NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
इलाहाबाद विश्वविद्यालय : अब नहीं बदलेगा नाम, छात्र आंदोलन की बड़ी जीत
विश्वविद्यालय के छात्रों ने नाम न बदले जाने पर खुशी जाहिर करते हुए एग्जीक्यूटिव काउंसिल के फैसले का स्वागत किया है। छात्रों का कहना है कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय सवा सौ साल पुराना है और यह अपने नाम में ही तमाम स्वर्णिम इतिहास समेटे हुए है। ऐसे में विश्वविद्यालय का नाम ही उसकी धरोहर है, इससे छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
सोनिया यादव
13 May 2020
इलाहाबाद विश्वविद्यालय
Image courtesy: Prediction Junction

“इलाहाबाद विश्वविद्यालय सिर्फ एक नाम नहीं है, बल्कि सदियों से थाती समेटे हुए गौरव चिह्न है।”

ये शब्द इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ की पूर्व अध्यक्ष और समाजवादी पार्टी की नेता ऋचा सिंह के हैं। ऋचा विश्वविद्यालय के नाम न बदले जाने के फैसले पर एग्जीक्यूटिव काउंसिल को धन्यवाद देते हुए कहती हैं कि दुनियाभर में इलाहाबाद विश्वविद्यालय की पहचान इसके नाम से है और यही हम सबका सम्मान है।

बता दें कि इलाहाबाद शहर का नाम बदले जाने के बाद से ही ‘पूरब का ऑक्सफ़ोर्ड’ कहे जाने वाले इलाहाबाद विश्वविद्यालय का नाम बदलने की कवायद भी शुरू हो गई थी। मानव संसाधन विकास मंत्रालय, उत्तर प्रदेश सरकार के निर्देश पर विश्वविद्यालय प्रशासन ने कार्यकारिणी परिषद के सदस्यों से इस प्रस्ताव पर ईमेल के जरिए राय मांगी थी। जिसके जवाब में काउंसिल के 15 में से 12 सदस्यों ने नाम बदलने का विरोध किया, जबकि तीन ने कोई जवाब ही नहीं दिया। इसके बाद अब ये प्रस्ताव खारिज हो गया है। 

विश्वविद्यालय के छात्रों ने नाम न बदले जाने पर खुशी जाहिर करते हुए एग्जीक्यूटिव काउंसिल के फैसले का स्वागत किया है। छात्रों का कहना है कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय सवा सौ साल पुराना है और यह अपने नाम में ही तमाम स्वर्णिम इतिहास समेटे हुए है। ऐसे में विश्वविद्यालय का नाम ही उसकी धरोहर है, इससे छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

बीकॉम की छात्रा ममता ने न्यूज़क्लिक से बातचीत में कहा, “जिस तरह हमारा नाम हमारी पहचान है, उसी तरह विश्वविद्यालय का नाम ही उसकी पहचान है। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी को हम इलाहाबाद के बिना कभी सोच ही नहीं सकते। मुझे खुशी है कि फैसला छात्रों के पक्ष में आया, नहीं तो हमें आने वाले दिनों में बड़ा आंदोलन देखने को मिल सकता था।

क्या है पूरा मामला?

नाम बदलने में माहिर उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने साल 2018 में इलाहाबाद शहर का नाम प्रयागराज कर दिया था। जिसके बाद फरवरी 2020 में रेलवे स्टेशन का नाम भी इलाहाबाद जंक्शन से बदल कर प्रयागराज जंक्शन कर दिया गया और फिर जोर-शोर से चर्चा शुरू हो गई शहर में बसी प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी यानी इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के नाम बदलने की।

विश्वविद्यालय का नाम बदलकर प्रयागराज विश्वविद्यालय करने का पहला प्रयास उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव ने किया था। उन्होंने चार दिसंबर 2018 को केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय (एचआरडी) के सचिव को पत्र लिखकर नाम बदलने की मांग की। 11 दिसंबर 2018 को मंत्रालय को रिमाइंडर भेजा। इसके बाद तत्कालीन मंडलायुक्त आशीष गोयल ने 27 नवंबर 2019 को उत्तर प्रदेश के उच्च शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव को पत्र लिखकर नाम बदलने की मांग की। इसी बीच एचआरडी के डिप्टी सेक्रेटरी राजू सारस्वत ने 10 फरवरी 2020 को पत्र लिखकर विश्वविद्यालय प्रशासन से सुझाव मांगा।

इसे पढ़े: क्या अब “इलाहाबाद विश्वविद्यालय” नहीं रहेगा?

