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राजनीति
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रूस के बाहरी इलाक़ों में अस्थिरता फैलाने की कोशिश
स्पष्ट रूप से, रूस के पश्चिमी और दक्षिण-पश्चिमी बाहरी इलाक़ों में बड़ी अस्थिरता की कोशिश रूस और अमेरिका के बीच भू-राजनीतिक युद्ध का प्रदर्शन है। इसलिए, रूस को इसके ख़िलाफ़ एक रणनीति बनाने की ज़रूरत है।
एम. के. भद्रकुमार
19 Oct 2020
Translated by महेश कुमार
रूस
अजरबैजान के गांजा शहर का वह स्थान जहां अर्मेनियाई रॉकेट द्वारा हमला किया गया। 17 अक्टूबर, 2020

रूस के बाहरी इलाक़े के पश्चिम और दक्षिण-पश्चिम हिस्से में जो बेलारूस, नागोर्नो-करबाख और किर्गिस्तान से जुड़ा है वहां अस्थिरता का माहौल है। ये क्षेत्र रूस की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं और विश्व स्तर पर दोबारा से एक बड़ी शक्ति बनने की इसकी क्षमता को कमज़ोर कर सकते हैं।

वास्तव में बेलारूस, रूस के लिए और इसकी पश्चिम सीमा का बफर ज़ोन है। रूस बेलारूस को पश्चिमी ताक़तों के हाथों नहीं खो सकता है। (मेरा लेख पढ़ें, बेलारूस: स्क्रैम्बल फॉर हार्ट ऑफ यूरोप)

मॉस्को ने दावा किया है कि अमेरिका ने मध्य यूरोप के अपने सहयोगियों- पोलैंड, यूक्रेन, बाल्टिक देशों और जॉर्जिया के साथ मिलकर मिन्स्क में 'कलर रिवॉल्यूशन' करने के पीछे खास भूमिका निभाई थी।

राष्ट्रपति अलेक्जेंडर लुकाशेंको कोई भरोसेमंद सहयोगी नहीं रहे हैं, लेकिन मास्को के पास उसका समर्थन करने अलावा कोई विकल्प भी नहीं रहा, क्योंकि यहां निज़ाम में बदलाव का मतलब रूस की पश्चिमी सीमाओं के पास एक प्रतिकूल सरकार आ सकती है।
मास्को बेलारूस को कष्ट देने का जोखिम नहीं उठा सकता है फिर चाहे वह 'राइट साइड ऑफ हिस्ट्री' ही क्यों न हो, हालांकि उसकी प्राथमिकता बेलारूस में एक व्यवस्थित लोकतांत्रिक परिवर्तन की होगी।

\वर्तमान में रूस का खास ज़ोर लुकाशेंका के सत्तावादी निज़ाम को समय और संसाधन उपलब्ध कराने पर है, ताकि कलर रिवॉल्यूशन को रोका जा सके और संवैधानिक शासन को बहाल किया जा सके।

बेलारूस की उथल-पुथल में विवादास्पद एलेक्सी नवलनी मामला जो टकराव का केंद्र बना हुआ है एक रहस्य बन गया है। क्या यह संयोग था? जैसा कि पता चला, कि यूरोपीयन यूनियन के साथ रूस के संबंध- विशेष रूप से जर्मनी के साथ बड़ी तेजी से बिगड़ रहे हैं, जो रूस के लिए एक अन्य जटिल मुद्दा बन गया है।

नागोर्नो-कराबाख में संघर्ष जुलाई में शुरू हुआ था जिसकी शुरूआत आर्मेनिया से हुई थी। इसके बाद से अजरबैजान ने बड़े पैमाने पर जवाबी कार्रवाई की, जिसने पिछले तीन दशकों से अर्मेनियाई के क़ब्ज़े वाले क्षेत्र पर नियंत्रण पाने के लिए सैन्य हमले का रूप ले लिया।
इस युद्ध के रूस की राष्ट्रीय सुरक्षा पर गंभीर परिणाम हो सकते हैं, जैसे कि अज़रबैजान की उत्तर काकेशस की सीमाएं इस्लामिक आतंकवाद की चपेट में आ सकते है।

