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ख़बरों के आगे-पीछे: विपक्ष को पोस्टल बैलेट में खेल होने का डर
हर हफ़्ते की ऐसी चुनिंदा ख़बरें जिन पर कम ध्यान जाता है लेकिन वो होती महत्वपूर्ण हैं, ऐसी ही ख़बरों को लेकर आए हैं अनिल जैन..
अनिल जैन
27 Feb 2022
ECI
फ़ाइल फ़ोटो- PTI

चुनावी राजनीति में पोस्टल बैलेट को कभी भी बहुत अहम नहीं माना जाता है। शायद ही कभी इसकी वजह से नतीजे प्रभावित होते होंगे। लेकिन अचानक पोस्टल बैलेट का महत्व बढ़ रहा है। चुनाव लड़ रही भाजपा विरोधी पार्टियों को पोस्टल बैलेट का डर सता रहा है। उनको चुनाव आयोग पर भी संदेह है और प्रशासन पर भी। उनको लग रहा है कि सिस्टम का फायदा उठा कर भाजपा पोस्टल बैलेट के सहारे नतीजों को प्रभावित कर सकती है। ध्यान रहे पहले पोस्टल बैलेट से वोटिंग का अधिकार सेना के जवानों-अधिकारियों और चुनाव कराने वाले कर्मचारियों को ही था। अब 80 साल से ज्यादा उम्र के लोगों को पोस्टल बैलेट से वोट डालने की अनुमति मिल गई है। पहले पोस्टल बैलेट बूथ लेवल ऑफिसर के जरिए दिए जाते थे, अब डाक से भेजे जा रहे हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि पोस्टल बैलेट से वोट भेजने वाले सरकारी कर्मचारियों को अपने पहचान पत्र की कॉपी उसके साथ लगानी होती है। इससे वोट की गोपनीयता भंग होती है और अगर सरकारी कर्मचारी ने सरकार की विरोधी पार्टी को वोट किया हो तो उसके लिए अलग खतरा पैदा होता है। उत्तर प्रदेश में गाजियाबाद के एक बूथ पर ऐसी घटना हुई कि वोट डालने पहुंचे मुस्लिम परिवार के कई सदस्यों के वोट पोस्टल बैलेट से डाले जा चुके थे, जबकि उनको इसके बारे में कुछ पता ही नहीं था। इसीलिए विपक्षी पार्टियों को लग रहा है कि पोस्टल बैलेट से कुछ खेल हो सकता है, खास कर उन सीटों पर, जहां जीत-हार का अंतर कम होगा।

अमित शाह के इस पैंतरे का क्या मतलब?

बहुजन समाज पार्टी को कौन वोट देगा और कौन नहीं देगा या बसपा अभी प्रासंगिक है या अप्रासंगिक हो गई है, इसे लेकर प्रचार के दौरान अमित शाह के बयान देने का क्या मतलब है? वह भी तब, जब मतदान के चार चरण बाकी हो। उन्होंने बसपा को प्रासंगिक बता कर न सिर्फ उसके प्रति सद्भाव दिखाया बल्कि यह भी कहा कि मुस्लिम भी बसपा को वोट देंगे। एक मोटी बात जो समझ में आती है वह यह है कि भाजपा के दूसरे सबसे बड़े नेता ने बसपा और मायावती के प्रति सद्भाव दिखाया और कहा कि उनको अभी अप्रासंगिक नहीं माना जा सकता है तो इससे दलित मतदाताओं में अच्छा मैसेज जाएगा। इससे यह भी मैसेज जाएगा कि भाजपा और बसपा अंदर से मिले हुए हैं। इससे दलित वोटों का रूझान भाजपा की ओर बन सकता है। दलित के साथ-साथ बसपा की समर्थक रहीं अति पिछड़ी जातियों में भी उन्होंने एक मैसेज बनवाया। दलित और अति पिछड़ा जातियों को लुभाने का यह दांव अच्छा है लेकिन जैसे ही उन्होंने यह कहा कि मुस्लिम भी बसपा को वोट देंगे, वैसे ही उन्होंने अपने प्रमुख प्रतिद्वंद्वी यानी समाजवादी पार्टी का भला कर दिया। उनके इस बयान से सपा को बड़ा फायदा हो सकता है। जो भी थोड़ा बहुत मुसलमान बसपा को वोट देने वाला होगा वह भी अमित शाह के बयान के बाद उससे दूर भागेगा। बसपा और मायावती के प्रति उनके सद्भाव दिखाने से भी मुस्लिम मतदाताओं का रहा सहा संदेह भी दूर हो गया होगा। ध्यान रहे उत्तर प्रदेश में पहले से यह चर्चा चल रही है कि बसपा और भाजपा अंदर से मिले हुए हैं और भाजपा को फायदा पहुंचाने के लिए मायावती इस बार के चुनाव में चुपचाप बैठी हैं। अमित शाह के बयान से इन चर्चाओं की पुष्टि हो गई है। मुस्लिम मतदाताओं में यह मैसेज पहुंच गया है कि बसपा को वोट देना, परोक्ष रूप से भाजपा को वोट देने जैसा है क्योंकि चुनाव के बाद अगर त्रिशंकु विधानसभा बनती है तो भाजपा की सरकार बनवाने के लिए बसपा समर्थन दे सकती है या दोनों की मिली-जुली सरकार बन सकती है। इसलिए यह समझना मुश्किल है कि सपा को फायदा पहुंचाने वाला इस किस्म का बयान अमित शाह ने क्यों दिया? भाजपा में भी कई नेता अमित शाह के इस बयान पर हैरानी जता रहे हैं।

