NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
मज़दूर-किसान
भारत
राजनीति
85 प्रतिशत घरेलू कामगारों को लॉकडाउन में नहीं मिला वेतन - सर्वे
डोमेस्टिक वर्कर्स सेक्टर स्किल काउंसिल (DWSSC) के सर्वेक्षण में यह भी कहा गया है कि उन्हें भेदभाव और ज़लालत का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि उनके मालिकों को संदेह है कि वे लोग वायरस के कैरियर हैं।
न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
04 Jun 2020
Translated by महेश कुमार
migrant worker

कोविड-19 महामारी को थामने के लिए की गई देशव्यापी तालाबंदी की घोषणा ने खास तौर शहरों में अनौपचारिक श्रमिकों की दयनीय हालत का पर्दाफाश कर दिया है। घरेलू कामगारों की हालत – जिनमें अधिकांश महिलाएँ हैं- बहुत खराब और बेहाल हैं।

डोमेस्टिक वर्कर्स सेक्टर स्किल काउंसिल (DWSSC) के एक सर्वेक्षण में कहा गया है कि लगभग 85 प्रतिशत घरेलू कामगारों को लॉकडाउन अवधि के दौरान का वेतन या मजदूरी नहीं मिली है। कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय के तहत काम कर रहे एक गैर-लाभकारी संगठन डीडब्ल्यूएसएससी ने आठ-राज्यों के रेंडम सर्वेक्षण में पाया कि 23.5 प्रतिशत घरेलू श्रमिक अपने मूल स्थान यानि अपने गाँव वापस चले गए हैं।

जबकि, 38 प्रतिशत घरेलू कामगारों ने बताया कि उन्हें भोजन का इंतजाम करने में गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। लॉकडाउन की अवधि में ज़िंदा रहने के लिए लगभग 30 प्रतिशत लोगों के पास फूटी कौड़ी नहीं है। हालांकि, 98.5 प्रतिशत घरेलू कामगार कोविड-19 से बचने के लिए बरती जाने वाली सावधानियों से परिचित हैं। 

यह सर्वेक्षण आठ राज्यों में अप्रैल महीने में किया गया था- जिनमें दिल्ली, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, असम, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड और तमिलनाडु शामिल है। लेकिन, घरेलू कामगार अभी भी संकट में हैं क्योंकि वे काम पर वापस नहीं जा पा रहे हैं और जीवन यापन के लिए जरूरी मजदूरी नहीं कमा पा रहे हैं।

पूरे भारत में, केवल 14 राज्यों ने ही घरेलू श्रमिकों के लिए न्यूनतम मजदूरी को अधिसूचित किया है। “इन राज्यों में, घरेलू मजदूर या कामगार अपनी समस्याओं के निदान के लिए शिकायत दर्ज कर सकते हैं लेकिन राष्ट्रीय राजधानी सहित बाकी राज्यों में, उनके पास ऐसा कोई अधिकार या सहारा नहीं है। इसलिए, इनके लिए क़ानूनों में एकरूपता की आवश्यकता है, उक्त बात, ”दिल्ली घरेलू कामगार संगठन के अध्यक्ष रामेंद्र कुमार ने कही।

रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि कई संपन्न तबकों के भीतर इन घरेलू श्रमिकों को भेदभाव का सामना करना पड़ता है। अमीर लोग, घरेलू कामगारों को ऐसे मानते हैं जैसे कि वे वायरस को अपने साथ लेकर चलते हैं।

स्त्री जागृति समिति की संस्थापक गीता मेनन के अनुसार, जिन्होंने घरेलू कामगार अधिकार यूनियन कर्नाटक बनाने में भी मदद की थी, कई मालिक समझते हैं कि घरेलू कामगार वायरस के वाहक हैं।

हाल ही में, कैंट वाटर प्यूरीफायर ब्रांड ने इंस्टाग्राम पर एक क्लासिस्ट विज्ञापन पोस्ट किया जिसमें कहा गया है कि, “क्या आप अपनी नौकरानी के हाथों को आटा गूंधने की अनुमति देंगे? उसके हाथ संक्रमित हो सकते हैं।” कई मालिक ऐसा ही सोचते हैं और वह विज्ञापन उनकी आवाज़ बनाकर निकाला गया विज्ञापन है, गीता ने कहा।

“80 प्रतिशत से अधिक घरेलू कामगारों को अगले दो महीनों (जून और जुलाई) तक काम पर न आने के लिए कहा गया है क्योंकि उनके मालिक डरते कि वे उनके घर में वायरस ले आएंगे। गीता के अनुसार, जब घरेलू कामगार काम पर आते है तो मालिक लोग खुद को एक कमरे के अंदर बंद कर लेते हैं, जो अपने आप में असंवेदनशील और ज़लालत भरा कदम है,”।

गीता ने कहा कि अप्रैल के महीने में बेंगलुरु में लगभग 50 प्रतिशत घरेलू कामगारों को उनका वेतन नहीं मिला है, जबकि कई को मालिकों ने हमेशा के लिए काम से निकाल दिया है।

