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कोविड-19 का क़हर : ज़िंदगी की परीक्षा
वायरस ने हमारी हड्डियों और सरकारों पर हमला बोल दिया है जो हमला हमारे अस्तित्व के हर अणु को हिला रहा हैं।
सूरज गोगोई 
18 Mar 2020
Translated by महेश कुमार
coronavirus
प्रतीकात्मक तस्वीर

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने नोवेल कोरोनावायरस या कोविड-19 को महामारी घोषित कर दिया है। इस लेख को लिखते समय, मरने वालों की संख्या 7,000 से ऊपर पहुँच चुकी है और दुनिया भर में 180,000 से अधिक लोग इस वायरस से प्रभावित हुए हैं। कुछ रिपोर्टों के अनुसार, अब तक 50 से अधिक देशों में मौतें हो चुकी हैं।

इतिहास में इस तरह के घातक वायरस के कई उदाहरण मौजूद हैं। छोटी चेचक विषाणु के कारण हुई थी। 1918-1919 में स्पैनिश फ्लू की महामारी एक वायरल संक्रमण था, जिसमें 20 से 40 मिलियन लोग मारे गए थे। एचआईवी/एड्स भी एक वायरस है, जिसने 2018 में लगभग 1.1 मिलियन लोगों को मार डाला था और इसके प्रकोप के चलते लगभग 32 मिलियन लोग एड्स से अपनी जान गंवा चुके हैं।

सैन फ्रांसिस्को में, 1918-19 में इन्फ्लूएंजा के प्रकोप के दौरान, शहर के स्वास्थ्य और देखभाल बोर्ड ने जनता के लिए कई सिफ़ारिशें की थीं। इनमें से कुछ में ज़्यादा भीड़ के दौरान स्ट्रीटकार्स से बचना, सार्वजनिक स्थानों पर नृत्य करने पर प्रतिबंध का होना, व्यक्तिगत स्वच्छता पर ध्यान देना, सार्वजनिक मनोरंजन के सभी स्थानों को बंद कर देना, स्कूलों (सार्वजनिक और निजी) और सभी लॉज पर प्रतिबंध लगाना शामिल है।

मुखौटे के उपयोग ने देशभक्ति की भावना को पैदा किया और ज़िम्मेदारी का एहसास कराया। लेकिन फ्लू को देखते हुए ‘मास्क ऑर्डर’ जिसने मास्क पहनना अनिवार्य कर दिया था, लोगों ने उसे अपराध के रूप में देखा - कुछ ऐसा जो व्यक्तिगत नागरिक स्वतंत्रता के आड़े वाली चीज़ माना गया। इस मास्क लगाने की मजबूरी के विरोध में एक छोटे से तबके ने एक ‘मास्क विरोधी लीग' का भी गठन किया। लेकिन आदेश का उल्लंघन करने पर कई लोगों को गिरफ़्तार भी किया गया था। उन्हें 5 डॉलर से 10 डॉलर के बीच जुर्माना देना पड़ता था, एक ऐसी राशि जिसे अंततः रेड क्रॉस को दान किया जाता था। तब कैलिफ़ोर्निया के गवर्नर विलियम स्टीफेंस ने कहा था कि मास्क पहनना हर नागरिक का कर्तव्य है जिसे देश का प्रत्येक नागरिक आसानी से निभा सकता है।

ग़रीब राष्ट्रों और निचले दर्जे के सामाजिक वर्ग के लोगों के पास बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं की  न्यूनतम पहुंच तक नहीं है।

सिंगापुर जैसे देशों ने अपने देश को वायरस-युक्त बनाने में असाधारण प्रदर्शन किया है। इसके विपरीत, इटली जैसे देशों में, सभी का इलाज करने के बजाय वे ‘प्रलय चिकित्सा’ के दर्शनशास्त्र की ओर बढ़ सकते हैं। इसका स्पष्ट मतलब है कि जीवित रहने की अधिकतम संभावना वाले लोगों को प्राथमिकता दी जाएगी। इस तरह के प्रवचन या सोच का इस्तेमाल आमतौर पर युद्ध और आपदा के हालात में किया जाता है। यह नैतिक हलचल और निराशा पैदा करने की क्षमता रखता है।

वायरस, बैक्टीरिया के विपरीत, कोई कोशिकीय जीव नहीं है। इसे जीवित रहने के लिए एक मेज़बान की ज़रूरत होती है। वह मेज़बान कोई व्यक्ति और कुछ भी हो सकता है। जब एक बार यह मानव शरीर में प्रवेश कर जाता है, तो यह आनुवंशिक सामग्री और प्रोटीन की नकल करके सेलुलर संरचना के ढांचे को बदल सकता है। इस प्रक्रिया में, यह उन कणों को शरीर के भीतर छोड़ सकता है जो शरीर के बेहतरीन सेल को नष्ट कर सकते हैं। इस वायरस से शिशुओं और बुजुर्गों को सबसे अधिक ख़तरा है।

यह दिलचस्प है कि इसकी कार्यप्रणाली पूंजीवाद की याद कैसे दिला सकती है। वायरस किसी भी इंसान के भीतर वैसे ही प्रवेश कर सकता है, जैसे पूंजीवाद किसी भी राष्ट्र राज्य पर आक्रमण कर सकता है। खाली उड़ानों को उड़ाने के माध्यम से कई आपूर्ति श्रृंखलाओ और शेयर बाजारों को बाधित करना वह भी सिर्फ अपने 'स्थान' को बनाए रखने के लिए, ऐसी पूंजीवादी प्रक्रियाएं वैश्विक पूंजी के विभिन्न सर्किटों को छू रही हैं। सम्मेलनों को या तो रद्द किया जा रहा है या फिर उन्हे पुनर्निर्धारित किया जा रहा है, खेल मैचों को रद्द कर दिया गया है या अनिश्चित काल के लिए बंद कर दिया गया है और परीक्षाएं रोक दी गई है, वायरस हमें दिखाता है कि कैसे हमें किसी भी काम की प्रतीक्षा, उसे स्थगित या रद्द कर देना चाहिए।

मेरे जैसे लोगों में, जो अक्सर 'घर' से दूर रहते हैं, यह घर 'वापसी' की एक निश्चित इच्छा पैदा करता है। संक्षेप में, वायरस हमारे चारों ओर है जो एक नैतिक और भावनात्मक अर्थव्यवस्था का प्रतीक है, जो सबसे जुदा है और हमें मानव होने का एक नया तरीका सिखाता है। इसने हमें मानवीय पत्राचार और आपसी देखभाल की नई भाषा दी है। यह हमें चीजों का भंडारण करना भी सिखाता है। यह हमें जीवन में बिखराव और मूल्यवान चीजों की एक नई भाषा प्रदान करता है। वास्तव में, यह वस्तुओं के लिए मात्रात्मक और गुणात्मक रूप के अलग-अलग मूल्यों को नया आयाम देता है [जैसे कि सेनीटाईजर्स और मास्क]।

यह स्पष्ट है कि वायरस एक ख़तरा है, लेकिन यह ख़तरा ग़ैर नहीं है। यह हमारी सरकारों के लिए खतरा है और यह ‘असाधारणता’ का वातावरण बना रहा है। यह ऐसा है जैसे कि हम ऐसी स्थिति में रहने के लिए बने हैं, जहां अपवाद की स्थिति को एक सामान्य प्रतिमान में बदल दिया जाता है जैसा कि आगमबेन कहते हैं। स्वतंत्रता के ऐसे ह्रास के लिए सहमत होना और राष्ट्रों और संकीर्ण विचारधारा वाले नेताओं द्वारा इसका दुरुपयोग कैसे किया जा सकता है, क्योंकि इसके परिणाम किसी के शरीर के बाहर हैं। दोनों, व्यक्तियों और सामाजिक संस्थाओं को इस महामारी से लड़ने के लिए एक आपसी रास्ता खोजना चाहिए।

यहाँ, मुझे एक शब्द ‘जांच किया जीवन’ की याद दिलाती है जिसका उपयोग समाजशास्त्री इवान इलिच ने किया था। उन्होंने जापान के अर्थशास्त्री जोशीरो तमनोय और हिबाकुशा के कार्यों के संदर्भ में इसका उल्लेख किया था, जो जापान में जुड़वा बमों के शिकार थे। हम सभी एक ऐसे जीवन में धँसते जा रहे हैं जिसकी जांच की जाती ह या उसकी जांच करने की आवश्यकता होती है। वायरस की जांच करने में, हम उन शरीरों की जांच कर रहे हैं जो वायरस ढोते हैं, दिवंगत हैं, और हर कोई जो वायरस को ले जाने में सक्षम है-यहां तक कि हमारे फर्नीचर और दरवाज़े के हैंडल भी।

वायरस राष्ट्र-राज्य के नागरिकों की जांच करने, उनकी निगरानी करने, उन्हें चिह्नित करने, उनका इलाज करने और उनकी उपेक्षा करने की एक नई श्रेणी बन सकता है। हमें इस तथ्य का सामना करने के लिए भी तैयार होना चाहिए कि वायरस हमारे साथ रहने वाली एक स्थायी चीज़ हो सकती है, न कि केवल एक लौकिक इकाई, हालांकि हम इसे हराना ज़रूर चाहते हैं। लगता है, जांच किए गए वे विषय हैं जो पूंजीवाद के खंडहर में पड़े हैं।

*सूरज नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ़ सिंगापुर में सोशियोलॉजी में डॉक्टरेट कर रहे हैं और @char_chapori उनका ट्विटर हैंडल है। व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं।

अंग्रेजी में लिखा मूल आलेख आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

Amid COVID-19 Crisis: Examined Subjects, Examined Life

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Racism
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