NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
अर्थव्यवस्था
जंग से फलती-फूलती रही है अमेरिकी अर्थव्यवस्था!
9 दिसंबर 2019 को जारी स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) की रिपोर्ट के अनुसार सबसे बड़ी 100 कंपनियों (चीनी कंपनियों को छोड़कर) द्वारा हथियारों और सैन्य सेवाओं की बिक्री कुल 420 अरब डॉलर थी। हथियार निर्यात में अमेरिकी कंपनियां शीर्ष 100 की सूची में हावी हैं।
राकेश सिंह
13 Jan 2020
America

अमेरिका ने ईरान की कुद्स फोर्स के कमांडर जनरल कासिम सुलेमानी की हत्या करके एक बार फिर पूरी दुनिया को युद्ध के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है। पिछले 100 सालों से अमेरिका लगातार युद्ध में उलझा हुआ है। शायद ही कोई दशक ऐसा बीतता है जब अमेरिका किसी न किसी लड़ाई में शामिल नहीं रहता है।

प्रथम विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका द्वितीय विश्वयुद्ध में शामिल हुआ। द्वितीय विश्व युद्ध के खत्म होने के तुरंत बाद उसने कोरिया में जंग छेड़ दी। इसके बाद अमेरिका वियतनाम युद्ध में उलझ गया। वियतनाम युद्ध से निकलने के बाद अमेरिका ने अफगानिस्तान में सोवियत संघ के अतिक्रमण के खिलाफ अप्रत्यक्ष लड़ाई को आगे बढ़ाया। सोवियत संघ का जब पतन हुआ तो सद्दाम हुसैन ने कुवैत पर हमला करके अमेरिका को एक और जंग का न्योता भेज दिया। यूगोस्लाविया के विघटन के बाद वहां पैदा हुए बोस्निया संकटों में भी अमेरिका को अपनी सैनिक ताकत दिखाने का मौका मिला। इसके बाद अमेरिका के ऊपर 9/11 का आतंकवादी हमला हुआ। अमेरिका ने इस मौके का उपयोग सद्दाम हुसैन को खत्म करने के लिए और अफगानिस्तान पर तालिबान हुकूमत का सफाया करने के लिए किया।

ये युद्ध विश्व में अमेरिका द्वारा केवल अपनी सैन्य ताकत की धौंस जमाने का काम नहीं है बल्कि इसके पीछे दूसरे अन्य कारण भी हैं। इस समय अमेरिका आर्थिक संकट से जूझ रहा है। राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप ने चीन के खिलाफ ट्रेड वॉर छेड़ दिया है। ट्रंप ने तो भारत को भी विकासशील देश मानने से इंकार कर दिया है। अमेरिका ने भारत से आयातित कई सामानों पर शुल्क बढ़ा दिया है।अमेरिका ने अपनी अर्थव्यवस्था के प्रभावित होने का हवाला देकर पेरिस जलवायु परिवर्तन समझौते से भी बाहर निकलने की घोषणा कर दी है।    

इस बात की पड़ताल करना जरूरी है कि इन युद्धों से अमेरिका को आर्थिक रूप से क्या लाभ और नुकसान हुए, क्योंकि कोई भी शासन केवल नुकसान उठाने के लिए लगातार युद्ध नहीं करता है। इसके पीछे आर्थिक मुनाफा छुपा रहता है। प्रथम विश्व युद्ध से पहले अमेरिका एक कर्ज से दबा हुआ राष्ट्र था। युद्ध के बाद वह विशेष रूप से लैटिन अमेरिका के देशों के लिए ऋणदाता बन गया। इस दौरान अमेरिका से यूरोप के लिए निर्यात में वृद्धि हुई क्योंकि उन देशों ने युद्ध के लिए जरूरी सामान की खरीद अमेरिका से की।

