NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
बीच बहस: शरीयत कानून-1937 बदलाव की मांग करता है!
क्या निकाह के लिए बालिग़ होना जरूरी नहीं? पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के एक हालिया फ़ैसले ने देश में एक बार फिर शरीयत कानून-1937 में बदलाव पर बहस छेड़ दी है।
नाइश हसन
14 Feb 2021
शरीयत कानून
प्रतीकात्मक तस्वीर

पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के एक हालिया फैसले में माननीय न्यायाधीश अल्का सरीन ने एक 17 वर्षीय नाबालिग मुस्लिम लड़की को 36 वर्षीय पुरुष के साथ विवाह करने की इजाजत देते हुए कहा कि निकाह के लिए बालिग होना जरूरी नहीं। ऐसा कहते हुए उन्होंने लड़की के माता-पिता की लड़की के विवाह के निरस्तीकरण की मांग को खारिज कर दिया। इस फैसले ने देश में एक बार फिर शरीयत कानून-1937 में बदलाव पर बहस छेड़ दी है।

मुस्लिम निजी कानून शरीयत एप्लीकेशन एक्ट-1937 में अभी भी लड़की के विवाह की न्यूनतम आयु यौवनावस्था या 15 साल है। ऐसे में न्यायाधीश का यह कहना कि निकाह के लिए बालिग होना जरूरत नही, तकनीकी रूप से सही प्रतीत होता है। लेकिन दूसरी ओर यह भी गौर करने की बात है कि बाल विवाह की रोकथाम हेतु बने शारदा अधिनियम-1929 में सुधार करते हुए 1978 में लड़की के विवाह की आयु को 15 से बढ़ा कर 18 और लड़के की आयु 21 हो चुकी है। जिसे संसद द्वारा पारित भी किया जा चुका है, यह एक राष्ट्रीय कानून है जो भारत में रहने वाले हर बच्चे पर लागू होता है। जिसका स्थान किसी निजी कानून से ऊपर है, परन्तु फैसला सुनाते समय इस बात का ध्यान नही रखा गया।

जहां तक यौवनावस्था का प्रश्न है आजकल के जीवनस्तर खान-पान से लड़की अक्सर 12 वर्ष में ही यौवनावस्था को प्राप्त कर लेती है, तो क्या कानून के मुताबिक 12 साल की लड़की का ब्याह हो जाना चाहिए? मुस्लिम निजी कानून बाल विवाह अधिनियम से भी टकराता है, एक तरफ बाल विवाह को समाप्त करने के लिए नए-नए कार्यक्रम तैयार किए जा रहे है तो दूसरी तरफ ऐसा कानून बालिका वधू तैयार करने की बात करता है। जिसके प्रमाण भी समय-समय पर दिखते रहते हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट कहती है कि महिलाएं जो 20 वर्ष की आयु से पहले गर्भवती हो जाती हैं उन्हें जन्म के समय बच्चे के वजन कम होने, कुपोषित होने, अपरिपक्व प्रजनन, एवं नवजात शिशु से सम्बन्धित अनेकों कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। नवजात शिशु के साथ माता को भी अनेको स्वास्थ्य सम्बन्धी जोखिम उठाने पड़ सकते है। जो कि मातृ-शिशु मृत्यु दर को बढ़ाते हैं। अपरिपक्व शरीर से जना बच्चा भी अपरिपक्व और कुपोषित ही होता है। इसका प्रभाव लड़की के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ता है।

अक्सर यह देखा जाता है कि जब भी शरीयत कानून-1937 में बदलाव की बात उठती है तो मुस्लिम समुदाय अतिसंवेदनशील हो उठता है और किसी भी बदलाव से इनकार करता है, ऐसा हमने तीन-तलाक (जो कि कुरान सम्मत नही था) को खत्म करने की लड़ाई में भी देखा। अब प्रश्न यह उठता है कि क्या ऐसे कानून में समयानुसार बदलाव किया जा सकता?

