NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
2013 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए "लघु अल्पसंख्यक" टैग को चुनौती दी गई है
धारा 377 समलैंगिकता को कलंक माने जाने को वैध और क्वियर व्यक्तियों के लिए अपने अधिकारों और स्वतंत्रताओं का प्रयोग करना मुश्किल बनाती है और उन्हें भारत के अन्य नागरिकों द्वारा प्राप्त अधिकारों और स्वतंत्रता के दायरे से बाहर कर देती है।
योगेश एस.
13 Jul 2018
Translated by मुकुंद झा
artical 377

भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 377 की संवैधानिकता पर सवाल उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील अशोक एच देसाई ने तर्क दिया, "लॉर्डशिप, आपके सामने आया यह पूरा मामला एक इंसानी प्रवृत्ति का हैI" 11 जुलाई 2018 को, अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) तुषार मेहता, अदालत में केंद्र सरकार का प्रतिनिधित्व किया  और धारा 377 पर अपना रुख स्पष्ट करते हुए घोषणा की केंद्र सरकार अदालत के फैसले का विरोध नहीं करेगी। केंद्र सरकार ने अदालत को हलफनामा सौंप दिया और कहा कि वह धारा 377 की संवैधानिकता के संबंध में निर्णय नहीं लेगा और अदालत से इसकी सुनवाई से ही इसकी संवैधानिकता को निश्चित  करने का आग्रह किया।

इसे भी पढ़े: Ray of Hope in the Legal Battle of the Queer Movement in India

अदालत में प्रस्तुत एक अनुवांशिक याचिका में सुरेश कुमार कौशल बनाम नाज़ फाउंडेशन के मामले में अदालत के फैसले को चुनौती दी। इस फैसले में अदालत ने नाज़ फाउंडेशन बनाम एनसीटी, दिल्ली सरकार के मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले को खारिज कर दिया था और धारा 377 की संवैधानिकता को बरकरार रखा था। अपने पहले के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने यौन अल्पसंख्यकों को संबोधित करते हुए "लघु अल्पसंख्यक" कहा थाI पांच साल बाद, 14 अगस्त, 2018 को, न्यायमूर्ति के.एस. पुट्टस्वामी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के मामले में उसी अदालत ने गोपनीयता को मूलभूत अधिकार के रूप में कायम रखा। यह निर्णय, गोपनीयता को मौलिक अधिकार बनाते हुए, क्वियर के लिए एक वर्ग बनाया गया ताकि वह सर्वोच्च न्यायालय के तर्क को कानूनी रूप से इस सवाल को कायम रख सके क्योंकि यह "लघु अल्पसंख्यक" को प्रभावित करता है।

इसे भी पढ़े : Section 377 IPC Could Potentially be Struck Down if Not Read Down

वकील श्याम दिवान ने शायरा बानो बनाम भारतीय संघ और अन्य मामलों के मामले में अदालत के फैसले का हवाला दिया,  इस फैसले को ट्रिपल तालाक मामले के नाम से जाना जाता है। फैसले के अनुच्छेद 62 में "कानून के  समक्ष समानता" और "कानून की समान सुरक्षा" पर चर्चा की गई। दिवान ने तर्क दिया कि समलैंगिक व्यक्तियों के लिए राज्य के हिस्से पर सकारात्मक कार्यवाही आवश्यक है यानी कि कानून द्वारा प्राप्त सुरक्षा और इसलिए "सुप्रीम कोर्ट समलैंगिकता को दोबारा अपराध नहीं बनाना चाहिए।"

अधिकारों के उल्लंघन और समलैंगिक व्यक्तियों की आज़ादी को रोकता है  कठोर  आईपीसी धारा 377, इसी पर वकील, अशोक एच देसाई, सीयू सिंह,श्याम दिवान, मनोज जॉर्ज, मेनका गुरुस्वामी और कृष्णन वेणुगोपाल ने 12 जुलाई  के सुनवाई में बेंच के सामने अपने तर्क प्रस्तुत किए।

