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कहीं लोन मेला के नाम पर अमीरों की क़र्ज़माफ़ी तो नहीं की जायेगी ?
लोन का खेल समझ लेंगे तो आपको दिखेगा कि भाजपा सरकार सच नहीं बोल रही। आइये लोन का खेल समझते हैं? क्यों लोन के मामलें में बैंकों के पास तिकड़म भिड़ाने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है?
अजय कुमार
20 May 2020
mn

कोरोना की वजह से भारत की चलती हुई गाड़ी पर ऐसा ब्रेक लगा है कि इसके परखच्चे उड़ते हुए दिख रहे हैं। फाइनेंसियल रेटिंग एजेंसी गोल्डमैन ने कहा कि भारत में इस साल अभूतपूर्व मंदी आएगी। FY21 में जीडीपी बढ़ोतरी दर जैसी कोई बात नहीं होगी। बढ़ोतरी दर -5 फीसदी हो सकती हैं। सरकार में शामिल लोग इसे सबसे अधिक समझते हैं। भारत के प्रधानमंत्री के पास इसकी सबसे अधिक खबर है कि भारत किस हालत से गुजर रहा है।

ऐसे में होना क्या चाहिए? चाहे कोई भी तर्क दें, मदद करने से जुड़ें विषयों पर सोचा जाएगा तो सबसे पहले उन विषयों पर सोचा जाएगा, जो सीधे तौर पर कोरोना से प्रभावित हो रहे हैं। और सबसे पहले इन्हीं लोगों को कोरोना से पड़ने वाले पहाड़ से जैसी परेशनियों से दूर रखने की कोशिश की जाएगी। लेकिन 20 लाख करोड़ रुपये की आर्थिक मदद के एलान से क्या ऐसा हुआ ? तकरीबन सभी जानकारों का कहना है कि ऐसा नहीं हुआ।

जानकार ऐसा क्यों कह रहे हैं इसे ऐसे समझिये। लागतार पांच दिन के तकरीबन 7 घंटे की प्रेस कॉन्फ्रेंस में सरकार की तरफ से 20 लाख 97 हजार 53 रुपये के मदद का एलान किया गया। इसमें से सरकार की जेब से खर्च होने वाला पैसा सिर्फ 1 लाख 78 हजार 800 रुपये है। यानी कोरोना जैसे संकट से लड़ने के लिए भारत की जीडीपी का 1 फीसदी से भी कम। यानी यह साफ़ तौर पर कहा जा सकता है कि कहने के लिए 20 लाख करोड़ तो कह दिया लेकिन दिया कुछ भी नहीं।

अब आप पूछेंगे कि बाकी पैसा कहाँ गया तो आप ही में से कोई जवाब देगा कि बाकी पैसा लोन यानी कर्ज के तौर पर रखा गया है। फिर आप में ही से सवाल भी उठना चाहिए कि कर्ज से जुड़े सहयोग को आर्थिक मदद कैसे कहा जा सकता है। यह बहुत ही जायज सवाल है। सरकार के नुमाइंदे इसका जवाब देते हैं कि इस समय जो कारोबार चलता आ रहा है, उसे बचाना जरूरी है। यह बच पाएं तभी आगे बढ़ जा सकता है। इसलिए उन्हें कर्ज दिया जा रहा है। यह तर्क भी सुनने में जायज लगेगा लेकिन इसमें नाजायज बात यह है कि इसमें केवल वही व्यापारी आते हैं जिनकी कुल सम्पति करोड़ों से ऊपर की होती है। और असलियत यह है कि भारत की तकरीबन 90 फीसदी से अधिक जनता ऐसी है, जिनका करोड़ रुपये की कमाई से कोई लेना देना नहीं। यानी जैसे ही कर्ज के आधार पर सहयोग की बात आती है तो इस जाल से तकरीबन 90 फीसदी जनता सीधे तौर पर बाहर चली जाती है।

बैंकों के लोन का तकरीबन 25 फीसदी हिस्सा पर्सनल लोन के तौर पर जाता है। कोरोना के इस समय में जहां नौकरियां जा रही है। सैलरी बढ़ने का दूर-दूर तक आसार नहीं है। ऐसे में कोई कार या घर खरीदने के लिए लोन क्यों लेगा? बाकी बचा बैंकों का 75 फीसदी हिस्सा यह बिजनेस लोन के तौर पर चला जाता है। यानी बैंकों के लोन का बहुत बड़ा हिस्सा बिजनेस लोन के तौर पर जाता है। किताबों में और अर्थशास्त्र की किताबों में लिखा होता है कि बैंकों में पैसा होने पर ही बिजनेस को लोन मिलता है और जब लोन मिलता है तभी कारोबारी अपने कारोबार को आगे बढ़ाने के लिए सोचता है।

