NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
इलेक्टोरल बॉन्ड राजनीतिक कुकर्म का ज़रिया है
सभी बिके बॉन्ड में तकरीबन 87.5 फीसदी बॉन्ड 1 करोड़ , 12.4 फीसदी बॉन्ड 10 लाख वाले थे। इस तरह से अभी तक बिके बॉन्ड में तकरीबन 99.9 फीसदी बॉन्ड 1 लाख से अधिक मूल्य वाले थे।
अजय कुमार
25 Aug 2018
Electorial bond

हम चाहे जितना मर्ज़ी कांग्रेस ,भाजपा या गठबंधन महागठबंधन कर लें । आम जन के मन में बसी राजनीति की गन्दी छवि को तब तक नहीं सुधार सकते ,जब तक राजनीतिक पार्टियों को मिलने वाले चंदे का हिसाब किताब पारदर्शी न बन जाए। एक राजनीतिक पार्टी तब तक खुद को जनकल्याणकारी नहीं साबित कर सकती जब तक वह खुद को चलाने वाले खर्च की आमदनी को सार्वजनिक करने का बीड़ा न उठाए। चुनाव आयोग तब तक खुद को  एक कारगर संस्था के रूप  में  प्रस्तुत नहीं  कर सकता जब तक वह चुनाव सुधार के तौर पर  राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे को आम जनता में उजागर करने  के लिए सही और कठोर कदम नहीं उठाए। चूंकि भारतीय लोकतंत्र राजनीति से संचालित होता है, इसलिए भारतीय लोकतंत्र की यह एक ऐसी परेशानी है जो चुनाव आयोग के कमरे में हाथी की तरह बैठी रहती है और चुनाव आयोग एक साथ एक चुनाव जैसे बोगस मुद्दे पर ध्यान देता रहता है।

राजनीतिक चंदे में मौजूद कई तरह के भ्रष्टाचार को रोकने के लिए साल 2017-18 के बजट में इलेक्टोरल बॉन्ड का सीगुफा छोड़ा गया। कहा गया कि यह इलेक्टोरल बॉन्ड चुनाव सुधार के लिए उठाया गया ऐतिहासिक कदम है। उस समय कुछ जानकारों को छोड़कर सबने तालियां पीटी । लेकिन असलियत यह थी कि जिस सरकार का आधार ही हज़ारों करोड़ के चंदे के भार पर खड़ा हो वह किसी तरह का ऐतिहासिक सुधार कर दे,ऐसा नामुमकिन लगता है। इसे अब साक्ष्यों से समझिए ।

जनवरी 2018 में इलेक्टोरल बॉन्ड की योजना को सरकार द्वारा जनता के उपयोग के लिए नोटिफाई कर दिया गया। अभी तक के  स्टेट बैंक द्वारा जारी इलेक्टोरल बॉन्ड के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। यह पाया गया कि  बैंक से मुश्किल से ही  कम कीमत वाले बॉन्ड की खरीददारी हुई है। जुलाई माह में एक भी ऐसे बॉन्ड की खरीददारी नहीं हुई  जिनकी कीमत 10 लाख या 1 करोड़ से कम हो ।तकरीबन 99.7 फीसदी बॉन्ड की कीमत 1 लाख से ऊपर की थी। इलेक्टोरल बॉन्ड बिक्री के नियम के तहत केवल 10 दिनों के भीतर इलेक्टोरल बॉन्ड खरीदने का नियम बनाया गया है। इसी नियम के तहत 2 जुलाई से लेकर 11 जुलाई तक देश की 11 एसबीआई शाखाओं के लिए इलेक्ट्रोल बॉन्ड जारी किये गए। इनमें से केवल 5 बड़े शहरों दिल्ली,गांधीनगर ,मुंबई,गुवाहाटी और  कलकत्ता की बैंक शाखाओं से इलेक्ट्रोल बॉन्ड की खरीदारी हुई। बाकी 6 शहरों की शाखाओं से एक भी बॉन्ड की खरीदारी नहीं हुई। इसके साथ जहां मार्च के महीने में 520 बॉन्ड के  साथ 222 करोड़ रुपए राशि की बॉन्ड बिक्री हुई। वहीं जुलाई महीनें में बॉन्ड की बिक्री की संख्या घटकर 82 हो गई और इसकी बिक्री से मिली राशि भी घटकर केवल 32.5 करोड़ रुपये हो गई । इन 82 बॉन्ड में तकरीबन 10 बॉन्ड 1 लाख रुपए,44 बॉन्ड 10 लाख रुपए और 28 बॉन्ड 1 करोड़ रुपए वाले थे।

