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एआइएमआइएम और भारत का बहुसंख्यक गतिरोध
इन बहुसंख्यक गतिरोधों को, जो धार्मिक पहचान के आधार पर मतदाताओं को बांट देते हैं, दूर करने के लिए क्या कदम उठाए जाएंगे? यह एक सवाल है, जिसका बहुतों के पास जवाब नहीं है।
अजय गुदावर्ती
13 Jan 2021
AIMIM

ऑल इंडिया मजलिस-ए-ईत्तहदुल मुस्लिमीन (एआइएमआइएम) के नेता असदुद्दीन ओवैसी की स्थानीय और विधानसभाओं के चुनावों में अपनी राजनीतिक पार्टी के उम्मीदवारों के उतारने की रणनीति ने बहुसंख्यक गतिरोध की उस जटिलता को व्यापक तौर पर सामने ला दिया है, जिससे भारत इस समय घिरा हुआ है। यद्यपि उन्होंने मुस्लिमों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व के विस्तार की मंशा जाहिर की है, लेकिन उनके इस नजरिये का नतीजा भारतीय जनता पार्टी को चुनावी फायदा दिलाने में दिख रहा है, जो इसके लिए धार्मिक पहचान के आधार पर मतदाताओं को परस्पर बांटती है। इस जटिलता के बीच में यह बात है कि मुस्लिम चाहे एआइएमआइएम को वोट करें या न करें, यह अनिवार्य रूप से एक सांप्रदायिक परिदृश्य है। वहीं अन्य छोर पर यह परिदृश्य सवाल करता है कि बहुसंख्यकवाद का समर्थन किए बिना कोई हिंदू कैसा हो सकता है। 

ओवैसी की राजनीतिक रणनीति मुस्लिम समाज के एक उस खास समूह पर टिकी हुई है, जो उन तथाकथित धर्मनिरपेक्ष पार्टियों के रवैये से रोष में हैं, जिन्होंने इस समुदाय की उम्मीद से के हिसाब से बहुत कम काम किया है। अल्पसंख्यकों के हितों को नजरअंदाज करने के बावजूद, भाजपा की दुष्प्रचार करने वाली मशीनरी ने, बहुसंख्यक समुदाय के मतदाताओं के दिलो-दिमाग में यह बात बैठाने की कोशिश की है कि ऐसी पार्टियां “अल्पसंख्यकों के तुष्टीकरण” में लगी हैं। लिहाजा, ओवैसी के लिए यह सवाल पूछना लाजमी है कि उन्हें मुस्लिमों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिए अपनी पार्टी का विस्तार क्यों नहीं करना चाहिए? और मुसलमानों के लिए यह सवाल करना तो और भी लाजमी है कि, अगर क्षेत्रीय पार्टियां, जैसे कि पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस, उनके हित में काम नहीं कर रही हैं तो वे एआइएमआइएम के लिए वोट क्यों नहीं कर सकते? उनके मुताबिक, अगर ओवैसी की पार्टी चुनाव में बेहतर प्रदर्शन करती है, तो भी यह उनको एक राजनीतिक मौजूदगी का अहसास कराती है। यह खासतौर से उनके अनुकूल है, अगर वे हिन्दुओं के साम्प्रदायिक पूर्वाग्रह के बाहर जा कर उनके उम्मीदवार को वोट नहीं देते हैं। 

इसके अलावा, ओवैसी और मुसलमान वोटर ये दलील दे सकते हैं कि भाजपा कई क्षेत्रों में अपने पांव पसार रही है, जिनमें पश्चिम बंगाल भी शामिल है, जहां वह पिछले आम चुनावों में 18 सीटें जीती हैं, जबकि एआइएमआइएम ने तो अभी तक वहां से एक भी उम्मीदवार नहीं उतारे हैं। अब अगर भाजपा किसी न किसी तरह हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण की मदद से जीत की जा रही है, फिर इसके लिए ओवैसी पर दोष मढ़ना कहां तक जायज है कि वह भाजपा के विकास में मदद दे रहे हैं?

