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एक आधुनिक लोकतांत्रिक राष्ट्रनिर्माण की डॉ. आंबेडकर की परियोजना आज गहरे संकट में
डॉ. आंबेडकर एक आधुनिक लोकतांत्रिक राष्ट्रनिर्माण की परियोजना के सबसे बड़े सिद्धान्तकारों और शिल्पियों में थे। आज देश में वह परियोजना गहरे संकट में फंस गई है। डॉ. आंबेडकर की जयंती उनके आह्वान के अनुरूप फ़ासीवादी हिन्दूराष्ट्र की मुहिम को रोकने का संकल्प बने।
लाल बहादुर सिंह
14 Apr 2022
ambedkar

डॉ. आंबेडकर की जयंती जनता के लिए तो बेहद प्रासंगिक है ही, स्वयं भाजपा और मोदी ने अपने नेताओं-कार्यकर्ताओं से इसे इस वर्ष पुरजोर ढंग से observe करने  का आह्वान किया है। जहां यह नागरिकों और उत्पीड़ित दलित जनता के लिए डॉ. आंबेडकर के जीवन-संघर्ष से प्रेरणा लेने और संवैधानिक मूल्यों पर हो रहे हमलों के खिलाफ कृतसंकल्प होने का अवसर है, वहीं  भाजपा और मोदी के लिए यह डॉ. आंबेडकर के प्रति अपने छद्म सम्मान का प्रदर्शन करते हुए दलितों का भावनात्मक दोहन कर उन्हें अपनी हिंदुत्व की छतरी के नीचे ले आने की अवसरवादी कवायद है। सावरकर का जो आह्वान था, " सम्पूर्ण राजनीति का हिन्दुत्वकरण और हिंदुओं का सैन्यीकरण", संघ के उस प्रोजेक्ट में निर्णायक मील का पत्थर दलितों का हिन्दुत्वकरण है। 

दरअसल, ऐतिहासिक रूप से दलितों का हिन्दुत्वकरण संघ-परिवार के लिए सबसे बड़ी चुनौती रहा है। इसके दोनों ही कारण थे। वैसे तो हिंदुत्व की समग्र परियोजना एक आधुनिक फासीवादी प्रोजेक्ट है, पर सवर्ण वर्चस्व और ब्राह्मणवाद इसके मूल संघटक तत्वों में है। दलित सदियों से ब्राह्मणवादी व्यवस्था के सबसे बड़े शिकार रहे हैं। इसलिए, दलित समुदाय के लिए संघ सबसे अस्वाभाविक choice ही हो सकता था। दलित चेतना के आधुनिक विकास पर डॉ. आंबेडकर की गहरी छाप ने भी उन्हें लंबे दौर तक हिंदुत्व से अलग रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। रिपब्लिकन पार्टी के बड़ा राष्ट्रीय स्वरूप न ग्रहण कर पाने तथा डॉ. आंबेडकर के निधन के बाद कालांतर में उसके बिखराव के कारण दलित लंबे समय तक कांग्रेस की राजनैतिक छतरी के नीचे बने रहे। लेकिन कांग्रेस से दलितों के बढ़ते मोहभंग को कांशीराम के बहुजन आंदोलन ने एक नई दिशा दी और बसपा एक बड़ी राजनैतिक ताकत बन गयी। बाद में बसपा ने अपने राजनीतिक अवसरवाद में संघ और भाजपा को दलितों के बीच स्वीकार्य बनाने का रास्ता खोला और दलितों के हिन्दुत्वकरण की जमीन तैयार की। मायावती को 3 बार मुख्यमंत्री बनने में भाजपा ने मदद की। उसी दौर में गोधरा कांड  के बाद मुस्लिम विरोधी हिंसा की पृष्ठभूमि में हो रहे मोदी के जीवन के पहले निर्णायक चुनाव में मायावती जी मोदी के साथ उनके प्रचार में गईं और उन्होंने मोदी पर उस हिंसा के आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया।

एक ideological movement के बतौर तो बसपा का पतन पहले ही हो गया था, अब जब political पार्टी के बतौर बसपा का पराभव हो रहा है, भाजपा की निगाह उनके कोर वोट-बैंक जाटव समुदाय पर है। गैर-जाटव दलितों को तो वह दलित समुदाय के अंदर मौजूद फॉल्ट-लाइन्स तथा मायावती से उनके अलगाव का फायदा उठाकर पहले ही अपने साथ ले जा चुकी है। इस पर मायावती को लेकर संघ-भाजपा की पूरी रणनीति अभी unfold होनी बाकी है।

