NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
दुनिया भर की: कोलंबिया में पहली बार वामपंथी राष्ट्रपति बनने की संभावना
पूर्व में बाग़ी रहे नेता गुस्तावो पेट्रो पहले दौर में अच्छी बढ़त के साथ सबसे आगे रहे हैं। अब सबसे ज़्यादा वोट पाने वाले शीर्ष दो उम्मीदवारों में 19 जून को निर्णायक भिड़ंत होगी।
उपेंद्र स्वामी
30 May 2022
Gustavo Petro
कोलंबिया में राष्ट्रपति पद के लिए रविवार को हुए मतदान के नतीजों के बाद सबसे आगे रहे वामपंथी उम्मीदवार गुस्तावो पेट्रो और उपराष्ट्रपति के पद के लिए उनकी साथी फ्रांसिया मार्केज। फोटो साभार : रायटर्स

मध्य व दक्षिण अमेरिका में वामपंथ के नए सिरे से उदय के अगले कदम के तौर पर अब कोलंबिया में पहली बार एक वामपंथी राष्ट्रपति बनने की संभावना बन रही है। रविवार को वहां हुए मतदान में वामपंथी नेता और अपनी युवावस्था में गुर्रिल्ला संगठन एम-19 के सदस्य रहे गुस्तावो पेट्रो सबसे आगे रहे।

राजधानी बोगोटा के मेयर रह चुके पेट्रो को छह उम्मीदवारों में सबसे ज्यादा 40 फीसदी वोट मिले। मध्य व दक्षिण अमेरिका में कई देशों में प्रचलित चुनावी व्यवस्था के अनुरूप अब सबसे ज्यादा मत पाने वाले शीर्ष दो उम्मीदवारों में निर्णायक भिड़ंत होगी 19 जून को। अगर पेट्रो को पहले दौर में ही 50 फीसदी से ज्यादा वोट मिल जाते तो वह राष्ट्रपति बन जाते और दूसरे दौर की जरूरत ही नहीं रहती। किसी भी उम्मीदवार को 50 फीसदी से ज्यादा वोट न मिलें तो फिर दूसरे दौर का मतदान होता है।

लैटिन अमेरिका में बदहाल आर्थिक स्थिति से नाराज लोगों ने हाल के कई चुनावों में वामपंथी सरकारों को चुना है। पिछले साल चिली, पेरु व होंडुरास में वामपंथी राष्ट्रति निर्वाचित हुए। मेक्सिको में पहले ही 2018 में वामपंथी राष्ट्रपति चुने गए थे। ब्राजील में भी इस साल चुनाव होने हैं और अब तक के संकेतों के अनुसार वहां भी वामपंथी रुझान वाले पूर्व राष्ट्रपति लुला दा सिल्वा रायशुमारियों में आगे चल रहे हैं। रविवार के मतदान को समझें तो कोलंबिया भी इसी दिशा में बढ़ रहा है।

इसे भी पढ़ें:  दुनिया भर की : चिली में वामपंथी छात्र नेता होंगे सबसे युवा राष्ट्रपति

हालांकि पेट्रो का मुकाबला निर्णायक दौर में उस प्रत्याशी से नहीं होगा, जिससे होने के अनुमान तमाम विश्लेषणों में लगाए जा रहे थे। पेट्रो तो पिछले कई महीनों से तमाम रायशुमारियों में आगे ही चल रहे थे, लेकिन अनुमान यह था कि दूसरे दौर के सीधे मुकाबले में उनकी भिड़ंत मेडेलिन के पूर्व मेयर फेड्रिको गुतिएरेज से होगी। उन्हें सत्ता व्यवस्था की ही निरंतरता के दावेदार के तौर पर देखा जा रहा था, जाहिर था कि उनका रुख व्यवसायी वर्ग के हितैषी वाला और कथित आर्थिक विकास को बढ़ाने वाला था।

