NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
कानून
सोशल मीडिया
भारत
राजनीति
क्या है ट्विटर, फेसबुक आदि बैन होने का मामला और संदर्भ?
क्या गाइडलाइन भ्रामक जानकारी और फेक न्यूज़ को रोकने के लिए हैं या डिजिटल मीडिया पर अंकुश लगाने के लिए है? क्या ये डिजिटल मीडिया में हो रही सरकार की आलोचना और पूछे जा रहे कड़े सवालों को दबाने और सरकार की छवि को बचाने के लिए तो नहीं हो रहा?
राज कुमार
26 May 2021
Social Media
फ़ोटो साभार: नेशनल हेराल्ड

आप सुर्खियां देख रहे होंगे कि भारत में फेसबुक, ट्विटर आदि सोशल मीडिया माध्यम बैन हो सकते हैं। क्या हैं नई डिजिटल मीडिया गाइडलाइन? क्या ये गाइडलाइन आपत्तिजनक सामग्री पर अंकुश लगाने के लिए हैं या ये सरकार के खिलाफ उठने वाली आवाज़ों को दबाने का मामला है?

क्या गाइडलाइन भ्रामक जानकारी और फेक न्यूज़ को रोकने के लिए हैं या डिजिटल मीडिया पर अंकुश लगाने के लिए है? क्या ये डिजिटल मीडिया में हो रही सरकार की आलोचना और पूछे जा रहे कड़े सवालों को दबाने और सरकार की छवि को बचाने के लिए तो नहीं हो रहा? ये जवाबदेही मांगने वाली आवाज़ को दबाने को लिए तो नहीं हो रहा, क्या है पूरा मामला आइये संदर्भ के साथ समझते हैं?

क्या है मामला?

 25 फरवरी 2021 को इलोक्ट्रॉनिक और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के द्वारा सोशल मीडिया और ओटीटी प्लेटफार्म के लिए गाइडलाइन और डिजिटल मीडिया के लिए आचार संहिता जारी की थी। आप यहां पर क्लिक करके मंत्रालय की प्रेस विज्ञप्ति पढ़ सकते हैं और यहां क्लिक करके प्रेस कॉन्फ्रेंस का वीडियो देख सकते हैं। प्रेस कॉन्फ्रेंस को केंद्रीय मंत्री रवि शंकर प्रसाद और प्रकाश जावडेकर ने संबोधित किया था। इन्हें लागू करने के लिए तीन महीने का समय दिया गया था जो 25 मई को पूरा हो गया है।

इन आचार-संहिताओं पर उस समय भी सवाल उठे थे। ज्यादा जानकारी के लिए इस लेख को पढ़ें। “द वायर” के संस्थापक संपादक एमके वेणु और “द न्यूज़ मिनट” की प्रधान संपादक धन्या राजेंद्रन व “फाउंडेशन फॉर इंडिपेंडेंट जर्नलिस्ट” की तरफ से इन गाइडलाइन और आचार-संहिताओं के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई थी। मात्र इतना ही नहीं बल्कि एडिटर गिल्ड ऑफ इंडिया ने भी चिंता ज़ाहिर की थी कि इन नियमों को डिजिटल मीडिया और स्टेकहोल्डर्स से विचार-विमर्श के बिना अमल में लाया गया है। ये भारत में प्रेस की स्वतंत्रता के लिए गंभीर चिंता का विषय है।

इस बारे में एडिटर गिल्ड ऑफ इंडिया ने 22 मार्च को प्रधानमंत्री को पत्र भी लिखा था और सिलसिलेवार ढंग से नियमों पर अपनी टिप्पणियां दी थीं। ज्यादा जानकारी के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।

 