डॉ. आंबेडकर एक आधुनिक लोकतांत्रिक राष्ट्रनिर्माण की परियोजना के सबसे बड़े सिद्धान्तकारों और शिल्पियों में थे। आज देश में वह परियोजना गहरे संकट में फंस गई है। 

आज देश में संवैधानिक मूल्यों के लिए जो संकट है, वह अभूतपूर्व है। यह सत्ता संरक्षित बहुसंख्यकवादी फासीवादी अभियान कई अर्थों में 1975 के आपातकाल या 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के दौर से अधिक संगीन है। आपातकाल सत्ता की निरंकुशता थी, जिसे जनसमर्थन अथवा सामाजिक वैधता नहीं प्राप्त थी। उल्टे सरकार के ख़िलाफ़ जनता का एक ताकतवर आंदोलन था जिसे दबाने के लिए ही इमरजेंसी लगी थी। जनता ने पहला मौका मिलते ही प्रचंड बहुमत से इंदिरा गांधी की सत्ता को उखाड़ फेंका था।

ठीक इसी तरह बाबरी मस्जिद विध्वंस के दौर में फासीवादी अभियान को केंद्रीय सत्ता का संरक्षण नहीं प्राप्त था। मस्जिद गिरने के बाद जनता और विपक्ष की ओर से जबरदस्त प्रतिक्रिया (backlash ) हुई, भाजपा की तीन तीन राज्य सरकारें बर्खास्त हुई थीं,  उसके तुरन्त बाद UP में ही भाजपा सत्ता से बाहर हो गयी थी।

लेकिन आज majoritarian फासीवादी अभियान को सत्ता का खुला संरक्षण प्राप्त है, संवैधानिक संस्थाएं पंगु हैं। विपक्ष ने जैसे हथियार डाल दिये हैं। किसी सशक्त विरोधी नैरेटिव के अभाव में फासीवादी प्रचार अभियान बहुसंख्यकों के बीच एक तरह की सामाजिक वैधता अर्जित करने की जीतोड़ कोशिश में लगा है।

डॉ. आंबेडकर आधुनिक राष्ट्रनिर्माण की राह में आने वाले इन खतरों को समझते थे और उन्हें लेकर उन्होंने आगाह किया था। हिन्दूराष्ट्र को लेकर उन्होंने चेतावनी दी था, " अगर वास्तव में हिन्दूराज बन जाता है तो निस्संदेह इस देश के लिए भारी खतरा उतपन्न हो जाएगा। हिंदुत्व स्वतंत्रता-समानता-बंधुत्व के लिए खतरा है। इस कारण जनतंत्र के लिए यह अनुपयुक्त है। हिन्दू राज को हर कीमत पर रोका जाना चाहिए।"

हिन्दू राष्ट्र को पूरी तरह खारिज करते हुए उन्होंने आधुनिक राष्ट्रनिर्माण की एकल प्रक्रिया के अंग  के बतौर जाति-विनाश, सामाजिक लोकतन्त्र से संपुष्ट राजनीतिक लोकतन्त्र तथा राजकीय समाजवाद के आर्थिक कार्यक्रम का प्रस्ताव किया था।

आज जो लोग आंबेडकर के जाति प्रश्न पर विचार को, उनके हिंदुत्व और राष्ट्रवाद पर विचार से, संवैधानिक लोकतन्त्र के भविष्य सम्बन्धी विचार से अथवा सामाजिक लोकतन्त्र और राजकीय समाजवाद के विचार से अलग काट कर देखते हैं, वे उनके साथ अन्याय करते हैं। आंबेडकर के लिए यह सब आधुनिक राष्ट्रनिर्माण की एकल प्रक्रिया का हिस्सा था। उन्हें अलग अलग करके देखने वाले, एक पक्ष को पकड़कर,दूसरे पहलुओं की अनदेखी करने वाले अथवा उन्हें एक दूसरे के खिलाफ खड़ा करने वाले गलत निष्कर्ष पर पहुंचते हैं। अक्सर  अवसरवादी राजनीतिक ताकतें अपने निहित स्वार्थ के लिए ऐसा करती हैं। 

एक आधुनिक लोकतांत्रिक राष्ट्र-निर्माण की अपनी परियोजना के तहत जहां वे जाति-विनाश, दलितों की बराबरी और मानवोचित गरिमा की लड़ाई वैचारिक और आंदोलनात्मक-राजनीतिक औजारों से लड़ते रहे, उन्हें कानूनी-संवैधानिक जामा पहनाने की जद्दोजेहद करते रहे, वहीं जमीन का राष्ट्रीयकरण करने तथा जमीन जोतने वाले किसानों के बीच उसके बंटवारे की वकालत करते रहे। उन्होंने कहा, " भूमि गांव के लोगों को जाति या पंथ के भेदभाव के बिना पट्टे पर दी जायेगी और  ऐसी रीति से पट्टे पर दी जाएगी कि कोई जमींदार न रहे, कोई पट्टेदार न रहे और न कोई भूमिहीन मजदूर रहे।" (States and Minorities)

