NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
मज़दूर-किसान
स्वास्थ्य
भारत
चरमराई कृषि-आपूर्ति श्रृंखला को तत्काल मदद की ज़रुरत
देश में जारी लॉकडाउन के चलते कंबाइन हार्वेस्टर की कमी ने किसानों के लिए कई समस्याएं पैदा कर दी हैं। उधर मांग की धीमी रफ्तार एक गंभीर संकट बन कर सामने आ रही है।
रश्मि सहगल
12 Apr 2020
चरमराई कृषि

हर साल मार्च महीने की शुरुआत में कंबाइन हार्वेस्टर के साथ फोरमैन और श्रमिक पंजाब के खेतों से लेकर मध्य प्रदेश के अंदरुनी इलाकों तक जाते हैं। मार्च महीने के मध्य तक इस प्रदेश में गेहूं की खड़ी फसलों की कटाई करने के लिए ये कंबाइन हार्वेस्टर पहुंच जाते हैं। फिर वे उत्तर प्रदेश, गुजरात और राजस्थान का रुख करते हैं। अप्रैल महीने के मध्य तक पंजाब में वापस आने से पहले वे हर एक जिले में जाते हैं। लेकिन अब वे पंजाब और पड़ोसी राज्य हरियाणा में गेहूं की फसलों के लेिए दिन रात काम कर रहे हैं।

इस साल नोवल कोरोनावायरस के प्रसार को रोकने करने के लिए देश भर में लॉकडाउन कर दिया गया है, लेकिन इसने भारतीय खेतों पर बड़े पैमाने पर संकट पैदा कर दिया है। ये संकट विशेष रूप से भारत के उत्तरी राज्यों में है। 8,000 और 10,000 के बीच हार्वेस्टर और इनके साथ काम करने वाले लोग वहीं फंसे हुए हैं जहां वे लॉकडाउन की घोषणा से पहले रुके हुए थे। ये लोग खास तौर से मध्य प्रदेश और गुजरात में हैं और अन्य राज्यों में रबी की फसल की कटाई के लिए समय पर इन्हें पंजाब लौटने की संभावना अब बहुत कम है। गेहूं, बंगाली चना और सरसों प्रधान फसले हैं जिसकी उत्तरी राज्यों में शुरुआत से लेकर मध्य रबी सीजन में कटाई की जाती है। आमतौर पर, ये फसल मई के मध्य तक तैयार हो जाते है। लॉकडाउन के चलते बड़ी अनिश्चितता बनी हुई है कि क्या गेहूं की कटाई करने वाले ये कंबाइन हार्वेस्टर पंजाब में चार साल पर होने वाली बम्पर फसलों को काटने में सक्षम होंगे या नहीं।

इसके चलते पंजाब और हरियाणा के किसान परेशान हैं और ट्रैक्टर में “मिनी” हार्वेस्टर लगाने का काम कर रहे हैं। ऐसे महत्वपूर्ण समय में खेत में काम करने वाले श्रमिकों की कमी हो गई क्योंकि अचानक लॉकडाउन की घोषणा के बाद बड़ी संख्या में ये श्रमिक अपने अपने गांव लौट चुके हैं। इसने किसानों के संकट को और बढ़ा दिया है। विशेष रूप से तब जब खेतिहर श्रमिकों के वापस लौटने को लेकर अभी कुछ भी स्पष्ट नहीं है।

नभा-आधारित कृषि-निर्माण कंपनी के लिए काम करने वाले सरदार हरजीत सिंह कहते हैं, “हमने इस साल 200 से अधिक कंबाइन हार्वेस्टर मध्य प्रदेश भेजे थे। लेकिन लॉकडाउन को देखते हुए, हम यहां फसल कटाई के काम में मदद के लिए उनमें से एक भी मशीन के समय पर पंजाब लौटने की उम्मीद नहीं है।”

सरदार हरजीत अपनी टीम के फोरमैन और अन्य लोगों से संपर्क किया तो उन्होंने बताया कि ट्रैक्टर और हार्वेस्टर के लिए डीजल की कमी है। रास्ते में पड़ने वाले रिपेयरिंग की दुकानें नहीं खुलते हैं जहां किसान किसी भी तरह की खराबी या दुर्घटना के समय अपने वाहन खड़ी करते हैं।  इसके अलावा, राज्य के अधिकारी राज्य की सीमा पार करने पर प्रत्येक श्रमिक और ड्राइवर के कोरोनोवायरस की जांच कर रहे हैं। सिंह कहते हैं "इन सब के चलते उन्हें लौटने में डर लगता है।"

