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भारत
राजनीति
21 घंटे चली भारत की संसद में 20 बिल पेश हुए, अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन
लोकसभा में सरकार के मंत्री द्वारा पेश किए गए 15 बिल पर किसी भी दूसरे सांसद ने कोई राय नहीं रखी। और वह बिल संसद से पास होकर कानून में तब्दील हो गए। राज्यसभा में 20 बिलों में से केवल 2 बिल ऐसे थे, जिन पर 1 घंटे से अधिक की चर्चा हुई।
अजय कुमार
13 Aug 2021
संसद

भारत के चुनाव जब नफरत की बिसात पर लड़े और जीते जा रहे हों तो संसद अगर मारपीट का दंगल बन जाए तो इसमें किसी तरह की अचरज की बात नहीं। 

350 से अधिक सीट लेकर बैठी भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगी दल कह रहे हैं कि विपक्षी दल संसद नहीं चलाने दे रहे हैं। हूबहू इसी बात को भारत की कॉरपोरेट मीडिया भी प्रचारित कर रही है। टीवी चैनलों से लेकर बड़े-बड़े अखबारों की हेडिंग इसी तरह से लिखी गई है जैसे यह बताने की कोशिश की जा रही हो कि विपक्ष की वजह से संसद नहीं चल पा रही है।

लेकिन कोई भी इस बुनियादी बात को नहीं दिखा और बता रहा कि जिसके हाथ में सत्ता है, जो सरकार में है, जिसके पास 350 से अधिक सीट है, उसका संसद में रवैया कैसा है?

350 से ज्यादा सीट वाली सरकार - यह इतनी बड़ा बहुमत है कि अगर सरकार चाहे तो जनकल्याण के झंडे गाड़ दे या अब तक बने सभी जन कल्याण के झंडे को उखाड़ कर फेंक दे। सरकार चाहे तो संसदीय मर्यादा और गरिमा की नई इबारत लिख दे या सरकार चाहे तो बची-खुची सभी संसदीय मर्यादा और गरिमा को तबाह कर दे।

याद कीजिए कि जब इस मानसून सत्र की शुरुआत हुई थी तब भारत के बड़े मुद्दे क्या थे? कोरोना की महामारी से पैदा हुई तबाही के वक्त भारत सरकार की प्रतिक्रिया, किसानों के अंतहीन संघर्ष पर भारत सरकार का अनसुना रवैया, जमीन के नीचे धंसती भारत की अर्थव्यवस्था, पेट्रोल और डीजल पर लगने वाला पहाड़नुमा टैक्स, कमरतोड़ महंगाई, पेगासस के जरिए लोकतंत्र की तबाही - यह कुछ ऐसे मुद्दे थे जिन पर जन कल्याण के लिए बनी भारतीय लोकतंत्र की संसद में खूब गहमागहमी भरी चर्चा होनी चाहिए थी। विपक्ष इन सारे मुद्दे पर सरकार को घेरता रहा। सरकार इन सारे मुद्दों से भागती रही। और मीडिया में हेडलाइन बनती रही कि विपक्ष संसद को चलने नहीं दे रही है।

19 जुलाई से मानसून सत्र की शुरुआत हुई। तो दोनों सदनों में बहस के लिए 19 दिन तय किए गए। लेकिन 2 दिन पहले 17 दिन में ही मानसून सत्र खत्म हो गया। साल 2019 के बाद यह चौथी बार हो रहा है कि संसद अपने तय समय से कम समय में ही खत्म हो गया। द हिंदू अखबार की माने तो इस दौरान लोकसभा के लिए जितना समय निर्धारित किया गया था उसका महज 19 फ़ीसदी समय ही लोकसभा चली। राज्यसभा चलने की अवधि भी अपने लिए निर्धारित कुल अवधि की महज 26 फ़ीसदी ही रही।

लोकसभा में इस दौरान कुल 96 घंटे कामकाज होना चाहिए था, लेकिन सिर्फ 21 घंटे 14 मिनट ही काम हुआ। कामकाज के तय घंटों में से 74 घंटे 46 मिनट काम नहीं हो सका। इससे ज्यादा तो जंतर मंतर पर किसानों के संसद ने काम किया। हर कानून पर तकरीबन 10 घंटे की चर्चा की।

जबकि 21 घंटे चले भारत की संसद में 20 बिल पेश किए गए। लोकसभा में केवल एक बिल पर 15 मिनट से अधिक की बहस हुई। लोकसभा में 15 बिल सरकार के मंत्री ने पेश किए। उस पर किसी भी दूसरे सांसद ने कोई राय नहीं रखी। और वह बिल संसद से पास होकर कानून में तब्दील हो गया। राज्यसभा में 20 बिलों में से केवल 2 बिल ऐसे थे, जिसपर 1 घंटे से अधिक की चर्चा हुई। हर बिल जिस सत्र में पेश किया गया उसी सत्र में कानून भी बन गया।

