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राजनीति
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अफ़ग़ानिस्तान: सौ दिन का एकांत
इस आर्टिकल में लेखक तालिबान के अधिग्रहण के 100 दिनों के बाद इस दौरान हुई घटनाओं पर नज़र डाल रहे हैं।
एम. के. भद्रकुमार
30 Nov 2021
Translated by महेश कुमार
taliban

जैसा कि तालिबान अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता में अपने 100 दिन पूरे कर रहा है, पश्चिमी ताकतें काबुल में अधिकारियों के साथ कुछ मामूली गरिमा के साथ जुड़ने के लिए अपना चेहरा बचाने के लिए फार्मूले की तलाश कर रही हैं।

यूरोपीय यूनियन यहां प्रमुख भूमिका निभा रहा है। यूरोपीय देशों में अफ़ग़ानिस्तान से संभावित शरणार्थी प्रवाह के मद्देनजर अत्यावश्यक कार्यवाही करने की भावना पैदा हुई है। यूरोपीयन यूनियन का इरादा अफ़ग़ानिस्तान के छह तत्काल पड़ोसियों (चीन, पाकिस्तान, ईरान, तुर्कमेनिस्तान, उज्बेकिस्तान और ताजिकिस्तान) "समावेशी क्षेत्रीय संवाद मंच के ज़रिए संवाद शुरू करना है।“

यूरोपीयन आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने 13 वीं एशिया-यूरोप बैठक (एएसईएम) के दौरान बोलते हुए शुक्रवार को कहा कि "आसन्न आर्थिक और सामाजिक पतन को रोकने के लिए जिसका कि अफ़ग़ानिस्तान सामना कर रहा है” यूरोपीयन यूनियन को वहां के लोगों का समर्थन करना चाहिए।

मध्य एशियाई देशों की राजधानियों, खासकर ताशकंद और दुशांबे में ब्रसेल्स से उड़ान भर अधिकारियों के साथ बातचीत करने की गतिविधियों में हाल ही में तेजी आई है। उम्मीद जताई जा रही है कि यूरोपीयन यूनियन जल्द ही अफ़ग़ानिस्तान के लिए एक 'मानवीय सहायता के लिए गलियारा' खोलेगा। दुशांबे में हाल ही में आयोजित की गई यूरोपीयन यूनियन-मध्य एशिया मंत्रिस्तरीय बैठक उस दिशा में एक प्रयास है। यूरोपीयन यूनियन की विदेश नीति के प्रमुख जोसेप बोरेल, जिन्होंने दुशांबे बैठक में प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया, ने बाद में लिखा:

"हो सकता है कि मध्य एशिया यूरोपीयन यूनियन के मीडिया के शीर्ष समाचार में न हो, लेकिन यह एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है, जो प्रमुख शक्तियों को, अफ़ग़ानिस्तान के बगल में व्यापार, निवेश और अन्य लिंक के माध्यम से पूर्व और पश्चिम को जोड़ने का रास्ता है। यूरोपीयन यूनियन के मामले में, हमारे स्पष्ट हित दांव पर हैं - और ऐसा ही कुछ मध्य एशियाई लोगों के लिए भी है।"

बोरेल शायद मध्य एशियाई क्षेत्र के अपने पहले दौरी से काफी प्रभावित हो गए हैं, खासकर जब उन्होंने लिखा, "यह क्षेत्र अपने निकटतम पड़ोसियों के साथ अपने नज़दीकि संबंधों के साथ-साथ 'ईयू-विकल्प' के साथ होने की भी सराहना करता है। वे यूरोपीयन यूनियन को महान शक्तियों की राजनीति में घिरे अस्थिर अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में संतुलन बनाने और भविष्य के कारक के रूप में भी देखते हैं।"

इसे सुनिश्चित करने के लिए, ब्रसेल्स का ध्यान इस ओर अचानक आकर्षित हुआ है। "राजनेता जहां भी जाते हैं, वह उनकी राजनीतिक प्राथमिकताओं का संकेत होता है, इसलिए यह यात्रा दोनों दिशाओं में, एक बढ़िया संकेत है कि चीजें यूरोपीयन यूनियन-मध्य एशियाई संबंधों में आगे बढ़ रही हैं," जैसा कि बोरेल ने कहा भी है। 

यह प्रचार कहां तक ठोस कार्रवाइयों में तब्दील होता है, यह देखना अभी बाकी है। रूस मध्य एशियाई क्षेत्र के लिए सुरक्षा का मुख्य प्रदाता है और मास्को का यूरोपीयन यूनियन और विशेष रूप से बोरेल के साथ एक अशांत संबंध है। अप्रत्याशित रूप से, बोरेल ने यूरोपीयन यूनियन के मध्य एशियाई क्षेत्र पर ध्यान केंद्रित करते हुए बहुत ही सौम्य शब्दों में कहा कि, "यूरोपीयन यूनियन इस क्षेत्र को द्विआधारी रणनीतिक विकल्पों और प्रतिद्वंद्विता के बजाय क्षेत्र को  कनेक्टिविटी और सहयोग के लिए एक खुली जगह के रूप में रखना चाहता है।"

इस पृष्ठभूमि में, शनिवार को दोहा में तालिबान और अमेरिका/यूरोपीयन यूनियन के अधिकारियों के बीच हुई वार्ता को दोहा शांति प्रक्रिया को गति देने का प्रयास माना जा रहा है। अफ़ग़ान विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अब्दुल कहार बल्खी के अनुसार, हुई वार्ता में राजनीतिक मुद्दों, फ्रीज़ संपत्ति, मानवीय सहायता, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, काबुल में दूतावासों को फिर से खोलना शामिल है।

निःसंदेह, पश्चिमी कहानी अपनी चाल बदल रही है। बीबीसी समाचार कार्यक्रम द रियल स्टोरी ने आज अपने नवीनतम एपिसोड में हंगर इन अफ़गानिस्तान: टाइम टू वर्क विद तालिबान? का प्रसारण किया।  

50 मिनट चले कार्यक्रम की थीम यह है कि यह गैर-जिम्मेदाराना होगा कि राजनीतिक वैधता संकट को अंतरराष्ट्रीय समुदाय और अफ़गान लोगों आपसी जुड़ाव के रास्ते में रोड़ा बनना चाहिए। योगिता लिमये, बीबीसी समाचार संवाददाता, जो दक्षिण एशिया को कवर करती हैं, ने पश्चिमी अफ़गानिस्तान से रिपोर्ट किया कि:

“यहां (मानवीय) संकट की पृष्ठभूमि में उपजी हताशा और तात्कालिकता को शब्दों में बयां करना मुश्किल है। यह बिल्कुल स्पष्ट है कि अफ़ग़ानिस्तान के लोगों तक पहुंचने के लिए अब और समय नहीं बचा है। ये लोग तब तक इंतजार नहीं कर सकते हैं जब तक दुनिया इस बात पर बहस करे कि तालिबान सरकार को मान्यता दी जाए या नहीं।

द बीबीसी चर्चा में एक अन्य प्रतिभागी नॉर्वेजियन रिफ्यूजी काउंसिल (NRC) के महासचिव जान एगलैंड ने तालिबान के साथ जुड़ने की अनिवार्य जरूरत को हरी झंडी दिखाई है। उनकी टिप्पणी विशेष रूप से दिलचस्प है क्योंकि एनआरसी अफ़गानिस्तान में सबसे बड़े पश्चिमी सहायता कार्यक्रमों में से एक को चलाता है और इसके कर्मचारियों के रूप में वर्तमान में काबुल और प्रांतों में 1000 से अधिक अफ़ग़ान नागरिक काम कर रहे हैं। एगलैंड ने लिमये के आकलन को बल देते हुए कहा कि:

"यहां लोगों में एक सर्वसम्मत अविश्वास है कि पश्चिमी देशों, खासकर नाटो देशों ने ऐसे ही उन्हे छोड़ दिया और आबादी के नीचे से गलीचा खींच लिया ... शिक्षा पर महिलाओं के अधिकार जैसे बहुत सारे प्रश्न हैं, लेकिन हमने अपनी महिला कर्मचारियों के काम करने और सभी अधिकारों पर समझौते पर पहुँचने के लिए बातचीत की है। इसलिए भी, नई सरकार के साथ जुड़ना संभव है और जरूरी भी है।"

उन्होने कहा कि, तालिबान के साथ पश्चिमी जुड़ाव समस्याग्रस्त बना हुआ है। मेरे विचार से, तालिबान, पिछले 100 दिनों में अकेले रहकर चीजों पर विचार करने के बाद, काबुल में सत्ता साझा करने या किसी भी पश्चिमी देश की शर्तों को स्वीकार करने के मामले में अब और भी कम इच्छुक हो सकता है। आगे बढ़ने का एकमात्र तरीका यही है कि तालिबान को संयम से मौजूदा रास्ते पर चलने के लिए प्रोत्साहित किया जाए। 

पश्चिमी देशों की शर्तें स्पष्ट रूप से अवास्तविक हैं। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अब्दुल कहर बल्खी से जब बीबीसी कार्यक्रम में पश्चिमी शर्तों के बारे में पूछा गया तो उन्होने उसे सिरे से  खारिज कर दिया और कहा:

“हम यह स्थिति कभी नहीं चाहते थे। हमने जो कुछ किया वह खुद की आजादी के लिए लड़ना था, कब्जे से अपनी आजादी हासिल करना था। और दूसरों को यहां आकर हमारी ज़िंदगियों पर या अफ़ग़ानों पर हुक्म चलाने का कोई हक़ नहीं है - यह समस्या का समाधान नहीं है। समस्या का समाधान हुक्म चलाने के लिए दबाव की रणनीति नहीं हो सकती है। समस्या का समाधान सहयोग के माध्यम से, सकारात्मक संबंधों के माध्यम से और ऐसी स्थिति लाने के माध्यम से है जहां हम सभी एक साथ काम कर सकें।”

दूसरी ओर, जबकि पश्चिमी देशों पर जल्दी कुछ करने का दबाव बन रहा है ताकि शरणार्थी प्रवाह को रोका जा सके, इसके लिए सबसे पहले एक व्यवस्था स्थापित करने की जरूरत है जिससे वे तालिबान को दरकिनार करते हुए सीधे अफ़गान लोगों तक पहुंच सकें।

कुछ विचित्र विचार हवा में घूम रहे हैं जैसे कि काबुल में एक केंद्रीय बैंक के माध्यम से लोगों को सीधे पैसे वितरित किए जाए जो अफ़गान अर्थव्यवस्था में तरलता पैदा करेगा कि जो तालिबान सरकार से स्वतंत्र होगा और आईएमएफ द्वारा उसका ऑडिट किया जाएगा! तालिबान अपने देश की संप्रभुता पर इस तरह के पेटेंट पश्चिमी अतिक्रमण को कभी बर्दाश्त नहीं करेगा!

समान रूप से, क्या यह उम्मीद करना यथार्थवादी है कि तालिबान अमेरिकी प्रतिबंधों को उठाने के लिए हक्कानी को हटाकर सरकार का पुनर्गठन करेगा? इन सबसे ऊपर, यह सब बाइडेन की रेटिंग में भारी गिरावट की छाया डालती है, क्योंकि तालिबान के साथ नए संबंध को निष्पक्ष और ईमानदारी से विकसित करने की उनकी इच्छा संदेह के घेरे में है।

सीधे शब्दों में कहें तो अगले साल मध्यावधि चुनाव नजदीक आने के साथ ही अफ़गानिस्तान अमेरिकी राजनीति में एक राजनीतिक फुटबॉल बन जाएगा और बाइडेन की इच्छा सुरक्षित खेलने की होगी। बाइडेन आतंकवाद से मुकाबले को प्राथमिकता देंगे।

इस प्रकार अब स्थिति यह बन गई है कि अमेरिका और नाटो (उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन) सहयोगी पुराने रास्ते पर वापस आ गए हैं क्योंकि अब केवल पाकिस्तान ही है जो तालिबान का लाभ उठाने और उन्हें पश्चिम की मांगे मनवाने तैयार कर सकता है इसलिए अमेरिका और नाटो अब पाकिस्तान पर निर्भर हैं। 

तदनुसार, इस सप्ताह ब्रुसेल्स में नाटो मुख्यालय में एक उच्च स्तरीय पाकिस्तानी सैन्य प्रतिनिधिमंडल की मेजबानी की गई थी। वहीं, समानांतर ट्रैक पर, आश्चर्यजनक उलटफेर में, वाशिंगटन ने 9-10 दिसंबर को वाशिंगटन में होने वाली वर्चुअल डेमोक्रेसी समिट में भाग लेने के लिए पाकिस्तान को निमंत्रण भी दिया है। रणनीति पाकिस्तान में नागरिक और सैन्य नेतृत्व दोनों को साथ लाने की है।

गौरतलब है कि नाटो महासचिव जेन्स स्टोलटेनबर्ग ने आज कहा कि अमेरिका पाकिस्तान के साथ सैन्य संपर्क बनाए रखना चाहता है और उच्च स्तरीय पाकिस्तानी सैन्य प्रतिनिधिमंडल द्वारा हाल ही में नाटो मुख्यालय का दौरा उसी प्रक्रिया का हिस्सा था। जैसा कि उन्होंने कहा, 

“जब पाकिस्तान की बात आती है, तो नाटो का पाकिस्तान के साथ कई वर्षों से नियमित संपर्क रहा है। बेशक, मक़सद सिर्फ अफ़गानिस्तान की स्थिति पर चर्चा नहीं है। हमारे बीच राजनीतिक संपर्क हैं, हमारे बीच नियमित सैन्य संपर्क और संवाद हैं और मुझे लगता है कि यह महत्वपूर्ण है कि यह सब जारी रहे, क्योंकि इस क्षेत्र में अभी भी कई चुनौतियां हैं, खासकर अफ़गानिस्तान के भविष्य से संबंधित चुनौतियां भारी हैं।

क्या नाटकीय बदलाव है! अब अमेरिकियों की नज़रों में पाकिस्तान एक अच्छा सहयोगी बन कर वापस आ गया है। रावलपिंडी में पाकिस्तानी सैन्य नेतृत्व के लिए अमेरिका/नाटो का प्रस्ताव अमेरिकी अधिकारियों और तालिबान के बीच दोहा में वार्ता की बहाली के साथ मेल खाता है। वाशिंगटन पाकिस्तानी मदद से काबुल में राजनीतिक सुधार चाहता है।

एम.के. भद्रकुमार एक पूर्व राजनयिक हैं। वे उज्बेकिस्तान और तुर्की में भारत के राजदूत रह चुके हैं। व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

Afghanistan: One Hundred Days of Solitude

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