NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
कानून
भारत
राजनीति
समझिए कि राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून के तहत सलाहकारी मंडल क्या है?
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम, 1980 के तहत तीन सदस्यों वाले सलाहकारी मंडल का गठन किया है, यहां "द लीफ़लेट" इसकी शक्तियों और हाल के सालों में इसके काम के इतिहास पर नज़र डाल रहा है।
पारस नाथ सिंह
22 Mar 2022
jail

15 मार्च को गृह मंत्रालय ने एक अधिसूचना जारी कर राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम, 1980 (रासुका) के तहत राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली के लिए एक तीन सदस्यीय सलाहकारी मंडल का गठन किया है। इस मंडल में दिल्ली हाई कोर्ट के तीन जज- जस्टिस योगेश खन्ना, जस्टिस चंद्रधारी सिंह और जस्टिस रजनीश भटनागर शामिल हैं। जस्टिस खन्ना को मंडल का अध्यक्ष बनाया गया है। गृह मंत्रालय ने रासुका की धारा 9 के तहत दी गई शक्तियों का इस्तेमाल कर यह अधिसूचना जारी की है। इससे पहले 12 अगस्त, 2016 को पुराने मंडल का गठन किया गया था, जिसमें जस्टिस संजीव खन्ना, जस्टिस जयंत नाथ और जस्टिस संगीता ढींगरा सहगल शामिल थीं। 18 जनवरी 2019 को जस्टिस संजीव खन्ना को सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति दे दी गई, जबकि जस्टिस नाथ पिछले नवंबर में हाई कोर्ट से सेवानिवृत्त हो गए। वहीं जस्टिस सहगल ने मई 2020 में इस्तीफा दे दिया था।

एक संसदीय सवाल के जवाब में गृह मंत्रालय ने 21 सितंबर 2020 को राज्यसभा को बताया था कि पिछले पांच साल में दिल्ली में रासुका के तहत एक भी मामला दर्ज नहीं किया गया है। 

रासुका एक निवारक हिरासत कानून है। यह केंद्र और राज्य सरकारों को यह अधिकार देता है कि वे राज्य की सुरक्षा या शांति व्यवस्था बनाए रखने या जन समुदाय तक आपूर्ति और सेवाओं को बरकरार रखने के लिए किसी व्यक्ति के संबंध में आदेश पारित कर सकती हैं। यह शक्तियां उस स्थिति में भी उपयोग की जा सकती हैं जब कोई व्यक्ति ऐसा कार्य कर रहा हो, जिससे भारत की सुरक्षा, विदेशी शक्तियों के साथ भारत के संबंध प्रभावित हो रहे हों। वहीं विदेशियों के मामले में, उनकी भारत में सतत उपस्थिति को नियंत्रित करने के लिए या उन्हें देश से निकालने के लिए इसका इस्तेमाल किया जा सकता है।  

रासुका जैसे निवारक हिरासत कानून बिना कोर्ट में सुनवाई के ही संबंधित व्यक्ति को हिरासत में रखने का अधिकार देते हैं।

रासुका जैसे निवारक हिरासत कानून बिना कोर्ट में सुनवाई के ही संबंधित व्यक्ति को हिरासत में रखने का अधिकार देते हैं, इसलिए संविधान के अनुच्छेद 22(4) के तहत सलाहकारी मंडल एक संवैधानिक सुरक्षात्मक उपाय बनाया गया है। दूसरे उपायों में हिरासत में लिए गए व्यक्ति को हिरासत का आधार बताना और उन्हें इस आदेश के खिलाफ़ जल्द से जल्द सुनवाई का अवसर उपलब्ध कराना है। यह सारे उपाय संविधान के अनुच्छेद 22 से उपजते हैं।

चूंकि निवारक हिरासत कानून सीधे व्यक्तिगत आज़ादी पर हमला करते हैं, ऐसे में सरकार से यह अपेक्षा की जाती है कि वो संवैधानिक सुरक्षा उपायों का पूरा सम्मान करते हुए ही इनका उपयोग करे। 

