NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
1​984​ के​ दंगे- 'हम भारत के भुला दिए गए नागरिक हैं’
एक फोटो डाइजेस्ट जो 1984 के दंगे के 15 पीड़ितों के जीवन में झांकता है और उनके अतीत-वर्तमान का पता देता है, जो अभी भी इंसाफ का इंतजार कर रहे हैं।
सनम सुतीरथ वज़ीर, सोम बासु
02 Nov 2021
Replug

तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 31​​ अक्टूबर 1984 से ​3​​ नवंबर ​​1984​ के बीच ​हिंसक भीड़ ने ​3,000 से अधिक ​सिख पुरुषों, महिलाओं और बच्चों का संहार कर दिया था। पेट्रोल से भरे टायरों को सिख पुरुषों के गले में बांध कर उनमें आग लगा दी गई थी। कइयों को गोलियां मार दी गईं थीं या तलवार से काटकर उन्हें मौत के घाट उतार दिया गया था। महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया था और उन्हें बुरी तरह मारा-पीटा गया था। जिन लोगों ने यह सब अपनी आंखों के सामने होते देखा था, उन्होंने बाद में इनकी जांच के लिए गठित आधिकारिक जांच आयोग को बताया कि किस तरह पुलिसकर्मियों ने सिखों की हत्याओं को रोकने के लिए कुछ नहीं किया था, उसने भी नरसंहार में सक्रिय रूप से भाग लिया था। 

कई अन्य चश्मदीदों ने बताया कि सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी के सदस्यों ने भीड़ को उकसाया था और खुद भी हमलों में हिस्सा लिया था। सरकार द्वारा नियुक्त न्यायिक आयोग ने इन हत्याओं को "संगठित नरसंहार" करार दिया था। 

1984 का नरसंहार ​एक राष्ट्रीय शर्म की बात थी, और इसके बाद इनके अपराधियों को सजा देने में लगा तीन दशकों से अधिक समय भी इसकी इंतिहा थी। जुल्मो-सितम से किसी तरह बच गए लोगों ने बताया कि पुलिस अक्सर उनकी शिकायत दर्ज करने से इनकार करती है या एक अस्पष्ट "प्राथमिकी" दर्ज करती है, जिसमें सभी अपराधों को पड़ोस में हुआ दर्ज कर देती है। दिल्ली में, ​​587​​ संहार मामले में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज की गई थी, जिसमें 247 मामलों को दिल्ली पुलिस ने "अनट्रेस्ड" कह कर बंद कर दिया था, जिसके मायने हैं कि वह किसी भी सबूत का पता लगाने में असमर्थ थी। इस नरसंहार के 36​​ वर्षों बाद, अपने कर्त्तव्य की उपेक्षा करने और पीड़ितों की बजाए हमलावरों की हिफाजत करने के आरोप में गिने-चुने पुलिसकर्मियों को ही दंडित किया गया है। 

1984 के नरसंहार में बचे लोगों की पीड़ा ​अभी समाप्त नहीं हुई है। उनके बच्चे हिंसा में मिले दर्द और अन्याय के साथ जीना जारी रखे हुए हैं। ये तस्वीरें 1984 के दंगे के उन भुला दिए पीड़ितों और जीवित बचे लोगों के जीवन की एक झलक पेश करती हैं। उनकी चीखें अभी भी पड़ोस की तंग गलियों में गूंजती हैं, जहां हजारों लोग मारे गए थे। भारत के लिए यह सुनिश्चित करने का समय है कि 1984 के नरसंहार के प्रति किए जाने वाले न्याय को एक रिसता जख्म नहीं रहने दिया जाना चाहिए। 

1. भागी कौर 

भागी कौर 

दिल्ली के त्रिलोकपुरी से भाग कर तिलक विहार में शरण लेनी पड़ी। 1984 के दंगे में भागी के पति एवं उनके सात रिश्तेदारों को हत्या कर दी गई थी। 

“बाकी सभी के लिए, तो आज से 36 वर्ष पहले यह नरसंहार हुआ था, लेकिन मुझे तो ऐसा लगता है जैसे यह सब कल हुआ है।‘’

“मेरी आंखों के सामने लगभग मेरा पूरा परिवार खत्म हो गया और इतने सालों के बाद भी हमें कोई इंसाफ नहीं मिला।” 