शरीयत अधिनियम अल्लाह का बनाया कानून नहीं है यह इंसानों का बनाया कानून है जिसमें समय की मांग के अनुसार बदलाव होते रहे हैं और आगे भी हो सकते हैं। प्रथागत कानूनों को शरीयत कानून या इस्लामिक कानून कहना ही गलत है, हमारे सामने जो प्रथागत कानून अभी मौजूद हैं वह है ‘मुस्लिम विधि’ समय के साथ यह मुहम्मडन लॉ और बाद में एंग्लों मोहम्मडन लॉ कहलाया। इसे इस्लामिक लॉ कहना या समझना एक भूल है, लेकिन दुर्भाग्य यह है कि इसे ही इस्लामिक लॉ समझा जाता है।

आंग्ल संसद ने शरीयत एप्लीकेशन एक्ट 1937 में बनाया। मोटे तौर पर समझें तो यह एक्ट मुसलमानों पर मुस्लिम विधि ही लागू होगी इस बात की महज एक घोषणा भर था। कानून तो पुराना ही लागू रहा जो पूरी तरह पितृसत्तात्मक, एकतरफा, मर्दो द्वारा, मर्दो के लिए ही बना था जिसका कुरान में महिलाओं को जो अधिकार दिए गए है उससे कोई सम्बन्ध नहीं था।

शरीयत एक्ट 1937 क्यों बनाया गया? इसे भी जानना ज़रूरी है। जैसा कि विदित है मुसलमानों के पास एक अपनी मुस्लिम विधि पहले से थी, उसमें तब से लेकर अब तक कोई विशेष सुधार नही हुआ है। 1937 से पहले भारतीय आंग्ल अदालते सम्परिवर्तित (converted) मुसलमानों के उत्तराधिकार के मामले मुस्लिम विधि के अनुसार न देखकर प्रथागत हिन्दू विधि द्वारा विनियमित कर दिया करती थी,  जो मृतक के जीवन के अधिकांश वर्षो तक लागू रहती। इससे मुस्लिमों पर गैर-मुस्लिम विधि लागू हो जाया करती थी। मुसलमानों के मन में इससे कई आशंकाए उभरीं, उन्हें लगा कि ऐसा करने से मुस्लिम विधि के दूषित हो जाने की सम्भावना है। यह सवाल उठने लगा। तत्पश्चात ब्रिटिश-शासन प्रणाली ने किसी भी प्रकार की प्रथा एवं अन्य विधि को मुस्लिम व्यैक्तिक विधि में स्थान न देने के उद्देश्य से केन्द्रीय विधान मण्डल ने यह अधिनियम पारित किया। इस अधिनियम की धारा-2 यह निर्धारित करती है कि वैयक्तिक मामलों से सम्बन्धित किसी वाद में यदि दोनों पक्षकार मुस्लिम हैं तो निर्णय देने में केवल मुस्लिम विधि के नियम ही लागू होंगे, इन मामलों में कोई अन्य विधि लागू नहीं हो सकती। इस धारा में निम्न मामले वैयक्तिक मामले माने गए हैं-

निर्वसीयत उत्तराधिकार (विरासत), महिलाओं की विशिष्ट सम्पत्ति, विवाह, विवाह विच्छेद (सभी प्रकार के), भरण-पोषण अथवा निर्वाह, मेहर, संरक्षकता, दान, न्यास एवं न्यास सम्पत्तियां और वक्फ।

अदालतें अब उपरोक्त मामलों में मुस्लिम विधि लागू करने के लिए न केवल सक्षम है वरन बाध्य भी हैं।

शरीयत एक्ट बनवाने का उस दौर के मुसलमानों का बस इतना ही मकसद रहा, लेकिन जो मुस्लिम विधि पहले से चल रही थी जो नाइंसाफी पर थी, उसमें सुधार करने का कोई प्रयास न तो सरकार और न ही मुस्लिम समुदाय ने किया।

