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अमेरिका के WHO को छोड़ने का मतलब है दुनिया को कोरोना से संक्रमित कर दुनिया से भाग जाना
पिछले कुछ सालों से अमेरिका का एक अलग रुख दिखाए दे रहा है। डोनाल्ड ट्रंप की अगुवाई में अमेरिका ने ऐसे कदम उठाए हैं, जो दुनिया को बीच मझदार में छोड़कर अपनी जिम्मेदारियों से भागने जैसा है।
अजय कुमार
30 May 2020
अमेरिका
Image courtesy: The New York Times

अमेरिका खुद को लोकतंत्र का हिमायती बताता है। खुद को दुनिया की अगुवाई करने वाला बताता है। लेकिन तकरीबन सभी जानकारों का कहना है कि पूरी दुनिया में अमेरिका ने जनहित से ज्यादा केवल अपने फायदे के लिए काम किया है। पिछले कुछ सालों से अमेरिका का एक अलग रुख दिखाए दे रहा है। डोनाल्ड ट्रंप की अगुवाई में अमेरिका ने ऐसे कदम उठाए हैं, जो दुनिया को बीच मझदार में छोड़कर अपनी जिम्मेदारियों से भागने जैसा है। पेरिस जलवायु समझौता, यूनिसेफ, अंतरराष्ट्रीय मानव अधिकार कमीशन, ईरान-अमेरिका न्यूक्लियर डील से लेकर कई सारे ऐसे समझौते जो दुनिया में हथियारों के होड़ को कम करने के लिए बनाए गए थे, इन सभी समझौतों में अमेरिका की एक खास भूमिका थी। अमेरिका ने इन सभी भूमिकाओं से खुद को अलग कर लिया है।

जिम्मेदारियों से भागने की इस कड़ी में अब विश्व स्वास्थ्य संगठन से अमेरिका का अलग हो जाना जुड़ गया है। डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका को विश्व स्वास्थ्य संगठन से अलग करने का एलान किया है। इसकी वजह भी वही है, जिसका राग अमेरिका पिछले कुछ महीने से अलापता आ रहा है। राग यह है कि चीन की वजह से विश्व स्वास्थ्य संगठन ने दुनिया को कोरोना  के मसले पर आगाह करने में देरी की। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अगर सही जिम्मेदारी निभाई होती तो दुनिया को कोरोना पर पहले ही आगाह कर दिया होता तो कोरोना चीन में ही रुक जाता पूरी दुनिया में नहीं फैलता।  

अमेरिका  खुलेआम आरोप लगाते आ  रहा है कि चीन ने विश्व स्वास्थ्य संगठन के इशारों पर काम किया है। इन्हीं सब आरोपों का पुरजोर साथ लेकर डोनाल्ड ट्रंप ने 19 मई को विश्व स्वास्थ्य संगठन को 30 दिन की मोहलत दी थी कि वह अपने कामकाज में सुधार करे। लेकिन अभी 30 दिन ख़त्म भी नहीं हुए थे कि केवल 11 दिनों के अंदर डोनाल्ड ट्रंप ने अपने झूठे दावों को फिर से दुहराते हुए अमेरिका को विश्व स्वास्थ्य संगठन से अलग कर लिया।

हेल्थ एक्सपर्ट का कहना है कि कोरोनावायरस के इस संकट की घड़ी में अमेरिका ने खुद को अपनी जिम्मेदारियों से अलग कर लिया है। अमेरिका विश्व स्वास्थ्य संगठन को औसतन सालाना 450 मिलियन डॉलर राशि की मदद करता था। अब यह राशि विश्व स्वास्थ्य संगठन को नहीं मिलेगी। लेकिन इससे भी बड़ा झटका अमेरिका द्वारा उठाए गए कदम से विश्व स्वास्थ्य संगठन की छवि पर लगा है। अमेरिका का जाना रायशुमारी के खेल में चाहे-अनचाहे भी विश्व स्वास्थ्य संगठन की छवि पर बहुत अधिक धक्का पहुंचाते रहेगा। एक देश जो विश्व स्वास्थ्य संगठन को मिलने वाले कुल मदद में 15 फीसदी का योगदान करता हो, उसका अचानक से चले जाना विश्लेषण की दुनिया में भले ही एक गलत कदम लगता हो, लेकिन इस गलत कदम की वजह से विश्व स्वास्थ्य संगठन पर कई तरह के जायज़-नजायज सवालों की झड़ी लगनी भी शुरू हो जाएगी।