“अपराधी आज भी छुट्टे घूम रहे हैं।”

2. शांति देवी

शांति देवी 

त्रिलोकपुरी से आकर तिलक विहार में शरण ली। दंगे में शांति के पति एवं देवर की हत्या कर दी गई थी। 

“उन्होंने तलवारों से मेरे पति एवं देवर को काट डाला था। मेरे देवर का पेट फाड़ दिया गया था, वे हमारे पास ही पड़े थे।”

“ईश्वर मेरी पीर का गवाह है। हम पानी के लिए भीख मांग रहे थे। हम लोगों पर 1984 में जो अत्याचार किए गए वे आज भी हमें हंट करते हैं।”

3. लक्ष्मी कौर 

लक्ष्मी कौर 

मंगोलपुरी से भाग कर तिलक विहार, दिल्ली में शरण ली। दंगाइयों ने लक्ष्मी के पति, उनके पांच भाइयों एवं अन्य नातेदारों को काट डाला था। 

“दंगाइयों ने पुलिस थाने के ठीक सामने मेरे पति के गले में पेट्रोल से भरे टायर बांध कर उसमें आग लगा दी थी।”

उस समय भीड़ में शामिल एक अधेड़ आदमी रात में लौटा और मुझे गलत तरीके से छूने की कोशिश की। जब मैंने इसका विरोध किया तो वह चला गया और फिर अपने सभी संगी-साथी को बुला लाया। इन लोगों ने मेरे घर की तलाशी ली और घर में उस वक्त जान बचाने के लिए छिपे सभी आठों व्यक्तियों की हत्या कर दी। मुझे बराबर धमकियां दी जाती थीं और मुझे तंग-परेशान किया जाता था। इसलिए हमने अपना केस वापस लेने का फैसला किया। मैं मुकदमा लड़ने से डर गई थी। अब सरकार को आना चाहिए और देखना चाहिए कि हम लोग कैसे गुजर-बसर कर रहे हैं।”

4. हुक्मी कौर

हुक्मी कौर 

त्रिलोकपुरी से भागी अब तिलक विहार, दिल्ली में रह रही हैं। दंगाइयों ने हुक्मी के पति, देवर, ससुर एवं अन्य 11 रिश्तेदारों को जिंदा जला कर मार डाला था। 

“मेरे परिवार के मर्दों को हमारे ही घर के आगे जिंदा जला दिया गया था।”

“इसके तीन बाद मेरे पति को भी मार दिया गया था, उनकी आंखें निकाल ली गईं थीं और उन्हें भी जिंदा ही जला दिया गया था। 30 साल होने को आए अब तक बिना इंसाफ के ही हैं। हम लोग असहाय हैं।”

5. सुंदरी कौर  

सुंदरी कौर  

सुल्तानपुरी से भाग कर तिलक विहार, दिल्ली में शरण ली हुई हैं। दंगे में सुंदरी ने अपने पति एवं परिवार से अन्य सदस्यों को खोया है। 

“मेरे पति ऑटो ड्राइवर थे। उनकी कहीं बाहर हत्या कर दी गई थी। मैं तो उनकी लाश भी नहीं देख सकी, हमने सिर्फ उनका जला हुआ ऑटो पुलिस स्टेशन में देखा था।”

“मैं अब भी 1984 की पीड़ा से गुजर रही हूं। इंसाफ होता कहीं दिख नहीं रहा है। दंगाइयों ने हमारे पास उस वक्त जो भी था, वो सारा का सारा लूट लिया था और हमें इनके बिना ही मरने के लिए छोड़ दिया था।”

6. दर्शन कौर

दर्शन कौर

त्रिलोकपुरी से उजड़ कर दिल्ली के ही रघुबीर नगर में रहती हैं। दंगे में दर्शन के पति एवं परिवार के 11 सदस्यों की हत्या कर दी गई थी। 

“मेरे पति ने त्रिलोकपुरी के हमारे मकान के किचन में छिप कर जान बचाने की कोशिश की थी। लेकिन हिंसक भीड़ ने उनके बाल पकड़ कर बाहर खींच लिया, उनके गले में रजाई लपेट कर उसके ऊपर टायर बांध दिया। आताताइयों ने उनके ऊपर तेल डाल दिया और फिर आग लगा दी। वे बुरी तरह जल गए थे। बाद में उनकी मौत हो गई।”

