NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
मज़दूर-किसान
भारत
राजनीति
अवध का किसान आंदोलन और आज़ादी की लड़ाई
आज अवध के किसान आंदोलन और आज़ादी की लड़ाई के साथ उसके अंतर्विरोधों को समझना जितना ज़रूरी है उतना ही ज़रूरी है अपने इतिहास के प्रति सांप्रदायिक और जातिवादी नज़रिए से बचना।
अरुण कुमार त्रिपाठी
23 Mar 2021
अवध का किसान आंदोलन और आज़ादी की लड़ाई
प्रतीकात्मक तस्वीर। साभार :  नवभारत टाइम्स

जब से केंद्र सरकार ने किसानों को मुक्ति दिलाने का दावा करके व्यापारियों और पूंजीपतियों के हित में तीन कानून पास किए हैं और पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों ने देश की राजधानी दिल्ली को घेरा है तबसे पूरे देश में किसान आंदोलनों पर नए किस्म की चर्चा चल निकली है। वैसे तो देश और दुनिया का चप्पा चप्पा किसानों के संघर्ष और बलिदान के लंबे इतिहास से पटा पड़ा है लेकिन इस बीच अवध के किसान आंदोलन की विशेष याद दिलाई जा रही है। ऐसा करने की कुछ वजहें हैं।

पहली वजह तो यह है कि अवध के किसान आंदोलन के ठीक सौ साल पूरे हो रहे हैं। दूसरी बात यह है कि देश को आजादी मिले 75 साल हो रहे हैं। इसलिए यह देखना जरूरी है कि आजादी के आंदोलन और किसान आंदोलन में रिश्ता क्या था?

तीसरी बात यह है कि आज जिस तरह अवध किसान आंदोलन के प्रति उदास है और हिंदुत्व के रंग में रंग गया है उसकी वजह क्या हो सकती है? चौथी बात यह है कि क्या कि शहर, उद्योग और शक्तिशाली लोग सदैव किसानों के साथ साजिश करते रहे हैं या आज ही कर रहे हैं?

इन दिनों हिंदी के साहित्यकार और विशेषकर प्रगतिशील तबके के लोग अवध के किसान आंदोलन को विशेष रूप से याद कर रहे हैं। वे इस तलाश में लगे हैं कि इतिहास के उस पन्ने से कैसी प्रेरणा ली जा सकती है। दूसरी ओर ऐसे लोग भी हैं जो यह साबित करने में लगे हैं कि महात्मा गांधी, कांग्रेस, बाबा रामचंद्र समेत ब्राह्मण बिरादरी ने किस तरह छोटी जातियों के माध्यम से संचालित किसान आंदोलन के साथ छल किया और उनके दमन में अंग्रेजों का साथ दिया।

इन दिनों जिन दो पुस्तकों के माध्यम से 1920-21 के दौरान उठे अवध के किसान आंदोलन पर गहरी चर्चा हो रही है, उनमें एक पुस्तक सुभाष चंद्र कुशवाहा की है—अवध का किसान विद्रोह और दूसरी पुस्तक राजीव कुमार पाल की है—एका। किसान आंदोलन के प्रति गहरी सहानुभूति से प्रेरित यह दोनों पुस्तकें असहयोग आंदोलन, खिलाफत आंदोलन, चौरी चौरा कांड और राष्ट्रीय आंदोलन के नेताओं से आंदोलन के रिश्तों पर प्रकाश डालती हैं।

पुस्तकें यह बताती हैं कि किसानों का आंदोलन कितना जबरदस्त था और कांग्रेस के भीतर बैठे ताल्लुकदार और जमींदार वर्ग के हितैषी नेतृत्व ने उनके साथ छल करके अवध रेंट कंट्रोल कानून 1921 पारित कराकर उन्हें ठग लिया। जबकि किसानों की मांग जमींदारी खत्म करने की थी लेकिन वह पूरी नहीं हुई। किसान गांधी पर भरोसा करके सच्चाई की राह पर चले तो सजा पाई और कांग्रेस ने जमींदारों के साथ सहयोग करने की सीख देकर आंदोलन को ठंडा कर दिया।