अमेरिका द्वारा दिए जाने वाले वित्तीय मदद की खाली पड़ती जगह को चीन जैसे देश भर भी दें, लेकिन एक अंतरराष्ट्रीय संगठन को इसके आलावा और भी कई तरह के मदद की ज़रूरत होती है। अमेरिका जाएगा तो अमेरिका के सहयोगी भी आनाकानी करेंगे। वह भी जाएंगे। अमरीका द्वारा मिलने वाली वैज्ञानिक मदद भी विश्व स्वास्थ्य संगठन के हाथों से बाहर निकल जाएगी। और इन सबसे बड़ी परेशानी तब होगी जब करोना का वैक्सीन तैयार हो जाएगा, अमेरिका पर किसी अन्तर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य संगठन का दबाव नहीं होगा और अमेरिका दुनिया के हित को छोड़कर केवल अपने फायदे को देखते हुए फैसले लेगा।

साल 1948 में अमेरिका विश्व स्वास्थ्य संगठन का सदस्य बना। यानी अमेरिका विश्व स्वास्थ्य संगठन के संस्थापक देशों में से एक है। नियम यह कहता है कि कोई भी देश अचानक से केवल एक घोषणा करके विश्व स्वास्थ्य संगठन से अलग नहीं हो सकता है। उसे अलग होने के लिए 12 महीने पहले कारण सहित विश्व स्वास्थ्य संगठन को बताना पड़ता है। ठीक इसी तरह का नियम अमेरिका के लिए भी है कि कोई भी अमेरिकी राष्ट्रपति अचानक से घोषणा कर खुद को विश्व स्वास्थ्य संगठन से अलग नहीं कर सकता है, उसे पहले कांग्रेस के सदस्यों से इसकी सहमति लेनी जरूरी है। इसलिए यह भी थ्योरी दी जा रही है कि अमेरिका में इस समय कोरोना की वजह से एक लाख से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। और इसमें हर दिन इज़ाफा होता जा रहा है। इससे ध्यान भटकाने और इसकी सारी जिम्मेदारी चीन और विश्व स्वास्थ्य संगठन पर थोपने के लिए डोनाल्ड ट्रंप में यह चाल चली है।

अब आते हैं, मुख्य मुद्दे पर कि विश्व स्वास्थ्य संगठन का कामकाज कैसा है? विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कोरोना के लिहाज से कैसा काम किया है? यह बात सही है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के कामकाज में कुछ कमियां हो सकती हैं लेकिन इसके लिए विश्व स्वस्थ्य संगठन के सभी देश जिम्मेदार हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन एक सलाहकारी संघ है इसका काम केवल सलाह देना है, यह बात देशों पर निर्भर होती है कि वह विश्व स्वास्थ्य संगठन की बात मानें या नहीं मानें।

अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार विजय प्रसाद जिक्र करते हैं कि कोरोना को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन पर बिलकुल बेबुनियाद आरोप लगाए जा रहे हैं। जिन देशों ने विश्व स्वास्थ्य संगठन को लाचार बना दिया है, वे संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोपीय देश ही हैं,और उनके ही नेता अब डब्ल्यूएचओ पर चीनी प्रभाव को लेकर निशाना साध रहे हैं। 1990 के दशक तक यह साफ़ हो गया था कि डब्ल्यूएचओ के पुराने अंतर्राष्ट्रीय हेल्थ रेगुलेशन रूल जो मूल रूप से 1969 में जारी किये गये थे, जिनमें दो दशकों के दौरान कुछ मामूली संशोधन किये गये और उसके बाद समय के साथ जिन ज़रूरी सुधारों की ज़रूरत थी,उन्हें नहीं अपनाया गया।