अमेरिका के पूंजीपतियों ने विशेष रूप से इस युद्ध में अच्छा लाभ कमाया। 1917 में अमेरिका की बड़ी कंपनियों का लाभ 1914 की तुलना में तीन से चार गुना बढ़ चुका था। अमेरिका की सबसे बड़ी कंपनी का मुनाफा तो दस गुना तक बढ़ गया था। युद्ध के दौरान सरकारी युद्ध अनुबंधों ने बड़ी कंपनियों के मुनाफे में अभूतपूर्व वृद्धि में मुख्य भूमिका निभाई थी। अमेरिकी उद्योग जगत और सरकारी तंत्र ने तभी समझ लिया था कि जंग एक बड़े मुनाफे का धंधा है।

अमेरिका में 1929 में शुरू हुई आर्थिक महामंदी को समाप्त करने में द्वितीय विश्व युद्ध ने जो भूमिका निभाई, उसका विश्लेषण 1929 से युद्ध के बाद की अवधि के दौरान अमेरिकी सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि के आंकड़ों से किया जा सकता है। द्वितीय विश्व युद्ध बाजार अर्थव्यवस्था की संरचना से जुड़े बदलावों के संदर्भ में एक बहुत ही अनोखा समय है। इस युद्ध के कारण अमेरिकी उत्पादन इतनी तेजी से बढ़ा कि यह महामंदी के दौरान सुस्त अर्थव्यवस्था से बाहर निकल गया। विनिर्माण, जहाज निर्माण और वाहन उद्योग में अप्रत्याशित तेजी देखी गई। 1942 में तो जीडीपी की वृद्धि दर 17% से अधिक हो गई थी। इस दौरान बेरोजगारी का वस्तुतः अंत हो गया था। सार्वजनिक कार्यों पर भी अच्छा खर्च हुआ। अमेरिकी अर्थव्यवस्था 1939 और 1944 के बीच सालाना कम से कम 8 प्रतिशत बढ़ी। इस दौरान अमेरिकी अर्थव्यवस्था के इतिहास में आर्थिक विकास में सबसे महत्वपूर्ण अल्पकालिक वृद्धि देखी गई है।
 
कोरियाई युद्ध को मोटे तौर पर 1950 में शुरू माना जाता है। उस समय जीडीपी की औसत वृद्धि दर 5.8% थी। जबकि 1953 में सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर 11.4% के करीब पहुंच गई थी। कोरिया युद्ध के दौरान अमेरिकी शेयर बाजार में भी तेजी आई। कोरियाई युद्ध का प्रभाव द्वितीय विश्व युद्ध की तुलना में बहुत कम था, लेकिन फिर भी द्वितीय विश्व युद्ध के समान, कोरियाई युद्ध ने सरकारी खर्च के माध्यम से जीडीपी वृद्धि को बढ़ावा दिया। हालांकि इस खर्च को द्वितीय विश्व युद्ध के विपरीत कर्ज से वित्त पोषित करने के बजाय करों को बढ़ाकर वित्तपोषित किया गया था। अमेरिकी अर्थव्यवस्था में 1951 में 11% से अधिक की जीडीपी वृद्धि दर्ज की गई।

वियतनाम युद्ध, द्वितीय विश्व युद्ध और कोरियाई युद्ध के विपरीत था क्योंकि अमेरिका इसमें बहुत धीरे-धीरे शामिल हो रहा था। 1965 में अमेरिकी सेना की टुकड़ियों को वियतनाम भेजा गया था, लेकिन इसके 10 साल पहले से ही अमेरिकी सैन्य सलाहकार वियतनाम में मौजूद थे। केवल वियतनाम युद्ध ही एकमात्र ऐसा युद्ध था जो अमेरिकी बाजार की आकांक्षाओं को पूरा करने में विफल रहा। इसी बीच 1973 के तेल संकट ने भी अमेरिकी अर्थव्यवस्था को झकझोर दिया।
शीत युद्ध की अवधि को आमतौर पर 1970 के दशक के अंत से 1989 तक मानी जाती है। इस अवधि में भी सैन्य खर्च में निरंतर वृद्धि होती रही। सोवियत ब्लॉक के टूटने तक सैन्य व्यय 1980 के पहले के स्तर से काफी ऊपर था। 1984 तक सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर 7.6% तक पहुंच गई थी।

