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इज़्ज़त से जीने की जद्दोजहद
क्या विडंबना है कि स्वच्छ भारत पर करोड़ों रुपये खर्च करने वाली मोदी सरकार मैन्युअल स्केवेंजरों पर कुछ भी खर्च करने को तैयार नहीं है, लेकिन समाज इस नरक से बाहर आना चाहता है।
राज वाल्मीकि
22 Jul 2019
manual scavengers india

हाल ही में देश की संसद ने एक बार फिर मैला प्रथा के जारी रहने पर चर्चा की। राज्यसभा में बिहार से राजद सांसद मनोज झा ने इस बारे में प्राइवेट मेंबरशिप बिल पेश किया और सरकार को झकझोरने की कोशिश की। सीवर में जहरीली गैसों से सफाईकर्मियों की लगातार हो रही मौतों पर उन्होंने सरकार की संवेदनशीलता पर प्रश्न उठाए और यहाँ तक कहा कि जो लोग इसके लिए जिम्मेदार हैं उनको मृत्युदंड की सजा मिलनी चाहिए। इसी प्रकार तमिलनाडु से सांसद डी राजा ने इस शर्मनाक प्रथा के जारी रहने पर प्रश्न उठाए और सरकार की नीयत पर शंका करते हुए कहा कि राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव के कारण देश में मैला प्रथा आज भी जारी है।  

जहाँ सीवर में होने वाली मौतों का सिलसिला जारी है वहीं मोदी सरकार सारा जोर स्वच्छ भारत पर लगा रही है, जबकि जमीनी सच्चाई यह है कि मैला प्रथा से बाहर आए कर्मचारी जिनमें महिलाओं की संख्या अधिक है अभी भी पुनर्वास का इंतजार कर रहे हैं।

मैन्युअल स्केवेंजर (हाथ से मैला उठाने वाले कर्मचारी) दुःख के साथ कहते हैं कि समाज में जाति व्यवस्था के कारण मैला ढोने की अमानवीय प्रथा के कलंक से हमें छुटकारा इस इक्कीसवीं सदी मे भी नहीं मिला है। ज़िल्लत की जिंदगी से मुक्ति नहीं मिली है।

मैला प्रथा उन्मूलन के लिए भले ही दो–दो कानून (1993 और 2013) बन गए हों पर आज भी पूरे देश में एक से डेढ़ लाख तो केवल शुष्क शौचालय साफ़ करने वाले मैनुअल स्केवेंजर हैं, जिनमें महिलाओं की संख्या सर्वाधिक है। दूसरी ओर हैं रेलवे ट्रैक से मल साफ़ करने वाले, खुले नालों में बहते मल को साफ़ करने वाले, सेप्टिक टैंक साफ़ करने वाले और सीवर साफ़ करने वाले। इनमे पुरुषों की संख्या सबसे अधिक है।

मानव मल को साफ़ करने वालों के अलावा घरों और सड़कों पर झाड़ू लगाने वालों की संख्या भी बहुत है। नगर निगमों, नगर पालिकाओं और जल बोर्ड में भी सफाई कर्मचारियों की खासी संख्या होती है। इनका सही आंकड़ा तो सरकार के पास भी नहीं है। सफाई का काम एक ऐसा काम है जो बिना संवैधानिक प्रावधान के ही सफाई समुदाय वर्ग के लिए आरक्षित है।

क्यों है ऐसा?

सब जानते हैं कि हमारा समाज जाति व्यवस्था पर आधारित है। सदियों से चली आ रही जाति व्यवस्था के कारण ही लोगों के जन्म के आधार पर ही जाति तय हो जाती है फिर जाति के  आधार पर पेशे। मनु ने चार वर्ण पहले ही बना रखे हैं- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। शूद्रों में भी अतिशूद्र हैं सफाई समुदाय के लोग। दलितों में भी महादलित हैं सफाई समुदाय के लोग। उपरोक्त तीनों वर्गों की सफाई करना इनका पेशा है – ये जाति व्यवस्था की देन है।

क्या होती है जातिवादी मानसकिता?

हमारा समाज जाति व्यवस्था में बंटा है और जाति बंटी है उच्च-निम्न क्रम में। मनु ने जाति को मानव आकार में बाँट रखा है – ब्राह्मण सिर है तो क्षत्रिय बाहें, वैश्य पेट है तो शूद्र पैर। इसी क्रम में श्रेष्ठता का भाव है। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य सम्मानित श्रेणी में आते हैं तो शूद्र तिरस्कृत और उपेक्षित श्रेणी में। व्यवस्था कुछ इस तरह है कि कम मेहनत करनेवाल वर्ग सम्माननीय है और अधिक श्रम करने वाला अपमानजनक जीवन जीने वाला। सफाई समुदाय भी ज़िल्लत की जिन्दगी जीने वाला वर्ग है। वह दूसरों का मल-मूत्र भी साफ़ करता है और उनकी छूआछात के दंश को भी झेलता है। जातिवाद के कारण भेदभाव और शोषण का शिकार है।

क्यों जीता है सफाई समुदाय ज़िल्लत भरी ज़िंदगी?