सब आल्टर्न नजरिए से लिखी गई सुभाष कुशवाहा की किताब अवध का किसान विद्रोह तो पूरे राष्ट्रीय आंदोलन को ही षडयंत्रकारी और धोखेबाज साबित करती है। यहां तक कि वे आंदोलन की प्रेरक शक्ति बाबा रामचंद्र को भी नहीं छोड़ते। वे उन्हें किसानो के आंदोलन में एक ब्राह्मण की घुसपैठ के रूप में देखते हैं। यही वजह है कि उनकी पुस्तक की समीक्षा करते हुए एक उत्साही टिप्पणीकार ने लिखा कि यह पुस्तक गांधीवाद की दूसरी शवपरीक्षा है। एक शवपरीक्षा यशपाल ने की थी और दूसरी पुस्तक हंसराज रहबर ने गांधी बेनकाब करके लिखी थी। कुशवाहा की पुस्तक का निष्कर्ष है कि इलाहाबाद के राजनीतिकों ने पूरी ताकत लगाकर आंदोलन को हिंसक होने से रोका और अंततः जमींदारों के हितों की रक्षा की। इस आंदोलन से कुर्मियों की एकता बनी। वे घोड़ावन, मोटरावन, हथियावन, जैसे करों और बेगार जैसी प्रथा और बेदखली का सीधा विरोध कर रहे थे। दूसरी ओर इलाहाबाद के शहरी कुलीन कांग्रेसी नेता गौरीशंकर मिश्र किसानों और जमींदारों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाते थे। वे किसानों की मांग को व्यावहारिक ढंग से रखते थे जिससे लगे कि वे किसानों के हित के लिए चिंतित हैं मगर उनकी मांगों से जमींदारों पर ज्यादा फर्क नहीं पड़ता था।

कुशवाहा लिखते हैं कि यहां के किसान विद्रोह का नेतृत्व निम्न जातियां कर रही थीं। पुरुषों के साथ महिलाएं भी थीं। उनका गुस्सा ब्रिटिश के खिलाफ कम ताल्लुकदारों के खिलाफ ज्यादा था। क्योंकि वे जबरिया लगान वसूलते थे , बेदखली करते थे और बेगार करवाते थे। रामचंद्र गांधी के प्रभावित थे। वे बाहरी थे और वे ही इलाहाबाद के कुलीन कांग्रेसी नेताओं से किसान आंदोलन को संपर्क साधने पर जोर देते थे। वे कहते थे कि गांधी की निगाह में आने से आंदोलन को मदद मिलेगी और किसानों की विजय होगी। लेकिन हुआ उल्टा। गांधी ने किसानों से हिंसा छोड़ने और जमींदारों से सहयोग करने को कहा। वे चौरी चौरा के आंदोलन में भी पिछड़ी जाति के भगवान अहीर के नेतृत्व को रेखांकित करते हैं और कहते हैं कि गांधी ने आंदोलन वापस लेकर उन पिछड़ी जातियों के साथ छल किया।

निश्चित तौर पर आजादी के आंदोलन और किसान आंदोलन के बीच एक जटिल रिश्ता रहा है। वैसे ही जैसे आज के राजनीतिक दलों और किसान संगठनों और आंदोलनों के बीच एक जटिल रिश्ता है। एक ओर किसान आंदोलन अपने को अराजनीतिक बताते हैं और अपने मंचों पर राजनीतिक दल के नेताओं को आने से रोकते हैं तो दूसरी ओर सरकार समर्थक उन पर तोहमत लगाते रहते हैं कि यह आंदोलन तो आढ़तिये, कांग्रेस पार्टी और अलगाववादी चला रहे हैं यह अपने में कोई किसान आंदोलन थोड़े है। फरवरी 2021 में अवध के इलाके में घूमते हुए ऐसे बहुत सवर्ण मिले जो किसान आंदोलन को किसानों का आंदोलन मानने को तैयार ही नहीं थे। उनकी चिंताएं किसान कानूनों से जुड़ी भी नहीं थीं। उनकी चिंता यह थी कि राम मंदिर कब से बनना शुरू होगा, किसने कितना चंदा दिया और श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय से अगली मुलाकात कब होगी।