“भीड़ ने निर्ममतापूर्वक सभी महिलाओं के कपड़े उतार लिए थे। वे अब भी गहरे सदमे हैं और उन्हें विश्वास ही नहीं होता कि उनके पति एवं रिश्तेदार मार दिए गए। उनके साथ कई आदमियों ने जाने कितनी बार रेप किया था।”

7. सुरजीत सिंह

सुरजीत सिंह

सुरजीत ने 1984 में दंगाइयों के हाथों अपने पिता को खोया था।

“मैं स्कूल में पढ़ाई के दौरान पूरे समय अवसादग्रस्त रहा और चिढ़ाए जाने से तंग आ कर क्लास जाना छोड़ दिया था। स्कूल में बच्चे मुझे ‘सीख कबाब’ कहते थे। एक दिन अचानक, हमारा जीवन बरबाद हो गया और हम इसे लेकर अनिश्चित हो गए थे। आप अगर अपने परिवार में किसी को खो देते हैं, तो यह दुर्घटना परिवार में सबको झकझोर देती है। इसकी जरा कल्पना करिए, हमने अपने पिता को जिंदा जलाए जाते देखा है।”

8. निरप्रीत कौर

निरप्रीत कौर

दंगे के बाद दिल्ली से चंडीगढ, पंजाब में शरण ली। 

“मैं क्रोध और पीड़ा से भर गई थी। जिन्होंने 1984 में सिखों का कत्लेआम किया, वे अभी भी आज़ाद घूम रहे हैं।" 

9. गुरमैल सिंह

गरमैल सिंह

रानीगंज, पश्चिम बंगाल

“मैं एक ट्रक ड्राइवर था। कई बार लुटेरों ने मुझे सड़क पर निशाना बनाया, लेकिन शुक्र है कि मैं हर बार बच निकला। मुझे उस चीज़ के लिए ज़िम्मेदार ठहराया जा रहा था जो मैंने नहीं किया था।​ मैं लगातार 14 दिनों तक अपने परिवार से दूर था।”

10. हरबंस सिंह 

हरबंस सिंह

भोगल, दिल्ली

“दंगाइयों ने वे सारे ट्रक जला दिए, जिन पर सिख धर्म के प्रतीक चिह्न लगे हुए थे।”

“उन्होंने एक युवक के गले में जलता टायर डालकर उसे जला दिया। पुलिस ने कुछ नहीं किया और वह केवल तमाशा देखती रही।”

11. जोगिन्दर कौर

जोगिन्दर कौर

जोगिन्दर कौर को सागरपुर से राजौरी गार्डेन, दिल्ली में आकर रहना पड़ा। जोगिन्दर के पति की हत्या कर दी गई और उनकी सास भी लापता हो गईं, जिनका आज तक अता-पता नहीं है। 

“​मेरे पति पर तलवारों और लाठियों से हमला किया गया। वे तीन दिन तक बिना हिले-डुले बिस्तर पर लेटे रहे, हमारे बच्चे उनके पास बैठे रहे थे और वे उनके पास से हिलने-डुलने को तैयार नहीं थे।"

“हिंसा के तीसरे दिन एक भीड़ फिर से हमारे घर में घुस गई और उन्हें मार डाला। 1984 के दंगे में मेरा सब कुछ गंव गया- हमारा भविष्य, हमारी प्रगति, हमारा सब कुछ। मेरा छोटा बेटा उस समय इन घटनाओं को लेकर अवसाद में थे और अब वह पिछले पांच साल से लापता है। मैं एक जीवित नर्क में हूँ।"

12. अमरजोत कौर

अमरजोत कौर

दंगे में तबाह हो कर त्रिनगर से राजा गार्डेन, दिल्ली रहने आ गई। अमरजोत को दंगे में अपने पति एवं देवर को खोना पड़ा था। 

“मेरे पति और उनके भाई की बादली में हत्या कर दी गई। सैकड़ों की भीड़ ने उन्हें जिंदा जला दिया। वे कुछ सफेद पाउडर फेंक रहे थे जिससे तुरंत आग लग गई, यहां तक कि विस्फोट भी हो गया। हम भारत के भुला दिए गए नागरिक हैं।" 

