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धड़ल्ले से जारी कोयला खनन से असम की समृद्ध जैव विविधता पर छाया ख़तरा
NBWL ने हाल में "कोल इंडिया" की सहायक कंपनी "नॉर्थ ईस्टर्न कोलफील्ड्स (NEC)" को सालेकी के वर्षावनों में क़रीब 98.59 हेक्टेयर ज़मीन पर "ओपन कास्ट माइनिंग'' करने की अनुमति दी है।
अयस्कांत दास
20 Jul 2020
 कोयला खनन
Image Courtesy: Indian Express

"नेशनल बोर्ड ऑफ वाइल्ड लाइफ (NBWL)" द्वारा हाल में असम के भीतर कोयला खनन की अनुमति देने के बाद, चारों तरफ से वर्षावनों में सभी तरह की खनन गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाने की मांग उठ रही है। आरोप है कि खनन की अनुमति पर्यावरणीय चिंताओं को परे रखकर दी गई है।

कुछ नागरिक समूहों और गैर सरकारी संगठनों ने इलाके में हर तरह के खनन पर पूर्ण प्रतिबंध की मांग की है, क्योंकि बड़े स्तर के खनन से पर्यावरण और वन्यजीवों को नुकसान हो सकता है।

अप्रैल में NBWL ने "कोल इंडिया लिमिटेड" की सहायक कंपनी "नॉर्थ ईस्टर्न कोलफील्ड्स" को वर्षावनों में स्थित सालेकी इलाके की 98.59 हेक्टेयर भूमि "ओपन कास्ट माइनिंग" के लिए दी थी। यह अनुमति उन आरोपों के बावजूद दी गई, जिनके मुताबिक़, 2003 में 30 साल की लीज़ खत्म होने के बावजूद NEC ने अवैध खनन जारी रखा था। इस दौरान जरूरी वन अनुमतियां नहीं ली गईं। 

असम के बड़े इलाके में फैले वर्षावनों में बहुत समृद्ध जैव विविधता है। वहां स्तनधारी, पक्षी, उभयचर, सरीसृप, तितिलियां, मछली और रंग-बिरंगे फूलों वाले विविध पौधे पाए जाते हैं। सालेकी इन्हीं वर्षावनों के भीतर स्थित है, यहां 'प्रस्तावित संरक्षित वन' का इलाका भी है, जिसे केंद्र सरकार अप्रैल, 2003 में "देहिंग पतकई एलीफेंट रिज़र्व" के नाम से सूचित भी कर चुकी है।

डिग्बोई स्थित /ग्रीन बड सोसायटी' के त्रिनयन गोगोई कहते हैं, "एलीफेंट रिज़र्व में 'ओपन कास्ट माइनिंग' करने के लिए बड़े पैमाने पर जंगलों का सफाया किया गया है। इससे वन्यजीवों का भी नुकसान हुआ है और पेड़-पौधों की कई प्रजातियों पर भी असर पड़ा है। इस इलाकों में होने वाला कोयला खनन में खूब सल्फर निकलता है, जिससे यहां का पानी प्रदूषित हो गया है और जलीय जीवन का भी नुकसान हो रहा है। इस आरक्षित वन के भीतर कई एलीफेंट कॉरिडोर हैं। खनन गतिविधियों ने हाथियों की आवाजाही को भी प्रभावित किया है।'

इस आरक्षित वन के आसपास बसे इंसानी इलाकों में अकसर हाथियों की आवाजाही की शिकायत होती है। विशेषज्ञ इसकी वजह शताब्दियों पुराने इस प्राकृतिक वर्षावन का क्षरण होना बताते हैं।

NGO ने मैं हूं 'देहिंग पतकई' नाम से एक कैंपेन भी शुरू किया है। इशका मक़सद वर्षावनों के पर्यावरण की रक्षा करना है, जिसके लिए सभी तरह की कोयला गतिविधियों को रुकवाना है।

सालेकी को असम फॉ़रेस्ट रेगुलेशन एक्ट, 1891 के तहत जून, 1976 में आरक्षित वन बनाने का प्रस्ताव दिया गया था। लेकिन चार दशक गुजर जाने के बाद भी सालेकी को पूर्णत: आरक्षित वन का दर्जा मिलना बाकी है। सालेकी, देहिंग पतकई वन्यजीव अभ्यारण्य के दस किलोमीटर की परिधि में पड़ता है, जो ईको-सेंसिटिव जोन है। देहिंग पतकई, एक एलीफेंट रिज़र्व के बीच पड़ता है। इन तथ्यों के बावजूद NBWL ने इलाके में खनन की अनुमति दे दी।