विडंबना देखिए कि सौ साल पहले भी सीताराम का नारा लगाकर और सत्यनारायण की कथा सुनकर आर्थिक शोषण के विरुद्ध एक विशाल किसान आंदोलन खड़ा किया गया था, जिसमें सभी जातियों और धर्मों के लोग शामिल थे। दिसंबर 1920 में उसकी विशाल सभा अयोध्या में ही हुई थी। लेकिन आज सौ साल बाद जयश्रीराम के नारे से अवध की किसान जातियां जिसमें पिछड़े, दलित और सवर्ण सभी शामिल हैं, इतने सम्मोहित हैं कि उन्हें मंदिर के अलावा कुछ दिख ही नहीं रहा है। उन्हें न तो बहुराष्ट्रीय कंपनियों का साम्राज्यवाद दिख रहा है और न ही पूंजीवाद।

इसलिए आज अवध के किसान आंदोलन और आजादी की लड़ाई के साथ उसके अंतर्विरोधों को समझना जितना जरूरी है उतना ही जरूरी है अपने इतिहास के प्रति सांप्रदायिक और जातिवादी नजरिए से बचना।

निश्चित तौर पर यहां डॉ. राम मनोहर लोहिया का यह कथन बहुत प्रासंगिक हो जाता है कि अगर आजादी की लडाई पिछड़ों और दलितों के नेतृत्व में लड़ी गई होती तो न तो भारत का विभाजन होता और न ही आजाद भारत की सरकार पूंजीपतियों की समर्थक होती। लेकिन यह सब कहना जितना आसान है तात्कालिक सामाजिक स्थितियों के लिहाज से उसे फलित करना उतना ही कठिन रहा है।

यहां किसी को साजिशकर्ता और छलिया बताने की बजाय अगर हम इतिहास और उसके पात्रों की विडंबनाओं को देखने की कोशिश करेंगे तो बातें ज्यादा स्पष्ट होंगी। हिंसा और अहिंसा के बीच फंसे किसानों की त्रासद कथा है। उसका वर्णन स्वयं पंडित जवाहर लाल नेहरू अपनी आत्मकथा—मेरी कहानी में करते हैं। वे 1921 में रायबरेली गोलीकांड के साक्षी भी थे।

उन्होंने लिखा---`` 1921 में फैजाबाद जिले में दूर दूर तक दमन हुआ। वहां एक अनोखे ढंग से झगड़ा हुआ। कुछ देहात के किसानों ने जाकर एक ताल्लुकेदार का माल असबाब लूट लिया। बाद को पता चला कि उन लोगों को एक जमींदार के नौकर ने भड़का दिया था जिसका ताल्लुकदार से झगड़ा था। उन गरीबों से सचमुच यह कहा गया था कि महात्मा गांधी चाहते हैं कि वे लूट लें और उन्होंने महात्मा गांधी की जय का नारा लगाते हुए इस आदेश का पालन किया।’’