13. अमरजीत सिंह

अमरजीत सिंह

अमरजीत सिंह दंगे के दौरान मंगोलपुरी में रहते थे, वहां से भाग कर अब तिलक विहार, दिल्ली में शरण ले रखी है। अमरजीत ने अपने बड़ा भाई खोया है। 

“मेरे बड़े भाई की मृत्यु के बाद मेरी माँ का दिल टूट गया था। तब मैं केवल ​1​1​ साल का था। मैं अपने भाई की ज्यादा मदद नहीं कर सका। मैंने उन्हें [दंगाइयों] कसाइयों द्वारा इस्तेमाल किए गए हथियार से मारते देखा था। सबसे भयावह यादें उनके द्वारा पहने गए दस्ताने की थीं। मैंने दस्ताने पहने इस अधेड़ उम्र के व्यक्ति को सिखों और हमारे घरों पर सफेद पाउडर फेंकते देखा, जिससे तुरंत आग लग गई। उन्होंने मेरी आंखों के सामने एक युवक को जला दिया।” 

14. संतोख सिंह 

संतोख सिंह 

संतोख सिंह को सुल्तानपुरी से उजड़ कर तिलक विहार, दिल्ली में शरण लेनी पड़ी। संतोख के पिता और उनके दादा की हत्या कर दी गई थी। 

“मेरी माँ ने मुझे बचाने के लिए मुझे मेरी बहन के कपड़े पहना दिए थे। उन्मादी भीड़ सिखों के खिलाफ नारे लगा रही थी। उन्होंने हमें सांप कहा। भीड़ ने मेरे पिता को जिंदा जला दिया। इसके दृश्य आज भी मेरा पीछा करते हैं।" 

15. शमनी कौर

शमनी कौर

शमनी कौर को त्रिलोकपुरी से उखड़ कर तिलक विहार, दिल्ली में शरण लेनी पड़ी। शमनी ने 1984 के नरसंहार में अपने 10 संबंधियों को खोया है। 

“मैं 1984 के दंगे के दर्द से 30 साल से अधिक समय से पीड़ित रहा हूँ। न्याय कहीं भी नहीं है। तब किसी ने हमें सांत्वना नहीं दी और न ही अब किसी को हमारी परवाह है। क्या कोई समझ सकता है कि वो तीन दिन हमारे लिए कितने लंबे थे? भीड़ 'सिखों पर भरोसा मत करो’। ‘वे देशद्रोही हैं’, के नारे लगा रही थी।"

सिफारिशें: अब न्याय किया जाए

* आज से 36 साल पहले दिन-दहाड़े किए गए सिखों के नरसंहार मामले में केवल कुछ ही जिम्मेदार लोगों को न्याय के कटघरे में लाया जा सका है। इनमें किसी भी पुलिस अधिकारी को दोषी नहीं ठहराया गया है। बलात्कार के लिए एक भी मुकदमा नहीं चलाया गया है।

* 1984 के नरसंहार के अपराधियों को किसी तरह के दंड से मिली छूट का इस्तेमाल अन्य संगठित नरसंहारों और सांप्रदायिक दंगों के लिए जिम्मेदार लोगों को दंडित करने में प्रगति की कमी को सही ठहराने के लिए किया गया है। जब तक 1984 के संहार के अपराधियों सजा नहीं मिलेगी, कानून का राज कमजोर रहेगा।

* लिहाजा, हत्या, बलात्कार और अन्य अपराधों के सभी संदिग्ध लोगों पर मुकदमा चलाया जाना सुनिश्चित किया जाए। इसके दायरे में उन लोगों को भी लाया जाए, जिन्होंने इस जघन्य अपराध को अंजाम देने का हुक्म उस भीड़ को दिया था। 

* पीड़ितों और गवाहों को सुरक्षा प्रदान की जाए ताकि वे बिना डर के जांच कार्य और अभियोजन प्रक्रिया को आगे सुचारु रखने के लिए आगे बढ़ सकें।