गत एक दशक में कंबाइन हार्वेस्टर की मांग तेजी से बढ़ी है और यह वास्तविक अर्थशास्त्र (शीयर इकॉनोमिक्स) पर आधारित है। चूकि कोई हार्वेस्टर गेहूं के किसान से प्रति हेक्टेयर 800 रुपये ले सकता है, जबकि खेतिहर श्रमिकों की एक टीम का खर्च 10,000 रुपये तक हो सकता है। लेकिन लॉकडाउन ने इस आर्थिक हिसाब किताब को भी बदल दिया है, क्योंकि भाड़े पर फसल काटने वाले का वर्तमान खर्च दोगुना या इससे ज्यादा हो गया है। ये लगभग प्रति हेक्टेयर 1,600 रुपये के आस-पास हो गया है। इस कीमत पर भी हार्वेस्टर उपलब्ध नहीं है। सिंह ने कहा, "मेरे एक ऑपरेटर ने मुझे 7 अप्रैल को बताया कि उसने जबलपुर जिले में गेहूं की कटाई पूरी कर ली है और अब वह इसके आस-पास के जिलों में काम शुरू करने की योजना बना रहा है।"

इस कमी को सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा इस घोषणा के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है कि आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत कृषि वस्तुओं को छूट दी गई है। लंबे समय तक, कृषि सेवाएं आवश्यक वस्तुओं की सूची से बाहर रहीं, जिसे लॉकडाउन के दौरान भी अबाध्य तरीके से राज्य के भीतर और बाहर भेजने की अनुमति दी गई होती।

गृह मंत्री ने लॉकडाउन के चार दिन बाद इस छूट की घोषणा की। लेकिन तब तक तो नुकसान हो चुका था क्योंकि कृषि उत्पादों की आपूर्ति श्रृंखला (सप्लाई चेन) बाधित हो गई थी। इसे बाधित करना आसान होता है लेकिन चीजों को सामान्य स्थिति में लाना बहुत मुश्किल होता है।

राजनीतिक-सामाजिक संगठन 'स्वराज अभियान' चलाने वाले योगेंद्र यादव ने किसानों को लेकर भविष्यवाणी की है: जब तक सरकार ने छूट की घोषणा की, तब तक थाना प्रभारियों को आदेश दिए जा चुके थे। लगता है चार दिनों के बाद कृषि के लिए इस छूट पर विचार किया गया। वे कहते हैं, "ये उजागर करता है कि सरकार की योजनाओं में कृषि को प्राथमिकता कम है।" उनका कहना है, "इसके अलावा, पहले से ही नकदी की तंगी झेल रहे किसान को कम्बाइन हार्वेस्टर का किराया देने और साथ ही बहुत मुश्किल से उपलब्ध कृषि श्रमिकों को काम पर रखने के लिए के लिए ज्यादा पैसा देना पड़ रहा है।"

पंजाब में भटिंडा के पास किसान होने के साथ साथ हार्वेस्टर ऑपरेटर गगन सिंह वर्तमान में राजस्थान के नीमच में काम कर रहे हैं। वे कहते है, “मैं पंजाब में अपने घर लौटना चाहता हूं लेकिन इसके लिए मुझे कई राज्य की सीमाओं को पार करना होगा। मुझे अन्य ऑपरेटरों ने बताया है कि राज्य के अधिकारी हमारे लिए समस्याएं पैदा कर रहे हैं।”

उत्तर प्रदेश और बिहार के किसान जिन्होंने कटाई करने वाले कंबाइन हार्वेस्टर के लिए ऑर्डर दिया था और इसके लिए अग्रिम भुगतान कर दिया था उन्हें मामूली सरकारी राहत के अलावा अब नई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है जिसने उनके रबी गेहूं को जोखिम में डाल दिया है। कंबाइन हार्वेस्टर की कीमत 22 लाख रुपये का भारी रकम खर्च करने के बावजूद उनके इस खर्च का कोई लाभ नहीं मिल रहा है। अब, राज्य सरकारें लॉकडाउन की मियाद को बढा़ने का दबाव डाल रही हैं, उनमें से कई का मानना है कि गेहूं की कटाई के बाद कंबाइन हार्वेस्टर को ज्यादा लाभ मिलेगा। वे कहते हैं कि तब तक तो बहुत देर हो जाएगी।

मध्य प्रदेश, गुजरात और राजस्थान ने 2 अप्रैल से गेहूं की खरीद प्रक्रिया की घोषणा की है, हालांकि अब यह देखना होगा कि वे सोशल डिस्टेंशिंग का पालन करते हुए सफलतापूर्वक ऐसा कैसे करे लेंगे। पंजाब में खरीद की प्रक्रिया 15 अप्रैल से शुरु होने की संभावना है।