छात्र संगठनों ने जमकर किया विरोध

मामला तब सुर्खियों में आया जब विश्वविद्यालय प्रशासन ने इस प्रस्ताव को इस साल मार्च में होने वाली कार्यकारिणी परिषद के एजेंडे में शामिल कर लिया। एक ओर प्रशासन तैयारी में लग गया तो वहीं दूसरी ओर छात्र संगठनों ने इसका जमकर विरोध शुरू कर दिया। 19 मार्च को छात्रों ने छात्रसंघ भवन पर प्रदर्शन किया और कार्यवाहक कुलपति प्रो. आरआर तिवारी का पुतला फूंका।

हालांकि कोरोना वायरस के चलते मार्च में ये बैठक तो नहीं हो पाई, लेकिन छात्रों का विरोध लगातार जारी रहा। विश्वविद्यालय के कई पूर्व छात्रों ने भी नाम बदलने को लेकर अपनी आपत्ती दर्ज करवाई। सोशल मीडिया पर एक कैंपेन भी चलाया गया, जिसमें पूर्व छात्रों द्वारा नाम न बदलने की अपील की गई।

विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र अभिषेक तिवारी बताते हैं, “सोशल मीडिया के जरिए इस मुद्दे को जनमानस का मुद्दा बनाने के लिए इलाहाबाद हेरिटेज सोसाइटी की ओर से नाम बदलने के खिलाफ ऑनलाइन रिट याचिका तैयार की गई थी। इस याचिका का समर्थन करने वालों में विश्वविद्यालय के सेवानिवृत और सेवारत शिक्षकों के साथ ही वर्तमान और पुरा छात्र, शोधार्थी और बड़ी संख्या में शहर के प्रबुद्ध लोग भी शामिल हैं। अभी तक हमें पांच हजार से अधिक लोगों का समर्थन भी प्राप्त हो चुका है।”

अभिषेक आगे कहते हैं कि नाम न बदलने का फैसला छात्र आंदोलन की बड़ी जीत है। इस लॉकडाउन के समय में भी छात्रों ने विभिन्न माध्यमों से विरोध जारी रखा। हम सभी का एक ही मकसद है इस विश्वविद्यालय की गरिमा बचाए रखना। वर्तमान नाम में इस यूनिवर्सिटी को लेकर जो गौरव बोध होता है, वह किसी और नाम में नहीं होगा। इससे तमाम दिक्कतें बढ़ेंगीं इसलिए नाम बदलना कतई उचित नहीं है।

एक ओर संसद में जहां प्रयागराज की फूलपुर लोकसभा सीट से सांसद केशरी देवी पटेल और कौशांबी के सांसद विनोद सोनकर ने विश्वविद्यालय के नाम बदलने का मुद्दा उठाया तो वहीं छात्र इस मामले को लेकर  इलाहाबाद हाईकोर्ट और फिर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद तक पहुंच गए।

छात्रसंघ की पूर्व अध्यक्ष ऋचा सिंह ने सांसद विनोद सोनकर को पत्र लिखकर विश्वविद्यालय का नाम बदले जाने के प्रस्ताव पर अपना विरोध दर्ज करवाया। पूर्व उपाध्यक्ष आदिल हमजा ने नाम न बदलने को लेकर खून से पत्र तक लिखा दिया। हाइकोर्ट में भी याचिका दाखिल करने की तैयारी हो गई। सपा एमएलसी वासुदेव यादव ने भी राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को को नाम न बदलने को लेकर पत्र लिखा था।

नाम बदलने के विरोध में लगभग सभी छात्र संगठन एकजुट नजर आए। एनएसयूआई ने मांग कि की सरकार नाम बदलने की बजाय इविवि की शैक्षिक गुणवत्ता में सुधार के प्रयास करे, जिसका छात्रों, शोधार्थियों और समाज को फायदा होगा।

क्यों नहीं बदला नाम?

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के जनसंपर्क अधिकारी डॉ. शैलेंद्र कुमार मिश्रा ने बताया कि कार्य परिषद के 12 परिषदों ने कहा कि यूनिवर्सिटी का नाम बदलने की कोई जरूरत नहीं है।

उन्होंने कहा, “इस मुद्दे पर मार्च में प्रस्तावित कार्यकारिणी परिषद की बैठक में चर्चा होनी थी लेकिन लॉकडाउन के कारण ये संभव नहीं हो सका, इसलिए ई-मेल के जरिए सभी सदस्यों से सोमवार, 12 मई को जवाब मांगे गए थे, फिर वही ईमेल एमएचआरडी को भी भेज दिया गया है।”

विश्वविद्यालय के एक प्रशासनिक अधिकारी के अनुसार, एग्जीक्यूटिव काउंसिल के सदस्यों ने अपने फैसले में कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं को सामने रखा। जिसमें छात्रों के विरोध को भी संज्ञान में लिया गया।

  • नाम बदलने के प्रोसेस में डॉक्यूमेंटेशन का काफी काम बढ़ जाएगा, पूर्व छात्रों को भी कई दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है। मार्कशीट, डिग्री आदि में नाम बदलना बहुत मुश्किल है, जिसमें बहुत समय निकल जाएगा।
  • कई अन्य शहरों के विश्वविद्यालओं के नाम भी जस के तस बने हुए हैं, उदाहरण मद्रास यूनिवर्सिटी और कलकत्ता यूनिवर्सिटी का है, जहां शहर का नाम बदलने के बाद भी शिक्षण संस्थानों का नाम नहीं बदला है।
  • प्रयागराज शहर का नाम जरूर बदल गया है लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट का नाम अभी तक नहीं बदला गया है तो ऐसे में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी का नाम भी नहीं बदला जाना चाहिए।