* दंगा-पीड़ितों और दंगे में बचे लोगों, जिनमें युवा लोग, लड़कियों एवं महिलाएं शामिल हैं, उनसे और उनके साथ काम करने वाले नागरिक समाज समूहों से राय विचार कर क्षतिपूर्ति के लिए एक व्यापक योजना बनाई जाए और उसे कार्यान्वित किया जाए। यह संयुक्त राष्ट्र के मूल सिद्धांतों और अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार कानून के घोर उल्लंघन के शिकार लोगों के लिए उपचार और क्षतिपूर्ति के अधिकार के संदर्भ में दिए गए उसके दिशानिर्देशों के अनुरूप होना चाहिए। 

* 1984 के दंगे के पीड़ित व्यक्तियों या समुदाय के पुनर्वास की योजनाओं में उन सभी व्यक्तियों का हक होना चाहिए, जिन्हें इस दौरान शारीरिक या मनोवैज्ञानिक रूप से चोट पहुंची हो, आर्थिक नुकसान हुआ हो या उनके मौलिक अधिकारों की पर्याप्त हानि हुई हो। 

* आकलन योग्य किसी भी आर्थिक क्षति की भरपाई की जाए। इसमें रोजगार, शिक्षा के खोए हुए अवसर शामिल हैं। इनके साथ, सामाजिक लाभों, और भौतिक क्षति और कमाई की हानि, जिसमें कमाई की क्षमता का नुकसान भी शामिल है, उन सबकी क्षतिपूर्ति की जाए।

* भारत सरकार की ओर से एक औपचारिक सार्वजनिक माफीनामा जारी किया जाए, जिसमें इससे जुड़े सभीतथ्यों को स्वीकार किया गया हो और जिम्मेदारी की स्वीकृति भी शामिल है। 

कानूनी एवं नीतिगत सुधार 

* सांप्रदायिक और लक्षित हिंसा को रोकने और उसका जवाब देने के लिए एक मजबूत कानून बनाया जाए, जिसमें श्रेष्ठ और कमान जिम्मेदारी, राहत, वापसी और पुनर्वास के लिए अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार के सिद्धांत शामिल किए गए हों। ऐसे बने कानून को देश में ही विस्थापित लोगों सहित सांप्रदायिक और लक्षित हिंसा से पीड़ित सभी व्यक्तियों की राहत और क्षतिपूर्ति के अधिकार को मान्यता देनी चाहिए। इसे सांप्रदायिक या लक्षित हिंसा की घटनाओं के दौरान तत्काल बचाव और राहत प्रदान करनी चाहिए। इसे यह स्वीकार करना चाहिए कि क्षतिपूर्ति के अधिकार में पीड़ितों के पुनर्स्थापन, पुनर्वास, उसकी संतुष्टि और दंगे को न दोहराए जाने की गारंटी भी शामिल है। 

* पीड़ित और गवाह संरक्षण कार्यक्रम केंद्र और राज्य स्तर पर एक व्यापक और पर्याप्त रूप से साधन-संपन्नता से किया जाना चाहिए। परंतु उसे पुलिस जैसी राज्य एजेंसियों से संबद्ध नहीं किया जाना चाहिए। 

* राजनीतिक दबाव एवं हस्तक्षेप से पुलिस को मुक्त रखने के लिए एक समग्र पुलिस सुधार कार्यक्रम अपनाना चाहिए। पुलिस के कदाचार की शिकायतों की जांच के लिए राज्यों और जिलों में पुलिस शिकायत प्राधिकरण का गठन करने के लिए राज्य सरकारों के साथ मिलकर काम करना चाहिए। पुलिस अधिकारियों को एक निश्चित कार्यकाल तक तैनाती के लिए राज्य सरकारों के साथ काम करना चाहिए और पुलिस की भर्ती, नियुक्ति और स्थानांतरण की निगरानी के लिए एक बोर्ड का गठन करना चाहिए।

(सनम सुतीरथ वजीर एक मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं। वे 1984 के सिख संहार के पीड़ितों के साथ 2013 से ही शोध कार्य में लगे हैं। सोम बासु एक फोटोजर्नलिस्ट हैं और 2015 में प्रकाशित किताब शेड्स ऑफ कश्मीर के लेखक हैं। लेख में इस्तेमाल किए गए विवरण 2018-19 के दौरान जुटाए गए थे। लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं।) 

अंग्रेजी में मूल रूप से प्रकाशित लेख को पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें 

Replug: 1984 Riots - ‘We Are the Forgotten Citizens of India’

delhi police
1984
Anti-Sikh Riots

Related Stories

दिल्ली: रामजस कॉलेज में हुई हिंसा, SFI ने ABVP पर लगाया मारपीट का आरोप, पुलिसिया कार्रवाई पर भी उठ रहे सवाल

क्या पुलिस लापरवाही की भेंट चढ़ गई दलित हरियाणवी सिंगर?