आज के समय में जरूरत इस बात की है कि क्षेत्रीय प्रथागत नियमों पर आधारित अंगे्रजो द्वारा पारित शरीयत एप्लीकेशन एक्ट 1937 में सुधार किया जाए।

यह तभी मुमकिन हो पाएगा जब इंसाफपसंद कानून बने और उसे लागू करने की सरकार की मंशा भी साफ हो, वरना ऐसे फैसले भी आते ही रहेगे जो तार्किक रूप से गलत न होते हुए भी बाल विवाह को समर्थन देंगे।

पिछले कुछ वर्षों से शिक्षित लड़कियां, महिला संगठन, व डॉक्टरों के संगठन यह मांग उठा रहे हैं कि लड़कियों के विवाह की न्यूनतम आयु जो अभी 18 वर्ष है उसे भी बढाया जाए। देश में बहस जारी हो गई है। लड़कियां अपनी आवाज बुलंद करते हुए पूछ रही हैं कि क्या हम लड़कियों को मात्र 12वी तक ही पढ़ना चाहिए? चूंकि विवाह संस्था अभी भी पूर्ण रूप से पितृसत्ता के हाथों में है, जहां ब्याह कर आने वाली लड़की को थाली, रकाबी, अच्छी बहू बनने के साथ रसोई और बिस्तर के गणित में ही उल्झा दिया जाता है, अपेक्षाएं बहुत हो जाती है, ऐसे में विवाह के बाद कितनी लड़कियां पढ़ लिख पाएंगी, अन्जाम यही होगा कि वह समाज के हर क्षेत्र में पिछड़ जाएंगी और पितृसत्ता उनपर अपना नियंत्रण बढ़ा देगी।

इसे पढ़ें :  मुद्दा: लड़कियों के विवाह की न्यूनतम आयु क्यों न 21 वर्ष हो!

शिक्षित भारत बनने के लिए बेटियों को उच्च शिक्षा प्राप्त होना बहुत जरूरी है। विज्ञान, तकनीकि, व संचार क्रांति से उपजी बिल्कुल नए प्रकार की शैक्षिक प्रतियोगिता के बीच लड़की को भी अपनी जगह बनानी है नहीं तो वह हाशिए पर चली जाएगी इसके लिए जरूरी है कि लड़कियों को भी उतना ही समय दिया जाए जितना लड़कों को दिया जाता है। यदि उन्हें गैरजरूरी जिम्मेदारियों में उलझा कर उन्हें रोक दिया जाएगा तो फिर उस बदलते समाज की शिक्षा प्रणाली की किसी प्रतियोगिता में अपना स्थान नही बना पाएंगी। यह बात भारत की सभी लड़कियों पर लागू होती है।

इसे भी पढ़ें : क्या शादी की न्यूनतम उम्र बदलने से लड़कियों की ज़िंदगी भी बदल जाएगी?

अगर ऐसे ही कानून रहे तो मुसलमान लड़कियों के और पीछे रह जाने की सम्भावना बढ़ जाएगी। क़ानून समय की मांग के अनुसार बनाए जाते है जिनमें हमेशा बदलने की सम्भावना मौजूद होती है। कभी बेहद तरक़्क़ीपसन्द मानी जाने वाली क़ानून प्रणालियां पुरानी और बेअसर हो जाती हैं और सामाजिक ज़रूरतों के हिसाब से उन्हें देाबारा ढाला और गढ़ा जाता है। आज जरूरत इस बात की है कि शरीयत कानून-1937 में बदलाव किया जाए और विवाह की न्यूनतम आयु अनिवार्य रूप से वही रखी जाए जो बाल विवाह निरोधक कानून में है ताकि बाल विवाह पर नियंत्रण लगाया जा सके।

(लेखक रिसर्च स्कॉलर व सामाजिक कार्यकर्ता हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