इसके माध्यम से वे दलितों की अधिकार-विहीनता के मूल अर्थात भूमिहीनता को खत्म करना और सामंतवाद-ब्राह्मणवाद के भौतिक आधार को ध्वस्त करना चाहते थे। उद्यमों के राष्ट्रीयकरण की उनकी वकालत का महत्व आज आम जनता के लिए, विशेषकर वंचितों-दलितों के लिए स्वतः सिद्ध है जब मोदी सरकार सब कुछ कारपोरेट के हाथों सौंप देने पर आमादा है और शिक्षा, स्वास्थ्य, सरकारी नौकरियां, आरक्षण सब कुछ दांव पर लगा चुकी है। भारत के लोकतन्त्र के भविष्य को लेकर उनकी दो सबसे बड़ी चिंताएं थीं। संविधान सभा के अपने चर्चित अंतिम भाषण ने उन्होंने चेतावनी दी थी कि आने वाले दिनों में देश में सामाजिक लोकतंत्र (सामाजिक-आर्थिक बराबरी) स्थापित न हुआ तो हमारा राजनीतिक लोकतंत्र भी खतरे में पड़ जायेगा।

आज वह सामाजिक लोकतंत्र जितने गहरे  खतरे में है, उसी अनुपात में राजनीतिक लोकतंत्र के लिए भी खतरा खड़ा हो गया है। कारपोरेट-हिंदुत्व के उत्थान के मौजूदा दौर में वर्चस्वशाली तबकों तथा वंचितों के बीच की सामाजिक खाईं (social gulf) जितनी चौड़ी हो चुकी है, शायद इतिहास में कभी नहीं रही है-जब कोरोना काल तक में कारपोरेट घरानों की दौलत दिन दूना रात चौगुना बढ़ती गयी, जबकि वंचित गरीब दलित पेट भरने के लिए मुफ्त अनाज की सौगात के मोहताज हो गए।

आज एक तरफ मोदी सफाई कर्मियों के पैर धोने का ढोंग करते हैं, दूसरी ओर सीवर में आये दिन दलित सफाई कर्मी डुबकी लगाने और मरने को अभिशप्त हैं। हाल ही में लखनऊ में नगर निगम की लापरवाही से दो सफाई कर्मचारियों की मौत हो गयी। वे सीवर में सफाई करने हेतु उतरे थे। बताया जा रहा है कि ज्यादा देर तक सीवर लाइन में डूबने से दोनों युवकों की मौत हुई। नगर निगम और ठेकेदार ने सफाई कर्मियों को कोई भी सेफ्टी उपकरण नहीं दिया था। 

सवाल यह है कि आधुनिक टेक्नोलॉजी के दौर में जबकि इसके लिए मशीनें उपलब्ध है, एक मनुष्य से इस अमानवीय काम को क्यों करवाया जा रहा है और दलित ही इस काम को करने और मरने के लिए क्यों अभिशप्त हैं?

मोदी जी के शर्मनाक दर्शन के अनुसार मैला ढोने में सफाई कर्मियों को आध्यात्मिक सुख मिलता है! फिर सीवर में उतरने और मरने वालों के लिए कुछ करने की जरूरत  ही क्या है? यह मानवीय गरिमा को रौंदने वाली जातिवादी व्यवस्था का हिंदुत्ववादी justification है!

जाहिर है फासीवादी हिंदुत्व से दलितों-वंचितों को चौतरफा तबाही के सिवा कुछ मिलने वाला नही, न वास्तविक अर्थ में बराबरी, सम्मान, मानवीय गरिमा, न जमीन, नौकरी, संवैधानिक हक, भले ही उनके  वोट का सौदा करने वाले अवसरवादी नेताओं को  पद-पैसा-प्रतिष्ठा मिल जाय और इस symbolic representation को दलितों-पिछड़ों की सत्ता में हिस्सेदारी का नाम दिया जाय।

डॉ. आंबेडकर की जयंती दलितों-वंचितों समेत पूरे देश के लिए उनके आह्वान के अनुरूप फासीवादी हिन्दूराष्ट्र की मुहिम को रोकने का संकल्प बने, यही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

(लेखक इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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