ऊपर आरोप लगाया गया कि वे दो माह से गर्भवती हैं। साध्वी द्वारा जांच के लिए जोर देने के बाद जब जांच हुयी तो यह बात झूठी पायी गयी। शासन-प्रशासन की ओर से यह आश्रम को बदनाम करने की कोशिश थी ताकि किसी तरह मातृ सदन को ख़त्म किया जा सके।

किन्तु शासन-प्रशासन को इस बात का अंदाजा नहीं था कि मातृ सदन के  प्रमुख स्वामी शिवानंद सरस्वती कोई आशा राम बापू, राम रहीम अथवा नित्यानंद नहीं हैं। स्वामी शिवानंद सत्य और ब्रह्मचर्य के प्रति पूरी तरह समर्पित हैं और इन्हें ही अपना हथियार मानते हैं। उन्होंने बड़ी बहादुरी के साथ सरकार, खनन माफिया, पुलिस, न्यायालय, मीडिया, आदि सभी का सामना किया है और कहीं भी कोई समझौता करने को तैयार नहीं हैं। उन्हें भय, प्रलोभन, झूठे आरोप लगाना, आदि तमाम प्रकार से प्रभावित करने की कोशिश की गयी है।   

जब तक अगले दिन साध्वी पद्मावती को मातृ सदन वापस लाया गया तब तक ब्रह्मचारी आत्मबोधानंद ने भी अनशन शुरू कर दिया था। इस तरह एक साथ दो अनशन चलने लगे। आश्रम का आरोप है कि साध्वी को अस्पताल में कोई ऐसी चीज दी गई जिससे उनकी तबियत बिगड़ने लगी और आश्रम लौटने के बाद लगातार तबियत खराब ही होती गई।  सरकार द्वारा उनके चरित्र हनन के प्रयास से वे बहुत आहत हुयी थीं।

उनकी तबियत जब ज्यादा खराब हुई तो आश्रम ने ही निर्णय लेकर 16 फरवरी को उन्हें अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, दिल्ली ले जाने का फैसला लिया। किन्तु निजी एम्बुलेंस में जब उन्हें ले जाया जा रहा था तो उसे बीच सड़क रोक कर सरकारी एम्बुलेंस में डाल ऋषिकेश ले जाने की कोशिश की गयी। ब्रह्मचारी आत्मबोधानंद ने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, ऋषिकेश के निदेशक को मेल द्वारा सन्देश भेज पूछा कि क्या स्वामी सानंद की तरह साध्वी को भी मारने की तैयारी है? ऐसा सन्देश भेजने के बाद एम्बुलेंस का रुख ऋषिकेश से दिल्ली की तरफ हुआ। तब से साध्वी अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, दिल्ली की सघन देखरेख इकाई में रखा गया है।

सरकारी एम्बुलेंस में स्थानांतरित करने के बाद साध्वी को फिर आघात लगा और उन्होंने अपनी ऑंखें मूँद लीं। उन्होंने स्वामी शिवानंद से कहा की उन्हें सरकारी दरिंदों के हाथ मरने के लिए न छोड़ा जाये। तब से उनकी आवाज़ लगभग बंद हो गयी। दिल्ली में उन्हें नाक में नली डाल कर तरल पदार्थ शरीर में पहुँचाया जा रहा है।

19 फरवरी से स्वामी शिवानंद को 20 वर्षों से सरकार से मिली सुरक्षा हटा ली गयी। यह सुरक्षा स्वामी जी को खनन माफिया से खतरे को देखते हुए मिली थी। तब ब्रह्मचारी आत्मबोधानंद ने जल त्याग की घोषणा की। 22 फरवरी को ब्रह्मचारी आत्मबोधानंद को भी हरिद्वार से सरकार द्वारा उठा कर अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संसथान, दिल्ली में भर्ती करा दिया गया है। 4 मार्च को अस्पताल में उन्हें व साध्वी पद्मावती को देखने आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह पहुंचे।

5 मार्च को अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संसथान के चिकित्सकों ने ब्रह्मचारी आत्मबोधानंद को मुक्त कर दिया किन्तु उत्तराखंड सरकार ने उनके प्रति जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया। उनके साथ जो पुलिसकर्मी उत्तराखंड से आया था वह गायब हो गया। पांच दिन अस्पताल के बरामदे में पड़े रहने के बाद ब्रह्मचारी आत्मबोधानंद राजेंद्र सिंह के साथ मातृ सदन चले गए। 10 मार्च, होली के दिन स्वामी शिवानंद ने अपने शिष्यों की दुर्दशा व अपमान देख ब्रह्मचारी आत्मबोधानंद का अनशन ख़त्म करा खुद अनशन शुरू करने के निर्णय लिया।