बग्गा मामला: उच्च न्यायालय ने दिल्ली पुलिस से पंजाब पुलिस की याचिका पर जवाब मांगा

शाहीन बाग़ : देखने हम भी गए थे प तमाशा न हुआ!

शाहीन बाग़ ग्राउंड रिपोर्ट : जनता के पुरज़ोर विरोध के आगे झुकी एमसीडी, नहीं कर पाई 'बुलडोज़र हमला'

जहांगीरपुरी : दिल्ली पुलिस की निष्पक्षता पर ही सवाल उठा दिए अदालत ने!

अदालत ने कहा जहांगीरपुरी हिंसा रोकने में दिल्ली पुलिस ‘पूरी तरह विफल’

मोदी-शाह राज में तीन राज्यों की पुलिस आपस मे भिड़ी!

पंजाब पुलिस ने भाजपा नेता तेजिंदर पाल बग्गा को गिरफ़्तार किया, हरियाणा में रोका गया क़ाफ़िला

नफ़रती भाषण: कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को ‘बेहतर हलफ़नामा’ दाख़िल करने का दिया निर्देश


बाकी खबरें

  • water pump
    शिवम चतुर्वेदी
    हरियाणा: आज़ादी के 75 साल बाद भी दलितों को नलों से पानी भरने की अनुमति नहीं
    22 Nov 2021
    रोहतक के ककराणा गांव के दलित वर्ग के लोगों का कहना है कि ब्राह्मण समाज के खेतों एवं अन्य जगह पर लगे नल से दलित वर्ग के लोगों को पानी भरने की अनुमति नहीं है।
  • ATEWA
    सरोजिनी बिष्ट
    पुरानी पेंशन बहाली की मांग को लेकर अटेवा का लखनऊ में प्रदर्शन, निजीकरण का भी विरोध 
    22 Nov 2021
    21 नवंबर को लखनऊ के इको गार्डेन में नेशनल पेंशन स्कीम यानी एनपीएस को रद्द करने, पुरानी पेंशन सिस्टम यानी ओपीएस को पुनः बहाल करने और रेलवे के निजीकरण पर रोक लगाने की मांगों के साथऑल इंडिया टीचर्स एंड…
  • COP26
    डी रघुनंदन
    कोप-26: मामूली हासिल व भारत का विफल प्रयास
    22 Nov 2021
    इस शिखर सम्मेलन में एक ओर प्रधानमंत्री के और दूसरी ओर उनकी सरकार के वरिष्ठ मंत्रियों तथा आला अफसरों के अलग-अलग रुख अपनाने से ऐसी छवि बनी लगती है कि या तो इस शिखर सम्मेलन के लिए भारत ने ठीक से तैयारी…
  • birsa
    अनिल अंशुमन
    झारखंड : ‘जनजातीय गौरव दिवस’ से सहमत नहीं हुआ आदिवासी समुदाय, संवैधानिक अधिकारों के लिए उठाई आवाज़! 
    22 Nov 2021
    बिरसा मुंडा जयंती के कार्यक्रमों और सोशल मीडिया के मंचों से अधिकतर लोगों ने यही सवाल उठाया कि यदि बिरसा मुंडा और आदिवासियों की इतनी ही चिंता है तो आदिवासियों के प्रति अपने नकारात्मक नज़रिए और आचरण में…
  • kisan mahapanchayat
    लाल बहादुर सिंह
    मोदी को ‘माया मिली न राम’ : किसानों को भरोसा नहीं, कॉरपोरेट लॉबी में साख संकट में
    22 Nov 2021
    आज एक बार फिर कॉरपोरेट-राज के ख़िलाफ़ किसानों की लड़ाई लखनऊ होते हुए देश और लोकतंत्र बचाने की लड़ाई और नीतिगत ढांचे में बदलाव की राजनीति का वाहक  बनने की ओर अग्रसर है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License