पर्यावरण वकील संजय उपाध्याय कहते हैं,  ''NBWL की अनुमति, पर्यावरण संरक्षण कानून, 1986 में बताए गए ईको-सेंसिटिव जोन की अवधारणा का उल्लंघन करती हैं। चार दशक बाद भी सालेकी का प्रस्तावित आरक्षित वन बनकर ही रह जाना देश की बुरी स्थिति बताता है। इसका नतीजा यह हुआ कि ऐसे जंगल कभी वैज्ञानिक प्रबंधन के तहत नहीं आ पाते। इसके चलते जंगल के गलत इस्तेमाल की संभावना बनी रहती है। बिलकुल वैसे ही, जैसे इस मामले में हो रहा है।"

देहिंग पतकई को जब एलीफेंट रिज़र्व घोषित किया गया, तब इलाके में हाथियों की संख्या 295 थी। हाथियों की रक्षा के लिए देश में कोई कानूनी तंत्र नहीं है, लेकिन इसके बावजूद हाथियों और कॉरिडोर्स की सुरक्षा के लिए बेहद अहम पर्यावरणीय क्षेत्र बनाए गए हैं।

कश्मीरा काकती एक वन्यजीव बॉयोलॉजिस्ट हैं, जो देश के पूर्वोत्तर में काम करती हैं। उन्होंने अपने अध्ययन में देहिंग पतकई में पक्षियों और जानवरों की खतरे में पड़ी प्रजातियों का दस्तावेज़ीकरण किया है। 

अपने अध्ययन में काकती ने दावा किया कि देहिंग पतकई में 49 स्तनधारी, 283 पक्षियों, 107 रंगबिरंगे पौधों, 71 सरीसृपों, 306 तितिलियों, 71 मछलियों और 40 ओडोनेट्स की प्रजातियां हैं। इन प्रजातियों में दो क्रिटिकली एनडेंजर्ड, 13 एनडेंजर्ड और कुछ ऐसी प्रजातियां हैं, जिन्हें वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की सूची एक में रखा गया है।

काकती ने एलीफेंट रिज़र्व और आसपास के इलाकों में छिन्न-भिन्न हो रहे पर्यावरण को संभालने के लिए एक तंत्र बनाने की मांग करते हुए याचिका दायर की थी। इस पर सुनवाई करते हुए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने दिसंबर, 2017 में दिए फ़सले में केंद्र सरकार के लिए कई निर्देश जारी किए हैं।

इन निर्देशों में हर राज्य में सर्वे के ज़रिए हाथी की संख्या का पता लगाकर उनके रहवासी इलाके को संरक्षित वन घोषित करना भी शामिल है। ट्रिब्यूनल ने अपने आदेश में इस इलाके के आसपास के क्षेत्रों को ईको-सेंसिटिव जोन घोषित करने के लिए भी कहा है।

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने राज्य और केंद्र सरकारों से इस संबंध में एक साल के भीतर रिपोर्ट देने को कहा है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेस पर तात्कालिक प्रतिबंध लगा दिया है, इसलिए इसके बारे में कोई प्रगति होना बाकी है।

NBWL की अध्यक्षता केंद्रीय पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर करते हैं। अक्टूबर, 2019 में मंत्रालय के उत्तर-पूर्व क्षेत्रीय कार्यालय ने सालेकी में NEC की खदान का निरीक्षण किया। जांच के दौरान अवैध खनन की पुष्टि हुई, लेकिन सर्वे में इन खनन गतिविधियों से स्थानीय पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव की मात्रा को नहीं बताया गया।

NBWL के सदस्य रमन सुकुमारण के नेतृत्व में एक और टीम ने अक्टूबर, 2019 में सालेकी इलाके में दौरा किया।

टीम ने अपनी रिपोर्ट में बताया, ''कमेटी ने स्थानीय गांव वालों से कॉरिडोर में हाथियों की आवाजाही के बारे में बातचीत की। उन्होंने बताया कि कभी-कभार इलाके में हाथियों की आवाजाही दिखाई देती है, लेकिन यह चावल की फ़सल के मौसम में बढ़ जाती है।'' टीम ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि देहिंग आरक्षित वन क्षेत्र के उत्तर से एक रेलवे लाइन गुजरती है, जहां पूर्व में हाथियों की जानें भी गई हैं।

हालांकि टीम ने वर्षावन इलाके की समृद्ध जैव विविधता को स्वीकार किया है, लेकिन अवैध खनन गतिविधियों ने वन्यजीवन को कितना नुकसान पहुंचाया है, इस बारे में रिपोर्ट चुप है।

असम वन विभाग के तीन वरिष्ठ अधिकारियों की एक टीम ने पिछले साल जुलाई में डिग्बोई वन क्षेत्र के इलाके में पड़ने वाले वर्षावनों का मुआयना किया।  डिग्बोई फॉरेस्ट डिवीज़न के क्षेत्राधिकार में  प्रस्तावित सालेकी आरक्षित क्षेत्र भी आता है, दो करीब़ 8,504 हेक्टेयर के इलाके में फैला हुआ है। डिग्बोई डिवीज़न में कुल 55,714 हेक्टेयर भूमि का आरक्षित वन क्षेत्र आता है। इसी में से 11,142 हेक्टेयर के इलाके को केंद्र सरकार ने जून, 2004 में देहिंग पतकई वन्यजीव अभ्यारण्य घोषित किया था। 