इस तरह मातृ सदन के दो संत अभी भी अनशन पर हैं, साध्वी पद्मावती कुछ बोल न पाने की स्थिति में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संसथान, दिल्ली में व स्वामी शिवानंद मातृ सदन हरिद्वार में। किन्तु सरकार उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दे रही है, बल्कि कहा जाये तो सरकार उनके अनशन को नज़रअंदाज़ कर रही है जैसे पहले उसने स्वामी सानंद और स्वामी निगमानंद के अनशन को नज़रअंदाज़ किया।

यह कितनी अजीब बात है कि एक हिंदुत्ववादी सरकार के शासन काल में गंगा के संरक्षण के मुद्दे पर साधु अपनी जान की बाजी लगाए हुए हैं और सरकार ही नहीं समाज भी इतना संवेदनशील नहीं कि उनके साथ सहानुभूति भी दिखा सके।

नरेंद्र मोदी सरकार ने चाहे नमामि गंगे के नाम पर जितना भी पैसा खर्च कर लिया हो हक़ीक़त तो यही है की गंगा साफ़ नहीं हुई है और दूसरी हक़ीक़त यह है की जब तक गंगा में अवैध खनन बंद नहीं होगा, सभी प्रस्तावित व निर्माणाधीन बांधों पर रोक नहीं लगाई जाएगी व गन्दी नालियों का पानी, बिना साफ़ किये अथवा साफ़ करने के बाद भी, नदी में डालने से रोका नहीं जायेगा तब तक मातृ सदन का संघर्ष जारी रहेगा।

साभार : आईसीएफ 

Hindu Nationalism
Hindutva
Hinduvadi Sarkar
Ganga River
Illegal mining
modi sarkar
BJP
Narendra modi

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

डिजीपब पत्रकार और फ़ैक्ट चेकर ज़ुबैर के साथ आया, यूपी पुलिस की FIR की निंदा

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट


बाकी खबरें

  • hafte ki baat
    न्यूज़क्लिक टीम
    मोदी सरकार के 8 साल: सत्ता के अच्छे दिन, लोगोें के बुरे दिन!
    29 May 2022
    देश के सत्ताधारी अपने शासन के आठ सालो को 'गौरवशाली 8 साल' बताकर उत्सव कर रहे हैं. पर आम लोग हर मोर्चे पर बेहाल हैं. हर हलके में तबाही का आलम है. #HafteKiBaat के नये एपिसोड में वरिष्ठ पत्रकार…
  • Kejriwal
    अनिल जैन
    ख़बरों के आगे-पीछे: MCD के बाद क्या ख़त्म हो सकती है दिल्ली विधानसभा?
    29 May 2022
    हर हफ़्ते की तरह इस बार भी सप्ताह की महत्वपूर्ण ख़बरों को लेकर हाज़िर हैं लेखक अनिल जैन…
  • राजेंद्र शर्मा
    कटाक्ष:  …गोडसे जी का नंबर कब आएगा!
    29 May 2022
    गोडसे जी के साथ न्याय नहीं हुआ। हम पूछते हैं, अब भी नहीं तो कब। गोडसे जी के अच्छे दिन कब आएंगे! गोडसे जी का नंबर कब आएगा!
  • Raja Ram Mohan Roy
    न्यूज़क्लिक टीम
    क्या राजा राममोहन राय की सीख आज के ध्रुवीकरण की काट है ?
    29 May 2022
    इस साल राजा राममोहन रॉय की 250वी वर्षगांठ है। राजा राम मोहन राय ने ही देश में अंतर धर्म सौहार्द और शान्ति की नींव रखी थी जिसे आज बर्बाद किया जा रहा है। क्या अब वक्त आ गया है उनकी दी हुई सीख को अमल…
  • अरविंद दास
    ओटीटी से जगी थी आशा, लेकिन यह छोटे फिल्मकारों की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा: गिरीश कसारावल्ली
    29 May 2022
    प्रख्यात निर्देशक का कहना है कि फिल्मी अवसंरचना, जिसमें प्राथमिक तौर पर थिएटर और वितरण तंत्र शामिल है, वह मुख्यधारा से हटकर बनने वाली समानांतर फिल्मों या गैर फिल्मों की जरूरतों के लिए मुफ़ीद नहीं है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License