 ट्विटर, फेसबुक, वाट्सऐप आदि की प्रतिक्रिया

 इकॉनोमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार गूगल और फेसबुक ने नई गाइडलाइन का स्वागत किया है। फेसबुक ने साथ ही कहा है कि कुछ मुद्दों पर सरकार के साथ और चर्चा की ज़रूरत हैं। हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार वाट्सऐप ने इन नियमों पर कानूनी तौर पर दिल्ली में शिकायत दर्ज़ की है। वाट्सऐप का कहना है कि कुछ नियम प्राइवेसी पॉलिसी का उल्लंघन करते हैं। ट्विटर का अभी कोई अधिकारिक बयान नहीं आया है। अनुमान लगाया जा रहा है कि ट्विटर ने छह महीने का समय मांगा है।

हाल ही के फ़र्ज़ी कांग्रेस टूलकिट मामले को भी भूलना नहीं चाहिये। ट्विटर ने टूलकिट मामले में भाजपा के प्रवक्ता संबित पात्रा के ट्वीट को “मेनुपुलेटेड मीडिया” का लेबल दिया था। जिस पर काफी बवाल भी हुआ। ज्यादा जानकारी के लिए इस फैक्ट चेक को पढ़ें। इसके बाद ट्विटर के दिल्ली दफ्तर में पुलिस पहुंच गई थी।

ट्विटर भ्रामक और फ़र्ज़ी सूचनाओं संबंधित पोस्ट को फ्लैग करता है। हाल ही में अमेरिका में हुए चुनाव के दौरान ट्विटर ने ट्विट को फ्लैग करना और उन्हें लेबल देना शुरू किया। ट्विटर ने ऐसा अपनी Civic Integrity Policy के तहत किया है। भारत में ट्विटर ने फ्लैगिंग की शुरुआत दिसंबर 2020 में की। भारत में जिस पहली ट्विट को मेनुपुलेटिड मीडिया के लेबल दिया गया था वो भाजपा आईटी सेल के चीफ अमित मालवीय की थी। जिसे आप इस लिंक पर क्लिक करके देख सकते हैं।

क्या ये सोशल मीडिया पर विरोधी आवाज़ों पर अंकुश लगाने की तैयारी है?

गौरतलब है कि तक़रीबन पूरा मेनस्ट्रीम मीडिया सरकार से सवाल पूछने की बजाय उसके गुणगान और उसकी इमेज बनाने में लगा हुआ है। ऐसे में सोशल मीडिया में ही एक ऐसा स्पेस बचता हैं जहां लोग अपनी बात रख सकते हैं। वो ज़रूरी मुद्दे उठाए जा सकते हैं जिनसे देश की बड़ी आबादी प्रभावित होनी है और मेनस्ट्रीम मीडिया जानबूझकर उनसे ध्यान भटका रहा है। हम लगातार देखते रहे हैं कि सोशल मीडिया पर पोस्ट की वज़ह से कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और संगठनों आदि पर कार्यवाहियां की गई हैं। हालिया उदाहरण लीजिये जब किसान आंदोलन के बारे में पोस्ट करने की वज़ह से पत्रकारों, कार्यकर्ताओं और संगठनों के तकरीबन 250 ट्विटर अकाउंट को सस्पेंड कर दिया गया था। भारत सरकार ने न्यायिक मांग करके इन ट्विटर अकाउंट को सस्पेंड कराया था। जिसमें सांसद, विधायक, राजनीतिक पार्टी, किसान नेता और स्वयं किसान एकता मंच का ट्विटर अकाउंट भी शामिल था।

स्मरण रहे कि किसान आंदोलन के दौरान मेनस्ट्रीम मीडिया ने किसान आंदोलन को कमज़ोर और बदनाम करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी थी। ऐसे में यूट्यूब और सोशल मीडिया पर पेज आदि बनाकर पत्रकारों ने किसान आंदोलन की रिपोर्टिंग की थी। बहुत सारे स्थानीय सामुदायिक पत्रकारों ने नागरिक पत्रकारिता की थी। ये नागरिक पत्रकार और इनके पेज़ भी इन नियमों से प्रभावित होंगे।

जब सरकार का प्रमुख काम ही नैरेटिव गढ़ना और हेडलाइन मैंनेज़मेंट हो तो ऐसे में इस फ्री स्पेस को कैसे बर्दाश्त किया जा सकता है।

क्या सरकार डिजिटल मीडिया पर अंकुश लगाना चाहती है?