नेहरू लिखते हैं, `` जब मैंने यह सुना तो मैं बहुत बिगड़ा और दुर्घटना के एक दो दिन के अंदर उस स्थान पर पहुंचा जो अकबरपुर के पास ही था। मैंने उसी दिन एक सभा बुलाई और कुछ ही घंटों में पांच छह हजार लोग कई गांवों से कोई दस दस मील दूरी से वहां इकट्ठे हो गए। मैंने उन्हें आड़े हाथों लिया और कहा कि किस तरह से उन्होंने अपने आपको और हमारे काम को धक्का पहुंचाया और शर्मिंदगी दिलाई और कहा कि जिन जिन ने लूटपाट की है, वे सबके सामने अपना गुनाह कुबूल करें। (उन दिनों मैं गांधी की सत्याग्रह की भावना से, जैसा कुछ मैं उसे समय समझता था, भरा हुआ था।) मैंने उन लोगों से जो लूट मार में शरीक थे, हाथ ऊंचा उठाने के लिए कहा, और कहते ताज्जुब होता है कि बीसों पुलिस अफसरों के सामने कई दर्जन हाथ उठ गए। इसके मानी थे यकीनन उन पर आफत आना। ......मुझे उनकी हालत पर बहुत दुख हुआ और इस बात पर अफसोस होने लगा कि मैंने नाहक ही इन सीधे और भोले लोगों को लंबी सजाएं दिलाने की हालत में ला दिया।’’

मार्क्सवादी और सब आल्टर्न नजरिए से हम पंडित जवाहर लाल नेहरू और महात्मा गांधी के तमाम राजनीतिक फैसलों और वक्तव्यों को खारिज कर सकते हैं। अगर इसमें आंबेडकरवादी नजरिया भी जोड़ दिया जाए तब तो उनकी और भी कठोर आलोचना की गुंजाइश बनती है। ऐसे में यह आलोचना ज्यादा धारदार हो जाती है कि अवध के किसान आंदोलन के साथ ब्रिटिश सरकार, ताल्लुकदारों और कांग्रेस के सवर्ण नेतृत्व ने साजिश की और जमींदारी प्रथा समाप्त नहीं होने दी।

लेकिन 1921 के अवध रेंट कंट्रोल एक्ट से किसानों का कोई फायदा न हुआ हो ऐसा नहीं था। कम से कम आचार्य नरेंद्र देव जैसे मार्क्सवादी और क्रांतिकारी कांग्रेसी नेता की व्याख्या तो यही कहती है कि किसानों के आंदोलन के लाभ हुआ।

वे 28 नवंबर 1936 को कांग्रेस सोशलिस्ट वीकली के अपने लेख में कहते हैं,  ``  1920-1921 के जबरदस्त संघर्ष के बात किसानों को कम से कम अपनी एक मांग मनवाने में कामयाबी मिली। पहले कोई भी काश्तकार सात साल से ज्यादा समय के लिए पट्टा पाने का अधिकारी नहीं था। उस मियाद के पूरा होने के बाद किसान जमींदार की मर्जी के अनुसार बेदखल कर दिया जाता था। लेकिन बेदखली के इस नियम का जबरदस्त विरोध होने के कारण सरकार ने कानून में कुछ संशोधन किया। अब आजीवन पट्टा का प्रावधान स्वीकृत कर लिया गया। हालांकि इस संशोधन के कारण किसानों को कुछ अधिकार मिले लेकिन दूसरे बदलावों से जमींदारों को बेदखली के नए मौके मिल गए। लेकिन अपनी तमाम कमियों के बावजूद इन कानूनों ने किसानों फायदा पहुंचाया। फिर भी बेदखली की बुराई अभी समाप्त नहीं हुई।’’    

शायद अवध के किसान आंदोलन और उसकी उपलब्धियों की इससे ज्यादा वस्तुनिष्ठ व्याख्या नहीं हो सकती। जाहिर सी बात है कि जमींदारी उन्मूलन और किसानों के अधिकारों का मुद्दा कांग्रेस के एजेंडे पर आ गया और  नागपुर अधिवेशन से लेकर कराची तक उसकी गूंज सुनाई पड़ती रही। इस बीच 1929 की भयानक मंदी ने बहुत सारे मुद्दों को बदल दिया। फिलहाल आजादी की लड़ाई की अपनी मजबूरियों को समझे बिना हम न तो किसान आंदोलन की उपलब्धियों को समझ सकते हैं और न ही उसकी विफलताओं को।

