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कानून
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राजनीति
न्यायिक श्रेष्ठता की खुलेआम नाफरमानी ने आम लोगों को भी गुमराह कर दिया है! 
राजनीतिक कार्यपालिका द्वारा न्यायपालिका के उपर लगाए जा रहे आक्रामक आरोपों की घटना भारतीय संवैधानिक शासनकाल में लगभग अनसुनी सी है।
एम श्रीधर आचार्युलु
12 Jan 2021
 न्यायपालिका

इस बात को हुए लंबा वक्त नहीं गुजरा है, जब आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति राकेश कुमार के उपर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने निम्नलिखित शब्द कहे थे: “सरकार राज्य की संपत्तियों की नीलामी कैसे कर सकती है? क्या सरकार दीवालिया हो चुकी है [कि उसके पास] सरकारी संपत्ति की नीलामी का ही सहारा रह गया है? हम इस बात की घोषणा करेंगे कि राज्य में संवैधानिक मशीनरी खत्म हो चुकी है और प्रशासन को केंद्र सरकार को सौंप दिया जाये।”

 इस कथित टिप्पणी के आधार पर आंध्रप्रदेश सरकार ने न्यायमूर्ति कुमार को अपने कार्यालय में अंतिम दिन से एक दिन पहले, अर्थात सेवानिवृत्त होने से एक दिन पूर्व एक रिट याचिका पर सुनवाई करने से खुद को अलग रखने के लिए कहा था। रोचक तथ्य यह है कि इसने एक ऐसी स्थिति उत्पन्न कर दी जिसमें उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को स्वयं पर लगे आरोपों का खंडन करना पड़ा और एक ऐसी याचिका पर निर्णय देना पड़ा, जो उन्हें स्वंय की सेवानिवृत्ति से एक दिन पूर्व मामले की सुनवाई न करने के लिए कह रही थी।

अपनी सेवानिवृत्ति से एक दिन पूर्व 30 दिसंबर 2020 को हुई सुनवाई एक प्रकार से एक ट्रायल साबित हुई, जिसमें इस बात की जाँच हुई कि न्यायाधीश ने वास्तव में ऐसा कहा है या नहीं कहा। न्यायमूर्ति कुमार ने इस बात से साफ़ इंकार किया कि उन्होंने राज्य में संवैधानिक मशीनरी के खात्मे और प्रशासन को केंद्र को सौंपने वाला अंतिम वाक्य कहा था, जिसे आंध्रप्रदेश राज्य द्वारा एएजी, सुधाकर रेड्डी के जरिये उन्हें जिम्मेदार ठहराया गया था।

न्यायमूर्ति कुमार ने अपने कार्यकाल के आखिरी दिन मानो साँड़ को सींगों से पकड़ने का काम किया।

ये घटनाएं तब सामने आईं जब न्यायमूर्ति कुमार की अगुवाई वाली पीठ एक जनहित याचिका की सुनवाई कर रही थी। इस याचिका में राज्य सरकार द्वारा गुंटूर और विशाखापट्टनम शहरों के ठीक बीचोबीच में स्थित कुछ जमीनों की एकमुश्त बिकवाली के फैसले को चुनौती दी गई थी।

एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी पी प्रवीण कुमार ने इस आरोप के समर्थन में कुछ अख़बारों की कतरनें दाखिल की थीं, लेकिन उच्च न्यायालय ने पाया कि इन समाचारों की रिपोर्टों में उस कथित टिप्पणी का कोई जिक्र तक नहीं था। इस अधिकारी को फिलहाल झूठा हलफनामा दाखिल करने के लिए शपथ भंग और अदालत की अवमानना करने के लिए अदालती कार्यवाही का सामना करना पड़ रहा है। 

पीआईएल में शामिल याचिकाकर्ताओं की ओर से दो वकील बी नलिनी राव और नारा श्रीनिवास राव सुनवाई में भाग ले रहे थे, जिन्होंने जोर देकर इस बात को कहा कि किसी भी समाचार पत्र की रिपोर्टों में यह नहीं लिखा गया था कि न्यायमूर्ति कुमार ने इस प्रकार की टिप्पणी की है।

पीठ ने उल्लेख किया: याचिकाकर्ता की ओर से दो विद्वान अधिवक्ताओं द्वारा प्रस्तुत किया गया कि तथाकथित अवलोकन के दूसरे हिस्से “हम इस बात की घोषणा करेंगे कि राज्य में संवैधानिक मशीनरी ब्रेकडाउन की स्थिति में है और केंद्र सरकार को प्रशासन सौंपेंगे” को इस अदालत [न्यायमूर्ति राकेश कुमार] द्वारा कभी कहा ही नहीं गया था।

16 बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाएं 

वास्तव में न्यायाधीश ने संवैधानिक ब्रेकडाउन को लेकर ये टिप्पणियां एक अन्य सुनवाई के दौरान की थीं, हालाँकि जैसा कि कथित शब्दों में कहा गया है ठीक वैसा नहीं कहा गया था। उच्च न्यायालय की राकेश कुमार और जे. उमा देवी को लेकर बनी एक एक पीठ, जिसमें 1 अक्टूबर 2020 को रेड्डी गोविंदा राव बनाम आंध्र प्रदेश राज्य मामले पर 16 बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं की एक साथ जाँच चल रही थी, जिसका संबंध पुलिस ज्यादतियों से था। उक्त मामले में उच्च न्यायालय ने निर्देश जारी किये थे कि अगली तारीख पर राज्य की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता “अदालत की सहायता के लिए तैयार रहें, कि जिस प्रकार की परिस्थितियां आन्ध्रप्रदेश में व्याप्त हैं क्या उसमें अदालत इस बात की जाँच करे कि राज्य में संवैधानिक ब्रेकडाउन की स्थिति है या नहीं।” 

इस पर सरकारी वकीलों द्वारा तत्काल इंगित किया गया था कि उच्च न्यायालय के पास इस प्रकार के अवलोकन को दर्ज करने की शक्तियाँ नहीं हैं। इस पर न्यायमूर्ति कुमार ने कहा था “आप अपने तर्कों को भी दर्ज कर सकते हैं.. ।” याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए अधिवक्ताओं के अनुसार, अब इसका अर्थ यह नहीं निकलता कि पीठ ने ब्रेकडाउन को लेकर कोई अंतिम निष्कर्ष निकाल लिया था। ऐसा एक खास सन्दर्भ और कुछ टिप्पणियों के मद्देनजर टिप्पणी मात्र थी, जैसे कि “...ऐसी स्थिति में कार्यपालिका अपना काम नहीं कर सकती, और अदालतों को प्रशासन के काम को भी अपने हाथ में ले लेना चाहिए।”

यदि मानवाधिकारों का हनन होता है तो उच्च न्यायालय ही एकमात्र सहारा बचता है। आंध्रप्रदेश में अवैध तौर पर व्यक्तियों को उठा लेना एक आम बात हो चुकी है। सुनवाई के दौरान न्यायाधीश ने राज्य पुलिस महानिदेशक को तलब किया था और उन्हें उन क़ानूनी प्रावधानों को पढ़ने के लिए बाध्य किया जो नागरिकों के अधिकारों और पुलिस की सीमाओं की व्याख्या करता है। हालाँकि पक्षपातपूर्ण मीडिया द्वारा इसे “ज्यादती” के तौर पर बढ़ा-चढ़ाकर प्रदर्शित किया गया और सोशल मीडिया मंचों पर न्यायमूर्ति कुमार को दोषी ठहराया गया।

गैर-क़ानूनी गिरफ्तारियाँ, डीजीपी को तलब करने का मुद्दा  

आंध्रप्रदेश में अदालतों के अंतरिम आदेशों और टिप्पणियों के आधार पर कई बार अपील और आवेदन दाखिल करना और सर्वोच्च न्यायालय की शरण में जाना अब एक आम बात हो चुकी है। अपने आदेश को वापस ले लेने की राज्य की याचिका को ख़ारिज करते हुए जहाँ उच्च न्यायालय ने 14 दिसंबर को कहा: “चूँकि कई मौकों पर अदालत के संज्ञान में यह बात आई है कि गैर-क़ानूनी तौर पर पुलिस द्वारा लोगों को उठा लेने और बंदी-प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर करने के बाद या तो उन्हें रिमांड पर ले लिया गया या रिहा कर दिया गया था। यहाँ तक कि इस याचिका [रेड्डी गोविंदा राव] में भी इस प्रकार के अत्याचारों को देखने के बाद इस अदालत ने आंध्रप्रदेश पुलिस महानिदेशक को 12 फरवरी 2020 को तलब किया था, लेकिन वे 14 फरवरी 2020 को जाकर उपस्थित हुए। उच्च न्यायालय का जोर लोगों की गिरफ्तारी के दौरान क़ानूनी प्रावधानों को अमल में लाने पर था।

अदालत के जोर दिए जाने पर पीठ ने पाया कि “...डीजीपी द्वारा पुलिस अधिकारियों को प्रशिक्षित करने के उद्येश्य से माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा डीके बासु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य [एआईआर 1997 एससी 610] और तत्पश्चात सीआरपीसी में किये गए संशोधनों के आधार पर दिए गए दिशानिर्देशों के पालन को लेकर आश्वासन दिया गया था।” 

पीठ यह जानकर भी हैरत में थी कि नरमी के पक्षधर अधिवक्ताओं तक को धमकाया जा रहा था। इसे भी याद रखा जाना चाहिए कि इन आदेशों को पारित किये जाने के बाद से उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों पर सोशल मीडिया में भद्दी भाषा के साथ हमले किये गए थे।

इन रिट याचिकाओं की सुनवाई के बाद ही ब्रेकडाउन वाली टिप्पणी निकलकर आई थी, जिसमें बंदी प्रत्यक्षीकरण, गैरक़ानूनी बंदीकरण, असंवैधानिक कार्यवाही, तेलुगु-माध्यम के स्कूलों को बंद कराये जाने, कोविड-19 महामारी के खिलाफ लड़ाई में यथोचित उपकरणों की माँग करने पर एक डॉक्टर पर हमला करने सहित कई मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों में सरकार की कई कार्यवाइयों को चुनौती दी गई थी।

इसके बाद जाकर मीडिया ने संवैधानिक ब्रेकडाउन पर की गई टिप्पणियों को जोरशोर से उजागर करने का काम किया और सरकार इस मामले को सर्वोच्च न्ययालय में “परेशान करने वाला” बताकर ले गई थी। सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर आगे की कार्यवाही पर रोक लगा दी और नए साल की छुट्टियों के बाद इस मामले को देखने के लिए लंबित रख दिया। न्यायाधीश ने इंगित किया कि उच्च न्यायालय का प्राथमिक कर्तव्य अनुच्छेद 226 और 227 के तहत अपने अधिकार क्षेत्र का उपयोग करते हुए नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करना और उन्हें लागू करने का है, यदि राज्य द्वारा उनका उल्लंघन या अपहरण किया जा रहा है; और इस सुनवाई की प्रकिया के दौरान न्यायाधीशों को कुछ सवाल उठाने के अधिकार हासिल हैं। 

जब अदालत के समक्ष सरकारी भूमि की सार्वजनिक नीलामी या ई-ऑक्शन की बात उठी तो न्यायमूर्ति राकेश कुमार का सवाल था कि क्या राज्य के सामने कोई वित्तीय संकट या आपातकाल की स्थिति थी, जो राज्य-स्वामित्व वाली भूमि को नीलामी के जरिये और वह भी राजस्व सृजन के मकसद से राज्य 

बिना भूमि का एक राज्य 

प्रथम दृष्टया ऐसा लगता है कि उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के मन में कुछ संदेह उत्पन्न हुआ होगा, कि क्या एक चुनी हुई सरकार जिसका कार्यकाल महज पाँच वर्षों के लिए है, को राज्य की भूमि के पट्टे के हस्तांतरण का अधिकार होना चाहिए या नहीं। यदि यह राज्य की संपत्ति है तो निश्चित तौर पर ऐसी संपत्तियों पर राज्य के प्रत्येक नागरिक का कुछ हित अवश्य जुड़ा होना चाहिए। जबकि [मात्र] पाँच वर्षों के लिए इसके ट्रस्टी के तौर पर चुनी हुई सरकार को इस प्रकार की संपत्तियों को ना तो बेचने और ना ही हस्तांतरित करने का अधिकार होना चाहिए। पीठ ने माना कि यदि ऐसे लेनदेन पर सवाल नहीं खड़े किये गए तो एक समय ऐसा भी आ सकता है जब राज्य को “बिना भूमि के राज्य” के तौर पर जाना जाए।

मुख्यमंत्री की शिकायत के सन्दर्भ में 

अदालतों के खिलाफ मुख्यमंत्री की शिकायत को न्यायमूर्ति कुमार एक सफलता के तौर पर मानते हैं, जब उन्होंने कहा “मैं समझता हूँ कि आंध्रप्रदेश राज्य के माननीय मुख्यमंत्री द्वारा माननीय सर्वोच्च न्यायाधीश के नाम लिखे एक पत्र और इसे सार्वजनिक करने पर, जिसमें माननीय सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ न्यायाधीशों, एपी उच्च न्यायालय के माननीय मुख्य न्यायाधीश और एपी उच्च न्यायालय के कई पीठासीन न्यायाधीशों को उनके नाम के साथ आरोप लगाए गए हैं, से राज्य के नौकरशाहों के हौसले प्रत्यक्ष तौर पर बुलन्द हो रखे हैं। 

यह आवेदन आंध्रप्रदेश सरकार के मिशन आंध्रप्रदेश ... के स्पेशल ऑफिसर प्रवीन कुमार द्वारा तैयार किये गए शपथ पत्र के आधार पर दायर किया गया था। उनके हलफनामे में लगाए गये आरोपों को “असत्य”, “झूठा” और “झूठी गवाही” मानकर ख़ारिज कर दिया गया था। पीठ ने इस अधिकारी के खिलाफ झूठी गवाही देने के लिए आपराधिक कार्यवाही शुरू करने के आदेश दिए हैं और उसके खिलाफ अवमानना के लिए कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया है।

यह सच है कि दर्जनों याचिकाओं में उच्च न्यायालय ने सरकार की नीतियों के खिलाफ आदेश पारित किये हैं। प्रतिकूल टिप्पणियों पर हिसंक प्रतिक्रिया भी देखने को मिली हैं। इनमें से ज्यादातर याचिकाकर्ता तेलगू देशम पार्टी या टीडीपी समर्थक थे। इसके चलते न्यायाधीशों के उपर टीडीपी शासनकाल में हुई नियुक्तियों को लेकर आरोप लगाए गए हैं। वाईएसआरसीपी और टीडीपी विरोधी तत्व ऐसे आरोपों को सच मानते हैं। मीडिया में इसको लेकर बहस भी पार्टी लाइन के आधार पर विभाजित है; और सोशल मीडिया के मंचों पर न्यायाधीशों के खिलाफ जमकर ट्रोलिंग की जा रही है। इसके बावजूद यह कहना बेहद कठिन है कि क्या सभी आदेश कानून के उद्येश्यपूर्ण विचारों से निर्देशित नहीं हैं।

इन घटनाओं ने लोगों और न्यायपालिका को एक बेहद परेशानी वाली स्थिति में ला खड़ा कर दिया है। यदि न्यायपालिका को एक संस्था के तौर पर नष्ट कर दिया जाता है तो आम लोगों के अधिकारों की रक्षा और कानून के राज को बनाये रखा पाने का काम बेहद मुश्किल होने वाला है। यही वजह है कि इसकी संवैधानिक संस्थाओं की महिमा पर हमले के तौर पर आलोचना की जा रही है। किसी राजनीतिक कार्यपालिका के शीर्ष पर बैठे व्यक्ति, जिसके खिलाफ कई आपराधिक कानूनों के प्रावधानों के तहत मामले चल रहे हों, द्वारा न्यायपालिका जैसी संस्था के खिलाफ हमला भारतीय संवैधानिक शासनकाल में एक अनसुनी घटना है।

लेखक पूर्व केन्द्रीय सूचना आयुक्त रहे हैं और संवैधानिक कानून पढ़ाते हैं। व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं। 

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें।

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