महाराष्ट्र का यह झगड़ा कहां तक पहुंचेगा?

भारतीय जनता पार्टी महाराष्ट्र को लेकर व्याकुल है। ऐसा लग रहा है कि उसे महाराष्ट्र में शिव सेना, एनसीपी और कांग्रेस की साझा सरकार हजम नहीं हो रही है। पहले तो भाजपा ने किसी तरह से सरकार बनाने की कोशिश की थी और जब सफलता नहीं मिली तो पहले दिन से महाराष्ट्र भाजपा के नेता डेडलाइन दे रहे हैं कि किस दिन तक महाविकास अघाड़ी की सरकार गिर जाएगी। इसलिए ऐसा लग रहा है कि भाजपा के राजनीतिक प्रयासों के साथ-साथ केंद्रीय एजेंसियों के प्रयास भी तेज हो गए हैं। पहले गृह मंत्री रहे अनिल देशमुख गिरफ्तार हुए और अब नवाब मलिक को ईडी ने गिरफ्तार कर लिया है। इनके अलावा पार्टी के सांसद संजय राउत सहित करीब एक दर्जन मंत्रियों, विधायकों, सांसदों पर तलवार लटकी है। चार दिन पहले ही भाजपा के नेता और केंद्र सरकार के वरिष्ठ मंत्री नारायण राणे ने कहा था कि महाविकास अघाड़ी के चार नेताओं के खिलाफ ईडी का नोटिस तैयार है। उन्होंने कहा और तीन दिन में एक बड़े मंत्री के यहां नोटिस लेकर ईडी की टीम पहुंच गई और उनको गिरफ्तार भी कर लिया। सवाल है कि नारायण राणे को ईडी की तैयारियों का कैसे पता था? क्या इससे संजय राउत के इस बयान की पुष्टि नहीं होती है कि केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल राज्य सरकार के खिलाफ किया जा रहा है? बहरहाल, एक तरफ केंद्रीय एजेंसियों की गाज प्रदेश के मंत्रियों और नेताओं पर गिर रही है तो दूसरी ओर प्रदेश सरकार की एजेंसियां केंद्र सरकार के मंत्रियों और भाजपा नेताओं के खिलाफ कार्रवाई कर रही हैं। नारायण राणे के जुहू स्थित बंगले में भी कथित अवैध निर्माण की जांच बीएमसी के अधिकारियों ने की है। संजय राउत ने कहा है कि भाजपा के चार बड़े नेताओं के लिए जेल में कमरा तैयार किया जा रहा है। राज्य का भ्रष्टाचार रोधी ब्यूरो यानी एसीबी, राज्य की पुलिस और बृहन्नमुंबई महानगरपालिका यानी बीएमसी के अधिकारी भाजपा नेताओं की फाइल तैयार कर रहे हैं। जिस तरह से पश्चिम बंगाल में केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई के विरोध में राज्य की एजेंसियों ने भाजपा नेताओं को परेशान किया, उसी तरह महाराष्ट्र में भी कार्रवाई की तैयारी हो रही है। सवाल उठता है कि इस तरह से अगर बदला निकालने या राजनीतिक मकसद से केंद्रीय एजेंसियां कार्रवाई करेंगी और राज्य की एजेंसियां जवाबी कार्रवाई करेंगी तो उसका क्या नतीजे निकलेगा? क्या इस तरह से भारतीय राजनीति की सफाई हो सकती है?