असल में मुख्य धारा के मीडिया पर नियंत्रण के बावजूद सरकार अपनी छवि को लेकर संतुष्ट नहीं है। डिजिटल मीडिया सरकार के लिए परेशानी का सबब बना हुआ है। पिछले साल से मंत्रियों का एक समूह मीडिया खासकर डिजिटल मीडिया में सरकार की छवि को सुधारने के लिए एक रिपोर्ट तैयार कर रहा था। इस बारे हिंदुस्तान टाइम्स की 8 दिसंबर 2020 की ये रिपोर्ट देखी जा सकती है। मंत्रियों के इस समूह में अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी, संचार, इलेक्‍ट्रानिक्‍स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री रविशंकर प्रसाद, कपड़ा मंत्री तथा महिला एवं बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी, मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर, विदेश मंत्री एस जयशंकर और राज्यमंत्री हरदीप सिंह पुरी, अनुराग ठाकुर, बाबुल सुप्रियो और किरेन रिजिजू शामिलथे। इस समूह की छह बैठकें हुईं और मीडिया क्षेत्र के विशिष्ट व्यक्तियों, उद्योग और व्यवसायिक चेंबरों के सदस्यों, अन्य विशिष्ट व्यक्तित्वों के साथ भी परामर्श किया गया। जिसके आधार पर एक रिपोर्ट तैयार की गई। द कारवां पत्रिका ने उस रिपोर्ट को हासिल किया है। “द कारवां” पत्रिका के राजनैतिक संपादक हरतोष सिंह बल का लेखपढ़ सकते हैं।

कारवां के अनुसार डिजिटल मीडिया को लेकर सरकार की चिंता पूरी रिपोर्ट में दिखाई देती है। रिलायंस द्वारा फंडेड थिंक टैंक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के डिस्टिंग्विश्ड (विशिष्ट) फेलो कंचन गुप्ता ने रिपोर्ट में सरकार को बताया है कि वह किस पर फोकस करे। उन्होंने कहा है, “गूगल द प्रिंट, वायर, स्क्रॉल, हिंदू आदि को प्रमोट करता है जो ऑनलाइन न्यूज प्लेटफॉर्म हैं। इन्हें कैसे हैंडल करना है इसके लिए अलग से चर्चा की जरूरत है।”

केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने नैरेटिव पर नियंत्रण न रख पाने की अपनी बेचैनी जाहिर की। उन्होंने कहा, “हालांकि हमें सटीक सुझाव मिलते हैं लेकिन यह समझ नहीं आता कि सरकार में होने के बावजूद स्क्रॉल, वायर और कुछेक क्षेत्रीय ऑनलाइन मीडिया की बराबरी क्यों नहीं कर पाते। मीडिया पर हमारा दख़ल विस्तारित नहीं हो रही है।”

सरकार ने नैरेटिव पर पकड़ कायम करने की अपनी रणनीति को एक नाम भी दिया है : “पोखरण इफेक्ट”। आरएसएस के विचारक गुरुमूर्ति रिपोर्ट में बताए गए विशिष्ट व्यक्तित्वों में से एक हैं। गुरुमूर्ति ने विस्तार से बताया है कि कैसे पोखरण की तर्ज पर “इको सिस्टम” को बदला जाना चाहिए, कैसे मीडिया की शत्रुता को हैंडल करना चाहिए और कैसे मेन लाइन मीडिया की चिंता करनी चाहिए? हमें नैरेविट बदलने के लिए पोखरण की जरूरत है।”