पंजाब के कृषि नीति विशेषज्ञ देविंदर शर्मा कहते हैं, "पंजाब में बीस फीसदी गेहूं की कटाई श्रमिकों द्वारा की जाएगी।" वह जानते हैं कि कंबाइन हार्वेस्टर की "बड़ी संख्या" मध्य प्रदेश में फंसी हुई है। वह कहते हैं कि श्रमिक बड़े खेतों में साल भर रहते हैं। इसलिए उनकी तात्कालिक जरूरतों का ध्यान रखना है, और इसलिए लॉकडाउन के कारण उन्हें अपने गांवों के लिए नहीं जाना पड़े। शर्मा कहते हैं, "लेकिन यह उत्तर प्रदेश और गुजरात में खेतिहर श्रमिकों के मामले में नहीं है।"

आर्थिक सर्वेक्षण 2019-20 के अनुसार, 2019-2020 के लिए रबी की खरीद फरोख्त के मौसम में 341.33 लाख मीट्रिक टन गेहूं की खरीद की गई थी। इस साल कुल गेहूं उत्पादन काफी ज्यादा होने की उम्मीद है। अकेले पंजाब में पिछले साल 181 लाख मीट्रिक टन गेहूं का उत्पादन हुआ।

पंजाब सरकार ने रबी की फसल के लिए अतिरिक्त जगह बनाने के लिए बड़े पैमाने पर कार्यक्रम शुरू किया है और इसने सोशल डिस्टेंसिंग की आवश्यकता पर ध्यान को कहा है। गेहूं के लिए अतिरिक्त स्थान प्रदान करने के लिए 2,050 चावल मिलों से धान को हटा दिया गया है। राज्य के 1,820 संचालित मंडियों का बोझ कम करने के लिए सीमेंटेड कंपाउंड वाले स्कूलों को भी मार्केट यार्ड में बदला जा रहा है।

शर्मा ने बताया, "किसानों को विशेष तारीख वाले कूपन जारी किए जाएंगे, जिससे कि वे उस तारीख को अपनी उपज को मंडी में ला सके।" उन्होंने कहा कि मंडी में आने वाले हर ट्रैक्टर के साथ एक अन्य व्यक्ति को केवल आने की अनुमति होगी।

कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि कृषि कार्यों को बंद करने का सवाल - जैसा कि सरकार ने शुरू में किया था- बेतुका था।

शर्मा कहते हैं, “कोई गाय दूध देती रहेगी। खेतों में टमाटर तैयार होंगे। प्रकृति थमती नहीं है। सरकार को लॉकडाउन से पहले कृषक समाज के लिए उचित व्यवस्था करनी चाहिए थी।”

हरियाणा सरकार ने भी मंडी में भीड़ कम करने के लिए केंद्र सरकार को एक प्रस्ताव भेजा है। यह चौंका देने वाली उत्पादन के आने को लेकर सलाह देती है और अपने उत्पादन को देरी से लाने वाले सहमत हुए उन किसानों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने की सिफारिश करती है। वरिष्ठ नौकरशाहों का कहना है कि यह आसानी से खरीदारी की प्रक्रिया को सुनिश्चित करेगा। तो 20 अप्रैल से 5 मई के बीच अपनी उपज लाने वाले किसानों को प्रति क्विंटल 1,925 रुपये की दी जाएगी वहीं जो किसान 5 मई से 5 जून के बीच अपनी उपज लाते हैं उन्हें 1,975 रुपये और जो किसान जून महीने में अपनी उपज लाते हैं उन्हें 2,050 रुपये प्रति क्विंटल दी जाएगी।

लेकिन विशेषज्ञों को यह प्रस्ताव अव्यवहारिक लगता है। किसानों को नकदी का अभाव है और पहले से ही उधार देने के लिए अढ़तिया (कमीशन एजेंट) पर निर्भर हैं। ये किसान श्रमिकों की मजदूरी का भुगतान करते हैं और डीजल खरीदता है और किराए पर लिए गए मशीनों का भुगतान करते हैं। इसलिए उधार से बचने के लिए कई किसान अपनी उपज एमएसपी से कम दर पर बिचौलिए को बेचना चाह रहे हैं।

दूसरा चौंकाने वाला झटका जो किसानों को लगा है वह है कृषि उत्पादों में भारी गिरावट। भारत कृषि समाज के अध्यक्ष अजय वीर झाखर कहते हैं, “मांग की समस्या है। पिछले महीने दूध की खरीद में 25% की कमी आई है और किसान बेच कर संकट का सामना कर रहे हैं। अंडे और अन्य पॉल्ट्री उत्पादों की मांग भी कम है। सब्जियों की मांग भी कम हो रही है। रेस्तरां और होटल बंद हो गए हैं और उपभोक्ता केवल बुनियादी जरूरी चीजें खरीद रहे हैं।”

