NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
शुष्क शौचालय खत्म करने का 100 दिनों का देशव्यापी अभियान        
रैपिड एक्शन 100 दिन 100 जिले: जिला अधिकारी को ज्ञापन देंगे और इन शौचालयों को जल चालित शौचालयों में परिवर्तन करने की माँग करेंगे। इस तरह इन शुष्क शौचालयों को खत्म करेंगे। मैला साफ करने वाली महिलाओं का दूसरे इज्जतदार काम धंधे में पुनर्वास कराएंगे।
राज वाल्मीकि
14 Jan 2021
शुष्क शौचालय खत्म करने का 100 दिनों का देशव्यापी अभियान        

शुष्क शौचालय से मानव मल साफ़ करने जैसा अमानवीय और घृणित कार्य बहुत हो गया - बस्स! अब और नहीं!! इसी भावना से सफाई कर्मचारी आन्दोलन ने देश से शुष्क शौचालय समाप्त करने का 100 दिन का अभियान चलाया है, और कुछ इस अंदाज में कि न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी।

हम 21वीं सदी के तीसरे दशक में जी रहे हैं, और विकास के तमाम दावों से घिरे हुए हैं। कहने को हम चाँद और मंगलग्रह तक पहुँच चुके हैं। लेकिन हमारे देश में एक समुदाय और खासतौर से उनकी महिलाओं पर मैला साफ करने का घृणित काम आज भी थोपा जाता है। मैला साफ करना मतलब एक इंसान का मल दूसरे इंसान से साफ कराना। यह मैला एक खास तरह के शुष्क शौचालय से साफ कराया जाता है। इन शौचालयों में पानी को कोई इंतजाम नहीं होता और मल बहने का प्रबंध नहीं होता। मल को उठाने किसी इंसान को आना पड़ता है और यह व्यक्ति सफाई समुदाय का होता है और ये सफाई कर्मचारी होती हैं सामान्य तौर पर दलित महिलाएं। इन शुष्क शौचालयों को हम ड्राई टॉयलेट या इनसेनीटरी टॉयलेट के नाम से भी जानते हैं। मैला ढोने का कार्य गैरकानूनी और अपराध है। और इसकी पूरी जानकारी सरकार को है। फिर भी मैला प्रथा जारी है क्यों?

इस गैरकानूनी प्रथा को खत्म करने के लिए अभी तक सरकार ने ठोस कदम नहीं उठाया है। पूरे देश में जहाँ-जहाँ ऐसे शुष्क शौचालय हैं, सफाई कर्मचारी आन्दोलन के कार्यकर्त्ता उन मौहल्लों में जायेंगे, शुष्क शौचालय साफ करने वाली महिलाओं और शौच के लिए इन शौचालय का इस्तेमाल करने वाले लोगों से मिलेंगे, जिला अधिकारी को ज्ञापन देंगे और इन शौचालयों को जल चालित शौचालयों में परिवर्तन करने की मांग करेंगे। इस तरह इन शुष्क शौचालयों को खत्म करेंगे। मैला साफ करने वाली महिलाओं का दूसरे इज्जतदार काम धंधे में पुनर्वास कराएंगे। हमने इस अभियान की शुरूआत 3 जनवरी 2021 को उत्तराखंड से की है। हमने शुष्क शौचालयों को गिराने या उन्हें  जलचालित शौचालयों में परिवर्तन के लिए 100 जिलों और 100 दिनों का लक्ष्य रखा है।

सवाल है कि आज भी हमारे देश में इंसान द्वारा इंसान का मल उठाने की प्रथा क्यों प्रचलन में  है? आखिर क्यों एक समुदाय विशेष की महिलाएं इस अमानवीय प्रथा में लगी हैं? और क्यों जारी है अभी भी हमारे देश में मैला ढ़ोने की अमानवीय प्रथा? सवाल कई हैं पर मुद्दा यह है कि जब मैला प्रथा उन्मूलन पर 1993 में और 2013 में दो-दो कानून बन चुके हैं। और कानून के अनुसार मानव मल ढुलवाना दंडनीय अपराध है फिर क्यों जारी है - मैला प्रथा। दंडनीय अपराध होने के बावजूद क्यों नहीं मिलती मैला ढुलवाने वालों को सजा? अगर हम इसकी पृष्ठभूमि पर जाएं तो कई बातें जेहन में आती हैं।