समाजिक  व्यवस्था समलैंगिक के लिए और कानून

क्वियर व्यक्तियों को रोज़ सामाजिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ता है। चूंकि याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व करने वाले समर्थकों ने 12 जुलाई को अदालत में तर्क दिया, धारा 377 यह उनके लिए जीवन को और अधिक कठिन बनाता है। यह धारा इस कलंक को वैध बनाने वाला अनुभाग क्वियर व्यक्तियों के अधिकारों का प्रयोग करना मुश्किल बनाता है और उन्हें भारत के अन्य नागरिकों द्वारा अधिकारों और आज़ादी के दायरे से बाहर कर देता है। इसे पहचानते हुए, न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा ​​ने टिप्पणी की कि, "इस समुदाय को उनके खिलाफ पूर्वाग्रहों के कारण चिकित्सा सहायता के लिए बाध्य होना पड़ता है"। उन्होंने यह भी ध्यान दिया कि, "परिवार और सामाजिक दबावों के कारण उन्हें विपरीत लिंग व्यक्तियों से शादी करने के लिए मजबूर होना पड़ता है" और इस तरह के "दर्दनाक अस्तित्व" को धारा 377 द्वारा बनाए रखा जाता है।

इसे भी पढ़े : Revisiting the Battles Around Section 377 of the Indian Penal Code

कौशल के फैसले में धारा 377 के प्रभाव को कमज़ोर कर दिया गया था। देसाई ने तर्क दिया कि धारा 377 ने "पूर्ण अराजकता पैदा की है"  और इस धारा में कुछ दृढ़ विश्वास है इस आधार पर नहीं हो सकता हैं जिस पर न्यायालय ऐसे कानून का समर्थन करे। जैसा कि कृष्णन वेणुगोपाल ने 12 जुलाई को अदालत में तर्क दिया था, इस अनुभाग का प्रयोग "एलजीबीटी व्यक्तियों को परेशान करने के लिए किया जाता है, जो कलंक और सामाजिक धारणाओं के कारण बताते नहीं हैं।" वेणुगोपाल ने आगे तर्क दिया कि अनुभाग वैकल्पिक यौन उत्पीड़न को दबाने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और एसोसिएशन (अनुच्छेद 19) का उल्लंघन करने के लिए मजबूर करता है। न्यायमूर्ति पुट्टस्वामी, हदिया और लॉरेंस बनाम टेक्सास के पहले मामलों में अदालत के फैसलों का जिक्र करते हुए दिवान ने तर्क दिया कि धारा 19 का उल्लंघन करती है। पैनल के पांच न्यायाधीशों में से एक न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम की धारा 21(ए) को भी संदर्भित किया , और तर्क दिया कि यह यौन अभिविन्यास के आधार पर भेदभाव को प्रतिबंधित करता है।

ये धारा, जिसे लॉर्ड मैकॉले द्वारा 1860 में आईपीसी में पेश किया गया था, विक्टोरियन नैतिकता पर आधारित है और कानूनी रूप से देश में क्वियर व्यक्तियों को तब से कमजोर और बेबस बना दिया है। वरिष्ठ वकील सी यू सिंह ने तर्क दिया कि , "160 से अधिक वर्षों से उन्हें  अपराधीकरण का सामना करना पड़ रहा है, यह इसे रोकने के लिए एक बड़ा कदम है। लेकिन जब भी ऐतिहासिक रूप से मज़बूत वाले भेदभाव होते हैं, तो राज्य ने उन्हें खत्म करने के लिए सकारात्मक कार्यवाही का सहारा लिया है।"

इसे भी पढ़े : Supreme Court Issues Notice to the Government On Section 377

पीठ ने अगले हफ्ते मंगलवार को दूसरे पक्ष को सुनेगा। 12 जुलाई को अदालत में दिए गए तर्क धारा 377 की असंवैधानिकता के परिप्रेक्ष्यको प्रस्तुत करते हैं। न्यायमूर्ति चंद्रचुड ने सुनवाई के पहले दिन नोट किया था कि, "धारा 377 लोगों की एक वर्ग को अपराधी बनाता है; कहने के लिए कि यह एक अधिनियम अपराधी के लिए है परन्तु लोगों की एक वर्ग के लिए सही नहीं है।"
अब तक सुनवाई ने "लोगों के एक वर्ग" को केंद्र बिंदु बनाया है, जहाँ सवाल वास्तव में संवैधानिक रूप से सुनिश्चित अधिकारों और "लोगों की एक वर्ग" के लिए आज़ादी के उल्लंघन के बारे में है और एक वर्ग के लोगों के लिए रोज़ के जीवन को प्रभावित करती है|