लेकिन मतदान से पहले के अंतिम दिनों में एक व्यवसायी रुडोल्फो हर्नांदेज़ ने अपनी चमकदार सोशल मीडिया छवि के आधार पर काफी लोकप्रियता हासिल कर ली और वह गुतिएरेज को पीछे छोड़कर रविवार के मतदान में 28.2 फीसदी वोटों के साथ दूसरे नंबर पर रहे। अब वह 19 जून को होने वाले रन-ऑफ में पेट्रो को चुनौती देंगे। हर्नांदेज़ भी बुकारामांगा शहर के मेयर रह चुके हैं। हर्नांदेज भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग लड़ने के नाम पर चुनाव लड़ रहे हैं हालांकि खुद उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के एक मामले की जांच चल रही है। हर्नांदेज की खास बात यही है कि वह किसी भी राजनीतिक धारा से ताल्लुक नहीं रखते हैं। प्रचार के दौरान उनकी छवि डोनाल्ड ट्रंप सरीखी सामने आई- अस्थिर व बड़बोली।

पेट्रो आर्थिक व सामाजिक व्यवस्था में बदलाव के एजेंडे पर मैदान में उतरे थे। खालिस वामपंथी एजेंडे के तौर पर उन्होंने पेंशन को फिर से बांटने, मुफ्त यूनिवर्सिटी शिक्षा उपलब्ध कराने, कर व्यवस्था सुधारने और सदियों से चली आ रही घोर असमानता को दूर करने के लिए काम करने के वादे किए थे। पहले दौर के नतीजों से साफ है कि कोलंबिया के लोग बदलाव चाहते हैं, यथास्थिति नहीं। इसके अलावा पेट्रो के प्रमुख वादों में कोलंबिया के ड्रग्स कार्टेल और पूर्व बागियों से निबटने के तरीके में खासा बदलाव लाना भी है। पेट्रो के पास अनुभव भी है।

पेट्रो ने 2016 में फार्क बागियों  के साथ किए गए शांति समझौते को भी पूरी तरह से अमल में लाने का वादा किया है। फार्क यानी कि रिवोल्यूशनरी आर्म्ड फोर्सेज ऑफ कोलंबिया-पीपुल्स आर्मी एक मार्क्सवादी-लेनिनवादी गुर्रिल्ला संगठन था। शीत युद्ध के दिनों में इसकी शुरुआत श्रमिक दस्ते के तौर पर हुई थी। एम-19 व ईएलएन भी कोलंबिया में सक्रिय बाकी गुर्रिल्ला संगठनों में से थे।

गुस्तावो पेट्रो के एम-19 ने तो पिछली सदी के नौवें दशक में ही सशस्त्र बगावत का रास्ता छोड़कर राजनीतिक मुख्यधारा में प्रवेश कर लिया था। ईएलएन अब भी सक्रिय है, हालांकि उसका ज्यादा प्रभाव की नहीं रहा। लेकिन फार्क बहुत ताकतवर था और वह कुछ साल पहले तक सक्रिय रहा। यहां यह याद दिलाना जरूरी है कि 2016 में फार्क ने कोलंबिया की सरकार के साथ शांति समझौते पर रजामंदी दिखाई थी और फिर हवाना में समझौते पर दस्तखत किए गए थे। यही वह समझौता था जिसके चलते कोलंबिया के उस समय राष्ट्रपति रहे जुआन मैनुअल सांतोस को 2016 का नोबेल शांति पुरस्कार मिला था। समझौता कितना कारगर रहा, यह बहस का विषय हो सकता है, लेकिन फार्क का दौर उससे बेशक खत्म हो गया।

कोलंबिया के बारे में हमारी तरफ़ के लोगों की जानकारी सीमित है और जो है, वह फिल्मों व कतिपय पश्चिमी मीडिया की खबरों से है। उनमें कोलंबिया की सबसे बड़ी छवि ड्रग्स के गैरकानूनी धंधे के केंद्र के रूप में और ड्रग्स माफिया की आपसी जंग के लिए है। हालांकि कोलंबिया की राजनीतिक व सामाजिक व्यवस्था वैसी है नहीं जैसी दिखती है, वह काफी जटिल है। कोलंबिया के लोगों ने करीब 60 सालों तक इसका काफी हिंसक स्वरूप देखा है। वहां सभी लोग ड्रग्स के कारोबार का अपने-अपने हित में फायदा उठाते रहे हैं।

