NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
SC ST OBC
भारत
राजनीति
जेलों में बंद कैदियों में से 66% कैदी एससी/एसटी और ओबीसी हैं: सरकारी आंकड़े
कैदी जेलों में नारकीय ज़िंदगी जीने को मज़बूर हैं। आजादी के बाद जेल सुधार के लिए कई समितियां बनीं, लेकिन इन सारी समितियों के सुझावों को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।
न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
11 Feb 2021
जेलों में बंद कैदियों में से 66% कैदी एससी/एसटी और ओबीसी हैं: सरकारी आंकड़े
प्रतीकात्मक तस्वीर

दिल्ली:  सरकार ने बुधवार को बताया कि देश की जेलों में बंद 4,78,600 कैदियों में से 3,15,409 (कुल 65.90 फीसदी) कैदी अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग श्रेणियों के हैं। जबकि एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक देश में कैदियों की संख्या लगातर बढ़ रही है, जबकि जेलों की संख्या कम हुई है। कैदी जेलों में नारकीय ज़िंदगी जीने को मज़बूर हैं।  

गृह राज्य मंत्री जी किशन रेड्डी ने राज्यसभा को एक प्रश्न के लिखित उत्तर में यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि ये आंकड़े राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा, 31 दिसंबर 2019 तक अद्यतन किए गए आंकड़ों के संकलन पर आधारित हैं।

उन्होंने बताया कि देश की जेलों में बंद 4,78,600 कैदियों में से 3,15,409 कैदी अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग श्रेणियों के हैं। शेष 1,26,393 कैदी अन्य समूहों से हैं।

रेड्डी ने बताया कि आंकड़ों के अनुसार, 1,62,800 कैदी (34.01 फीसदी) अन्य पिछड़ा वर्ग के हैं, जबकि 99,273 कैदी (20.74 फीसदी) अनुसूचित जाति से और 53,336 कैदी (11.14 फीसदी) अनुसूचित जनजाति से हैं।

उन्होंने बताया कि कुल 4,78,600 कैदियों में से 4,58,687 कैदी (95.83 फीसदी) पुरुष और 19,913 कैदी (4.16 फीसदी) महिलाएं हैं।

जेलों में अमानवीय स्थिति में कैदी

इंडिया जस्टिस रिपोर्ट 2020 के अध्ययन में काई आँकड़ें सामने आएँ हैं। बता दें कि हाल ही में टाटा ट्रस्ट ने कुछ अन्य संस्थानों के सहयोग से तैयार इंडिया जस्टिस रिपोर्ट-2020 को  सार्वजानिक किया है।  
रिपोर्ट के अनुसार  जेलों  में क्षमता से अधिक कैदी हैं।  2016 में जेल ऑक्युपेंसी रेट 114% थी जो 2019 में बढ़कर 119% हो गई। 2016 में देश में 4 लाख 33 हजार 3 कैदी थे, जबकि 2019 में ये संख्या बढ़कर 478600 हो गई. हालांकि इस दौरान देश में जेलों की संख्या कम हुई। 2016 में देश में 1412 जेलें थीं जो अब कम होकर 1350 रह गई हैं।  इससे जेलों में भीड़ और बढ़ गई है।

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट में 2013 में एक पीआईएल दाखिल कर कहा गया था कि देश भर के जेलों में बंद कैदियों की स्थिति अमानवीय हो गई है। लिहाजा जेल सुधार के लिए निर्देश जारी किया जाना चाहिए। दिक्कत यह है कि जेल सुधारों के प्रति प्रशासन का रवैया बेहद ढीला-ढाला रहा है।

आजादी के बाद जेल सुधार के लिए कई समितियां बनीं जैसे वर्ष 1983 में मुल्ला समिति, 1986 में कपूर समिति और 1987 में अय्यर समिति लेकिन इन सारी समितियों के सुझावों को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सितंबर 2018 में जस्टिस अमिताव रॉय की अध्यक्षता में दोषियों के जेल से छूटने और पैरोल के मुद्दों पर उनके लिये कानूनी सलाह की उपलब्धता में कमी एवं जेलों की विभिन्न समस्याओं की जाँच करने के लिये एक समिति का गठन किया गया था।

इस साल फरवरी में इस समिति ने अपनी रिपोर्ट भी सौंप दी है। द हिंदू के मुताबिक समिति ने कुछ सुझाव दिए हैं। इसके अनुसार, प्रत्येक नए कैदी को जेल में उसके पहले सप्ताह के दौरान दिन में एक बार अपने परिवार के सदस्यों से फोन पर बात करने की अनुमति दी जानी चाहिए।

चूँकि जेलों में विचाराधीन कैदियों का अनुपात दोषियों के अनुपात से अधिक है इसलिए समिति ने इस संदर्भ में सुझाव दिया है कि प्रत्येक 30 कैदियों के लिए कम-से-कम एक वकील होना चाहिए।

