NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
कानून
भारत
जजों की भारी कमी के बीच भारतीय अदालतों में 4.5 करोड़ मामले लंबित, कैदियों से खचाखच भरी जेलें
उच्च न्यायालयों में 2019-2020 के बीच लंबित मामलों में 20 फीसदी की वृद्धि हुई, जबकि इसी अवधि में अधीनस्थ न्यायालयों में ​13 फीसदी की बढ़ोतरी हुई।​
दित्सा भट्टाचार्य
27 Oct 2021
law

पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च द्वारा हाल ही में प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार, भारतीय न्यायपालिका दिनानुदिन लंबित मामलों की बढ़ती संख्या और सभी स्तरों पर न्यायिक अधिकारियों की बड़ी संख्या में रिक्तियों की समस्या से जूझ रही है। इस ताजा डेटा को सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम द्वारा हाल ही में सर्वोच्च अदालत में सात न्यायाधीशों की नियुक्ति किए जाने और इसके तुरंत बाद देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों के लिए 129 न्यायाधीशों को नियुक्त करने की सिफारिश के बाद प्रकाशित किया गया था। 

आंकड़ों के मुताबिक, ​2010 से लेकर ​2020​ के एक दशक की अवधि में सभी न्यायालयों में लंबित मामलों में सालाना 2.8 फीसदी की दर से वृद्धि हुई। ​15 सितंबर 2021 तक ​4.5​ करोड़ से अधिक मामले भारत की सभी अदालतों में लंबित थे। इनमें 87.6 फीसदी देश की निचली अदालतों में लंबित थे, जबकि 12.3 फीसदी मामले उच्च न्यायालयों में विचाराधीन थे। 

पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के एक नोट में कहा गया है, "इसका मतलब यह हुआ कि, यदि कोई नया मामला दर्ज नहीं किया जाता है तो अदालतों द्वारा सभी लंबित मामलों को निपटाने में सर्वोच्च न्यायालय को 1.3 वर्ष, और उच्च न्यायालयों एवं अधीनस्थ न्यायालयों के लिए तीन-तीन वर्षों का समय लगेगा।”

​देश के उच्च न्यायालयों में 2019-2020 की अवधि के बीच उच्च न्यायालयों में लंबित मामलों में 20 फीसदी की और निचली अदालतों में 13 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। 2020 में तो वैश्विक कोरोना महामारी एवं उसके निबटान के प्रयासों में लगे लॉकडाउन की वजह से अदालतों का सामान्य कामकाज प्रतिबंधित हो गया था। इसलिए, ​​2020​​ में नए मामले पिछले वर्षों की तुलना में जबकि बहुत कम संख्या में दर्ज किए गए थे, लेकिन निपटान दर की गति धीमी रहने से लंबित मामलों में वृद्धि हुई।

पीआरएस ने बताया कि उच्च न्यायालय और अधीनस्थ न्यायालय चूंकि प्रदेश की बड़ी आबादी को कवर करते हैं, इसलिए उनमें लंबित मामलों की संख्या अधिक होती है। हालांकि, मद्रास, राजस्थान, पंजाब और हरियाणा के उच्च न्यायालयों में कलकत्ता और पटना के उच्च न्यायालयों (जबकि इनके अधीन अपेक्षाकृत बड़ी आबादी वाले राज्य हैं) की तुलना में बहुत अधिक मामले लंबित हैं।

​2010 से लेकर ​2020 तक के एक दशक के बीच की अवधि​ में, केवल चार उच्च न्यायालयों (इलाहाबाद, कलकत्ता, ओडिशा, और जम्मू-कश्मीर और लद्दाख) में ही लम्बित मामलों में कमी आई थी। निचली या अधीनस्थ न्यायालयों में 2010​​ से 2020​ के बीच की अवधि में अधिकतर राज्यों (उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और बिहार सहित) में लंबित मामलों में वृद्धि देखी गई। पश्चिम बंगाल और गुजरात सहित कुछ राज्यों की अधीनस्थ अदालतों में लंबित मामलों में कमी आई है। 

उच्च न्यायालयों में, ​​41 फीसदी​ पांच साल या उससे अधिक समय से मामले लंबित पड़े हैं। अधीनस्थ न्यायालयों में, प्रत्येक चार में से लगभग एक मामला कम से कम पांच वर्षों से लंबित है। 

