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भारत
राजनीति
10 महीने में भूख से मरे 12 लोग; पर झारखण्ड सरकार मानने को तैयार नहीं
कार्यकर्त्ताओं ने ग्रामीण क्षेत्रों में सार्वजनिक वितरण प्रणाली के सार्वभौमिकरण की माँग की है।
न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
23 Jun 2018
Translated by महेश कुमार
 झारखण्ड

झारखंड में पिछले 10 महीनों में भुखमरी के कारण कम से कम 12 लोग मारे गए हैं। ज़िम्मेदारी लेना तो दूर बीजेपी की अगुवाई वाली राज्य सरकार भूख से हुई इन मौतों के कारण को स्वीकार करने से इंकार कर रही है।

द राइट टू फूड अभियान (आरटीएफसी) ने 21 जून 2018 को तथ्यों की खोज रिपोर्ट के साथ-साथ इन भुखमरी से हुईं मौतों का ब्यौरा जारी किया और सरकार को वक्त पर कार्यवाही न करने के लिए और खाद्य के अधिकार के उल्लंघन की बजाय झूठे दावे करने के लिए ज़िम्मेदार ठहराया।

आरटीएफसी निष्कर्षों के मुताबिक, इनमें से कुछ मामलों में राशन या पेंशन के वितरण में सरकार की विफलता मौत का कारण बने। लेकिन ज़्यादातर मामलों में आधार का राशन प्रणाली/पेंशन से अनिवार्य जोड़ा गया और आधार न होने की वजह से गरीबों को राशन या पेंशन देने से मना कर दिया।

रिपोर्ट में कहा गया है कि "भुखमरी से हो रही मौतों ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) से गरीब परिवारों के बहिष्कार और राज्य में खाद्य असुरक्षा के बदहाल स्थिति का खुलासा किया है।"

राईट तो फ़ूड कैंपेन ने एक बयान में यह कहा कि समस्याओं का समाधान करने के लिए कार्यवाही करने की बजाय राज्य खाद्य मंत्री सारायू रॉय झारखंड में भोजन के अधिकार के घोर उल्लंघन को उजागर करने वाले कार्यकर्त्ताओं के खिलाफ घृणित दावों और आरोपों की झड़ी लगाने में व्यस्त दिख रहे हैं"।

राज्य में हो हुईं मौतों में से तीन अकेले जून में हुईं। आरटीएफसी ने कहा, "गिरिध में सावित्री देवी, चतरा में मीना मुशहर और रामगढ़ में चिंतमान मल्हार की हाल ही में हुईं मौतों ने सरकार में भुखमरी से निपटने के लिए गंभीरता की भारी कमी का खुलासा किया है।" "इन तीन पीड़ितों से पहले भी कई लोगों की मौत हुई, इसके बावजूद सरकार ने इस खतरनाक स्थिति संज्ञान नहीं लिया।"

पिछले साल 28 सितम्बर को झारखण्ड के सिमदेगा ज़िले में 11 वर्षीय संतोषी की भूख से हुई मौत देश भर में बड़ी खबर बनीI आधार कार्ड से जुड़ा न होने की वजह से संतोषी के परिवार का राशनकार्ड रद्द कर दिया गया थाI मौत से पहले आठ दिन से संतोषी ने कुछ नहीं खाया थाI  

भूख की वजह से हुई सबसे हालिया तीन मौतों का ब्यौरा देते हुए राइट टू फूड अभियान ने एक वक्तव्य में कहा कि: "लंबे समय तक भूखे रहने और अपर्याप्त पोषण की वजह से 60 वर्षीय विधवा सावित्री देवी की 2 जून 2018 को मृत्यु हो गई। उनके परिवार के सदस्यों को यह भी याद नहीं है कि आखिरी बार उन्होंने दाल कब पकायी थी।"

आरटीएफसी ने कहा कि “कुछ महीने पहले ग्राम पंचायत में आवेदन करने के बावजूद सावित्री देवी के परिवार के पास राशन कार्ड नहीं था।"

आरटीएफसी की इस खोज ने राज्य सरकार के इस दावे को भी खारिज कर दिया कि सावित्री देवी के परिवार ने राशन कार्ड के लिए आवेदन नहीं किया था। अभियान ने यह भी कहा कि सरकार द्वारा किए गए एक और दावे के विपरीत, "उपचार के लिए रांची में सावित्री देवी को कभी भर्ती ही नहीं किया गया।"

वास्तव में, आरटीएफसी ने कहा, भले ही उनकी विधवा पेंशन 2014 में स्वीकृत की गई थी, "लेकिन पेंशन की पहली किश्त अप्रैल 2018 में जमा की गई, जबकि उनका आधार कार्ड योजना से जुड़ा हुआ था। लेकिन सावित्री देवी को यह सूचित ही नहीं किया गया था कि उनकी पेंशन जमा कर दी गई है।"

रामगढ़ जिले में मंडु ब्लॉक के 50 वर्षीय चिंतमान मल्हार की 13 जून को "भूख से मृत्यु हो गई"।

आरआईटीएफसी ने कहा कि चिंतमान के पास भी राशन कार्ड नहीं था लेकिन सरकारी अधिकारियों ने "चिंतमान के बेटे से धोखे से एक ऐसे बयान पर हस्ताक्षर करवाये गये जो असलियत से बिलकुल अलग थाI"

"आश्चर्य की बात नहीं है कि खाद्य मंत्री ने बाद में दावा किया कि बेटे ने खुद स्वीकार किया कि उनके पिता की प्राकृतिक मृत्यु हुई। इस मुद्दे के प्रति उनकी संवेदनशीलता इससे भी सामने आती है कि उन्होंने यह सुझाव दिया कि मृतक के शव को खोदकर निकाला जाये और पोस्ट मोर्टेम के लिए भेजा जायेI जब मृतक के बेटे ने इंकार कर दिया तो इसका मतलब मंत्री जी ने यह निकाला कि मौत दरअसल भूख से नहीं हुईI"