ऋचा सिंह ने न्यूज़क्लिक से बातचीत में कहा, “इलाहाबाद विश्वविद्यालय का 132 साल पुराना गौरवशाली इतिहास रहा है। यह नाम मात्र संज्ञा नहीं है, बल्कि विशेषणों का समूह है। हमें इस पर गर्व है और यही हमारी पहचान है।”

इलाहाबाद विश्वविद्यालय का इतिहास

इलाहाबाद विश्वविद्यालय की स्थापना ब्रिटिश हुकूमत में 23 सितंबर 1887 को हुई थी। अस्तित्व में आने के बाद से ये विश्वविद्यालय देश के नामचीन विश्वविद्यालयों में शामिल रहा है। वर्ष 2005 में इसे केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा मिला। ‘पूरब का ऑक्सफ़ोर्ड’ के नाम से दुनिया में पहचान बनाने वाले इस विश्वविद्यालय की अपनी एक अलग पहचान है। पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह और चंद्रशेखर के अलावा कई बड़े राजनेता, सुप्रीम कोर्ट के जज, पत्रकार और नौकरशाह इस यूनिवर्सिटी से पढ़कर निकले हैं।

UttarPradesh
Allahabad University
Name Change Politics
student movement
student union
Union Ministry of Human Resource Development
HRD

Related Stories

बदायूं : मुस्लिम युवक के टॉर्चर को लेकर यूपी पुलिस पर फिर उठे सवाल

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

यूपी में  पुरानी पेंशन बहाली व अन्य मांगों को लेकर राज्य कर्मचारियों का प्रदर्शन

मलियाना नरसंहार के 35 साल, क्या मिल पाया पीड़ितों को इंसाफ?

ख़ान और ज़फ़र के रौशन चेहरे, कालिख़ तो ख़ुद पे पुती है

मनरेगा मज़दूरों के मेहनताने पर आख़िर कौन डाल रहा है डाका?

लखनऊ विश्वविद्यालय में एबीवीपी का हंगामा: प्रोफ़ेसर और दलित चिंतक रविकांत चंदन का घेराव, धमकी

ज्ञानवापी मस्जिद सर्वे: कोर्ट कमिश्नर बदलने के मामले में मंगलवार को फ़ैसला

ज्ञानवापी विवाद में नया मोड़, वादी राखी सिंह वापस लेने जा रही हैं केस, जानिए क्यों?  

ज्ञानवापी मस्जिद सर्वे: कमिश्नर बदलने की याचिका पर फ़ैसला सुरक्षित, अगली सुनवाई 9 को


बाकी खबरें

  • gautam navlakha
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    एल्गार परिषद: नवलखा को तलोजा जेल के 'अंडा सेल' में भेजा गया, सहबा हुसैन बोलीं- बिगड़ गई है तबीयत
    25 Oct 2021
    हुसैन ने पूछा- “नवलखा को उनके विचारों के लिए कब तक सताया जाएगा और अधिकारी उनकी विचारधारा को तोड़ने के लिए किस हद तक जाएंगे।''
  • skm
    लाल बहादुर सिंह
    किसान आंदोलन को उसके उन "शुभचिंतकों" से बचाना होगा जो संघ-भाजपा की भाषा बोल रहे हैं 
    25 Oct 2021
    जाहिर है मुद्दा  आधारित आंदोलन में सबका विचार हर प्रश्न पर एक हो, इसके लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। लेकिन आंदोलन की unity in action हर हाल में बनी रहे, इसे बेशक सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
  • Sardar Udham
    हर्षवर्धन, अंकुर गोस्वामी
    सरदार उधम: एक अंतरराष्ट्रीय क्रांतिकारी की महागाथा
    25 Oct 2021
    निर्देशक ने निश्चित ही एक ऐतिहासिक किरदार के जीवन के अनछुए पहलुओं को दर्शाने  के लिए गहरा शोध किया है। फिल्म यह भली प्रकार से दिखाती है कि उधम सिंह, सिर्फ बदले की भावना से प्रेरित एक जोशीले नौजवान…
  • congress
    शुभम शर्मा, अजय सहारन
    क्रांतिकारी और कांग्रेस
    25 Oct 2021
    क्रांतिकारियों, कम्युनिस्टों और समाजवादियों ने कांग्रेस पार्टी को अलग दिशा के बजाय संपूर्ण बदलाव और प्रगतिशील दिशाओं के रास्ते पर आगे चलने के लिए हमेशा मजबूर किया है।
  • RASHEED KIDWAI
    शिरीष खरे
    चर्चा में नई किताब 'भारत के प्रधानमंत्री'
    25 Oct 2021
    कश्मीर पर नेहरू की नीति कितनी उचित है या अनुचित, यह समझने के लिए हमें वर्ष 1947 के अगस्त से अक्टूबर के महीनों में जाना होगा। और इसमें हमारी मदद कर सकती है, पत्रकार रशीद किदवई की नई पुस्तक 'भारत के…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License