अतीत में झांकें तो हमें इसका जवाब मिल जाता है। मनुस्मृति में इनके बारे में विस्तार से लिखा है। पहले तो यही कि जातिवादी व्यवस्था ने इन्हें षड्यंत्र के तहत शिक्षा से दूर रखा। इतने सख्त प्रावधान किए गए कि यदि कोई इनके वेद का एक शब्द भी सुन ले तो इनके कानों में पिघला हुआ शीशा डाल दिया जाए और कोई शास्त्रों का शब्द बोले तो उसकी जीभ काट ली जाए। इनके पास जमीन न हो। ये अच्छे कपडे न पहनें। आभूषण या गहने पहनने की इन्हें अनुमति नहीं थी। छुआछूत की भावना इतनी कि इन्हें जमीन पर थूकने का भी हक नहीं और इनके पैरों के निशान भी जमीन पर न पड़ें। इनके गले में मटकी और पीछे झाड़ू बाँध होना अनिवार्य था। इज़्ज़त से जीने के सारे संसाधन छीन लिए गए। बस कथित उच्च जाति का मल-मूत्र उठाओ और बदले में रूखी-सूखी बासी रोटी पाओ। और तंगहाली में जहालत की जिंदगी बिताओ।

क्यों ज़रूरी है जद्दोजहद?

ज़िल्लत और जहालत की जिंदगी जीते-जीते सदियाँ गुजर गईं। जाति क्योंकि जन्म से निर्धारित है इसलिए जाति व्यवस्था सदियों से कायम है इसकी निकट भविष्य में भी ख़त्म होने की सम्भावना कम ही है। इस को इस बात से समझा जा सकता है कि आज इक्कीसवीं सदी में सुशिक्षित लोग भी शादी-ब्याह के समय जाति और गोत्र देख कर शादी करते हैं। बड़े-बड़े अंगरेजी के अखबारों में भी इसी तरह के matrimonial (वैवाहिक विज्ञापन) देखे जा सकते हैं.

किन्तु अब अच्छी बात यह है कि बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर ने संविधान में हम लोगों को बराबर के नागरिक अधिकार दिए हैं। गरिमा से जीने का हक़ दिया है। हमें पढ़ने का मौका मिला है, पर हमारी मानसिकता में और कथित उच्च जाति की मानसिकता में जो अंतर आना चाहिए वह नहीं आया है। वे अभी भी हमें गुलामों की नज़र से ही देखते हैं। अगर हम में से कुछ लोग (जिनका प्रतिशत बहुत कम या नाममात्र का है) किसी तरह इज़्ज़त से जीने की कोशिश करें तो ये बात कथित उच्च जातियों को नाकाबिले-बर्दाश्त लगती है। और परिणाम तथा प्रमाण आप देखते ही हैं। गोहाना हो, मिर्चपुर हो,खैरलांजी हो या फिर ऊना हो, ऐसे अनेक उदहारण दिए जा सकते हैं।

फिर भी इज़्ज़त से जीने के लिए संघर्ष जारी है। ये कटु यथार्थ यह है कि जातिवादी व्यवस्था के तहत वे शोषित हैं। उत्पीड़ित हैं, भेदभाव से पीड़ित हैं,अनपढ़ हैं, अशिक्षित हैं, उनमे जागरूकता का अभाव है। यही कारण है कि सरकारी अमला उनके प्रति उदासीन है।

मैन्युअल स्केवेंजर अधिनियम 2013 में स्पष्ट उल्लेख है कि मैला ढोने वाले/मैन्युअल स्केवेंजरों को चालीस हजार की नगद सहायता राशि काम छोड़ने के तुरंत बाद दी जाए और उसके बाद गरिमामय पेशे में उनका पुनर्वास किया जाए।

पर मैला ढोना छोड़ चुके मैन्युअल स्केवेंजर अपने पुनर्वास का इंतजार कर रहे हैं। सरकार इनकी सुध नहीं ले रही है।

क्या विडंबना है कि स्वच्छ भारत पर करोड़ों रूपये खर्च करने वाली मोदी सरकार मैन्युअल स्केवेंजरों पर कुछ भी खर्च करने को तैयार नहीं है, लेकिन समाज इस नरक से बाहर आना चाहता है।

ऐसे में देश के विभिन्न हिस्सों में कुछ मैन्युअल स्केवेंजर स्वयंसेवी संस्थाओं की सहायता से स्वयं अपना पुनर्वास कर रहे हैं।