जाति और पितृसत्ता है जिम्मेदार

हमारे देश में पिछले पांच हजार सालों से जातिगत कारणों से छुआछूत की जाती है। भले ही भारतीय संविधान ने अपने अनुच्छेद 17 में किसी भी रूप में छुआछूत का उन्मूलन कर दिया हो और इसे दण्डनीय अपरध घोषित कर दिया गया हो। बावजूद इसके छुआछूत आज भी जारी है। भारतीय समाज की बुनियादी इकाई जाति है। जाति के आधार पर हमारा समाज उच्च-निम्न क्रम में बंटा है। इसी के कारण जातिगत भेदभाव होते हैं। जाति व्यवस्था तो जन्म आधारित है ही इसके साथ ही जाति के आधार पर ही लोगों के पेशों का भी निर्धारण कर दिया गया है। यही कारण है कि इस सफाई समुदाय के लोग मैला ढोने जैसे अमानवीय कार्य को भी ’अपना काम’ समझते हैं।

सिर्फ जाति ही नहीं, हमारे समाज पर पितृसत्ता का शिकंजा भी कसा हुआ है। जिसकी वजह से महिलाओं को पुरूषों से हीन समझा जाता है। और घृणित पेशों को महिलाओं को ढकेल दिया जाता है। यही कारण है कि दलित महिलाओं को तिहरा शोषण होता है। उनकी जाति के कारण, उनके महिला होने के कारण और उनकी गरीबी के कारण। यही कारण है कि हिंसा की वारदातें भी दलित महिलाओं पर अधिक होती हैं। मानव मल ढोने की प्रथा भी उन पर हिंसा है।

 ब्राह्मणवादी व्यवस्था में दलितों को सबसे निचले पायदान पर माना जाता है और इसलिए उनके साथ छुआछूत और भेदभाव होता है। उनका शोषण होता है। दलित पुरूषों के साथ ही उनकी महिलाओं को भी इसका शिकार होना पड़ता है। पितृसत्ता के कारण सफाई कर्मचारी समुदाय के पुरूष भी मैला ढोने शुष्क शौचालय साफ करने जैसे अमानवीय और घृणित कार्य अपनी महिलाओं पर थोप देते हैं। यही कारण है कि शुष्क शौचालय साफ करने वाली महिलाओं की संख्या 90 प्रतिशत से अधिक हे।

ऐतिहासिक अन्याय है मैला प्रथा

अब समय आ गया है कि हम इन महिलाओं के साथ हो रहे ऐतिहासिक अन्याय को, शुष्क शौचालय साफ करने जैसी हिंसा को जड़ से समाप्त करें और  उन्हें उनके मानव होने का अहसास कराएं। उन्हें मानवीय गरिमा के साथ जीने के उनके हक के लिए उनका साथ दें। आइए, हम सब मिलकर शुष्क शौचालयों की प्रथा को समाप्त करें। इनको समाप्त कर एक ऐसे भारत का निर्माण करें जहां देश का हर नागरिक अपनी मानवीय गरिमा के साथ अपना जीवन यापन कर सके।

बाबा साहेब का सपना – मैला मुक्त भारत 

बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर के जातीय उन्मूलन के सपने को साकार करने के लिए सफाई कर्मचारी आंदोलन ने बीड़ा उठाया है . सात राज्यों में 100 दिन के भीतर मैला प्रथा के खात्मे का। सफाई कर्मचारी आन्दोलन उत्तराखंड, राजस्थान उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, झारखण्ड और जम्मू-कश्मीर इन राज्यों में मिशन 2021 के तहत तमाम समाज को गोलबंद करते हुए शुष्क शौचालय को ध्वस्त करेगा और इस तरह से सबसे बर्बर रूप में मौजूद जाति प्रथा के इस दंश का खात्मा करेगा।