ऐसा नहीं था कि यह सब पहली बार हो रहा था। लेकिन जितनी बड़ी संख्या में हो रहा था वह भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास में पहली बार था। साल 2009 से लेकर 2014 के बीच के 15 वीं लोकसभा में 18 फ़ीसदी बिल उसी सत्र में कानून बदल गए जिस सत्र में पेश किए गए। 16वीं लोकसभा ( 2014-19) में यही हश्र 33 फ़ीसदी बिलों के साथ हुआ। लेकिन साल 2019 के बाद शुरू हुई 17 वीं लोकसभा का इस मामले में कोई सानी नहीं। अभी इस लोकसभा की केवल 2 साल बीते है और इसमें सरकार की तरफ से अब तक पेश किए गए 70 फ़ीसदी बिल उसी सत्र में कानून में तब्दील हो गए जिस सत्र में पेश किए गए।

जब सरकार में मौजूद विधायिका के सदस्य अपने कर्तव्य का इस तरह से उल्लंघन कर रहे थे तब अगर उनके कामकाज को लेकर कोई यह कहे कि वह संसद की हत्या कर रहे थे तो कैसे कहा जाए कि वह गलत है? इस समय मीडिया वालों को सरकार से पूछना चाहिए था कि आखिरकार बिलों में लिखा क्या है? पूछना चाहिए था कि आखिकार सरकार को कौन सी आफत आन पड़ी है कि बिना बहस के बिल कानून में तब्दील कर दिए जा रहे हैं? पूछना चाहिए था कि अगर ऐसे ही कानून बनाने की जरूरत है तो देश में चुनाव क्यों होते हैं? चुनकर संसद पहुंचे जनप्रतिनिधियों को जब कानून बनाने की प्रक्रिया में शामिल ही नहीं करना है तो खुद को लोकतांत्रिक कैसे कहा जाए? जब कानून बनाने जैसे बुनियादी प्रक्रिया लोकतांत्रिक नहीं है तो अंतिम परिणति अगर मारपीट और हिंसा में बदल जाएगी तो इसका दोषी कौन होगा?

इनमें से किसी भी बिल को संसदीय समिति के पास जांच परख के लिए नहीं भेजा गया। संसदीय समिति में बिल से जुड़े सभी हित धारक, विशेषज्ञ, प्रशासनिक अधिकारी और विधायिका के सदस्य बिल पर गहन चिंतन मंथन करते हैं। इसी वजह से किसी बिल का क्या असर होगा? इससे जुड़ी सभी संभावनाएं बाहर आ पाती है? विधायिका के सदस्य उचित निर्णय ले पाते हैं कि आखिर कर बिल के साथ क्या किया जाए?

हाल के वर्षों में दिवालिया कानून और मोटर व्हीकल कानून में संसदीय समिति में भेजे गए तब वे उचित संशोधनों के साथ बाहर निकल कर आए। इसलिए संसदीय समिति की संसदीय कामकाज में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होती है। लेकिन पंद्रहवीं लोकसभा के बाद इसमें भी जबरदस्त गिरावट देखी जा रही है। 15वीं लोकसभा में तकरीबन 71 फ़ीसदी बिल बातचीत के लिए संसदीय समिति के पास भेजे गए। 16वीं लोकसभा में यह आंकड़ा घटकर  27 फ़ीसदी हो गया और 17वीं लोकसभा के महज दो सालों में केवल 12 फ़ीसदी बिल विचार-विमर्श के लिए संसदीय समिति के पास भेजे गए हैं।

इस तरह से हम देख सकते हैं कि बिना ठोक पीट और विचार विमर्श किए बिल कानून में तब्दील हो जा रहे हैं। बिना कानूनों का असर जाने कानून लागू कर दिए जा रहे हैं। यह कहीं से भी संसद का गुण नहीं है। यह तानाशाही सरकार के गुण हैं। वैसे राज्य के गुण हैं जहां पर सरकार महज कारपोरेट के हाथों की कठपुतली बनकर रह जाती हैं। किसान आंदोलन के लफ्जों में कहे तो भाजपा सरकार वैसी सरकार है जिसे कोई अंबानी अडानी चला रहा है और भाजपा सरकार अपने कामकाज से इस बात को हर बार साबित भी कर रही है।

