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गहराती आर्थिक मंदी की वजह से एक और बैंक धराशायी
श्री गुरु राघवेंद्र सहकार बैंक द्वारा दिये गये कर्ज में से 62 खाते या 372 करोड़ रुपये के कर्ज एनपीए हो गये हैं जो बैंक की कुल शेयर पूँजी 52 करोड़ के 7 गुने से भी अधिक है अर्थात बैंक पूर्णतया दिवालिया हो चुका है।
मुकेश असीम
16 Jan 2020
श्री गुरु राघवेंद्र सहकार बैंक

PMC बैंक के डूबने से उसके हजारों ग्राहकों को हुई भारी तकलीफ और 10 से ज्यादा की मौत की खबर अभी पुरानी भी नहीं हुई थी कि एक और सहकारी बैंक पर संकट के बादल छा गये हैं। रिजर्व बैंक ने 10 जनवरी को बंगलौर के श्री गुरु राघवेंद्र सहकार बैंक के सामान्य कामकाज पर रोक लगाते हुये कहा कि उसमें पैसा जमा करने वाला कोई ग्राहक अगले आदेश तक अपने खाते से 35 हजार रुपए से अधिक नहीं निकाल पायेगा, चाहे खाते में कितनी भी रकम क्यों न जमा हो। रिजर्व बैंक ने इस बैंक को कोई नया कर्ज देने से भी रोक दिया है। उधर निजी क्षेत्र के यस बैंक के बारे में भी पिछले दिनों कई किस्म की अनियमितताओं की खबरें आती रही हैं जबकि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के बारे में तो सभी जानते हैं कि पिछले कुछ सालों में डूबे कर्जों की वजह से हुये घाटे के कारण सरकार को उनके चलते रहने के लिये 4 लाख करोड़ रुपये से अधिक की पूँजी लगानी पड़ी है।

इस बैंक की बंगलौर में 8 शाखायें हैं और 31 मार्च 2018 को इसके 8614 सदस्य थे, जिन्होंने बैंक में 52 करोड़ की शेयर पूँजी का निवेश किया हुआ था। बैंक में कुल जमाराशि 1566 करोड़ थी और इसके द्वारा दिये गये कुल कर्ज 1150 करोड़ रुपये थे। पर 9 महीने से अधिक गुजर जाने पर भी बैंक ने साल 2018-19 के ऑडिट किये हुये वित्तीय खाते अभी तक घोषित नहीं किये थे जो इसकी वित्तीय स्थिति पर पहले ही संदेह खड़ा कर रहे थे। दिसंबर में रिजर्व बैंक द्वारा इसका निरीक्षण करने पर पता चला कि बैंक कई साल से कर्जों की ‘एवरग्रीनिंग’ कर रहा था।

इसका अर्थ है कि जो कर्जदार ब्याज या किश्त जमा न कर सके उसे दूसरा कर्ज देकर उससे ब्याज या किश्त को जमा दिखा दिया जाये और कर्ज के डूबने या एनपीए होने की बात छिपी रहे। अब प्राप्त जानकारी के अनुसार बैंक द्वारा दिये गये कर्ज में से 62 खाते या 372 करोड़ रुपये के कर्ज एनपीए हो गये हैं जो बैंक की कुल शेयर पूँजी 52 करोड़ के 7 गुने से भी अधिक है अर्थात बैंक पूर्णतया दिवालिया हो चुका है। यह राशि बैंक में जमा कुल रकम की लगभग एक चौथाई है अर्थात अगर इतना ही कर्ज डूबा हो तब भी बैंक के लिए जमाकर्ताओं की रकम लौटाने में काफी दिक्कत आने वाली है। इसके अतिरिक्त अगर और भी कर्ज एनपीए हुए तो जमाराशि को लौटाने की दिक्कत और भी बढने वाली है।