साथ ही त्वरित मुकदमा जेलों में अप्रत्याशित भीड़ को कम करने का एक महत्त्वपूर्ण उपाय है। जेल विभाग में पिछले कुछ वर्षों से 30% से 40% रिक्तियाँ लगातार बनी हुई हैं, इस दिशा में भी आवश्यक कदम उठाए जाने चाहिए।

हालांकि इस समिति के सुझावों पर अमल कब होगा यह पता नहीं है। चूंकि कैदी मतदान के अधिकार का प्रयोग नहीं कर सकते हैं इसलिए अक्सर वे राजनीतिक दलों के मुद्दों से बाहर रहते हैं। यही वजह है कि आज जेलों का बुरा हाल होता जा रहा है।

उनमें कैदी नारकीय जीवन जी रहे हैं। आए दिन विभिन्न जेलों से कैदियों के संदिग्ध स्थिति में मरने, उनके हंगामा मचाने और भागने की खबरें आती रहती हैं।

(समाचार एजेंसी भाषा इनपुट के साथ)

Indian Prisons
SC/ST/OBC
minorities

Related Stories

बच्चों को कौन बता रहा है दलित और सवर्ण में अंतर?

महाराष्ट्र सरकार का एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम को लेकर नया प्रस्ताव : असमंजस में ज़मीनी कार्यकर्ता

यूपी चुनाव में दलित-पिछड़ों की ‘घर वापसी’, क्या भाजपा को देगी झटका?

मेरठ: चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के भर्ती विज्ञापन में आरक्षण का नहीं कोई ज़िक्र, राज्यपाल ने किया जवाब तलब

मध्यप्रदेश ओबीसी सीट मामला: सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला अप्रत्याशित; पुनर्विचार की मांग करेगी माकपा

महामारी और अनदेखी से सफ़ाई कर्मचारियों पर दोहरी मार

यूपी: भर्ती और नियुक्ति घोटाले के बीच योगी सरकार पर लगातार उठते सवाल!

हक़ीक़त तो यही है कि सरकारी कंपनियां प्राइवेट में तब्दील होने पर आरक्षण नहीं देतीं

जाति-वटवृक्ष के पत्ते नहीं, जड़ें काटने की ज़रूरत!

सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों पर बार बार उठते सवाल


बाकी खबरें

  • bihar
    अनिल अंशुमन
    बिहार शेल्टर होम कांड-2’: मामले को रफ़ा-दफ़ा करता प्रशासन, हाईकोर्ट ने लिया स्वतः संज्ञान
    05 Feb 2022
    गत 1 फ़रवरी को सोशल मीडिया में वायरल हुए एक वीडियो ने बिहार की राजनीति में खलबली मचाई हुई है, इस वीडियो पर हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान ले लिया है। इस वीडियो में एक पीड़िता शेल्टर होम में होने वाली…
  • up elections
    रवि शंकर दुबे
    सत्ता में आते ही पाक साफ हो गए सीएम और डिप्टी सीएम, राजनीतिक दलों में ‘धन कुबेरों’ का बोलबाला
    05 Feb 2022
    राजनीतिक दल और नेता अपने वादे के मुताबिक भले ही जनता की गरीबी खत्म न कर सके हों लेकिन अपनी जेबें खूब भरी हैं, इसके अलावा किसानों के मुकदमे हटे हो न हटे हों लेकिन अपना रिकॉर्ड पूरी तरह से साफ कर लिया…
  • beijing
    चार्ल्स जू
    2022 बीजिंग शीतकालीन ओलंपिक के ‘राजनयिक बहिष्कार’ के पीछे का पाखंड
    05 Feb 2022
    राजनीति को खेलों से ऊपर रखने के लिए वो कौन सा मानवाधिकार का मुद्दा है जो काफ़ी अहम है? दशकों से अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगियों ने अपनी सुविधा के मुताबिक इसका उत्तर तय किया है।
  • karnataka
    सोनिया यादव
    कर्नाटक: हिजाब पहना तो नहीं मिलेगी शिक्षा, कितना सही कितना गलत?
    05 Feb 2022
    हमारे देश में शिक्षा एक मौलिक अधिकार है, फिर भी लड़कियां बड़ी मेहनत और मुश्किलों से शिक्षा की दहलीज़ तक पहुंचती हैं। ऐसे में पहनावे के चलते लड़कियों को शिक्षा से दूर रखना बिल्कुल भी जायज नहीं है।
  • Hindutva
    सुभाष गाताडे
    एक काल्पनिक अतीत के लिए हिंदुत्व की अंतहीन खोज
    05 Feb 2022
    केंद्र सरकार आरएसएस के संस्थापक केबी हेडगेवार को समर्पित करने के लिए  सत्याग्रह पर एक संग्रहालय की योजना बना रही है। इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश करने के उसके ऐसे प्रयासों का देश के लोगों को विरोध…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License