Sharia law
Punjab-Haryana High Court
Muslims
Muslim Law

Related Stories

बदायूं : मुस्लिम युवक के टॉर्चर को लेकर यूपी पुलिस पर फिर उठे सवाल

भारत में धार्मिक असहिष्णुता और पूजा-स्थलों पर हमले को लेकर अमेरिकी रिपोर्ट में फिर उठे सवाल

भाजपा के लिए सिर्फ़ वोट बैंक है मुसलमान?... संसद भेजने से करती है परहेज़

बिहार पीयूसीएल: ‘मस्जिद के ऊपर भगवा झंडा फहराने के लिए हिंदुत्व की ताकतें ज़िम्मेदार’

श्रृंगार गौरी के दर्शन-पूजन मामले को सुनियोजित रूप से ज्ञानवापी मस्जिद-मंदिर के विवाद में बदला गयाः सीपीएम

मध्य प्रदेश : मुस्लिम साथी के घर और दुकानों को प्रशासन द्वारा ध्वस्त किए जाने के बाद अंतर्धार्मिक जोड़े को हाईकोर्ट ने उपलब्ध कराई सुरक्षा

क्यों मुसलमानों के घर-ज़मीन और सम्पत्तियों के पीछे पड़ी है भाजपा? 

जहांगीरपुरी में चला बुल्डोज़र क़ानून के राज की बर्बादी की निशानी है

संकट की घड़ी: मुस्लिम-विरोधी नफ़रती हिंसा और संविधान-विरोधी बुलडोज़र न्याय

दिल्ली के जहांगीरपुरी इलाके में अतिक्रमण विरोधी अभियान पर सुप्रीम कोर्ट की रोक, कोर्ट ने पूछे कई गंभीर सवाल


बाकी खबरें

  • yogi bulldozer
    सत्यम श्रीवास्तव
    यूपी चुनाव: भाजपा को अब 'बाबा के बुलडोज़र' का ही सहारा!
    26 Feb 2022
    “इस मशीन का ज़िक्र जिस तरह से उत्तर प्रदेश के चुनावी अभियानों में हो रहा है उसे देखकर लगता है कि भारतीय जनता पार्टी की तरफ से इसे स्टार प्रचारक के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है।”
  • Nagaland
    अजय सिंह
    नगालैंडः “…हमें चाहिए आज़ादी”
    26 Feb 2022
    आफ़्सपा और कोरोना टीकाकरण को नगालैंड के लिए बाध्यकारी बना दिया गया है, जिसके ख़िलाफ़ लोगों में गहरा आक्रोश है।
  • women in politics
    नाइश हसन
    पैसे के दम पर चल रही चुनावी राजनीति में महिलाओं की भागीदारी नामुमकिन
    26 Feb 2022
    चुनावी राजनीति में झोंका जा रहा अकूत पैसा हर तरह की वंचना से पीड़ित समुदायों के प्रतिनिधित्व को कम कर देता है। महिलाओं का प्रतिनिधित्व नामुमकिन बन जाता है।
  • Volodymyr Zelensky
    एम. के. भद्रकुमार
    रंग बदलती रूस-यूक्रेन की हाइब्रिड जंग
    26 Feb 2022
    दिलचस्प पहलू यह है कि यूक्रेन के राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की ने ख़ुद भी फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों से सीधे पुतिन को संदेश देने का अनुरोध किया है।
  • UNI
    रवि कौशल
    UNI कर्मचारियों का प्रदर्शन: “लंबित वेतन का भुगतान कर आप कई 'कुमारों' को बचा सकते हैं”
    26 Feb 2022
    यूनाइटेड न्यूज ऑफ इंडिया ने अपने फोटोग्राफर टी कुमार को श्रद्धांजलि दी। इस दौरान कई पत्रकार संगठनों के कर्मचारी भी मौजूद थे। कुमार ने चेन्नई में अपने दफ्तर में ही वर्षों से वेतन न मिलने से तंग आकर…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License