बाबा साहेब अंबेडकर ने कहा था –“भारत में कोई मैला ढोने वाला व्यक्ति अपने काम की वजह से नहीं बल्कि अपने जन्म की वजह से जाना जाता है।" शुष्क शौचालय छुआछात और जाति भेद के ठोस प्रतीक हैं। दलित महिलाएं शुष्क शौचालय साफ़ करने के लिए बाध्य की गई हैं उन पर पितृसत्ता और जाति हिंसा के वे प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।

बाबा साहेब अंबेडकर ने जो संविधान बनाया वह जाति, पंथ और लिंग सभी प्रकार से समानता पर आधारित है। लेकिन जाति और पितृसत्ता ने जिसकी जड़ें काफी गहरी हैं, बड़ी बेशर्मी से इस अमानवीय शुष्क शौचालयों को बनाए रखा है और इस कारण मैला ढोने वालों पर अत्याचार जारी है। जाति प्रथा द्वारा जारी मैला ढोने की अमानवीय प्रथा तथा शुष्क शौचालयों के अस्तित्व को “मैला ढोने वालों को रोजगार का प्रतिषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम 2013” बना कर इसे गैर कानूनी घोषित कर दिया गया है। कानून कहता है कि इस ऐतिहासिक अन्याय को सुधारा जाए और हर व्यक्ति को मैला प्रथा से मुक्त कर गरिमामय जीवन के लिए उसका पुनर्वास किया जाए। पर कानून को पारित हुए 7 साल हो गए और सुप्रीम कोर्ट का आदेश जारी हुए भी 6 साल हो गए। फिर भी यह शर्मनाक मैला प्रथा अभी भी है। शुष्क शौचालय अभी भी प्रबल रूप से खुलेआम देखे जा सकते हैं। 

नवम्बर 2020 में विश्व शौचालय दिवस पर सरकार ने घोषणा की थी कि 243 शहरों में सफाई कार्य का मशीनीकरण किया जायेगा। भयावह तथ्य यह है कि नगर निगमों और स्थानीय सरकारों द्वारा ही दलित महिलाओं  को सार्वजनिक शुष्क शौचालयों को साफ़ करने के लिए नियुक्त किया जाता है। इससे पता चलता है कि सरकार जानबूझकर दलित महिलाओं का अनादर करती है और उनसे हाथों से शुष्क शौचालयों से मानव मल साफ़ करवाती है।

सफाई कर्मचारी आंदोलन बाबा साहेब अंबेडकर के तीन मूलमन्त्रों शिक्षित बनो, संगठित बनो और संघर्ष करो, के साथ सफाई कर्मचारियों की मुक्ति और मैला प्रथा के कलंक को मिटाने के लिए और बाबा साहेब के देश को मैला मुक्त करने के सपने को साकार करने के लिए देश के 100 जिलों में 100 दिनों में अंबेडकर के कारवां को ले जाएगा और समानता तथा दलित महिलाओं की गरिमा का अहसास कराएगा। 

सफाई कर्मचारी आन्दोलन समानता गरिमा और मानवीय व्यक्तित्व के दावे के मिशन पर चल पड़ा है। आप सबसे यह अनुरोध है कि आप सब इस मिशन 2021 में शामिल हों। मैला प्रथा के कलंक को देश से दूर करें। हम और आप मिलकर इस जातिगत दंश को जितनी जल्दी खत्म कर पायेंगे उतना हमारे समाज के लिए अच्छा रहेगा। 

(लेखक सफाई कर्मचारी आंदोलन से जुड़े हैं।)

Safai Karamchari Andolan
100 days nationwide campaign
Dry toilets
manual scavenging
Dalits
Caste System
patriarchy
B R Ambedkar

Related Stories

विचारों की लड़ाई: पीतल से बना अंबेडकर सिक्का बनाम लोहे से बना स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी

दलितों पर बढ़ते अत्याचार, मोदी सरकार का न्यू नॉर्मल!