बैंकिंग व्यवस्था में ऐसी ही घटनाओं के अनुभव से यहाँ कुछ निष्कर्ष और भी निकाले जा सकते हैं। एक, डूबे हुये कर्जों की तादाद 372 करोड़ रुपये से अभी और भी बढ़ने वाली है। दो, हालाँकि अभी 62 एनपीए खातों का जिक्र किया जा रहा है पर कुल डूबने वाली रकम का बड़ा हिस्सा दो-चार बड़े कर्ज खातों में ही फँसा होता है। तीन, यह ‘एवरग्रीनिंग’ काफी लंबे समय से चल रही थी जो बैंक व रिजर्व बैंक के प्रबंधकों व ऑडिटरों से छिपा होना नामुमकिन है। अतः इसे फ्रॉड कह कर छोड़ देना इसके असली कारणों को छिपाना होगा। हालाँकि यह एक छोटा बैंक है मगर इसके जरिये हम अर्थव्यवस्था और बैंकिंग सिस्टम की वर्तमान स्थिति पर कुछ विश्लेषण कर सकते हैं।
 
बैंकों में तेजी से बढ़ते ऐसे सब मामलों में रिजर्व बैंक, सरकार तथा अधिकतर आर्थिक विश्लेषक ऐसा जताते हैं कि यह समस्या कुछ प्रबन्धकों एवं बड़े कर्जदारों द्वारा मिलकर किये गये फ्रॉड या गबन का नतीजा है। उदाहरण के तौर पर पीएमसी बैंक के डूबने का कारण एचडीआईएल द्वारा किया गया गबन बताया गया है।

 पर क्या वास्तव में इन मामलों को सिर्फ फ्रॉड कह देना सही है? फ्रॉड कहने से ऐसा आभास होता है जैसे कि यह बैंकिंग प्रबंधन की कमजोरियों का फायदा उठाकर कुछ जालसाजों-गबनकर्ताओं द्वारा किये गये अपराध हैं जिसके खिलाफ सरकार, बैंकिंग और पुलिस-न्याय व्यवस्था जाँच और सजा के लिए कदम उठा रही है। वित्त और अन्य मंत्री, प्रशासक भी आम तौर पर नीरव मोदी, मेहुल चोकसी द्वारा पीएनबी से धोखाधड़ी के समय से ऐसे सब मामलों में यही बयान दे रहे हैं कि रिज़र्व बैंक तथा अन्य संस्थाओं के नियामकों, प्रबंधकों, ऑडिटरों की लापरवाही या मिली भगत से ये सब अपराध हुए हैं और अब इनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जा रही है।

परंतु इन ‘फ्रॉड’ की सारी प्रणाली और घटनाक्रम पर ध्यान दें तो वास्तव में ऐसा नहीं है। पहली बात तो यह कि यह सब बैंकों, सीबीआई, रिजर्व बैंक, सरकार को आज से नहीं बल्कि बहुत पहले से मालूम था। इन कंपनियों द्वारा बैंक कर्ज लेने के लिए अपनाया गया तरीका और बैंक प्रबंधकों द्वारा कर्ज चुकाने में हो रही समस्या को छिपाने के लिये की गई ‘एवरग्रीनिंग’ कोई अजूबा नहीं था, न ही चोरी छिपे चल रहा था बल्कि यह एक सामान्य कारोबारी तरीका था जिसका चलन पूरे बैंकिंग उद्योग में है।

स्पष्ट है कि इस बड़ी मात्रा में डूबे कर्जों और फ्रॉड की परिघटना को इन्हें कुछ अपराधियों द्वारा किये गए फ्रॉड कहकर नहीं समझा जा सकता। इसे समझने के लिए हमें वर्तमान पूंजीवादी व्यवस्था में बैंक, बीमा, आदि वित्तीय क्षेत्र और उद्योग-व्यापार क्षेत्र के पूंजीपतियों के परस्पर संबंधों को समझना चाहिए। पूंजीवादी व्यवस्था में प्रत्येक पूंजीपति को प्रतिद्वंद्विता में टिके रहने अधिक से अधिक बाजार हासिल करने और अपना अधिकतम मुनाफा सुनिश्चित करने के लिए निरंतर अधिक से अधिक चल-अचल पूंजी के निवेश की आवश्यकता होती है।