अतः, बहुसंख्यक गतिरोध दो तरफ से दिखाई देता है: अगर मुसलमान एआइएमआइएम को वोट देते हैं, तो यह भाजपा को वोट देने के हिंदुओं के फैसले को लाजिम ठहराता है। ठीक इसी तरह, अगर मुसलमान, दूसरी क्षेत्रीय पार्टियों या कांग्रेस को वोट देना जारी रखते हैं तो वे इसका वह फायदा और संरक्षण नहीं ले पाएंगे, जिनके वे हकदार हैं, क्योंकि ये पार्टियां स्वयं अल्पसंख्यक तुष्टीकरण के आरोप चस्पा होने से चौकन्ना हैं। इसलिए ओवैसी ये दलील देते हैं कि वह अपनी सियासी मौजूदगी और मुसलमानों की रहनुमाई करने को लेकर मुतमईन हैं, अब इसके अन्य सियासी पार्टियों पर चाहे जो असर पड़े। 

और भी यह कि, मुसलमान अक्सर ये शिकायत करते हैं कि धर्मनिरपेक्ष पार्टियों ने, जैसे तृणमूल कांग्रेस, पार्टी के भीतर आजाद व्यक्तित्व वाले मुसलमानों को कभी तवज्जो नहीं दी, वह केवल अपनी हां में हां मिलाने भर के लिए मुसलमान नेताओं को मौका या जगह देते हैं। यह तो साफ है कि पश्चिम बंगाल में मुसलमान तृणमूल कांग्रेस के धोखा देने और उनके एकमुश्त वोट को अपनी पार्टी के लिए गारंटीशुदा मानने के रवैये से बुरी तरह रंज हैं, जबकि हिंदू भी “अल्पसंख्यकों के तुष्टीकरण” की दीदी ममता बनर्जी की नीति को लेकर उनसे खफा हैं। इस संदर्भ में, मुसलमान दोनों तरफ से फंसे हुए हैं, चाहे उन पार्टियों द्वारा, जो मुसलमानों को, भाजपा के विस्तार का भय दिखा कर, घर की मुर्गी साग बराबर समझते हैं या, ओवैसी के लिए वोट करें, जो हिंदू वोटों को भाजपा के पक्ष में ध्रुवीकृत करता है। यहां तक कि हिंदू भी यह तर्क कर सकते हैं कि अगर मुसलमान एआइएमआइएम को वोट दे सकते हैं तो उनका भाजपा के पक्ष में वोट देने का फैसला किस आधार पर सांप्रदायिक ठहराया जा सकता है। इस उलझन में मुसलमानों के पास जो मुद्दा है और जिसके आधार पर उन्होंने ग़ैर-मुसलमान दलों को वोट किया है या करते हैं, वही रास्ते का रोड़ा बन जाता है। इसके अतिरिक्त हिंदू जायज रूप से यह प्रतिवाद कर सकते हैं कि वह भी गैर भाजपा दलों को वोट देते हैं। 

एआइएमआइएम के पक्ष में मतदान करना तथाकथित धर्मनिरपेक्ष पार्टियों के प्रति मुसलमानों के गुस्से का जायज इजहार है और यह आवश्यक रूप से सांप्रदायिक वोटिंग नहीं है, तथापि ओवैसी का पूर्व राग भाजपा की तत्क्षण मदद भी करता है। इसलिए उनके लिए यह दावा युक्तिसंगत नहीं है कि उन्हें इससे कोई मतलब नहीं है कि आखिरकार कौन पार्टी जीतती है, जब तक कि उनके वोट-प्रतिशत में और सीटों की संख्या में बढ़ोतरी होती है। यह भी कहा जा सकता है कि एआइएमआइएम क्षेत्रों के स्तर को देखती है क्योंकि हिंदू एक ऐसी पार्टी को वोट नहीं देने जा रहे, जो मुसलमानों को एकजुट करने के लिए प्रतिबद्ध हो। यह सवाल भी पूछा जा सकता है कि ओवैसी को ही क्यों ‘वोट कटवा’ पार्टी के रूप में देखना चाहिए और अन्य पार्टियों को क्यों नहीं?