जिस तरह से घरेलू कामगारों के साथ मालिक लोग व्यवहार करते हैं, उससे उनके प्रति ज़लालत और घृणा स्पष्ट तौर पर नज़र आती है। एक 30 वर्षीय घरेलू कामगार, प्रेमा बताती हैं कि उसके मालिक ने उसके साथ कैसा व्यवहार किया। “मेरे मालिक ने कहा कि जिस जगह मैं रहती हूं वह साफ-सुथरी जगह नहीं है और इसलिए उन्हे संक्रमित होने का डर हैं। अब, मैंने एक छड़े व्यक्ति के घर पर नौकरी ढूंढ ली है। वे मुझे प्रति माह 1,500 रुपये देने जा रहे हैं। इससे पहले, मैं दोगुना कमाती थी और मेरी शुरुआती सैलरी 3,500 रुपये प्रति घर थी। मुझे नहीं पता कि मैं और क्या कर सकती हूं।

अस्पृश्यता और छुआ-छूत के इस नए आयाम पर टिप्पणी करते हुए, एक प्रसिद्ध पत्रकार, फ़े डिसूज़ा ने कहा: "मुझे उम्मीद है कि उन्हें इस बात का एहसास होगा कि यह वायरस विदेश से वापस आने वाली ‘मैडम और साहब’ के माध्यम से आया है, जिन्होंने नौकरानियों को यह वायरस दिया है... न कि यह नौकरानियों की वजह से उनमें गया है!"

अंग्रेजी में लिखे मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें

85% Domestic Workers Not Paid During Lockdown, Says Survey

COVID-19
Coronavirus
domestic workers
Informal Workers
Plight of Domestic Workers
untouchability
Domestic Workers Unpaid
Lockdown
Lockdown Impact on Workers
Migrant workers

Related Stories

कर्नाटक: मलूर में दो-तरफा पलायन बन रही है मज़दूरों की बेबसी की वजह

हैदराबाद: कबाड़ गोदाम में आग लगने से बिहार के 11 प्रवासी मज़दूरों की दर्दनाक मौत

यूपी चुनाव: बग़ैर किसी सरकारी मदद के अपने वजूद के लिए लड़तीं कोविड विधवाएं

यूपी: महामारी ने बुनकरों किया तबाह, छिने रोज़गार, सरकार से नहीं मिली कोई मदद! 

यूपी चुनावों को लेकर चूड़ी बनाने वालों में क्यों नहीं है उत्साह!

सड़क पर अस्पताल: बिहार में शुरू हुआ अनोखा जन अभियान, स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए जनता ने किया चक्का जाम

लखनऊ: साढ़ामऊ अस्पताल को बना दिया कोविड अस्पताल, इलाज के लिए भटकते सामान्य मरीज़

किसान आंदोलन@378 : कब, क्या और कैसे… पूरे 13 महीने का ब्योरा

पश्चिम बंगाल में मनरेगा का क्रियान्वयन खराब, केंद्र के रवैये पर भी सामाजिक कार्यकर्ताओं ने उठाए सवाल

मौत के आंकड़े बताते हैं किसान आंदोलन बड़े किसानों का नहीं है - अर्थशास्त्री लखविंदर सिंह


बाकी खबरें

  • rakeh tikait
    लाल बहादुर सिंह
    यूपी चुनाव: किसान-आंदोलन के गढ़ से चली परिवर्तन की पछुआ बयार
    11 Feb 2022
    पहले चरण के मतदान की रपटों से साफ़ है कि साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण वोटिंग पैटर्न का निर्धारक तत्व नहीं रहा, बल्कि किसान-आंदोलन और मोदी-योगी का दमन, कुशासन, बेरोजगारी, महंगाई ही गेम-चेंजर रहे।
  • BJP
    वर्षा सिंह
    उत्तराखंड चुनाव: भाजपा के घोषणा पत्र में लव-लैंड जिहाद का मुद्दा तो कांग्रेस में सत्ता से दूर रहने की टीस
    11 Feb 2022
    “बीजेपी के घोषणा पत्र का मुख्य आकर्षण कथित लव जिहाद और लैंड जिहाद है। इसी पर उन्हें वोटों का ध्रुवीकरण करना है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी घोषणा पत्र पर अपनी प्रतिक्रिया में लव-लैड जिहाद को…
  • LIC
    वी. श्रीधर
    LIC आईपीओ: सोने की मुर्गी कौड़ी के भाव लगाना
    11 Feb 2022
    जैसा कि मोदी सरकार एलआईसी के आईपीओ को लांच करने की तैयारी में लगी है, जो कि भारत में निजीकरण की अब तक की सबसे बड़ी कवायद है। ऐसे में आशंका है कि इस बेशक़ीमती संस्थान की कीमत को इसके वास्तविक मूल्य से…
  • china olampic
    चार्ल्स जू
    कैसे चीन पश्चिम के लिए ओलंपिक दैत्य बना
    11 Feb 2022
    ओलंपिक का इतिहास, चीन और वैश्विक दक्षिण के संघर्ष को बताता है। यह संघर्ष अमेरिका और दूसरे साम्राज्यवादी देशों द्वारा उन्हें और उनके तंत्र को वैक्लपिक तंत्र की मान्यता देने के बारे में था। 
  • Uttarakhand
    मुकुंद झा
    उत्तराखंड चुनाव : जंगली जानवरों से मुश्किल में किसान, सरकार से भारी नाराज़गी
    11 Feb 2022
    पूरे राज्य के किसानों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य, मंडी, बढ़ती खेती लागत के साथ ही पहाड़ों में जंगली जानवरों का प्रकोप और लगातार बंजर होती खेती की ज़मीन जैसे तमाम मुद्दे लिए अहम हैं, जिन्हें इस सरकार ने…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License