लोकसभा में कई तरह के संस्थाओं के भीतरी झगड़े से निपटारे के लिए बनने वाले ट्रिब्यूनल से जुड़े ट्रिब्यूनल रिफॉर्म्स बिल पर 9 मिनट चर्चा हुई। राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे गंभीर विषय से जुड़े एसेंशियल डिफेंस सर्विसेज बिल पर 12 मिनट चर्चा हुई। आम लोगों के पैसे से चलने वाले बैंकों के फंसे हुए कर्जे को सुरक्षित रखने से जुड़े दिवालिया संशोधन कानून पर 5 मिनट चर्चा हुई। देश के भीतर जलमार्ग से माल परिवहन से जुड़े इन्लैन्ड वेसल बिल पर 6 मिनट चर्चा हुई। आपकी मेहनत की कमाई पर लगने वाले टैक्स से जुड़े का कराधान कानून के संशोधन पर 6 मिनट चर्चा हुई। ऐसे तमाम विषय हैं जिनका असर भारत के हर एक नागरिक पर पड़ने की संभावना रहती है। लेकिन उनके लिए बनने वाले कानूनों के प्रावधानों में लिखे शब्दों के भीतर छिपे सच को जानने के लिए संसद ने चंद मिनट भी खर्च नहीं किए। ऐसे में यह क्यों ना कहा जाए कि हिंदुत्व और कॉर्पोरेट के दम पर चल रही सरकार ने इन कानूनों के अंदर ऐसी तिकड़म जरूर लगाई होगी जिससे जनकल्याण कम अमीर कल्याण ज्यादा होता होगा।

अब जनरल इंश्योरेंस बिल का मामला ही देखिए। जिस पर मीडिया में खबर छपी है कि विपक्ष ने बहस की मांग की तो मामला तूल पकड़ते हुए इतना दूर चला गया कि मारपीट में बदल गया। जैसा कि जनरल इंश्योरेंस बिल का नाम ही बता रहा है कि इस बिल के प्रावधानों से उन करोड़ों बीमा धारकों से जुड़ाव है जो अपनी मेहनत की गाढ़ी कमाई से बूंद-बूंद करके जीवन भर बीमा भरते हैं।

जनरल इंश्योरेंस बिल के मुताबिक जनरल इंश्योरेंस कंपनी के मालिकाना हक में सरकार की हिस्सेदारी 51% से कम होने जा रही थी। यानी इस बिल के मुताबिक संसद में प्रस्ताव रखा जा रहा था कि जनरल इंश्योरेंस कंपनी की मालिक सरकार के अलावा प्राइवेट कंपनी भी हो सकती है। अब जरा विचार कर देखिए कि करोड़ों लोगों के जीवन से जुड़े इस तरह के कानून को अगर आनन-फानन में पास  किए जाएंगे तो इसे क्या समझा जाएगा? क्या यहां पर सत्ता और विपक्ष की जिम्मेदारी नहीं बनती है कि वह ऐसे बिलों की बारीक नजर से छानबीन करें?

मीडिया रिपोर्ट बता रही है कि 11 अगस्त के शाम में राज्यसभा में विपक्ष अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए सरकार से इस बिल को सेलेक्ट कमेटी में भेजने की अपील कर रहा था। उसी के बाद हंगामा शुरू हुआ। जिसे लेकर प्राइवेट न्यूज़ एजेंसी एएनआई ने शाम को एक छोटा सा वीडियो जारी किया। इसे लेकर कई तरह के सवाल हैं कि संसदीय विशेषाधिकार के तहत बिना संसद की अनुमति से संसद के भीतर के कार्रवाई के वीडियो किसी को भी नहीं मिलते तो एएनआई को कैसे मिल गए? अगर प्राइवेट न्यूज़ एजेंसी एएनआई को वीडियो मिला तो ऐसा वीडियो क्यों मिला जिसमें किसी एक पक्ष को बदनाम करने के लिहाज से सामग्री है? पूरा वीडियो क्यों नहीं जारी किया गया? इस तरह के सवालों का इशारा क्या कहता है? 

संसद में हुई मारपीट को लेकर दोष किसका था और किसका नहीं था। आरोप-प्रत्यारोप की भाषा में यह कभी पता चले या ना चले।

इस पूरे मामले पर अपनी राय दर्ज करते हुए पार्लियामेंट्री लेजिसलेटिव रिसर्च के अध्यक्ष एम आर माधवन लिखते हैं कि संसद अपने कामकाज में पूरी तरह से अप्रभावी रहा है। विधायिका को कार्यपालिका इसलिए अलग रखा गया था कि जब विधायिका कानून बनाएगी तो कार्यपालिका पर अंकुश लगाएगी। प्रस्तावित बिलों पर बिना चर्चा बातचीत और छानबीन के तो यह बिल्कुल संभव नहीं कि संसद की सार्थकता बनी रहे। अगले साल संसद अपनी 70 वीं सालगिरह मनाएगा। यहां भी योजना है कि संसद अपनी बड़ी बिल्डिंग में पहुंच जाएं। ऐसे मौके को उत्सव की तरह मनाने के तौर पर खूब भाषण होंगे। लेकिन उन भाषणों के सभी शब्द सांसदों के कृत्य की वजह से खोखले साबित होंगे।

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