चतरा जिले में कूड़ा बिनने वाली मीना मुशहर की मौत "भोजन की कमी और गंभीर गरीबी में" मृत्यु हो गई।

मीना के पड़ोसियों के अनुसार आरटीएफसी ने कहा कि, "वह इतनी कुपोषित थी कि वह अपने नवशिशु को दूध तक नहीं पिला सकती थी, उसकी उसके मरने से एक सप्ताह पहले ही मर गई थी।"

मीना के पास राशन कार्ड नहीं था। लेकिन झारखंड सरकार ने खुद को ज़िम्मेदारी से मुक्त करते हुए मान लिया कि वह बिहार की प्रवासी हो सकती थी जो आजीविका की तलाश में झारखंड आई हो।

वास्तव में, "खाद्य मंत्री ने यह भी कहा कि उनका विभाग उन लोगों की भुखमरी से मौत के लिए ज़िम्मेदार नहीं जिनके पास राशन कार्ड नहीं थे।"

आरटीएफसी के कथन के अनुसार "सरकार के दावों के विपरीत, हाल में हुईं 12 मौतों के तत्काल कारणों में राशन कार्ड न होने की वजह से सब्सिडी वाले चावल न मिलना, आधार कार्ड से जुड़ा न होना अनुपस्थिति या आधार के तहत बॉयोमीट्रिक प्रमाणीकरण की विफलता के कारण राशन कार्ड को रद्द करना शामिल है।"

"यह सच है कि भुखमरी पीड़ितों में से कई बीमार भी थे, लेकिन अगर उनको पर्याप्त पोषण और चिकित्सा मिलती तो शायद वे भूख से पीड़ित नहीं होते।"

आरटीएफसी ने बताया कि सामाजिक सुरक्षा पेंशन से इनकार और राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (एनआरईजीए) के तहत काम न मिलना भुखमरी से मौत और मृतकों के परिवारों की बर्बादी में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं।

पीड़ितों में से कम से कम चार पेंशन के हकदार थे, "लेकिन उन्हें या तो पेंशन जारी नहीं की गई थी या प्रशासनिक चूक या आधार से सम्बंधित कारणों से उनकी पेंशन नहीं मिली थी।“

कार्यकर्त्ताओं ने अंत्योदय अन्न योजना (एएवाई) के कवरेज पर भी प्रश्न उठाए - भारत सरकार ने इस योजना की शुरुआत दिसंबर 2000 में की थीI इसके तहत गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) के परिवारों में से  भी बेहद ग़रीब परिवारों की पहचान की गयी और इन्हें पीडीएस के तहत 2 रूपये किलो चावल और 3 रूपये किलो गेंहूँ दिया जाना थाI

आरटीएफसी ने कहा कि भूख से मरने वाले इन लोगों में से अधिकांश परिवार, "बेहद गरीबी में जीने के बावजूद एएवाई राशन कार्डधारी नहीं थे।"

आरटीएफसी ने कहा कि खाद्य मंत्री ने अनाज बैंक बनाने का प्रस्ताव रखा है। “अगर ऐसे बैंक स्थापित भी किये जाते हैं तब भी एक अधिकार के तौर पर खाद्य सुरक्षा के सार्वभौमिक विस्तार को सुनिश्चित करने में असफल होंगे”I

आरटीएफ़सी ने ग्रामीण क्षेत्रों में सार्वजानिक वितरण प्रणाली को पूरी तरह से लागू करने की माँग की है क्योंकि ऐसा करने से इन दुखद मौतों को भी रोका जा सकता है और भोजन के अधिकार के उल्लंघन को भी रोका जा सकता हैI उन्होंने पीडीएस में “दालों और खाद्य तेल को शामिल करने की भी माँग की – जिसका कि खाद्य मंत्री खुद वादा कर चुके हैं”।

आरटीएफ़सी ने अपनी माँग को दोहराया है कि सरकार तुरंत पीडीएस के साथ-साथ अन्य सार्वजनिक सेवाओं से आधार की अनिवार्यता को हटाये और साथ ही "राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत शिकायत निवारण प्रणाली को स्थापित करने के लिए मज़बूती से कदम उठाये"।

अभियान ने राँची ज़िले के नागरी ब्लॉक में "खाद्य सुरक्षा के लिए प्रत्यक्ष धन हस्तांतरण" पायलट परियोजना को तुरंत वापस लेने की भी माँग की है।

खाद्य सुरक्षा के लिए इस प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण पायलट परियोजना की विफलता के लिए अपनी रिपोर्ट में ध्यान आकर्षित करते हुए कार्यकर्त्ताओं ने कहा कि राज्य सरकार ने पायलट योजना को वापस लेने की अनिच्छा से लोगों की खाद्य असुरक्षा के प्रति सरकार की उदासीनता का खुलासा किया।

"सभी खुलासों से, पायलट परियोजना के परिणाम विनाशकारी हैं। हालांकि, खाद्य विभाग ने अभी तक इस पायलट परियोजना को वापस लेने या राशन कार्डधारकों की क्षतिपूर्ति नहीं की है, जिन्हें इस दुर्भावनापूर्ण पहल में सब्सिडी वाले खाद्यान्न के लिए उनके कानूनी पात्रता से इंकार कर दिया गया है। असल में, पायलट परियोजना के सरकार के अपने सामाजिक लेखा परीक्षा के निष्कर्षों को सार्वजनिक करने में भी सरकार खुद असफल रही है।"

 

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