अप्रत्याशित रूप से, तुर्की-ऐज़री गठजोड़ रुस के लिए चिंता का कारण बनने जा रहा है, जो कि राष्ट्रपति एर्दोगन की ‘नव-ओटोमन’ की विचारधारा है और वह भूवैज्ञानिक उपकरण के रूप में अंकारा के चयनात्मक कट्टरपंथी इस्लामिक समूहों का इस्तेमाल करता है।
एर्दोगन ने नागोर्नो-कराबाख प्रांत पर नियंत्रण पाने के लिए ऐज़री को पूरा समर्थन दे दिया है। यह मॉस्को की ऐज़री के राष्ट्रपति अलीयेव को प्रभावित करने की क्षमता को कमज़ोर बनाता है।

दूसरी ओर, अर्मेनियाई प्रधानमंत्री पशिनीन एक कुटिल राजनीतिज्ञ हैं, जो 2018 में अमेरिका समर्थित कलर रिवॉल्यूशन की बदौलत सत्ता में आए थे, जिन्हें कथित तौर पर जॉर्ज सोरोस द्वारा वित्तपोषित किया गया ।(मेरा आर्टिकल पढ़ें: A color revolution in the Caucasus puts Russia in a dilemma, May 9, 2018 and Color Revolution in the Caucasus rattles Russian leaders, August 8, 2018)  
मॉस्को अर्मेनिया की सुरक्षा की गारंटी के लिए संधि से बंधे है, लेकिन एक विरोधाभास यह है कि पशिनीन देश को पश्चिमी ताक़तों की ओर लगातार ले जा रहे है और इसके लिए उन्हे अमेरिका और फ्रांस के  प्रभावशाली अर्मेनियाई प्रवासियों का समर्थन मिलता है।

समान रूप से, मास्को भी मिन्स्क समूह की रुपरेखा के तहत नागोर्नो-कराबाख युद्ध को नियंत्रित करने के लिए बाध्य है जो अमेरिका और फ्रांस के साथ-साथ है।

यहां एक विरोधाभास है क्योंकि मिन्स्क समूह भी नागोर्नो-काराबाख के नियंत्रण को हासिल करने में  न तो एज़ेरी को संतुष्ट कर पाएगा और न ही अर्मेनिया को उसके क़ब्ज़े को खाली करने के लिए दबाव बना पाएगा।
अजरबैजान मिन्स्क समूह को बड़े संदेह से देखता है और आशा करता है कि तुर्की गतिरोध को तोड़ने में मदद करेगा। मिन्स्क समूह का प्रतिनिधित्व करने के लिए अमेरिका और फ्रांस ने खुशी-खुशी रूस का समर्थन किया है।

इस बीच, अमेरिका और उसके मध्य पूर्वी सहयोगी- इज़रायल, यूएई, सऊदी अरब और मिस्र- को उम्मीद है कि अभी या बाद में, रुस और तुर्की के जहाज़ नागोर्नो-कराबाख युद्ध के हिमखंड से टकराएंगे और डूब जाएंगे।

तुर्की के साथ सौहार्द बिगड़ने से रूसी की रणनीति को क्षेत्रीय रूप से झटका लग सकता है- न केवल सीरिया, लीबिया, पूर्वी भूमध्य सागर में, बल्कि काला सागर, यूक्रेन, जॉर्जिया, आदि में भी यह झटका महसूस होगा- और जो केवल अमेरिका को लाभ पहुंचाएगा। इसके अलावा, रूस की तुर्की के साथ द्विपक्षीय आर्थिक साझेदारी और व्यापारिक साझेदारी भी है।

अमेरिका के मध्य पूर्वी सहयोगी तुर्की को अपने अस्तित्व के मामले में दुश्मन मानते हैं और उनका अनुमान हैं कि अंकारा और मास्को के बीच टकराव या उनका अलग होना एर्दोगन को कमज़ोर करने में सक्षम होगा।

मास्को वास्तव में एक दुविधा में है। पुतिन ने एर्दोगन के अस्थिर स्वभाव के बावजूद उसका भारी समर्थन किया है।

रूस पश्चिमी खेमे से एर्दोगन के अलगाव का भी हितधारक है और उसे इस बात का ख्याल है कि उस पर किसी भी तरह का अत्यधिक दबाव जवाबी कार्रवाई साबित हो सकता है। जर्मनी तुर्की को नए सिरे से यूरोपीयन यूनियन की साझेदारी की पेशकश करने का इंतज़ार कर रहा है।
पुतिन सावधानी से आगे बढ़ रहे हैं और इस बात का काफी ध्यान रख रहे हैं कि रूसी-तुर्की गठजोड़ न टूटे। अतीत के अस्थिरता के मास्टर एर्दोगन अपनी ओर से भी इस हफ्ते पुतिन की तरफ रुख किया है।