रिपोर्ट में स्मृति ईरानी ने सुझाव दिया है कि निरंतर 50 नेगेटिव और पॉजिटिव इनफ्लुएंसर को ट्रैक किया जाए। इसके ज़िम्मेदरी इलैक्ट्रोनिक मीडिया मॉनिटरिंग सेंटर को सौंपी गई है जो सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अधीन आता है।

भूतपूर्व मीडिया कर्मी और अब बीजेपी के राज्य सभा सांसद स्वप्न दासगुप्ता के जिक्र के साथ रिपोर्ट में दर्ज़ है कि पर्दे के पीछे से पत्रकारों के साथ संवाद शुरु करना चाहिये और उन्हें अतिरिक्त तौर पर कुछ दिया जाना चाहिए। मीडिया कर्मी और प्रसार भारती प्रमुख सूर्य प्रकाश ने कहा, “पहले छद्म धर्मनिरपेक्षतावादियों को हाशिए पर कर दिया गया था। उन्हीं से यह परेशानी शुरू हो रही है।”

भूतपूर्व मीडियाकर्मी नितिन गोखले जो अब राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के करीबी हैं, उन्होंने कहा कि कलर कोडिंग की प्रक्रिया शुरू की जानी चाहिए। “हरा : फेंस सिटर (जो किसा का पक्ष नहीं लेते), काला : जो हमारे खिलाफ हैं, और सफेद : जो हमारा समर्थन करते हैं। हमें अपने पक्षधर पत्रकारों का समर्थन करना और उन्हें प्रोत्साहन देना चाहिए।”

कानून मंत्री ने सिफारिश की कि "कुछ प्रतिष्ठित शिक्षाविदों, कुलपतियों, सेवानिवृत्त आईएफएस अधिकारियों आदि की पहचान की जानी चाहिए जो हमारी उपलब्धियों को लिख सकें और हमारे नजरिए को पेश कर सकते हैं।"

रिपोर्ट सुझाती है, "अच्छा तर्क करने में सक्षम व्यक्तियों की पहचान करें, एक ही तथ्यों को अलग-अलग संदर्भों के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। इसलिए, ऐसे माहिर स्पिन डॉक्टरों (तर्कबाजों) की पहचान की जानी चाहिए और उनका उपयोग किया जाना चाहिए जो सरकार के लिए यह कर सकते हैं।” ऐसे लोगों को खोजने की ज़िम्मेदारी सूचना और प्रसारण मंत्रालय को दी गई है।

ओपइंडिया की संपादक नूपुर शर्मा ने निःसंकोच सिफारिश की, "ओप-इंडिया जैसे ऑनलाइन पोर्टल को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।" अभिजीत मजुमदार, जो पहले मेल टुडे में थे, ने यह कहने के बाद कि ऑल्ट न्यूज "शातिराना" है, शर्मा का साथ देते हुए कहा, "ओप-इंडिया की मदद करें और ओप-इंडिया के ट्विट्स को री-ट्विट करें।"

ओप-इंडिया एक दक्षिणपंथी प्रोपगेंडा वेबसाइट है जो फ़र्जी समाचार और सरकारी प्रोपगेंडा के लिए बदनाम है। ऑल्ट न्यूज एक फैक्ट चेकिंग वेबसाइट है जिसने ओपइंडिया द्वारा फैलाई गई गलत सूचनाओं को बार-बार उजागर किया है।

जीओएम ने सुझावों को नोट किया और लागू करने का जिम्मा एमआईबी को सौंप दिया। रिपोर्ट में कहा गया है, "ऑनलाइन पोर्टलों को बढ़ावा दें। (ओप इंडिया जैसे) ऑनलाइन पोर्टल को बढ़ावा देना और उसका समर्थन करना आवश्यक है क्योंकि मौजूदा ऑनलाइन पोर्टलों में से अधिकांश सरकार के प्रति आलोचनात्मक हैं।"