2001 से 2003 की मंदी के बाद कमजोर आर्थिक परिस्थितियों के बीच इराक का दूसरा युद्ध और अफगानिस्तान युद्धों की शुरुआत की गई थी। अमेरिका में 2001-2002 में मंदी शुरू हो चुकी थी। अमेरिकी इतिहास में यह भी पहली बार हुआ कि युद्ध के दौरान करों में कटौती की गई थी। ढीली मौद्रिक नीति को भी लागू किया गया और ब्याज दरों को कम रखा गया था और अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित करने के लिए बैंकिंग नियमों में ढील दी गई थी।  इसी दौरान 2008 में वैश्विक वित्तीय संकट ने दस्तक दी। यह केवल संयोग हो सकता है कि इराक युद्ध के दौरान सबसे ज्यादा सैन्य खर्च वर्ष 2008 में सकल घरेलू उत्पाद का 4.3% था। अफगानिस्तान युद्ध के दैरान वर्ष 2010 में  सबसे ज्यादा व्यय  297 अरब डॉलर या सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 2% था।

1 अक्टूबर 2019 से 30 सितंबर 2020 तक के लिए अमेरिकी सैन्य खर्च 989 अरब डॉलर है। सामाजिक सुरक्षा के बाद संघीय बजट में सैन्य खर्च दूसरी सबसे बड़ी मद है। संयुक्त राज्य अमेरिका अपने बाद के नौ देशों के संयुक्त रक्षा व्यय की तुलना में भी रक्षा पर अधिक खर्च करता है। यह 228 अरब डॉलर के चीन के सैन्य बजट से चार गुना अधिक है। यह रूस के सिर्फ 69.4 अरब डॉलर के बजट से लगभग 10 गुना बड़ा है।

9 दिसंबर 2019 को जारी स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) की रिपोर्ट के अनुसार सबसे बड़ी 100 कंपनियों (चीनी कंपनियों को छोड़कर) द्वारा हथियारों और सैन्य सेवाओं की बिक्री कुल 420 अरब डॉलर थी। हथियार निर्यात में अमेरिकी कंपनियां शीर्ष 100 की सूची में हावी हैं। रैंकिंग में शीर्ष पांच स्थानों पर संयुक्त राज्य अमेरिका की हथियार कंपनियों-लॉकहीड मार्टिन, बोइंग, नॉर्थ्राप ग्रुम्मन, रेथियॉन और जनरल डायनेमिक्स काबिज हैं। केवल इन पांच कंपनियों ने ही 2018 में 148 अरब डॉलर यानी शीर्ष 100 कंपनियों की हथियारों की बिक्री का 35 प्रतिशत हिस्सा बेचा है। शीर्ष 100 रैंकिंग में शामिल सभी अमेरिकी कंपनियों की कुल हथियारों की बिक्री 246 अरब डॉलर थी, जो सभी की हथियारों की बिक्री के 59 प्रतिशत के बराबर है। इसमें 2017 की तुलना में 7.2 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

इससे साफ है कि अमेरिका का हथियार उद्योग कितना बड़ा है। अमेरिका की अर्थव्यवस्था के पिछले 100 वर्षों के विश्लेषण से तो साफ है कि अमेरिका एक बड़ी आर्थिक महाशक्ति प्रथम विश्व युद्ध के बाद ही बन सका। प्रथम विश्वयुद्ध से लेकर अब तक अमेरिका में जब-जब आर्थिक संकट गहराया है, तब-तब कोई न कोई युद्ध उसके लिए संकटमोचक की भूमिका निभाता रहा है। लगता है कि ट्रंप भी इस पुराने और अजमाये नुस्खे को एक बार फिर से लागू करके अमेरिका को मौजूदा आर्थिक संकट से उबारने की कोशिश कर रहे हैं।  