जनवरी से लेकर अभी तक जारी किए गए बॉन्ड इस ओर इशारा करते हैं कि छोटी कीमत वाले बॉन्ड की मांग  न के बराबर है । सभी बिके बॉन्ड में तकरीबन 87.5 फीसदी बॉन्ड 1 करोड़ , 12.4 फीसदी बॉन्ड 10 लाख वाले थे। इस तरह से अभी तक बिके बॉन्ड में तकरीबन 99.9 फीसदी बॉन्ड 1 लाख से ऊपर वाले थे।अगर संख्या के लिहाज़ से देखा जाए तो कुल 1065 बॉन्ड की बिक्री हुई जिसमें से 995 बॉन्ड 10 लाख से ऊपर वाले थे। electoral bond

(ग्राफिक्स) फैक्टली वेबसाइट से साभार

यह आंकड़ें इस ओर साफ - साफ इशारे करते हैं कि  इलेक्टोरल बॉन्ड के ज़रिए किया  गया सुधार कोई सुधार नहीं है बल्कि  पूंजीपतियों द्वारा किए जाने वाली फंडिंग को कानूनी तरीके से  छिपाने का एक तरीका है। चुनाव सुधार की यह कोई ऐतिहासिक योजना नहीं है बल्कि चुनाव सुधार के नाम पर किया गया ऐतिहासिक फर्ज़ीवाड़ा है। अब आप पूछेंगे कि ऐसा क्यों? तो इसे बिंदुवार समझने की कोशिश करते हैं -

- इलेक्ट्रोल बॉन्ड एक ऐसा बॉन्ड होता है ,जिसपर न ही बॉन्ड खरीदने वाले का नाम लिखा होता है और न ही  बॉन्ड के ज़रिए फंडिंग लेने वाली पार्टी का नाम लिखा होता है। 

-- एक किस्म की kyc फॉर्म भरकर निर्धारित एसबीआई ब्रांच से 1 हजार ,1 लाख ,10 लाख और 1 करोड़ के मूल्य में अंकित इलेक्ट्रोल बॉन्ड की खरीददारी की जा सकती है ।

-- व्यक्ति ,कम्पनी,हिन्दू अविभाजित परिवार,फर्म,व्यक्तियों का संघ अन्य व्यक्ति और एजेंसी  इलेक्ट्रोल बॉन्ड की खरीददारी कर सकती है। इसके बाद इस बॉन्ड को विगत आम चुनाव में एक फीसदी से अधिक वोट पाने वाले किसी राजनीतिक दल को चंदे के रूप में  देने का प्रावधान होता है ,जिसे बॉन्ड के जारी किए दिन से  15 दिन के भीतर बैंक से क्रेडिट करा लेने का नियम होता है । यानी बॉन्ड की खरीददारी होगी और उसे किसी राजनीतिक दल को दिया जाएगा और राजनीतिक दल को 15 दिन के भीतर बॉन्ड की राशि मिल जाएगी। और इन सारी प्रक्रियाओं में किसी का भी नाम उजागर नहीं  होगा। सब बेनाम ही रहेंगे।

--  इलेक्ट्रोल बॉन्ड की राशि पर 100 फीसदी टैक्स की छूट मिलती है। यानी कि 500 करोड़ के इलेक्ट्रोल बॉन्ड पर 1 रुपए भी टैक्स भुगतान की जरूरत नहीं होती है ।

--- कम्पनी अधिनयम में हुए  हालिया संशोधन के मुताबिक राजनीतिक दलों को दिए जा सकने  वाले साढ़े सात फीसदी  चंदे की लिमिट वाले प्रावधान को हटा दिया गया है। यानी कि अगर एक कम्पनी चाहे तो अपने पूरे लाभ को चंदे के रूप में दे सकती है और दर्शा सकती है ।

-- कम्पनी के खातों में केवल इलेक्ट्रोल बॉन्ड की राशि लिखनी होती है, चन्दा हासिल करने वाले  राजनीतिक दलों  के नाम लिखने की जरूरत नहीं होती है।