बच्चों को कौन बता रहा है दलित और सवर्ण में अंतर?

मुद्दा: आख़िर कब तक मरते रहेंगे सीवरों में हम सफ़ाई कर्मचारी?

#Stop Killing Us : सफ़ाई कर्मचारी आंदोलन का मैला प्रथा के ख़िलाफ़ अभियान

सिवनी मॉब लिंचिंग के खिलाफ सड़कों पर उतरे आदिवासी, गरमाई राजनीति, दाहोद में गरजे राहुल

बागपत: भड़ल गांव में दलितों की चमड़ा इकाइयों पर चला बुलडोज़र, मुआवज़ा और कार्रवाई की मांग

मेरे लेखन का उद्देश्य मूलरूप से दलित और स्त्री विमर्श है: सुशीला टाकभौरे

भारत में सामाजिक सुधार और महिलाओं का बौद्धिक विद्रोह

गुजरात: मेहसाणा कोर्ट ने विधायक जिग्नेश मेवानी और 11 अन्य लोगों को 2017 में ग़ैर-क़ानूनी सभा करने का दोषी ठहराया


बाकी खबरें

  • No more rape
    सोनिया यादव
    दिल्ली गैंगरेप: निर्भया कांड के 9 साल बाद भी नहीं बदली राजधानी में महिला सुरक्षा की तस्वीर
    29 Jan 2022
    भारत के विकास की गौरवगाथा के बीच दिल्ली में एक महिला को कथित तौर पर अगवा कर उससे गैंग रेप किया गया। महिला का सिर मुंडा कर, उसके चेहरे पर स्याही पोती गई और जूतों की माला पहनाकर सड़क पर तमाशा बनाया गया…
  • Delhi High Court
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    दिल्ली: तुगलकाबाद के सांसी कैंप की बेदखली के मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने दी राहत
    29 Jan 2022
    दिल्ली हाईकोर्ट ने 1 फरवरी तक सांसी कैंप को प्रोटेक्शन देकर राहत प्रदान की। रेलवे प्रशासन ने दिल्ली हाईकोर्ट में सांसी कैंप के हरियाणा में स्थित होने का मुद्दा उठाया किंतु कल हुई बहस में रेलवे ने…
  • Villagers in Odisha
    पीपल्स डिस्पैच
    ओडिशा में जिंदल इस्पात संयंत्र के ख़िलाफ़ संघर्ष में उतरे लोग
    29 Jan 2022
    पिछले दो महीनों से, ओडिशा के ढिंकिया गांव के लोग 4000 एकड़ जमीन जिंदल स्टील वर्क्स की एक स्टील परियोजना को दिए जाने का विरोध कर रहे हैं। उनका दावा है कि यह परियोजना यहां के 40,000 ग्रामवासियों की…
  • Labour
    दित्सा भट्टाचार्य
    जलवायु परिवर्तन के कारण भारत ने गंवाए 259 अरब श्रम घंटे- स्टडी
    29 Jan 2022
    खुले में कामकाज करने वाली कामकाजी उम्र की आबादी के हिस्से में श्रम हानि का प्रतिशत सबसे अधिक दक्षिण, पूर्व एवं दक्षिण पूर्व एशिया में है, जहाँ बड़ी संख्या में कामकाजी उम्र के लोग कृषि क्षेत्र में…
  • Uttarakhand
    सत्यम कुमार
    उत्तराखंड : नदियों का दोहन और बढ़ता अवैध ख़नन, चुनावों में बना बड़ा मुद्दा
    29 Jan 2022
    नदियों में होने वाला अवैज्ञानिक और अवैध खनन प्रकृति के साथ-साथ राज्य के खजाने को भी दो तरफ़ा नुकसान पहुंचा रहा है, पहला अवैध खनन के चलते खनन का सही मूल्य पूर्ण रूप से राज्य सरकार के ख़ज़ाने तक नहीं…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License