ये नियम इबोला और एवियन इंफ्लूएंजा जैसे बहुत संक्रामक, घातक और बार-बार संक्रमण करने वाले विषाणुओं के उभरने से पहले लाये गये थे। अब हर साल क़रीब 4.3 बिलियन लोग हवाई यात्रा करते हैं,ये नियम इतने बड़े पैमाने पर हवाई सफ़र के पहले बनाये गये थे,जो इस समय तक पुराने पड़ चुके हैं। इस समय, इतने बड़े पैमाने पर हवाई यातायात को देखते हुए वायरस का एक जगह से दूसरी जगह पहुंचना आसान भी हो गया है।

उत्तर अमेरिकी और यूरोपीय देशों ने विशेष रूप से इस बात पर ज़ोर देकर कहा था क वैश्विक महामारी की घोषणा यह स्पष्ट होने के बाद ही की जायेगी कि हवाई यात्रा और व्यापार पहले की तरह बाधित नहीं होते हों। यही सीमा अनिवार्य रूप से वैश्वीकरण का मूल आधार है, और इस नियम के इसी आधार ने 2005 से डब्ल्यूएचओ को विवश किया हुआ है।

 एच 1 एन 1 और इबोला फैला तो विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे महामारी घोषित कर दिया। जब डब्ल्यूएचओ किसी महामारी की घोषणा करता है, तो सरकारों से दवाओं और टीकों की बड़े पैमाने पर ख़रीद सहित कई तरह की चीजें को सुनिश्चित किये जाने की उम्मीद की जाती है, क्योंकि ये महंगे होते हैं।

यूरोपीय परिषद के सांसदों ने डब्ल्यूएचओ की इस घोषणा को लेकर एक जांच बैठायी। इस परिषद के चौदह सदस्यों ने डब्ल्यूएचओ पर अनिवार्य रूप से की गयी धोखाधड़ी का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि “फार्मास्युटिकल कंपनियों ने दुनिया भर के सरकारों को चेताने वाले सार्वजनिक स्वास्थ्य मानकों के लिए ज़िम्मेदार वैज्ञानिकों और आधिकारिक एजेंसियों को प्रभावित किया है। इन कंपनियों ने उन्हें अप्रभावी वैक्सीन रणनीतियों के लिए महंगे स्वास्थ्य सेवा का संसाधन बना दिया है और इन कंपनियों ने अपर्याप्त रूप से परीक्षण किये गये टीकों के अज्ञात दुष्प्रभावों की अधिकता से लाखों स्वस्थ लोगों को अनावश्यक रूप से ख़तरे में डाल दिया है।” उन्होंने लिखा, "किसी ख़तरनाक महामारी को दवा बेचने वालों के प्रभाव में पारिभाषित नहीं किया जाना चाहिए।"

डब्ल्यूएचओ की इस आलोचना को काठ मार गयी। क्योंकि डब्ल्यूएचओ ने इसे एक महामारी घोषित तो कर दिया था, लेकिन इस घोषणा के तुरंत बाद वायरस स्थिर हो गया था। कहने का मतलब यह है कि महामारी को लेकर विश्व स्वास्थय संगठन एक ऐसे असमंजस में खड़ा है जहां पर वह पहले महामारी घोषित कर दे तब भी दिक्कत और बाद में महामारी घोषित कर दे तब भी दिक्कत। इसलिए विश्व स्वास्थय संगठन पर आरोप लगना तय है। लेकिन जब हम बड़े ध्यान से विश्व स्वास्थय संगठन के कार्यशैली को देखते हैं तो जिस तरह से विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कोरोना को लेकर वैश्विक महामारी का ऐलान किया है इसमें विश्व स्वास्थय संगठन को दोष देना बिल्कुल गलत है। ऐसे में अगर अमेरिका विश्व स्वास्थय संगठन को छोड़ रहा है तो इसका मतलब यही होगा कि अमेरिका कोरोना की लड़ाई से खुद को दुनिया से अलग कर रहा है। 

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