 इलेक्टोरल बॉन्ड से जुड़े इन सारे प्रावधानों को एक साथ देखने पर यह हासिल होता है कि सरकार ने  केवल आम जनता में चुनाव सुधार के नाम पर हवा बनाने के लिए इलेक्टोरल  बॉन्ड जैसे बोगस योजना की शुरुआत की है। जब बॉन्ड से जुड़े सभी  पक्षकार  बेनाम  हैं ,टैक्स में सौ फीसदी की छूट है, कम्पनी अधिनियम से साढ़े सात फीसदी राजनीतिक चन्दा देने की लिमिट को हटा लिया गया है, खातों में  राजनीतिक चंदे के नाम पर किसी भी प्राप्तकर्ता के नाम लिखने की जरूरत नहीं है , ऐसे में पॉलिटीकल फंडिंग के नाम पर इलेक्टोरल बॉन्ड की योजना फर्जी लगती है। साथ में बैंक को पता होगा की खरीदने वाला कौन है। बैंक सरकारी है। अतः सरकार आसानी से हर खरीदने वाले का नाम जान जायेगी। और यह भी पता लगाया जा सकता है कि अगले 15 दिन के अंदर किस पार्टी ने कितना इलेक्टोरल बांड  जमा किया। यानि सरकार - और सिर्फ सरकार ही - जान सकती है की कौन किसको चंदा दे रहा है। फिर गोपनीयता तो रही नहीं। हाँ, बाकि तमाम जनता और विपक्ष ज़रूर अँधेरे में रहेंगे। आप सोच सकते हैं की मोदी और अमित शाह इस जानकारी का क्या करेंगे! ऐसे में एसबीआई से मिले अभी तक के आंकडें  यह साफ साफ अंदेशा जता रहे हैं कि   चंदे के तौर पर केवल कॉरपोरेट फंडिंग हो रही है, काले धन के भंडार को इलेक्टोरल  बॉन्ड से धड़ल्ले  से सफेद किया जा रहे है ,सरकार और पूंजीपतियों की सांठ गांठ बेतहाशा जारी है और इलेक्ट्रोल बॉन्ड के जरिए राजनीतिक लोकतंत्र के इन कुकर्मों को एक कानूनी सहारा भी मिल गया है। 

electoral bond
SBI
corporate funding
electorial funding
crony capitalism

Related Stories

ख़बरों के आगे-पीछे: 23 हज़ार करोड़ के बैंकिंग घोटाले से लेकर केजरीवाल के सर्वे तक..

गुजरात : एबीजी शिपयार्ड ने 28 बैंकों को लगाया 22,842 करोड़ का चूना, एसबीआई बोला - शिकायत में नहीं की देरी

DCW का SBI को नोटिस, गर्भवती महिलाओं से संबंधित रोजगार दिशा-निर्देश वापस लेने की मांग

मोदी सरकार और नेताजी को होलोग्राम में बदलना

किसानों और सरकारी बैंकों की लूट के लिए नया सौदा तैयार

क्या 2014 के बाद चंद लोगों के इशारे पर नाचने लगी है भारत की अर्थव्यवस्था और राजनीति?

FCRA की शर्तों में थोड़ी राहत – देर से लिया गया सही फ़ैसला

विश्लेषण: मोदी सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र

परंजॉय के लेख पढ़िए, तब आप कहेंगे कि मुक़दमा तो अडानी ग्रुप पर होना चाहिए!

अगर सरकार में ईमान होता तो इलेक्टोरल बॉन्ड के बारे में जानने का हक जनता को भी होता!


बाकी खबरें

  • रवि शंकर दुबे
    ‘’मुसलमानों के लिए 1857 और 1947 से भी मुश्किल आज के हालात’’
    05 Apr 2022
    ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के महासचिव रहमानी ने आज के दौर को 1857 और 1947 के दौर से ज़्यादा घातक बताया है।
  • भाषा
    ईडी ने शिवसेना सांसद संजय राउत से संबंधित संपत्ति कुर्क की
    05 Apr 2022
    यह कुर्की मुंबई में एक 'चॉल' के पुनर्विकास से संबंधित 1,034 करोड़ रुपये के कथित भूमि घोटाले से जुड़े धन शोधन की जांच से संबंधित है। 
  • सोनया एंजेलिका डिएन
    क्या वैश्वीकरण अपने चरम को पार कर चुका है?
    05 Apr 2022
    पहले कोरोना वायरस ने एक-दूसरे पर हमारी आर्थिक निर्भरता में मौजूद खामियों को उधेड़कर सामने रखा। अब यूक्रेन में जारी युद्ध ने वस्तु बाज़ार को छिन्न-भिन्न कर दिया है। यह भूमंडलीकरण/वैश्वीकरण के खात्मे…
  • भाषा
    श्रीलंका के नए वित्त मंत्री ने नियुक्ति के एक दिन बाद इस्तीफ़ा दिया
    05 Apr 2022
    श्रीलंका के नए वित्त मंत्री अली साबरी ने मंगलवार को इस्तीफा दे दिया। एक दिन पहले राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे ने अपने भाई बेसिल राजपक्षे को बर्खास्त करने के बाद उन्हें नियुक्त किया था।
  • भाषा
    हरियाणा के मुख्यमंत्री ने चंडीगढ़ मामले पर विधानसभा में पेश किया प्रस्ताव
    05 Apr 2022
    हरियाणा विधानसभा के विशेष सत्र के दौरान मनोहर लाल द्वारा पेश प्रस्ताव के अनुसार, ‘‘यह सदन पंजाब विधानसभा में एक अप्रैल 2022 को पारित प्रस्ताव पर चिंता व्यक्त करता है, जिसमें सिफारिश की गई है कि…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License