आसान भाषा में समझिये तो यह कि कारोबार करने के लिए पूंजी की जरुरत होती है। पूंजी अपने कारोबार के मुनाफे से भी मिलती है और अधिक पूंजी की जरूरत होती है तो इसे बैंकों से भी लेने की सुविधा होती है। यह तो रही इकोनॉमिक्स के टेक्स्ट बुक की बात। व्यवहारिक बात इससे बिलकुल अलग होती है। आर्थिक मामलों के जानकार वरिष्ठ पत्रकार ऑनिन्द्यो चक्रवर्ती इसे बड़ी आसानी से समझाते हुए कहते हैं कि व्यवहारिक बात यह है कि लोन लेने का हमारे देश में पूरा एक ढाँचा बना हुआ है। जो इसमें फिट होता है, उन्हें ही लोन मिल पाता है। हर सेक्टर में पहले से ही कुछ कंपनियों की हुकूमत चल रही है। इनका नेताओं से कनेक्शन होता है। ये नेताओं की ‘सेवा’ करते हैं, बदले में नेता इन्हें कॉन्ट्रेक्ट दिलवाते हैं और कॉन्ट्रक्ट के दम पर इन्हें बैंकों से पैसा मिल जाता है। इलेक्टोरल बांड से लेकर चुनावों में होने वाले खर्चे का जुगाड़ यहीं से होता है। यह रही प्रोजेक्ट फाइनेंसिंग की बात।

इसमें आगे चलें तो पता चलता है कि बैंक कहता है कि 20 फीसदी आप अपना पैसा लगाइये, बाकी 80 फीसदी पैसा बैंक से मिल जाएग। कारोबारी यह भी नहीं करते। बढ़ा-चढ़ाकर प्रोजेक्ट की रिपोर्ट बैंक को सौंपते हैं और बैंक से पूरा पैसा ले लेते हैं। यानी कारोबारी का एक भी पैसा नहीं लगता है। अगर कम्पनी डूबी तो बैंकों को वही मिल पाता है, जो कम्पनी ने कोलेटरल के तौर पर बैंकों के पास रखा है। लेकिन अब तो सरकार ने इस कोलेटरल को भी खत्म कर दिया है। गारंटी सरकार ने खुद ले ली है। यानी अगर कम्पनी डूबी तो बैंकों को एक पैसा नहीं मिलेगा।

लेकिन बैंक यहां पर एक तिकड़म भी लगा सकता है। हो सकता है कि बहुत सारे बैंक इस तिकड़म का इस्तेमाल करें। चूँकि सरकार लोन की गारंटी दे रही है तो बैंकों को यह पता है कि अगर कारोबारी पैसा नहीं देंगे तो सरकार पैसा दे देगी। इसलिए बैंक से लोन लेने के लिए कहेंगे, जिन्होंने पहले से बैंकों का लोन लिया है, जिनका लोन एनपीए बन चुका है। इन्हें लोन देकर बैंक कहेगा कि ये पहले का अपना लोन दे दे। इस तरह से बैंकों को ख़स्ताहाल स्थिति अकॉउंट के जरिये सही दिखने लगेगी।

लेकिन क्या इसका प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसका प्रभाव पड़ेगा क्योंकि सरकार तो अंततः जनता से ही पैसा लेगी। टैक्स बढ़ाएगी, गुड्स एंड सर्विस टैक्स के दर बढ़ाएगी। महंगाई बढ़ेगी जिसे सब सहन कर लेंगे और आवाज कहीं से नहीं उठेगी। कहने का मतलब यह है कि कर्ज के मदद में सरकार का खुद खर्च एक रुपया का नहीं है। फायदा केवल अमीरों का है और बोझ सहन सबको करना है।

बैंक तिकड़मों का ही इस्तेमाल क्यों करेंगे? इसे आंकड़ों के जरिये समझते हैं। बैंक कर्ज की मांग 27 साल के न्यूनतम स्तर पर है। रिजर्व बैंक के पैकेजों का एक-तिहाई इस्तेमाल भी नहीं हुआ। नतीजतन बैंकों ने (4 मई तक) करीब 8.54 लाख करोड़ रुपये रिजर्व बैंक को लौटा (रिवर्स रेपो) दिए हैं और अब रि‍जर्व बैंक को उलटा बैंकों को ब्याज देना होगा। राहत पैकेज से पहले तक बैंक कर्ज वसूली टालने और नए बकाया कर्ज से निबटने में लगे थे, लाभांश भुगतान बंद कर रहे थे। कोरोना से पहले ही बैंकों और कंपनियों की सबसे बड़ी मुसीबत करीब 9.9 लाख करोड़ के फंसे हुए कर्ज हैं। कोरोना के दौरान जो स्थिति बनी है, उससे मांग भी न्यूनतम स्तर पर पहुँच चुकी है।

ऐसे में सरकार की गारंटी पर बैंकों द्वारा दिया जाने वाला लाखों करोड़ के कर्ज का इस्तेमाल कौन करेगा? कोई नहीं। ऐसे में आर्थिक मदद के नाम पर भाजपा सरकार ने लोन का खेल खेला है। सबके सामने लागातर पांच दिनों तक तक झूठ बोला है। जनता के आँखों में आँख डालकर बोला है।

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