Article 377
LGBTQ Community
LGBTQ
Supreme Court

Related Stories

ज्ञानवापी मस्जिद के ख़िलाफ़ दाख़िल सभी याचिकाएं एक दूसरे की कॉपी-पेस्ट!

आर्य समाज द्वारा जारी विवाह प्रमाणपत्र क़ानूनी मान्य नहीं: सुप्रीम कोर्ट

समलैंगिक साथ रहने के लिए 'आज़ाद’, केरल हाई कोर्ट का फैसला एक मिसाल

मायके और ससुराल दोनों घरों में महिलाओं को रहने का पूरा अधिकार

जब "आतंक" पर क्लीनचिट, तो उमर खालिद जेल में क्यों ?

विचार: सांप्रदायिकता से संघर्ष को स्थगित रखना घातक

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक आदेश : सेक्स वर्कर्स भी सम्मान की हकदार, सेक्स वर्क भी एक पेशा

तेलंगाना एनकाउंटर की गुत्थी तो सुलझ गई लेकिन अब दोषियों पर कार्रवाई कब होगी?

मलियाना कांडः 72 मौतें, क्रूर व्यवस्था से न्याय की आस हारते 35 साल

क्या ज्ञानवापी के बाद ख़त्म हो जाएगा मंदिर-मस्जिद का विवाद?


बाकी खबरें

  • Inflation
    सौम्या शिवकुमार
    महंगाई "वास्तविक" है और इसका समाधान भी वास्तविक होना चाहिए
    01 Mar 2022
    केंद्रीय बैंकों द्वारा महंगाई को काबू करने के लिए ब्याज दर को प्रबंधित किया जाता है, लेकिन यह तरीक़ा अप्रभावी साबित हुआ है। इतना ही नहीं, इस उपकरण का जब इस्तेमाल किया जाता है, तब यह भी ध्यान नहीं रखा…
  • russia ukrain
    एपी/भाषा
    यूक्रेन-रूस घटनाक्रम: रूस को अलग-थलग करने की रणनीति, युद्ध अपराधों पर जांच करेगा आईसीसी
    01 Mar 2022
    अमेरिका ने जासूसी के आरोप में 12 रूसी राजनयिकों को निष्कासित करने की घोषणा की है। रूस की कई समाचार वेबसाइट हैक हो गईं हैं जिनमें से कुछ पर रूस ने खुद रोक लगाई है। तो वहीं संयुक्त राष्ट्र के दुलर्भ…
  •  Atal Progress Way
    बादल सरोज
    अटल प्रोग्रेस वे से कई किसान होंगे विस्थापित, चम्बल घाटी का भी बदल जाएगा भूगोल : किसान सभा
    01 Mar 2022
    "सरकार अपनी इस योजना और उसके असर को छुपाने की कोशिश में है। ना तो प्रभावित होने वाले किसानों को, ना ही उजड़ने और विस्थापित होने वाले परिवारों को विधिवत व्यक्तिगत नोटिस दिए गए हैं। पुनर्वास की कोई…
  • covid
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना अपडेट: देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर एक लाख से कम हुई 
    01 Mar 2022
    पिछले 24 घंटों में देश में कोरोना के क़रीब 7 हज़ार नए मामले सामने आए हैं। देश में अब एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 92 हज़ार 472 हो गयी है।
  • Imperialism
    प्रभात पटनायक
    साम्राज्यवाद अब भी ज़िंदा है
    01 Mar 2022
    साम्राज्यवादी संबंध व्यवस्था का सार विश्व संसाधनों पर महानगरीय या विकसित ताकतों द्वारा नियंत्रण में निहित है और इसमें भूमि उपयोग पर नियंत्रण भी शामिल है। 
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License