14 अक्टूबर को पुतिन को एर्दोगन ने फोन किया और रूस के साथ न केवल काकेशस में बल्कि सीरिया में साथ काम करने की अपनी निरंतर रुचि का संकेत दिया, जबकि तुर्की के फैसले ने, बहुत शिथिलता के बाद, रूस-निर्मित एस-400 एबीएस सिस्टम का परीक्षण करने के साथ एक बड़ा संदेश मास्को को दिया है जो उसकी सामरिक महत्व की पुष्टि करता है और अंकारा-रूस के गठबंधन को बढ़ाने का भी संकेत देता है।

लेकिन, यह कहते हुए कि तुर्की भी यह उम्मीद करता है कि रूस काकेशस में अपनी उपस्थिति को दर्ज करेगा जहां ओटोमन विरासत तुर्की की सामूहिक स्मृति का एक सम्मोहक तथ्य है। एक बढ़ती क्षेत्रीय शक्ति के रूप में, तुर्की अपने प्रभाव का विस्तार करना चाहता है, जो केवल कुदरती बात है।

तुर्की अपने क्षेत्र से संबद्ध है और अमेरिका या फ्रांस की तरह अपने के क्षेत्र के बाहर हस्तक्षेप करने वाला नहीं है। तुर्की से उसके प्राकृतिक इलाक़े में मुकाबला करने की कोशिश करना निरर्थक है। इसके विपरीत, रूस काकेशस में क्षेत्रीय स्थिरता लाने के लिए तुर्की का एक रचनात्मक भागीदार के रूप में लाभ उठा सकता है।

बेलारूस और नागोर्नो-कराबाख की तुलना में, जो अत्यधिक जटिल मुद्दे बने हुए हैं, वह किर्गिस्तान की कलर रिवॉल्यूशन को सहजता से निपटाया जाना है- फिलहाल, कम से कम तो यही ज़रूरी है।

मॉस्को ने कलर रिवॉल्यूशन में जो सहजता दिखाई उससे पता चलता है कि रूस अभी भी इस क्षेत्र का सुरक्षा प्रदाता है जो इस क्षेत्र की कद्र करता है। इसकी तुलना मध्य एशिया में अमेरिकी प्रभाव से की जा सकती है।  (एशिया टाइम्स में मेरा आर्टिकल पढ़ें Moscow derails Kyrgyz colour revolution)

अंतिम विश्लेषण ये है कि तीनों हॉटस्पॉट्स- बेलारूस, नागोर्नो-कराबाख और किर्गिस्तान में तनाव, एक तरफ मॉस्को और दूसरी तरफ यूएस, ईयू और नाटो के बीच गहरी सोच और दुश्मनी की पृष्ठभूमि में खेला जा रहा हैं।

नाटो पहले से ही बेलारूस को बढ़ावा दे रहा है और जॉर्जिया को अपने कोकेशियान समुद्र तट के रक्षक के रूप में सहयोगी बना रहा है ताकि काला सागर में रूस की पहले से मौजूद प्रमुखता को चुनौती दी जा सके।

नाटो की अफगानिस्तान में 15 वर्षों से मौजूदगी है। इसलिए यह अफगान की पतिस्थिति में मध्य एशियाई क्षेत्र में प्रभाव जमाने की आकांक्षा रखता है।

स्पष्ट रूप से, रूस के पश्चिमी और दक्षिण-पश्चिमी बाहरी हिस्से में बढ़ती अस्थिरता रूस और अमेरिका के बीच भू-राजनीतिक युद्ध/टकराव का प्रदर्शन है। इसलिए, रूस को इसके ख़िलाफ़ एक रणनीति बनाने की ज़रूरत है।

तुर्की और ईरान को इस उभरते क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा परिदृश्य में रूस का प्राकृतिक सहयोगी होना चाहिए। यह रूस की पूर्ण सुरक्षा की शर्त है, और क्योंकि आज के वक़्त में 'प्रभाव क्षेत्र' की अवधारणा धूमिल हो गई है।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें

Arc of Instability on Russia’s Periphery

Russia
Belarus
Azerbaijan
Armenia
NATO
Nagorno-Karabakh
Kyrgyzstan
Turkey
Color Revolution

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