सलाहकारी मंडल का काम

रासुका के तहत बनाए गए सलाहकारी मंडल का काम हिरासत के आधार की जांच करने वाले तंत्र और सरकार द्वारा ऐसी हिरासत के लिए उपलब्ध कराए गए तर्कों की जांच व निगरानी करना है। रासुका की धारा 10 के तहत हिरासत का आदेश दिए जाने के तीन हफ़्ते के भीतर सरकार को हिरासत के आधार और आदेश से प्रभावित होने वाले व्यक्ति के प्रतिनिधित्व को सलाहकारी मंडल के सामने ले जाना होता है। अगर यह आदेश जिलाधीश या पुलिस आयुक्त ने जारी किए हैं, तो उन्हें अपनी रिपोर्ट सलाहकारी मंडल को भेजनी होती है। 

रासुका के तहत बनाए गए सलाहकारी मंडल का काम हिरासत के आधार की जांच करने वाले तंत्र और सरकार द्वारा ऐसी हिरासत के लिए उपलब्ध कराए गए तर्कों की जांच व निगरानी करना है।

रासुका की धारा 11 के तहत मंडल को सरकार या किसी भी व्यक्ति से वांछित जानकारी मांगने की शक्ति होती है। अगर आदेश से प्रभावित व्यक्ति खुद की सुनवाई चाहता है, तो यह जरूरी है कि उन्हें सशरीर सुनवाई उपलब्ध करवाई जाए। इस सुनवाई में वकीलों को आने की अनुमति नहीं होती। सलाहकारी मंडल की सुनवाई प्रक्रिया और रिपोर्ट, सिर्फ उतना हिस्सा छोड़कर जिसमें मंडल ने हिरासत के बारे में अपनी राय बताई है, उसे गुप्त रखा जाता है। मंडल से अपेक्षा की जाती है कि व्यक्ति को हिरासत में लिए जाने की तारीख़ से सात हफ़्ते के भीतर वो सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपेगा।

धारा 12(1) को पढ़ने के दौरान इन शब्दों पर गौर करना होता है कि अगर सलाहकारी मंडल को व्यक्ति को हिरासत में रखे जाने के पर्याप्त कारण भी मिलते हैं, तो सरकार हिरासत के आदेश को पारित और हिरासत को आगे बढ़ा "सकती" है। इसका मतलब हुआ कि भले ही सलाहकारी मंडल को संबंधित व्यक्ति को हिरासत में रखे जाने के पर्याप्त कारण लग रहे हों, लेकिन सरकार हिरासत को आगे बढ़ाने के लिए बाध्य नहीं है। लेकिन अगर सलाहकारी मंडल ने यह मत दिया है कि संबंधित व्यक्ति को हिरासत में रखने के पर्याप्त कारण नहीं हैं, तो सरकार को व्यक्ति की रिहाई का आदेश पारित करना ही होगा (धारा 12(2) में इसकी बाध्यता बताई गई है)।  

धारा 13 यह उपबंधित करती है कि इस अधिनियम के तहत हिरासत में लिए गए शख़्स को अधिकतम एक साल के लिए जेल में रखा जा सकता है। 

हालांकि यह कागज पर है, सलाहकारी मंडल को यह सुनिश्चित करना होता है कि किसी भी व्यक्ति को अवैधानिक ढंग से बिना पर्याप्त कारण के हिरासत में ना रखा जाए, लेकिन हाल के उदाहरणों से तो इसके उलट ही तस्वीर पेश होती है। डॉ कफील खान और मणिपुरी सामाजिक कार्यकर्ता एरेंद्रो लीचोम्बम के मामले में क्रमश: उत्तर प्रदेश सरकार और मणिपुर सरकार द्वारा बनाए गए सलाहकारी मंडल ने उन्हें रासुका के तहत हिरासत में बरकरार रखने का मत दिया था। 

हालांकि यह कागज पर है, सलाहकारी मंडल को यह सुनिश्चित करना होता है कि किसी भी व्यक्ति को अवैधानिक ढंग से बिना पर्याप्त कारण के हिरासत में ना रखा जाए, लेकिन हाल के उदाहरणों से तो इसके उलट ही तस्वीर पेश होती है।

सितंबर 2020 में डॉ कफील खान की हिरासत के आदेश को रद्द करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि खान द्वारा अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में दिया गया भाषण नफ़रत या हिंसा नहीं फैलाता। बता दें इसी भाषण के आधार पर खान को हिरासत में लिया गया था। 

पिछले साल जुलाई में लीचोम्बम की तुरंत रिहाई का आदेश पारित करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि उनकी हिरासत को बरकरार रखा जाना संविधान के अनुच्छेद 21 में वर्णित जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन होगा। लीचोम्बम को पत्रकार किशोरचंद्र वांगखेम के साथ हिरासत में लिया गया था। तत्कालीन बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष साइखोम तिकेंद्र सिंह की कोविड-19 से मौत के बाद, दोनों को उनके ऊपर टिप्पणी करने के लिए हिरासत में लिया गया था। उनके खिलाफ़ मणिपुर बीजेपी के उपाध्यक्ष उशम देबन और महासचिव पी प्रेमनंदा मीती ने शिकायत दर्ज कराई थी और कहा था कि उनकी पोस्ट आहत करने वाली थी।

साभार: द लीफ़लेट

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।

Advisory Board Under the National Security Act: an Explainer

Criminal Justice
Due process
Explainer
LIFE AND LIBERTY

Related Stories

राज्यपाल प्रतीकात्मक है, राज्य सरकार वास्तविकता है: उच्चतम न्यायालय


बाकी खबरें

  • सौरव कुमार
    कर्नाटक : देवदासियों ने सामाजिक सुरक्षा और आजीविका की मांगों को लेकर दिया धरना
    17 Mar 2022
    कलबुर्गी, विजयपुरा, विजयनगर, रायचूर, दवेंगेरे, बागलकोट, बल्लारी, यादगीर और कोप्पल ज़िलों की लगभग 1500 देवदासियों ने पुनर्वास की मांग को लेकर बेंगलुरु शहर में धरना दिया।
  • UKRAIN
    क्लाउस उलरिच
    गेहूं के निर्यात से कहीं बड़ी है यूक्रेन की अर्थव्यवस्था 
    17 Mar 2022
    1991 में सोवियत संघ से स्वतंत्रता मिलने के बाद, यूक्रेन का आर्थिक विकास भ्रष्टाचार, कैपिटल फ्लाइट और सुधारों की कमी से बाधित हुआ। हाल ही में हुए सुधारों से अब देश में रूस के युद्ध की धमकी दी जा रही…
  • भाषा
    दिल्ली हिंसा में पुलिस की भूमिका निराशाजनक, पुलिस सुधार लागू हों : पूर्व आईपीएस प्रकाश सिंह
    17 Mar 2022
    ‘पुलिस के लिये सबसे सशक्त हथियार नागरिकों का भरोसा एवं विश्वास होता है । नागरिक आपके ऊपर भरोसा तभी करेंगे जब आप उचित तरीके से काम करेंगे । ऐसे में लोगों को साथ लें । सामान्य जनता के प्रति संवेदनशील…
  • तान्या वाधवा
    कोलंबिया में राष्ट्रपति पद के दौड़ में गुस्तावो पेट्रो
    17 Mar 2022
    अलग-अलग जनमत सर्वेक्षणों के मुताबिक़ कोलंबिया में आगामी राष्ट्रपति चुनावों के लिए प्रगतिशील नेता गुस्तावो पेट्रो पसंदीदा उम्मीदवार हैं।
  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में कोरोना के 2,539 नए मामले, 60 मरीज़ों की मौत
    17 Mar 2022
    देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 30 हज़ार 799 हो गयी है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License