फिर साथ आ सकते हैं भाजपा और अकाली दल

पंजाब में विधानसभा चुनाव खत्म हो गए हैं और इसके साथ ही फिर दोनों पुरानी सहयोगी पार्टियों- अकाली दल और भाजपा के एक साथ आने की चर्चा शुरू हो गई है। मतदान के अगले ही दिन अकाली नेता बिक्रम मजीठिया ने कहा है कि चुनाव बाद दोनों पार्टियों में तालमेल हो सकता है। हालांकि उन्होंने यह बात सरकार बनाने के संदर्भ में कही थी, जिसकी कोई संभावना नहीं दिख रही है। फिर भी सरकार बने या न बने दोनों पार्टियां साथ आ सकती हैं। गौरतलब है कि अकाली दल ने तीन विवादित कृषि कानूनों के मुद्दे पर सरकार से समर्थन वापस लिया था। अब सरकार उन कानूनों को खत्म कर चुकी है तो अकाली को फिर से एनडीए में लौटने से आपत्ति नहीं होगी। दूसरी ओर भाजपा को भी 2024 के लोकसभा चुनाव की चिंता करनी है। इसलिए भाजपा भी अकाली दल का खुले दिल से स्वागत करेगी। ध्यान रहे मतदान से पहले डेरा सच्चा सौदा की ओर से डेरा प्रेमियों के लिए जो फरमान जारी हुआ था वह भाजपा और अकाली दोनों के लिए था। कोडवर्ड में फूल और तगड़ी यानी कमल और तराजू छाप पर मुहर लगाने को कहा गया था। इससे भी ऐसा लग रहा है कि गैर राजनीतिक ताकतें भी दोनों को साथ लाने में भूमिका निभाएंगी। पेंच इस बात पर फंसेगा कि हरसिमरत कौर बादल को केंद्र में फिर से मंत्री बनाया जाएगा या नहीं। इस बारे में नतीजों के बाद और राष्ट्रपति चुनाव से पहले चर्चा होगी।

अशोक स्तंभ को लेकर अफवाहों से भाजपा परेशान

अभी तक यह हो रहा था कि भाजपा की आईटी सेल और उसके कार्यकर्ताओं की नीचे की फौज की ओर से फैलाई गई अफवाहों का जवाब विपक्षी पार्टियों को देना होता है। लेकिन इस बार भाजपा कई तरह की अफवाहों का जवाब देते देते परेशान है। इसमें एक अफवाह यह है कि केंद्र सरकार की मुहरों और तमाम सरकारी जगहों से अशोक स्तंभ को हटाया जा रहा है। अवध से लेकर प्रयागराज और पूर्वांचल व बुंदेलखंड के इलाकों में, जहां कुशवाहा आबादी बड़ी संख्या में है वहां इस अफवाह से भाजपा को बड़ी परेशानी हो रही है। ध्यान रहे कुशवाहा समाज अपने को सम्राट अशोक का वंशज मानता है। ऐसे में अशोक चक्र से लेकर स्तंभ तक हर चीज उनके लिए गौरव की वस्तु है। इन अफवाहों को बिहार के घटनाक्रम से और बल मिल गया है। बिहार में विधानसभा के सौ साल पूरे होने के मौके पर एक स्तंभ का निर्माण विधानसभा के सामने किया जा रहा है। उस स्तंभ के ऊपर अशोक चक्र या अशोक स्तंभ की निशानी नहीं लगाई जा रही है, बल्कि उसकी जगह स्वास्तिक का चिन्ह लगाया जा रहा है। इसे लेकर बिहार में विरोध शुरू हो गया है यह बात उत्तर प्रदेश तक पहुंची है, जहां पहले से यह अफवाह फैली हुई है कि केंद्र की सरकारी मुहरों से सम्राट अशोक के प्रतीक चिन्ह हटाए जा रहे हैं। इस अफवाह और बिहार की घटना से भाजपा को अपने कोर वोट में बड़ा नुकसान हो सकता है।

राष्ट्रपति-उप राष्ट्रपति पद के लिए नामों की चर्चा

राष्ट्रपति और उप राष्ट्रपति पद के चुनाव के लिए सत्तारूढ़ भाजपा ने अभी कोई पहल नहीं की है लेकिन दोनों पदों के लिए एक दर्जन नामों की चर्चा शुरू हो गई है। इस बात की संभावना कम है कि भाजपा उत्तर भारत से राष्ट्रपति का उम्मीदवार देगी। इसकी भी संभावना नहीं के बराबर है कि किसी सहयोगी पार्टी के सक्रिय नेता को राष्ट्रपति या उप राष्ट्रपति का उम्मीदवार बनाया जाएगा। इसके बावजूद भाजपा और विपक्ष की ओर से भी कई नामों की चर्चा शुरू हो गई है। भाजपा की ओर से आनंदी बेन पटेल के नाम की चर्चा है लेकिन उनकी संभावना इसलिए नहीं है क्योंकि प्रधानमंत्री और गृह मंत्री दोनों गुजरात के हैं। इसलिए गुजरात की आनंदी बेन पटेल राष्ट्रपति या उप राष्ट्रपति नहीं बन सकती हैं। आखिर वहां की 26 लोकसभा सीटों के लिए गुजराती अस्मिता को कितना भुनाया जाएगा। इसी तरह सुमित्रा महाजन और उत्तराखंड की राज्यपाल रहीं बेबी रानी मौर्य का नाम भी चर्चा में है। महिला के अलावा भाजपा अल्पसंख्यक राजनीति भी कर सकती है। इस लिहाज से गुलाम नबी आजाद और केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान का नाम भी चर्चा में है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का नाम भी लिया जा रहा है। हालांकि पिछले रिकॉर्ड को देखते हुए संभव है कि बिल्कुल नए और अनजान से चेहरे लाए जाएं।