वहां वामपंथी गुर्रिल्ला संगठनों के अलावा दक्षिणपंथी अर्धसैनिक बल भी सक्रिय रहे हैं और खुद सरकार की भूमिका तो हमेशा से संदिग्ध रही है। कोलंबिया के नेशनल सेंटर फॉर हिस्टोरिकल मेमॉरी—जो एक सरकारी एजेंसी है—ने कुछ साल पहले अनुमान लगाया था कि वहां 1981 से लेकर 2012 तक के बीच नागरिकों की जो हत्याएं हुई हैं, उनमें से केवल 16.8 फीसदी के लिए गुर्रिल्ला जिम्मेदार रहे। सबसे ज्यादा 38.4 फीसदी नागरिक हत्याएं दक्षिणपंथी अर्धसैनिक बलों ने की, 27.7 फीसदी कतिपय गुमनाम सशस्त्र गुटों ने और 10.1 फीसदी कोलंबिया के सैन्य बलों ने। वहीं संयुक्त राष्ट्र ने भी एक अनुमान जारी किया  जिसके मुताबिक कोलंबिया की जंग में कुल नागरिक मौतों में से 12 फीसदी के लिए फार्क व ईएलएन के गुर्रिल्ला जिम्मेदार थे, जबकि 80 फीसदी के लिए दक्षिणपंथी अर्धसैनिक बल और 8 फीसदी के लिए कोलंबिया के सैन्य बल जिम्मेदार थे।

इन सबसे इतर अमेरिका वहां की राजनीति का एक प्रमुख अदृश्य खिलाड़ी रहा है। वहां के ड्रग्स कारोबार से निपटे के तौर-तरीक़े भी अमेरिका काफी हद तक प्रभावित करता रहा है, क्योंकि उसमें उसके भी अलग हित निहित हैं। इससे साफ है कि वहां चीजें वैसी हैं नहीं, जैसी आम तौर पर जाहिर की जाती हैं। ऐसे में एक वामपंथी नेता यदि वहां राष्ट्रपति बनता है तो उसकी काफी अहमियत होगी। पेट्रो के जेहन में ड्रग्स के इस समूचे संकट से निपटने का भी अलग खाका है।

पेट्रो ने ईएलएन बागियों से भी बातचीत की वकालत की है और तेल व गैस के नए उत्खनन पर भी रोक लगाने का वादा किया है। मजेदार बात यह भी है कि वहां की राजनीति में बदलाव की चाह रखने वालों में युवाओं की संख्या ज्यादा है। मतदान से पहले की रायशुमारियों में कोलंबिया के सबसे युवा मतदाताओं में से 50 फीसदी से भी ज्यादा पेट्रो का समर्थन कर रहे थे। उन्होंने भी अपने चुनाव प्रचार के आखिरी दिनों में युवाओं को बाहर निकालकर वोट डालने के लिए लाने पर काफी जोर लगाया। वैसे रविवार को तकरीबन 54 फीसदी लोगों ने ही वहां वोट डाले।

भले ही पेट्रो की बढ़त अभी अच्छी दिख रही है, लेकिन ध्यान देने की बात है कि वहां की दक्षिणपंथी ताकतें उन्हें इतनी आसानी से जीतने नहीं देंगी। गुतिएरेज ने पहले ही ऐलान कर दिया है कि वह दूसरे दौर में हर्नांदेज को समर्थन देंगे।

इसे भी पढ़ें: फ्रांस में मैक्राँ की जीत से दुनियाभर में राहत की सांस

देखना यही है कि क्या पेट्रो अगले तीन हफ्ते तक अपने प्रभाव को कायम रखकर वामपंथी धारा को एक और महत्वपूर्ण जीत दिला पाएंगे। पेट्रो तीसरी बार राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ रहे हैं, उम्मीद है इस बार कामयाबी उनके हाथ लगेगी।