अवध के किसान आंदोलन और आजादी की लड़ाई के रिश्तों को देखने के लिए तमाम शोध होने चाहिए और उसकी नई व्याख्याएं होनी चाहिए। लेकिन इतिहास के इस अध्याय की न तो किसानवादी व्याख्या से काम चलेगा और न ही पिछड़ावादी या सांप्रदायिक व्याख्या से। इस तरह की व्याख्याओं के लिए आचार्य नरेंद्र देव ने आगाह किया है, जो स्वयं किसान सभा के पदाधिकारी थे। लेकिन उससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्यों आज अवध की सवर्ण ही नहीं ज्यादातर पिछड़ी जातियां किसानी, बेरोजगारी, जाति उन्मूलन, लोकतंत्र और सांप्रदायिक सद्भाव के मुद्दों को छोड़कर मंदिरवादी और बहुसंख्यकवादी हो गई हैं? या तो वे 1857 से लेकर 1920-21 जैसै अपने क्रांतिकारी इतिहास से अवगत नहीं हैं या फिर उन्हें सांप्रदायिक और जातिवादी विमर्शों में इतना उलझा दिया गया है कि उससे निकलने की जरूरत नहीं समझते। आज जरूरत अवध के किसानों की उस दृष्टि को जगाने की है जिसकी तुलना कभी फ्रांस की राज्यक्रांति और रूस के बोल्शेविक क्रांति से की जाती थी लेकिन जो आज मंदिर आंदोलन के साथ प्रतिक्रांतियों का पर्याय बन चुकी है।

(लेखक वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

Awadh peasant movement
Freedom fight
farmers protest
Farm Bills
BJP
Farmers vs Government

Related Stories

मूसेवाला की हत्या को लेकर ग्रामीणों ने किया प्रदर्शन, कांग्रेस ने इसे ‘राजनीतिक हत्या’ बताया

बिहार : नीतीश सरकार के ‘बुलडोज़र राज’ के खिलाफ गरीबों ने खोला मोर्चा!   

आशा कार्यकर्ताओं को मिला 'ग्लोबल हेल्थ लीडर्स अवार्ड’  लेकिन उचित वेतन कब मिलेगा?

दिल्ली : पांच महीने से वेतन व पेंशन न मिलने से आर्थिक तंगी से जूझ रहे शिक्षकों ने किया प्रदर्शन

राम सेना और बजरंग दल को आतंकी संगठन घोषित करने की किसान संगठनों की मांग

आईपीओ लॉन्च के विरोध में एलआईसी कर्मचारियों ने की हड़ताल

जहाँगीरपुरी हिंसा : "हिंदुस्तान के भाईचारे पर बुलडोज़र" के ख़िलाफ़ वाम दलों का प्रदर्शन

दिल्ली: सांप्रदायिक और बुलडोजर राजनीति के ख़िलाफ़ वाम दलों का प्रदर्शन

आंगनवाड़ी महिलाकर्मियों ने क्यों कर रखा है आप और भाजपा की "नाक में दम”?

NEP भारत में सार्वजनिक शिक्षा को नष्ट करने के लिए भाजपा का बुलडोजर: वृंदा करात


बाकी खबरें

  • CORONA
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 15 हज़ार से ज़्यादा नए मामले, 278 मरीज़ों की मौत
    23 Feb 2022
    देश में 24 घंटों में कोरोना के 15,102 नए मामले सामने आए हैं। देश में कोरोना संक्रमण के मामलों की संख्या बढ़कर 4 करोड़ 28 लाख 67 हज़ार 31 हो गयी है।
  • cattle
    पीयूष शर्मा
    यूपी चुनाव: छुट्टा पशुओं की बड़ी समस्या, किसानों के साथ-साथ अब भाजपा भी हैरान-परेशान
    23 Feb 2022
    20वीं पशुगणना के आंकड़ों का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि पूरे प्रदेश में 11.84 लाख छुट्टा गोवंश है, जो सड़कों पर खुला घूम रहा है और यह संख्या पिछली 19वीं पशुगणना से 17.3 प्रतिशत बढ़ी है ।
  • