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भारत
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आख़िर क्यों देश भर की एलआईसी की शाखाएं एक दिन के लिए बंद रही?
बैंक कर्मचारियों के बाद अब एलआईसी (LIC) कर्मचारी भी आज हड़ताल पर रहेरहे । एलआईसी (Life Insurance corporation) के कर्मचारी विनिवेश का विरोध कर रहे हैं, जिसके चलते हड़ताल करने का ऐलान किया था। यह हड़ताल एक दिन की ही थी। आइए समझते हैं कि एलआईसी के कर्मचारियों के इस विरोध की पृष्ठभूमि क्या है?
अजय कुमार
18 Mar 2021
LIC
Image Courtesy : Business Today

आज यानी 18 मार्च को  एल आई सी के विभिन्न संगठन द्वारा बनाए गए  संयुक्त मोर्चा द्वारा  देश में एकदिवसीय हड़ताल की गई।  इस दौरान देशभर केएल आई सी शखाएं बंद रही। कर्मचारियों ने कहा यह हड़ताल भारत सरकार द्वारा एल आई सी में आई पी ओ लाने , बीमा क्षेत्र में एफ डी आई की सीमा में वृद्धि करने तथा वेत्तन पुनरीक्षण में अत्यधिक देरी होने के विरुद्ध की गई, अगर  अपने फैसले वापस नहीं लेती  यह हड़ताल अनिश्चितकालिन हो सकती है।

इस हड़तालके समर्थन में देशभर में जुलूस निकाला गया तथा आम सभा की गई जिसमें सभी मजदूर संगठनों का पूर्ण सहयोग रहा। दिल्ली में मज़दूर संगठन सीटू के राष्ट्रीय नेता ए के पदमनाभन भी कर्मचारियों के प्रदर्शन में शामिल हुए।  

बैंक कर्मचारियों के बाद अब एलआईसी (LIC) कर्मचारी भी आज हड़ताल पर रहे रहे। 15 मार्च से ही भारतीय वित्त व्यवस्था के कर्मचारी हड़ताल पर हैं। 15 -16 मार्च को जहाँ बैंक कर्मियों की हड़ताल रही वही 17 जनरल इंश्योरेंस के कर्मचीरियों की हड़ताल रही। आज यानि 18 कोएलआईसी के कमचारियों की हड़ताल रही है।  इन्हें भारतीय वित्त व्यवस्था की रीढ़ मानी जाती है। इन सभी का इस तरह से हड़ताल पर जाना अर्थव्यवस्था के लिए कही से भी शुभ संकेत नहीं है।  ये सभी कर्मचारी सरकार की नीतियों के ख़िलाफ़ सड़क पर है लेकिन सरकार अभी भी अपने निर्णय को अटल और देशहित में बताने पर तुली है।  एलआईसी (Life Insurance Corporation) के कर्मचारी विनिवेश का विरोध कर रहे हैं, जिसके चलते हड़ताल करने का ऐलान किया था। यह हड़ताल एक दिन की ही थी। आइए समझते हैं कि एलआईसी के कर्मचारियों के इस विरोध की पृष्ठभूमि क्या है? और कर्मचारियों ने हड़ताल का रास्ता क्यों चुना?

आम आदमी को बीमा का मतलब पता हो या न हो लेकिन उसने जीवन बीमा निगम (एलआईसी) का नाम जरूर सुना होता है। इसलिए जब बीमा करने की बात होती है तो उसकी सबसे पहली पसंद जीवन बीमा निगम होती है। वजह कि यह एक सरकारी कम्पनी है और आम लोगों को अपना पैसा सुरक्षित रखने में भरोसा जितना सरकार पर होता है उतना प्राइवेट कंपनियों पर नहीं। बीमा क्षेत्र में 23 प्राइवेट कंपनियों के साथ एक सरकारी कंपनी एलआईसी काम करती है। इन कंपनियों में बाज़ार में सबसे बड़ी हिस्सेदारी एलआईसी की है। कहने का मतलब यह कि एलआईसी के पास भारत के कुल बीमाधारियों में से तकरीबन 76 फीसदी बीमाधारी हैं।

इस बार के बजट में सरकार ने एलान किया कि सरकारी कंपनी जीवन बीमा निगम (एलआईसी) में सरकार अपनी हिस्सेदारी बेचना चाहती है। इसके लिए सीधे आईपीओ लाने की बात कही गई है। इसका मतलब है कि एलआईसी के शेयरों की बिक्री की जाएगी। ऐसे में इस सरकारी बीमा कंपनी में आम शेयरधारकों की भी हिस्सेदारी हो जाएगी। हालांकि सरकार ने खुलासा नहीं किया है कि स्वामित्व का कितना फीसदी हिस्सा बेचा जाएगा।

मौजूदा समय में साठ साल पुरानी कम्पनी एलआईसी के 100 फीसदी शेयरों की मालिक सरकार खुद हैं। सौ करोड़ की ऑथोराइज्ड कैपिटल वाले एलआईसी के कैपिटल यानी पूंजी की कीमत 8.77 लाख करोड़ रूपये है। यह टाटा कंसल्टेंसी सर्विस और मुकेश अम्बानी के रिलायंस इंडिया लिमिटेड के कुल शेयरों की कीमतों से भी ज्यादा है।

एलआईसी की बैलेंस शीट की स्थिति भी बहुत मज़बूत है। एलआईसी की कुल सम्पति 30 लाख करोड़ पार कर पहली बार वित्त वर्ष साल 2019 में 31.11 लाख करोड़ रूपये हो गयी। यह एक साल में तकरीबन 9.38 फीसदी की बढ़ोतरी थी। एलआईसी का सरप्लस साल 2019 में 50 हज़ार करोड़ से अधिक का है।

इसके साथ एलआईसी सरकार द्वारा चलाई जा रही कंपनियों में सबसे बड़ी निवेशक भी है। पिछले साल एलआईसी ने आईडीबीआई बैंक के उतने शेयर खरीदे थे, जितने से आइडीबीआई बैंक का मालिकाना हक एलआईसी को मिल गया था। सरकार इस समय आइडीबीआई बैंक के बचे हुए शेयरों को भी बेचने की बात कर रही रही है।

एलआईसी के शेयर जब बाज़ार में बिकने के लिए जारी किये जायेंगे, तब यह बाज़ार में लिस्ट हुई सबसे बड़ी कम्पनी होगी। जिसके पास सबसे अधिक सम्पति होगी। इसलिए बहुत मुश्किल होगा कि एलआईसी का दस फीसदी शेयर एक बार में बिक पाए। क्योंकि जितनी कीमत के ये शेयर हैं उतने बड़े खरीदार बाजार में नहीं है।

इस पूरी पृष्ठभूमि में यह बात तो साफ है कि एलआईसी की स्थिति बुरी नहीं है। न एलआईसी की बैलेंस शीट कमज़ोर है। न ही एलआईसी को नुकसान हो रहा है। इसलिए सवाल उठता है कि सरकार एलआईसी को बेचने क्यों जा रही है? बेचने के पीछे की वजह क्या है? जब बेचने लायक स्थितियां ही नहीं है।

पहला तर्क तो यह दिया जा रहा है कि सरकार के पास पैसे की कमी है? इसलिए सरकारी कंपनियों को बेचा जा रहा है ताकि सरकार के पास पैसा आ पाए। सरकार अपने विनिवेश के लक्ष्य यानी 2.1 लाख करोड़ के लक्ष्य को पूरा कर पाए। लेकिन इस तर्क में बहुत अधिक दम नहीं लगता। दम इसलिए नहीं लगता क्योंकि यह बात सही है कि सरकार के पास पैसा नहीं है। यह बात भी सही है कि सरकार को पैसे का जुगाड़ करना चाहिए।

लेकिन इसके जवाब में यह बात सही कैसे हो सकती है कि लाभ कमाती सरकरी कंपनियों को बेच दिया जाए। वैसी कंपनियों को बेच दिया जाए जिसकी साख जनता के बीच सबसे अधिक है। अगर सरकार इन सारी बातों को अलग कर केवल बेचने के बारे में सोच रही है तो इसका मतलब है कि सरकार इन कंपनियों को बेचकर बोझ उतारना चाहती है। और वह अपने अकूत बहुमत के दम पर इस तरह के मनमानी फैसले ले रही है।

दूसरा तर्क आर्थिक जानकरों की तरफ से है कि बाज़ार में एलआईसी की लिस्टिंग हो जाने से एलआईसी के कामकाज में पारदर्शिता आएगी। इस तर्क का जवाब देते हुए एलआईसी वर्किंग इम्पलॉई एसोसिएशन के वाईस प्रेसिडेंट अनिल कुमार भटनागर ने कहा कि समझ में नहीं आ रहा है कि किसी तरह की पारदर्शिता की बात की जा रही है। एलआईसी अपने सारे खातों को अपने वेबसाइट पर जारी करती है। सारे खाते वेबसाइट पर उपलब्ध हैं, कोई भी इन्हें पढ़ सकता है। पारदर्शिता के नाम पर दूसरा सवाल यह उठाया जा रहा है कि एलआईसी में पैसा लगाने वालों को यह पता नहीं चलता कि उनका पैसा कहां लगाया जाता है। इस पर अनिल कुमार भटनागर का कहना है कि एलआईसी का पैसा कहां निवेश होगा, इसका फैसला एलआईसी की बोर्ड करती है।

जो फैसला बोर्ड करती है, उसकी छानबीन करने के लिए इन्सुरेंस रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ़ इण्डिया होती है। उसके बाद पैसा कहां निवेश किया गया है, इसकी जानकरी भी हम अपने वेबसाइट पर मुहैया करवाते हैं। यह पारदर्शिता नहीं तो और क्या है? फिर भी चलिए एक समय के लिए उनके कमजोर तर्क को भी मान लेते हैं कि एलआईसी में पारदर्शिता नहीं है तो पारदर्शिता लाने के नाम पर एक पूरी कम्पनी बेच दी जाए जो बेतुकी बात है। अगर सरकार को लगता है कि पारदर्शिता नहीं है तो सरकार कुछ प्रशासनिक सुधार के लिए क़दम उठा सकती है, बेचने की बात करना बिल्कुल गलत है।

अनिल कुमार भटनागर आगे कहते हैं कि कुछ टीवी वाले तर्क यह भी दे रहे हैं कि अभी डूबी हुई दिवान हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड में एलआईसी के पैसे का निवेश हुआ था और एलआईसी का पैसा डूब गया। पारदर्शिता आने पर इससे छुटकारा मिलेगा। उनके इस तर्क का जवाब उनकी बात में ही है। जवाब यह है कि बाज़ार या सरकारी उपक्रम यानी सबका पैसा डूब सकता है। जैसे किंगफिशर डूब गयी, जेटएयरवेज का दिवालिया निकल गया। सरकरी कंपनी को बाज़ार के हवाले कर देने से यह नहीं होता कि बाज़ार के लोग जहां लगाएंगे, वहां वह डूबेगा नहीं। इस लिहाज से यह तर्क भी बहुत कमजोर है।

अनिल भटनागर कहते हैं कि एलआईसी को बाज़ार के हवाले करने के पीछे सरकार के पास कोई मज़बूत तर्क नहीं है। बस सरकार को पैसा चाहिए और इस पैसे की कमी को पूरा करने के लिए सरकार अपने सबसे मज़बूत उपक्रम को बर्बाद कर रही है। उस उपक्रम को बर्बाद कर रही है, जो उसके लिए आपातकालीन समय में कई बार सहारा बन चुकी है और आगे भी बनेगी। लेकिन सरकार अपने तत्काल फायदे के लिए भविष्य में होने वाले फायदे के आधार को तबाह कर रही है। एलआईसी के पास मौजूद पैसे के बारे में आप इससे अनुमान लगा सकते हैं कि एलआईसी की जिन सम्पतियों की कीमत खाताबही में सौ करोड़ है, उसकी इस समय बाज़ार में कीमत 5 हज़ार करोड़ से भी अधिक हो सकती है। हो सकता है कि एलआईसी बेचने पर सरकार को पैसा मिले लेकिन इसे बेचने के बाद सरकार अपनी आर्थिक सम्प्रभुता भी गंवा देगी जो भारत की सम्प्रभुता के लिए उचित कदम नहीं है।

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