डेटा ने खुलासा किया है कि अधीनस्थ न्यायालयों और उच्च न्यायालयों के समक्ष लगभग ​​45 लाख मामले​ 10 साल से अधिक समय से लंबित हैं। ​​इनमें से उच्च न्यायालयों में 21 फीसदी​ मामले और ​अधीनस्थ न्यायालयों में 8 फीसदी मामले एक दशक से अधिक समय से लंबित हैं।

एक तरफ न्यायालय में लंबित मामलों के अंबार लगे हैं तो दूसरी तरफ इनकी सुनवाई करने वाले न्यायाधीशों की भारी कमी है। 1 सितंबर ​2021​ तक सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों के  कुल 34 स्वीकृत पदों में से एक पद रिक्त था। हालांकि, उच्च न्यायालयों में ​न्यायाधीशों के लिए कुल स्वीकृत पदों (​​1,098 में से 465​)​ में से 42 फीसदी​ पद रिक्त थे। ​पांच उच्च न्यायालयों (तेलंगाना, पटना, राजस्थान, ओडिशा और दिल्ली) में तो न्यायाधीशों के 50 फीसदी से अधिक पद खाली पड़े थे जबकि मेघालय एवं मणिपुर में कोई वैकेंसी नहीं थी।

20 फरवरी 2020 तक ​अधीनस्थ न्यायालयों में ​​न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या ​(कुल 24,018) में से ​5,146​​) में से 21 फीसदी​ पद रिक्त थे। बिहार जैसे राज्यों के अधीनस्थ न्यायालयों में स्वीकृत कम से कम 100 जजों की संख्या पर सबसे अधिक 40 फीसदी (776) की कमी है। इसके बाद, हरियाणा में 38 फीसदी (297) और झारखंड में 32 फीसदी (219) जजों की कमी है।

मामलों के त्वरित निबटान के लिए बनाए गए न्यायाधिकरण और विशेष अदालतों (जैसे त्वरित अदालत और परिवार न्यायालय) में भी काफी तदाद में मामले लंबित हैं और न्यायाधिकारियों के पद रिक्त पड़े हैं। उदाहरण के लिए,​2020​​ अंत तक नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) के समक्ष 21,259​​ मामले लंबित थे।​ वहीं, अप्रैल 2021 तक  एनसीएलटी में ​स्वीकृत 63 न्यायाधीशों की संख्या में से मात्र 39​ ही कार्यरत थे। 

रिपोर्ट में कहा गया है, "दो दशक पूर्व जब त्वरित अदालत (फास्ट ट्रैक कोर्ट) पहली बार स्थापित किए गए थे, तब से ही अधीनस्थ अदालतों के साथ-साथ इन त्वरित अदालतों में लंबित मामलों में वृद्धि जारी रही है। 31 मई, 2021 तक देश भर के 24 राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों (बाकी बचे राज्यों या केंद्रशासित प्रदेशों में त्वरित अदालतें सुचारु नहीं हैं) की 956 त्वरित अदालतों में 9.2 लाख से अधिक मामले लंबित थे)।”

लंबे समय से लंबित मामलों का नतीजा यह हुआ है कि देश की जेलों में विचाराधीन कैदियों की तादाद काफी बढ़ गई है।31 दिसंबर ​​​2019​ तक लगभग ​4.8​​ लाख कैदी भारतीय जेलों में बंद थे। इनमें से दो-तिहाई से अधिक (​​3.3​​ लाख) विचाराधीन कैदी थे।

​5,011​​ से अधिक विचाराधीन कैदी पांच साल या उससे अधिक समय तक जेलों में बंद रहे थे। इनमें से आधे विचारधीन कैदी उत्तर प्रदेश (2,142) ​​और महाराष्ट्र (​394) की जेलों में बंद हैं। 

इस दस्तावेज को विभिन्न स्रोतों, जैसे सर्वोच्च न्यायालय की वार्षिक रिपोर्ट, उच्च न्यायालयों और अधीनस्थ न्यायालयों की राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड और उनकी रिक्तयों के विवरण के डेटा जुटा कर प्रकाशित किया गया था।

​अंग्रेजी में मूल रूप से प्रकाशित लेख को पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें। 

https://www.newsclick.in/4.5-Crore-Cases-Pending-Indian-Courts-Amid-Lack-Judges-Overcrowded-Prisons

law and order
Indian judiciary
Judiciary in crises
Supreme Court
Indian Legal System

Related Stories

ज्ञानवापी मस्जिद के ख़िलाफ़ दाख़िल सभी याचिकाएं एक दूसरे की कॉपी-पेस्ट!

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक आदेश : सेक्स वर्कर्स भी सम्मान की हकदार, सेक्स वर्क भी एक पेशा

एक्सप्लेनर: क्या है संविधान का अनुच्छेद 142, उसके दायरे और सीमाएं, जिसके तहत पेरारिवलन रिहा हुआ

राज्यपाल प्रतीकात्मक है, राज्य सरकार वास्तविकता है: उच्चतम न्यायालय

राजीव गांधी हत्याकांड: सुप्रीम कोर्ट ने दोषी पेरारिवलन की रिहाई का आदेश दिया

मैरिटल रेप : दिल्ली हाई कोर्ट के बंटे हुए फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, क्या अब ख़त्म होगा न्याय का इंतज़ार!

राजद्रोह पर सुप्रीम कोर्ट: घोर अंधकार में रौशनी की किरण

सुप्रीम कोर्ट ने राजद्रोह मामलों की कार्यवाही पर लगाई रोक, नई FIR दर्ज नहीं करने का आदेश

क्या लिव-इन संबंधों पर न्यायिक स्पष्टता की कमी है?

अदालत ने वरवर राव की स्थायी जमानत दिए जाने संबंधी याचिका ख़ारिज की


बाकी खबरें

  • Jharkhand
    अनिल अंशुमन
    झारखंड : ‘भाषाई अतिक्रमण’ के खिलाफ सड़कों पर उतरा जनसैलाब, मगही-भोजपुरी-अंगिका को स्थानीय भाषा का दर्जा देने का किया विरोध
    02 Feb 2022
    पिछले दिनों झारखंड सरकार के कर्मचारी चयन आयोग द्वारा प्रदेश के तृतीय और चतुर्थ श्रेणी की नौकरियों की नियुक्तियों के लिए भोजपुरी, मगही व अंगिका भाषा को धनबाद और बोकारो जिला की स्थानीय भाषा का दर्जा…
  • ukraine
    पीपल्स डिस्पैच
    युद्धोन्माद फैलाना बंद करो कि यूक्रेन बारूद के ढेर पर बैठा है
    02 Feb 2022
    मॉर्निंग स्टार के संपादक बेन चाकों लिखते हैं सैन्य अस्थिरता बेहद जोखिम भरी होती है। डोंबास में नव-नाजियों, भाड़े के लड़ाकों और बंदूक का मनोरंजन पसंद करने वाले युद्ध पर्यटकों का जमावड़ा लगा हुआ है।…
  • left candidates
    वर्षा सिंह
    उत्तराखंड चुनाव: मज़बूत विपक्ष के उद्देश्य से चुनावी रण में डटे हैं वामदल
    02 Feb 2022
    “…वामदलों ने ये चुनौती ली है कि लूट-खसोट और उन्माद की राजनीति के खिलाफ एक ध्रुव बनना चाहिए। ये ध्रुव भले ही छोटा ही क्यों न हो, लेकिन इस राजनीतिक शून्यता को खत्म करना चाहिए। इस लिहाज से वामदलों का…
  • health budget
    विकास भदौरिया
    महामारी से नहीं ली सीख, दावों के विपरीत स्वास्थ्य बजट में कटौती नज़र आ रही है
    02 Feb 2022
    कल से पूरे देश में लोकसभा में पेश हुए 2022-2023 बजट की चर्चा हो रही है। एक ओर बेरोज़गारी और गरीबी से त्रस्त देश की आम जनता की सारी उम्मीदें धराशायी हो गईं हैं, तो
  • 5 election state
    रवि शंकर दुबे
    बजट 2022: क्या मिला चुनावी राज्यों को, क्यों खुश नहीं हैं आम जन
    02 Feb 2022
    पूरा देश भारत सरकार के आम बजट पर ध्यान लगाए बैठा था, खास कर चुनावी राज्यों के लोग। लेकिन सरकार का ये बजट कल्पना मात्र से ज्यादा नहीं दिखता।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License