आज एक ओर तो उत्पादन के प्रत्येक क्षेत्र में पहले ही पूंजी की जकड़बंदी होने से बाजार के विस्तार की संभावनाएं बहुत सीमित हो चुकी हैं, दूसरी ओर हर उद्योग में कुछ पूंजीपतियों का एकाधिकार कायम हो चुका है। इसलिए दूसरे को पछाड़कर आगे बढ़ने की यह होड़ अत्यंत गलाकाट हो चुकी है। इसलिए सभी पूंजीपतियों के लिए वित्तीय पूंजीपतियों से अधिकाधिक पूंजी प्राप्त कर अपने कारोबार को निरंतर विस्तारित करने का दबाव हमेशा बना रहता है। फिर स्वयं बैंक, बीमा, आदि वित्तीय पूंजीपतियों में भी एकाधिकार की होड़ है और उन्हें भी आवश्यकता रहती है कि वे अपना बाजार हिस्सा बढ़ाने हेतु ज्यादा से ज्यादा कारोबारियों का वित्तीय पोषण कर उनके द्वारा कमाये लाभ में से अपनी हिस्सेदारी और मुनाफा सुनिश्चित करें। दोनों का यह परस्पर हित सुनिश्चित करता है कि बैंक उद्योग-व्यापार की अधिक से अधिक कंपनियों को लगातार एक के बाद एक पहले से बड़े कर्ज देते रहें।

वास्तविकता यह है कि ये बड़े पूँजीपति कभी कोई कर्ज वापस नहीं करते। बल्कि वह हर बार पहले से बड़ा कर्ज लेते हैं, जिससे पिछले कर्ज को जमा दिखाया जाता है। इसके बल पर ही वह बड़े पूंजीपति बनते हैं। इस पूंजी से ही उनका मुनाफा आता है और बैंकों को कर्ज पर ब्याज तथा कमीशन मिलता है। यह चक्र जब तक चलता है तब तक सब सामान्य रहता है, मगर जब यह टूटता है तो इसे फ्रॉड का नाम दे दिया जाता है।
 
यहाँ बैंकों की कार्यविधि की कुछ जानकारी जरुरी है। बैंक मुख्यतया दो किस्म के कारोबारी कर्ज देते हैं। एक, नया कारखाना लगाने, विस्तार करने, उन्नत तकनीक और मशीनें लगाने, आदि बड़े निर्माण में स्थाई निवेश के लिए दिए गए कर्ज निश्चित अवधि के होते हैं जिन्हें मासिक, त्रैमासिक, छमाही, सालाना, आदि अंतराल पर मूल व ब्याज की किश्तों में चुकाना होता है। दूसरे, उत्पादन के लिए सामग्री, श्रम शक्ति खरीदने, उत्पादित माल के भंडारण और उत्पादक और उपभोक्ता के बीच मध्यस्थ व्यापारियों से माल का भुगतान आने तक उधार देने के लिए बैंक नकद उधार, ओवरड्राफ्ट, गारंटी, लेटर ऑफ़ क्रेडिट, लेटर  अंडरटेकिंग, पैकिंग क्रेडिट, बिल डिस्कॉउंटिंग, आदि कई रूपों में कारोबारी कर्ज देते हैं, जो कहने के लिए तो 3, 6, 9 महीने या एक-डेढ़ साल में चुकाने होते हैं पर कभी चुकाए नहीं जाते, बस ब्याज चुका दिया जाता है, वह भी अक्सर अगला कर्ज और बड़ी रकम का लेकर। इसी पूंजी के बल पर सभी पूंजीपति अपने उत्पादन और कारोबार का विस्तार करते रहते हैं और दूसरे पूंजीपतियों से होड़ करते हैं।