Punjab tailoring

जब मैं पंजाब के लुधियाना के मच्छीवाडा में पहले एक मैन्युअल स्केवेन्जर रही बलजिंदर कौर से मिला, तो उन्होंने बताया कि वह उनके समुदाय के नेता सुभाष दिसावर की मदद से ट्रेनिंग लेकर अपना बुटीक चला रही हैं।

उनका कहना है कि –“ससुराल पक्ष में परिवार की माली हालत ठीक न होने के कारण मुझे अपनी सास विमला देवी के साथ मैला ढोने का कार्य करना पड़ा। मैला ढोने वाली के रूप में मैंने छुआछूत और जाति के भेदभाव को झेला। शुष्क शौचालय के मालिक मुझे किचेन में घुसने नहीं देते थे। मेरा चाय का कप भी अलग रखा जाता था... पर अब मैं अपने बुटीक के काम से इज़्ज़त की जिंदगी जी रही हूँ।”  

Hemlata Haryana

हरियाणा के अम्बाला जिले की हेमलता सामाजिक नेता राजकुमार बोहत की सहायता से सरकार से लोन लेकर दो भैसें खरीद दूध बेचने का काम कर रही हैं। बकौल उनके -“मैं कई वर्षों से मैला ढोने का काम कर रही थी। नर्क सफाई के बाद दुत्कार के साथ एक-एक घर से दो-दो रोटियां पाकर परिवार का पेट पाल रही थी। पति जो कमाता दारु में सब गवां देता। ऐसे में परिवार का पेट पालने की जिम्मेदारी मुझ पर आ गयी थी। मैं इस नरक की जिंदगी से मुक्ति के लिए छटपटा रही थी कि ऐसे में राजकुमार जी का साथ मिला और मेरी जिंदगी बदल गई...। आज मैं दूध बेचकर इज़्ज़त के साथ परिवार का पालन-पोषण कर रही हूँ.”

Saroj Devi from Rajasthan

राजस्थान की सरोज देवी भी मैला ढोने का काम करती थीं पर समुदाय के जागरूक नेता सोहनलाल सारवान, पवन नकवाल और प्रकाश हडाले जैसे लोगों की संगति में आने पर मैला ढोना छोड़कर अब अपना रेडीमेड गारमेंट शॉप चला रही है। सरोज देवी कहती हैं –“जब मैं मैला ढोने का काम करती थी तो सब मुझसे छुआछात करते थे और मुझ से दूर भागते थे। जाति के नाम पर ताने कसते थे.....पर अब हालात बदल गए हैं। अब लोग मुझे इज़्ज़त देते हैं। मै रेडीमेड गारमेंट का व्यवसाय करती हूँ।” 

Yespal from Punjab

इसी प्रकार कभी मैन्युअल स्केवेंजर रहे पंजाब के लुधियाना के दसमेश नगर के यशपाल सफाई कर्मचारी वित्त एवं विकास निगम से लोन लेकर अपना ऑटो-रिक्शा चला रहे हैं। उनका कहना है –“जब मैं मल-मूत्र बहने वाले नालों की सफाई करता था, या भरी हुए सेप्टिक टैंक खोलता था या सीवर में अन्दर घुसकर उन्हें खोलता था तब लोग मुझ से नफरत करते थे। मेरी कोई इज़्ज़त नहीं करते थे... पर आज मैं ऑटो-रिक्शा चला कर इज़्ज़त से अपने परिवार का पालन-पोषण कर रहा हूँ। अब समाज भी मुझे तवज्जो देने लगा है।”

ये है मैन्युअल स्केवेंजरों की असल दुनिया। पहले मैला प्रथा से अपने या संगठन के बल पर बाहर आओ और फिर खुद ही समाज से लड़ते हुए आपनी राह बनाओ।

ये तो बात है उन लोगों की जो नाममात्र के हैं और किसी तरह ज़िल्लत की जिंदगी से बाहर आ गए हैं पर सफाई समुदाय का बड़ा तबका अभी भी ज़िल्लत की जिंदगी जी रहा है। मैला ढोने जैसे अमानवीय कार्य में लगा है। वह कैसे इस ग़लाज़त की जिंदगी से बाहर निकले। इज़्ज़त और स्वाभिमान से जिए – इसके लिए जरूरी है जद्दोजहद। ज़रूरी है लगातार संघर्ष। ज़रूरी है लगातार शिक्षित होना। ज़रूरी है निरंतर जागरूक होना। ज़रूरी है अंधविश्वास से दूर होना। ज़रूरी है ये ठानना कि बस्स बहुत हो चुका! अब नहीं जीनी ये ज़िल्लत की ज़िंदगी!!

ज़िल्लत से बाहर आकर इज़्ज़त की जिंदगी  जीने की इनकी छटपटाहट तो काबिले तारीफ़ है पर इनको इज़्ज़त से जीने का हक़ देने वाली सरकार इनकी सुध कब लेगी?

 (लेखक सफाई कर्मचारी आंदोलन से जुड़े हैं।)

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