इसे भी पढ़ें : ऑस्ट्रेलिया: नौ साल बाद लिबरल पार्टी सत्ता से बेदख़ल, लेबर नेता अल्बानीज होंगे नए प्रधानमंत्री

colombia
Gustavo Petro
Left politics
Leftist President
International news
Colombian News

Related Stories

झारखंड-बिहार : महंगाई के ख़िलाफ़ सभी वाम दलों ने शुरू किया अभियान

अमेरिका में महिलाओं के हक़ पर हमला, गर्भपात अधिकार छीनने की तैयारी, उधर Energy War में घिरी दुनिया

रूस-यूक्रैन संघर्षः जंग ही चाहते हैं जंगखोर और श्रीलंका में विरोध हुआ धारदार

दुनिया भर की: सोमालिया पर मानवीय संवेदनाओं की अकाल मौत

चीन और लैटिन अमेरिका के गहरे होते संबंधों पर बनी है अमेरिका की नज़र

कोलंबिया में महिलाओं का प्रजनन अधिकारों के लिए संघर्ष जारी

कोलंबिया में राष्ट्रपति पद के दौड़ में गुस्तावो पेट्रो

दुनिया भर की: दक्षिण अमेरिका में वाम के भविष्य की दिशा भी तय करेंगे बोरिक

कोलंबिया में चुनाव : बदलाव की संभावना और चुनावी गारंटी की कमी

कोविड -19 के टीके का उत्पादन, निर्यात और मुनाफ़ा


बाकी खबरें

  • poverty
    अजय कुमार
    ग़रीबी के आंकड़ों में उत्तर भारतीय राज्यों का हाल बेहाल, केरल बना मॉडल प्रदेश
    28 Nov 2021
    मल्टीडाइमेंशनल पॉवर्टी इंडेक्स के मुताबिक केरल के अलावा भारत का और कोई दूसरा राज्य नहीं है, जहां की बहुआयामी गरीबी 1% से कम हो। 
  • kisan andolan
    शंभूनाथ शुक्ल
    हड़ताल-आंदोलन की धार कुंद नहीं पड़ी
    28 Nov 2021
    एक ज़माने में मज़दूर-किसान यदि धरने पर बैठ जाते थे तो सत्ता झुकती थी। पर पिछले चार दशकों से लोग यह सब भूल चुके थे।
  • Hafte Ki Baat
    न्यूज़क्लिक टीम
    संवैधानिक मानववाद या कारपोरेट-हिन्दुत्ववाद और यूपी में 'अपराध-राज'!
    27 Nov 2021
    संविधान दिवस के मौके पर भी सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच आरोपों-प्रत्यारोपो की खूब बौछार हुई. क्या सच है-संविधानवाद और परिवारवाद का? क्या भारत की सरकारें सचमुच संविधान के विचार और संदेश के हिसाब से…
  • crypto
    न्यूज़क्लिक टीम
    क्या Crypto पर अंकुश ज़रूरी है?
    27 Nov 2021
    मोदी सरकार क्रिप्टोकरेंसी पर अंकुश लगा रही हैI लेकिन आखिर यह क्रिप्टोकरेंसी है क्या? क्या यह देश में मुद्रा की जगह ले सकती है?
  • kisan andolan
    न्यूज़क्लिक टीम
    किसान मोदी को लोकतंत्र का सबक़ सिखाएगा और कॉरपोरेट की लूट रोकेगा: उगराहां
    27 Nov 2021
    ख़ास इंटरव्यू में वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने टिकरी बॉर्डर स्थित गुलाब बीबी नगर में बात की जुझारू किसान नेता और भारतीय किसान यूनियन (एकता) उगराहां के अध्यक्ष जोगिंदर सिंह उगराहां से और उनसे जानने की…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License