दूसरे शब्दों में, मुसलमान इस बात पर भले आश्चर्य कर सकते हैं कि भाजपा को हराने के लिए धर्मनिरपेक्ष पार्टियां एक मंच पर क्यों नहीं उतरती हैं और क्यों ऐसा करते हुए वह केवल मुसलमानों और एआईएमआईएम की फिक्र करती है? आखिरकार, भाजपा के बहुसंख्यवाद ने न केवल मुसलमानों के लिए बल्कि हिंदुओं के कई समूहों के लिए बुरे नतीजे लाया है। उदाहरण के लिए, अगर कांग्रेस और वाम दल बड़े मकसद के लिए एक साथ नहीं आते तो क्या सीमित जनाधार वाली छोटी या कम मियाद-मिजाज की पार्टियों के मत्थे पश्चिम बंगाल में भाजपा के अभ्युदय का दोष मढ़ा जा सकता है? या, अगर उनकी इच्छा है तो क्या एआइएमआइएम मौजूदा बहुसंख्यक गतिरोध में कोई अंतर ला सकती है?

एक अन्य स्तर पर, ये सभी सवाल, अगर एआइएमआइएम को इंगित कर बात की जाए, तो एक राजनीतिक विकल्प होने की इच्छा पर शक-शुबह पैदा करते हैं। क्या ओवेसी खुद अपनी पार्टी एआइएमआइएम में आजाद मुस्लिम आवाज और नेताओं के निजी खयालात को रखने का इजाजत दे सकते हैं? सवाल यह भी है कि हैदराबाद में मुसलमानों के जीवन स्तर में सकारात्मक बदलाव लाने में एआइएमआइएम का ट्रेक रिकॉर्ड क्या है, तेलंगाना की बात तो जाने दें। शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के मामले में ओवैसी के प्रयासों से कितने मुसलमान फायदेमंद हुए हैं? और अगर यह तर्क दिया जाए कि एआइएमआइएम की तरक्की के बावजूद मुसलमान सामाजिक नीतियों के संदर्भ में लाभान्वित नहीं होंगे तो क्या? दोनों लिहाज से, एक तो यह राजनीति की प्रकृति और दूसरी एआइएमआइएम जिस शब्दाडम्बर में बात करती है, और चूंकि एआइएमआइएम बहुत छोटी पार्टी है लिहाजा, वह मुसलमानों पर सकारात्मक प्रभाव डालने वाली एक स्वतंत्र नीति बनाने में सक्षम नहीं होगी। ऐसे में क्या यह उचित नहीं होगा कि एआइएमआइएम को वोट देने के बजाय-क्योंकि यह अपने कुछ विधायकों और सांसदों के साथ प्रत्यक्ष बदलाव नहीं ला सकती है जबकि इसकी सफलता की कीमत भाजपा के पक्ष में ध्रुवीकरण के रूप में चुकानी पड़ सकती है-धर्मनिरपेक्ष पार्टियों पर एक व्यापक रणनीति बनाने के लिए पुरजोर दबाव डाला जाए? 

भले ही यह लामबंदी की प्रक्रिया को मजबूत कर रहा हो, मगर ऐसा लगता है कि इस उलझन में “धर्मनिरपेक्ष पार्टियों के ख़िलाफ़” या उससे स्वतंत्र होकर चुनाव लड़ने की एआइएमआइएम और ओवैसी की रणनीति से अलग बहुसंख्यकवाद एकजुट होता जा रहा है। अब उनकी इस दलील को, कि कौन जीतता है, उनके लिए निकटतम चिंता का विषय नहीं है, को गलत ठहरा कर पूछा जाना चाहिए कि मुसलमान और ओवैसी और क्या कर सकते हैं? इस बहुसंख्यक गतिरोधों को दूर करने के लिए क्या कदम उठाए जाएंगे, यह एक सवाल है, जिसका बहुतों के पास जवाब नहीं है। इसका परिणाम पश्चिम बंगाल तथा अन्य विधानसभा चुनावों में अच्छे तरीके से देखे जा सकते हैं।

(लेखक जेएनयू में सेंटर फॉर पॉलिटिकल स्टडीज में एसोसिएट प्रोफेसर हैं। लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं)

 

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें।

AIMIM and India’s Majoritarian Impasse

AIMIM
Asaduddin Owaisi
Majoritarian Democracy
Hindu Majoritarianism
Communalism
BJP
West Bengal Elections

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