 इस पूरी जानकारी के नेपथ्य में युद्ध और देश की आर्थिक हालत के बीच पनपने वाले सम्बन्ध को भी समझने की कोशिश करते हैं। हथियारों की होड़ में अधिकतम लाभ को सुरक्षित करने के लिए बड़ी-बड़ी कंपनियां सरकारों से युद्ध सामग्री से जुड़े सौदे हासिल कर लेती हैं। इन सौदों का आमतौर पर कोई विरोध भी नहीं होता। इससे इनका मुनाफा और शेयरों के दाम बढ़ते हैं। युद्धों के दौरान भारी सैन्य खर्च से रोजगार और अतिरिक्त आर्थिक गतिविधियां पैदा करता है और नई प्रौद्योगिकियों के विकास में योगदान देता है। ये बाद में अन्य उद्योगों में छनकर उपयोग किए जाते हैं। अगर कोई भी सरकार शांति काल में किसी महंगी प्रौद्योगिकी के निवेश में जनता का पैसा बर्बाद करने का जोखिम नहीं उठा सकती लेकिन युद्ध काल में ऐसा करना बहुत आसान है। नई तकनीक के प्रयोग से उद्योगों का एक नया क्षेत्र पैदा हो जाता है। मोबाइल, सेटेलाइट और टेलीविजन उद्योग इसके स्पष्ट प्रमाण हैं।

प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान सरकारों को पता लग गया था कि लोग बाहरी ताकतों से सुरक्षा के लिए ज्यादा कराधान का विरेध नहीं करेंगे। अमेरिका के सबसे ऊंचे कर की दर 1915 में 7 प्रतिशत से बढ़कर 1918 में 77 प्रतिशत हो गई। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान 1944 में यह 90 प्रतिशत से ऊपर हो गया और 1964 में राष्ट्रपति जॉनसन के द्वारा कम किए जाने तक उसी स्तर पर बना रहा।

अमेरिका के द्वितीय विश्व युद्ध के बढ़ते खर्च ने उसके सरकारी कर्ज में 1,048 प्रतिशत की वृद्धि की थी। इसके भुगतान के लिए सरकार ने आयकर का विस्तार किया। 1939 में केवल 4 मिलियन अमेरिकियों ने संघीय करों का भुगतान किया था, जबकि 1945 तक यह संख्या बढ़कर 43 मिलियन हो गई।

युद्ध के कारण बढ़ने वाली मुद्रास्फीति भी आर्थिक गतिविधियों में अल्पकालिक तेजी का कारण बनती है। सरकार को इस बढ़ी हुई मुद्रास्फीति से भी फायदा होता है क्योंकि उसके द्वारा लिए गए कर्ज का वास्तविक मूल्य भी घटता है।अधिकांश युद्धों के दौरान सार्वजनिक कर्ज और कराधान का स्तर बढ़ता है और आम जनता की खपत में कमी आती है। युद्धों के सीधा परिणाम महंगाई में वृद्धि होती है। लोगों को होने वाली तकलीफों को देश की सुरक्षा के लिए जरूरी त्याग घोषित कर दिया जाता है।

जनता को इन सभी तकलीफों को सहने के तैयार करने के लिए राष्ट्रवाद के भावनात्मक उन्माद और भयादोहन के मनोविज्ञान का सावधानी से उपयोग किया जाता है। द्वितीय विश्व युद्ध में अमेरिकी जनमत लड़ाई में शामिल होने के पक्ष में नहीं था लेकिन पर्ल हार्बर पर हमले ने उनके भीतर पल रहे फासीवादी भय को उभारने में बड़ी भूमिका निभाई। ठीक ऐसी ही घटना 9/11 को वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमला था, जिसके बाद से इस्लामिक आतंकवाद के खिलाफ अब कोई भी कार्रवाई करने के लिए अमेरिकी प्रशासन को पूरी आजादी मिल चुकी है। 

America
American Economy
SIPRI
america -iran tussle
IRAN
Iraq
America Iran Tension

Related Stories

और फिर अचानक कोई साम्राज्य नहीं बचा था

ईरानी नागरिक एक बार फिर सड़कों पर, आम ज़रूरत की वस्तुओं के दामों में अचानक 300% की वृद्धि

असद ने फिर सीरिया के ईरान से रिश्तों की नई शुरुआत की

क्या दुनिया डॉलर की ग़ुलाम है?