इस टीम में IFS अनुराग सिंह, सी मुथुकुमारवेल और KSPV पवन कुमार शामिल थे, उन्होंने अपनी रिपोर्ट में जंगल के इलाके में धड़ल्ले से जारी खनन के चलते हो रहे क्षरण के सबूत दिए।

रिपोर्ट में कहा गया, ''आरक्षित वन/प्रस्तावित आरक्षित वन का एक बड़ा इलाका डिग्बोई डिवीज़न में अवैध खनन के चलते घट गया है। अवैध खनन का पूरा पैमान एक विस्तृत जांच में ही सामने आ सकता है, जिसमें दूसरे विभाग भी शामिल होंगे।''

टीम ने वर्षावन क्षेत्र में रेट होल माइनिंग के अलावा, व्यवस्थित ढंग से होने वाली अवैध ओपन कास्ट माइनिंग के सबूत पाए। इससे इलाके में बड़े पैमाने पर जंगलों का खात्मा हुआ है और सतह भंगुर हुई है।

कोयले का अवैध एकत्रीकरण और हस्तांतरण भी नज़र में आया, जिससे भी पर्यावरण और वन्यजीवों पर प्रभाव पड़ा। टीम ने अपनी रिपोर्ट में यह भी लिखा कि जितने बड़े पैमाने पर अवैध खनन हो रहा है, वह तभी संभव है जब इसमें वन विभाग के अधिकारियों समेत दूसरे विभाग के लोगों की मिलीभगत हो।

डिग्बोई कॉलेज में जूलॉजी विभाग के प्रमुख, राजिब रुद्रा तारियांग कहते हैं, "एक जंगल को केवल खड़े हुए पेड़ों की तरह नहीं देखना चाहिए। यह पूरा पर्यावरण तंत्र होता है। किसी भी तरह की ओपन कास्ट माइनिंग से पूरे पर्यावरण तंत्र पर प्रभाव पड़ता है।"

जब न्यूज़क्लिक ने डिग्बोई क्षेत्र के प्रभारी डीएफओ (डिवीज़नल फॉरेस्ट ऑफिसर) अतीक-उर-रहमान से बात की, तो उन्होंने किसी भी तरह के अवैध खनन से इंकार किया। हालांकि रहमान ने माना कि डिग्बोई डिवीज़न में कर्मचारियों की काफ़ी कमी है, जिससे क्षेत्राधिकार में पड़ने वाले सभी इलाकों पर सतत नज़र रखना मुश्किल होता है। 

रहमान कहते हैं, "डिग्बोई डिवीज़न में कुल 214 अधिकारियों की पोस्ट आवंटित हैं, लेकिन इनमें से केवल 74 पर ही फिलहाल नियुक्ति है। डिवीज़न में आठ रेंज ऑफिस हैं। लेकिन चार में रेंजर ही नहीं हैं। इसलिए हर रेंजर के पास दो रेंज ऑफिस का प्रभार है।"

प्रस्तावित आरक्षित वन होने के बावजूद केंद्र सरकार द्वारा खनन की अनुमति मिलने से सालेकी उभर कर सामने आ गया, लेकिन NEC के पास आसपास के तिकाक, लेडो, तिराप, तिपोंग और बारागोलाई में भी कोयला खदाने हैं।

इस बीच अनुमति मिलने के विरोध में हो रहे प्रदर्शनों के बीच जून के शुरुआती हफ़्ते में सालेकी में खनन गतिविधियां रोक दी गई हैं। सालेकी की गतिविधियां, तिकाक ओपन कास्ट माइनिंग प्रोजेक्ट का हिस्सा हैं।

वर्षावनों और इसके आसपास के इलाके में दूसरी ख़तरनाक औद्योगिक गतिविधियां भी जारी हैं, जिनसे पर्यावरण को नुकसान पहुंच रहा है। मई में बाघजन स्थित, सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी ऑयल इंडिया लिमिटेड के स्वामित्व वाले एक तेल के कुएं में आग लग गई, जो पिछले हफ़्ते तक भी जारी थी। यह इलाका मागुरी-मोटापंग आर्द्रभूमि के पास स्थित है। साथ में यह डिब्रू-साईखोवा राष्ट्रीय उद्यान के भी नज़दीक है। पर्यावरणीय कार्यकर्ताओं ने आग से आर्द्रभूमि में नुकसान होने की बात कही है, साथ में बड़े स्तर पर लोगों का विस्थापन भी हुआ है।

लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें।

Coal Mining Casts Shadow Over Assam’s Rich Biodiversity

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