सरकार द्वारा लागू की गई डिजिटल मीडिया गाइडलाइन और आचार-संहिता को उपरोक्त रिपोर्ट के संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए। स्पष्ट है कि ये नये कानून डिजिटल मीडिया पर अंकुश लगाने की मंशा से लाए गए हैं और प्रेस की आज़ादी के लिए गंभीर चिंता के सबब हैं। 

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार एवं ट्रेनर हैं। आप सरकारी योजनाओं से संबंधित दावों और वायरल संदेशों की पड़ताल भी करते हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

Digital Media
Editors guild of india
Ministry of Information and Broadcasting
ravi shankar prasad

Related Stories

किसान आंदोलन का मीडिया कवरेज क्यों सवालों के घेरे में है?

कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद बोले- शाहीन बाग प्रदर्शनकारियों से बातचीत के लिए तैयार सरकार

महँगी होती मीडिया की पढ़ाई, महरूम होते आम लोग


बाकी खबरें

  • LAW AND LIFE
    सत्यम श्रीवास्तव
    मानवाधिकारों और न्याय-व्यवस्था का मखौल उड़ाता उत्तर प्रदेश : मानवाधिकार समूहों की संयुक्त रिपोर्ट
    30 Oct 2021
    29 अक्तूबर को जारी हुई एक रिपोर्ट ‘कानून और ज़िंदगियों की संस्थागत मौत: उत्तर प्रदेश में पुलिस द्वारा हत्याएं और उन्हें छिपाने की साजिशें’ हमें उत्तर प्रदेश में मौजूदा कानून व्यवस्था के हालात को बेहद…
  • migrant
    सोनिया यादव
    महामारी का दर्द: साल 2020 में दिहाड़ी मज़दूरों ने  की सबसे ज़्यादा आत्महत्या
    30 Oct 2021
    एनसीआरबी के आँकड़ों के मुताबिक़ पिछले साल भारत में तकरीबन 1 लाख 53 हज़ार लोगों ने आत्महत्या की, जिसमें से सबसे ज़्यादा तकरीबन 37 हज़ार दिहाड़ी मजदूर थे।
  • UP
    लाल बहादुर सिंह
    आंदोलन की ताकतें व वाम-लोकतांत्रिक शक्तियां ही भाजपा-विरोधी मोर्चेबन्दी को विश्वसनीय विकल्प बना सकती है, जाति-गठजोड़ नहीं
    30 Oct 2021
    पिछले 3 चुनावों का अनुभव गवाह है कि महज जातियों के जोड़ गणित से भाजपा का बाल भी बांका नहीं हुआ, इतिहास साक्षी है कि जोड़-तोड़ से सरकार बदल भी जाय तो जनता के जीवन में तो कोई बड़ी तब्दीली नहीं ही आती, संकट…
  • Children playing in front of the Dhepagudi UP school in their village in Muniguda
    राखी घोष
    ओडिशा: रिपोर्ट के मुताबिक, स्कूल बंद होने से ग्रामीण क्षेत्रों में निम्न-आय वाले परिवारों के बच्चे सबसे अधिक प्रभावित
    30 Oct 2021
    रिपोर्ट इस तथ्य का खुलासा करती है कि जब अगस्त 2021 में सर्वेक्षण किया गया था तो ग्रामीण क्षेत्रों में केवल 28% बच्चे ही नियमित तौर पर पठन-पाठन कर रहे थे, जबकि 37% बच्चों ने अध्ययन बंद कर दिया था।…
  • climate change
    संदीपन तालुकदार
    जलवायु परिवर्तन रिपोर्ट : अमीर देशों ने नहीं की ग़रीब देशों की मदद, विस्थापन रोकने पर किये करोड़ों ख़र्च
    30 Oct 2021
    रिपोर्ट के अनुसार, विकसित देश भारी हथियारों से लैस एजेंटों को तैनात करके, परिष्कृत और महंगी निगरानी प्रणाली, मानव रहित हवाई प्रणाली आदि विकसित करके पलायन को रोकने के लिए एक ''जलवायु दीवार'' का…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License