सऊदी अरब के साथ अमेरिका की ज़ोर-ज़बरदस्ती की कूटनीति

यूक्रेन में छिड़े युद्ध और रूस पर लगे प्रतिबंध का मूल्यांकन

पड़ताल दुनिया भर कीः पाक में सत्ता पलट, श्रीलंका में भीषण संकट, अमेरिका और IMF का खेल?

अमेरिका ने ईरान पर फिर लगाम लगाई

ईरान पर विएना वार्ता गंभीर मोड़ पर 

लखनऊ में नागरिक प्रदर्शन: रूस युद्ध रोके और नेटो-अमेरिका अपनी दख़लअंदाज़ी बंद करें


बाकी खबरें

  • varansi ghat
    कुशाल चौधरी
    बनारस घाट के नाविकों को अब भी कोविड-19 की तबाही से उबरना बाक़ी
    21 Oct 2021
    पर्यटकों की आवाजाही पर महीनों का लॉकडाउन और मानसून में गंगा के स्तर में वृद्धि से त्रस्त नाविकों को काम, दैनिक मज़दूरी की कमी का सामना करना पड़ रहा है और वे भारी क़र्ज़ में हैं। इस बीच सरकारी मदद…
  • IGDTUW
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    दिल्ली सरकार के विश्वविद्यालय के सफ़ाई कर्मचारियों ने कपड़े उतार कर मुख्यमंत्री आवास पर किया प्रदर्शन!
    21 Oct 2021
    सफाई कर्मचारियों ने कहा कि वो दिल्ली सरकार की बर्बर उदासीनता के खिलाफ आज यानी गुरुवार को दलित महिला कर्मचारी सूर्यास्त के समय मुख्यमंत्री आवास पर अपने बाल मुंडवा कर उनका त्याग करेंगी। विश्वविद्यालय…
  • Bangladesh Violence
    एजाज़ अशरफ़
    बांग्लादेश हिंसा: अल्पसंख्यकों के लिए असहनीय जगह में तब्दील होता भारतीय उपमहाद्वीप
    21 Oct 2021
    अतीत की उथल-पुथल से सबक सीखने के बजाय, बांग्लादेश, पाकिस्तान और भारत में विभाजन की पूनरावृति देखी जा रही है।
  • patna
    राहुल कुमार गौरव
    पटना मेट्रो: पुनर्वास का इंतिज़ाम नहीं, अतिक्रमण हटाने पहुंची पुलिस के डंडे से हुई चाय वाले की मौत!
    21 Oct 2021
    पटना के कंकड़बाग इलाका के मलाही पकड़ी चौराहे के दोनों तरफ की सड़कों के बीच में खाली पड़ी जमीन पर पिछले कई सालों से दर्जनों परिवार 50 सालों से रह रहे हैं। पटना में मेट्रो निर्माण का कार्य तेजी से चल रहा…
  • Patna
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    बिहार: कश्मीर में प्रवासी बिहारी मज़दूरों की हत्या के ख़िलाफ़ पटना सहित पूरे राज्य में मनाया गया विरोध दिवस
    21 Oct 2021
    माले के मुताबिक़ राजधानी पटना के साथ-साथ बिहारशरीफ, बेगूसराय, अरवल, नवादा, रोहतास, डुमरांव, समस्तीपुर, भोजपुर, सिवान, दरभंगा आदि जिलों में भी विरोध मार्च निकाले गए।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License