बिहार, यूपी के नेताओं को शर्म नहीं आती

पंजाब में बिहार और उत्तर प्रदेश के भइया लोगों पर मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी की टिप्पणी का बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चुनावी लाभ लेना था इसलिए उन्होंने भी इसका जिक्र चुनावी सभा में किया, वरना बिहार के मजदूर तो गुजरात के सूरत से भी पीट कर भगाए जाते हैं। सो, मोदी के या पंजाब के किसी नेता के लिए प्रवासी मजदूरों का मामला चुनावी या राजनीतिक हो सकता है लेकिन उत्तर प्रदेश और बिहार के नेताओं के लिए तो यह शर्म की बात होनी चाहिए। पर दोनों राज्यों के नेता इतनी मोटी चमड़ी के हैं कि उनको शर्म नहीं आती। उलटे वे भी इस तरह के मामलों पर बेशर्मों की तरह बयान देते हैं। जैसे बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने चरणजीत सिंह चन्नी के बयान की आलोचना की और बयान को ‘बेहूदा’ बताया। नीतीश कुमार पिछले 17 साल से बिहार के मुख्यमंत्री हैं। पिछले पांच साल से तो डबल इंजन की सरकार चल रही है। फिर भी बिहारियों का पलायन नहीं रूका है। पढ़ाई, नौकरी और मजदूरी के लिए बिहार के लोग बाहर जा रहे हैं। इस पर शर्मिंदा होने की बजाय नीतीश कुमार पंजाब के मुख्यमंत्री की आलोचना कर रहें। उनकी सहयोगी भाजपा की हरियाणा सरकार ने अपने यहां छोटी नौकरियों में 75 फीसदी आरक्षण स्थानीय लोगों के लिए कर दिया। इसकी आलोचना उनसे नहीं हो रही है। अगर ऐसा ही आरक्षण देश के दूसरे राज्य भी कर दें तो बिहार के लोग कहां मजदूरी करने जाएंगे?

बेमतलब होती जा रही हैं संसद और विधानसभाएं

संसद और राज्यों की विधानसभा की बैठकों का एक दिलचस्प आकलन प्रकाशित हुआ है, जिसके मुताबिक भारत में साल दर साल संसद और विधानमंडलों की बैठकें कम होती जा रही हैं। अगर दुनिया के दूसरे देशों से इसकी तुलना करें तो भारत की विधायिका में सबसे कम बैठकें होती हैं। जितनी बैठकें होती हैं उनमें भी ज्यादातर समय हंगामे और विवाद में जाता है। असल में भारत में विधायिका का काम अब कानून बनाने से पहले उस पर चर्चा करने और उसके हर पहलू पर विचार करने का नहीं रह गया है। कई मामलों में सरकार पहले ही अध्यादेश के जरिए कानून लागू कर चुकी होती है और अगर नहीं लागू किया होता है तब भी तीन मिनट से लेकर तीन घंटे तक की अधिकतम बहस के बाद कानून बन जाता है। बहरहाल, भारत में लोकसभा साल में औसतन 63 दिन बैठती है, जबकि विधानसभाओं की पूरे साल में औसतन सिर्फ 30 दिन बैठक होती है! इसमें भी पंजाब और हरियाणा की विधानसभा तो साल में औसतन 15 दिन ही बैठती हैं। सबसे ज्यादा ओड़िशा में 46 दिन और केरल में 43 दिन विधानसभा की बैठकें होती हैं। लोकसभा की साल में 63 दिन की बैठक के मुकाबले ब्रिटेन में हाउस ऑफ कॉमंस की 140 दिन बैठक होती है। सोचें, भारत ने ब्रिटेन का ही मॉडल अपनाया है, जो उनके यहां तीन सौ साल से चल रहा है और अब भी उसकी संसद के निचले सदन की एक साल में 140 दिन बैठक होती है और भारत में सिर्फ 63 दिन। अमेरिका के निचले सदन यानी प्रतिनिधि सभा की बैठक कोरोना महामारी के बीच 2021 में 166 दिन और 2020 में 163 दिन हुई। उच्च सदन यानी सीनेट की बैठक इससे ज्यादा हुई।

ये भी पढ़ें: ख़बरों के आगे-पीछे: 23 हज़ार करोड़ के बैंकिंग घोटाले से लेकर केजरीवाल के सर्वे तक..

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