भारत सरकार के आंकड़ों से पता चलता है कि लगभग 265 मिलियन लोग कृषि कार्यों में लगे हुए हैं जिनमें से आधे से अधिक खेतिहर मजदूर हैं जो रोज़ाना खेतों में या मंडियों में काम करते हैं। भारतीय किसान हमेशा संकटपूर्ण स्थिति में रहे हैं। रबी की फसल की सफलता उनके लिए छह महीनों तक खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने का एक जरिया बन सकती है। इस लॉकडाउन ने उनके अस्तित्व को और भी लचर बना दिया है।

लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। लेख में व्यक्त विचार निजी है।

नीचे दिए गए लिंक पर अंग्रेजी में छपा मूल लेख पढ़ा जा सकता है।

A Broken Agri-Supply Chain Needs Quick Remedies

Agriculture
COVID-19
National lockdown
Farm workers
Combine harvester
Punjab Farmers
Wheat harvest
PDS

Related Stories

किसानों और सत्ता-प्रतिष्ठान के बीच जंग जारी है

हिसारः फसल के नुक़सान के मुआवज़े को लेकर किसानों का धरना

बिहार : गेहूं की धीमी सरकारी ख़रीद से किसान परेशान, कम क़ीमत में बिचौलियों को बेचने पर मजबूर

महामारी के मद्देनजर कामगार वर्ग की ज़रूरतों के अनुरूप शहरों की योजना में बदलाव की आवश्यकता  

यूपी चुनाव: बग़ैर किसी सरकारी मदद के अपने वजूद के लिए लड़तीं कोविड विधवाएं

यूपी चुनाव : किसानों ने कहा- आय दोगुनी क्या होती, लागत तक नहीं निकल पा रही

यूपी चुनाव : गांवों के प्रवासी मज़दूरों की आत्महत्या की कहानी

यूपी चुनावों को लेकर चूड़ी बनाने वालों में क्यों नहीं है उत्साह!

लखनऊ: साढ़ामऊ अस्पताल को बना दिया कोविड अस्पताल, इलाज के लिए भटकते सामान्य मरीज़

देशभर में घटते खेत के आकार, बढ़ता खाद्य संकट!


बाकी खबरें

  • Nishads
    अब्दुल अलीम जाफ़री
    यूपी चुनाव: आजीविका के संकट के बीच, निषाद इस बार किस पार्टी पर भरोसा जताएंगे?
    07 Mar 2022
    निषाद समुदाय का कहना है कि उनके लोगों को अब मछली पकड़ने और रेत खनन के ठेके नहीं दिए जा रहे हैं, जिसके चलते उनकी पारंपरिक आजीविका के लिए एक बड़ा खतरा उत्पन्न हो गया है।
  • Nitish Kumar
    शशि शेखर
    मणिपुर के बहाने: आख़िर नीतीश कुमार की पॉलिटिक्स क्या है...
    07 Mar 2022
    यूपी के संभावित परिणाम और मणिपुर में गठबंधन तोड़ कर चुनावी मैदान में हुई लड़ाई को एक साथ मिला दे तो बहुत हद तक इस बात के संकेत मिलते है कि नीतीश कुमार एक बार फिर अपने निर्णय से लोगों को चौंका सकते हैं।
  • Sonbhadra District
    तारिक अनवर
    यूपी चुनाव: सोनभद्र के गांवों में घातक मलेरिया से 40 से ज़्यादा लोगों की मौत, मगर यहां के चुनाव में स्वास्थ्य सेवा कोई मुद्दा नहीं
    07 Mar 2022
    हाल ही में हुई इन मौतों और बेबसी की यह गाथा भी सरकार की अंतरात्मा को नहीं झकझोर पा रही है।
  • Russia Ukraine war
    एपी/भाषा
    रूस-यूक्रेन अपडेट: जेलेंस्की ने कहा रूस पर लगे प्रतिबंध पर्याप्त नहीं, पुतिन बोले रूस की मांगें पूरी होने तक मिलट्री ऑपरेशन जारी रहेगा
    07 Mar 2022
    एक तरफ रूस पर कड़े होते प्रतिबंधों के बीच नेटफ्लिक्स और अमेरिकन एक्सप्रेस ने रूस-बेलारूस में अपनी सेवाएं निलंबित कीं। दूसरी तरफ यूरोपीय संघ (ईयू) के नेता चार्ल्स मिशेल ने कहा कि यूक्रेन के हवाई…
  • International Women's Day
    नाइश हसन
    जंग और महिला दिवस : कुछ और कंफ़र्ट वुमेन सुनाएंगी अपनी दास्तान...
    07 Mar 2022
    जब भी जंग लड़ी जाती है हमेशा दो जंगें एक साथ लड़ी जाती है, एक किसी मुल्क की सरहद पर और दूसरी औरत की छाती पर। दोनो ही जंगें अपने गहरे निशान छोड़ जाती हैं।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License