पर पूंजीवादी व्यवस्था में सभी पूंजीपतियों द्वारा किया जाने वाला यह निरंतर विस्तार हर कुछ वर्ष में 'अति-उत्पादन' का संकट पैदा करता है क्योंकि अधिकांश जनता की क्रय क्षमता सीमित होने से उत्पादन बाजार मांग से अधिक हो जाता है। तब उद्योगों में नया निवेश बंद हो जाता है तथा पूंजीगत मालों की मांग खास तौर पर नीचे आ जाती है। इस स्थिति में इन विस्तार करते पूंजीपतियों में से कुछ के लिए यह चक्र टूट जाता है, वे दिवालिया हो जाते हैं, और उन्हें उद्योगों की कब्रगाह में दफना दिया जाता है। तब उनके लिए हुए कर्ज एनपीए, विलफुल डिफाल्टर, फ्रॉड, आदि के रूप में सामने आते हैं। साथ ही कभी-कभी विभिन्न कारणों से किसी बैंक द्वारा किसी पूंजीपति को नया कर्ज नहीं मिले तब भी उसका कारोबार तबाह हो जाता है व कर्ज डूब जाता है। इसलिए बैंकिंग उद्योग का संकट असल में पूंजीवादी व्यवस्था के अन्तर्निहित संकट को ही प्रतिबिंबित करता है।

पिछले कुछ वर्षों से भारतीय अर्थव्यवस्था में भी यही स्थिति है। पूँजीपतियों ने भारी मात्रा में बैंक कर्ज लेकर उत्पादन क्षमता में जो निवेश किया है वह बाजार में मौजूद माँग अर्थात ख़रीदारी क्षमता से अधिक है और उद्योगों को लगाई गई क्षमता पर नहीं चलाया जा पा रहा है। रिजर्व बैंक पिछले कई सालों से बता रहा है कि उद्योगों की जितनी उत्पादन क्षमता है वे उसके 65-75% के बीच ही उत्पादन कर रहे हैं। उदाहरण के तौर पर बिक्री न होने की वजह से पिछले वर्ष अधिकांश कार/दुपहिया वाहन बनाने वाले कारखाने हर महीने दसियों दिन तक उत्पादन बंद रखने के लिये विवश थे। हालत यहाँ तक पहुँच गई है कि उद्योगों के बंद होने से बिजली की माँग कम हो गई है और पिछले 5 महीने से बिजली का उत्पादन कम करना पड़ रहा है।

किंतु लगाई गई पूँजी का उत्पादन और बिक्री में पूरा इस्तेमाल न होने से उद्योगों का परिचालन लाभ कम हो जाता है। लाभ कम होने से उनके लिये बैंक कर्ज का ब्याज और किश्त चुकाना मुमकिन नहीं रहता। कुछ समय तक कर्ज की मात्रा बढ़ाकर या कोई दूसरा कर्ज देकर बैंक मूल कर्ज के ब्याज/किश्त को चुकता दिखाते हैं क्योंकि उन्हें उम्मीद होती है कि स्थिति सुधर जायेगी। कर्जदार ही नहीं बैंक भी कर्ज को डूबा नहीं दिखाना चाहते क्योंकि उससे बैंक को भी घाटा दिखाना पड़ता है। इस तरह कर्ज के भुगतान में समस्या को छिपाने को ही एवरग्रीनिंग कहा जाता है। किंतु अगर अर्थव्यवस्था की स्थिति न सुधरे तो किसी न किसी स्थिति में जाकर इसे छिपा पाना नामुमकिन हो जाता है। तब इसके मूल कारण आर्थिक मंदी का जिक्र न कर बैंक/रिजर्व बैंक व सरकार इसे फ्रॉड की संज्ञा देते हैं।

मगर वास्तविकता यही है कि इतने सारे कर्जों के चुकाये जाने में दिक्कत का मूल कारण अर्थव्यवस्था में गहराता जा रहा संकट है और इसी संकट का नतीजा एक के बाद एक बैंकों के धराशायी होने में नजर आ रहा है। सार्वजनिक क्षेत्र के कई बड़े बैंक भी इस दिवालिया होने के नतीजे से सिर्फ इसलिए बच पाये हैं क्योंकि सरकार ने उन्हें जिंदा रखने के लिए बड़ी मात्रा में पूँजी झोंकी है जो आम मेहनतकश जनता पर लगाये गये भारी टैक्स व शिक्षा-स्वास्थ्य जैसी सेवाओं पर खर्च में कटौती से जुटाई गई है।

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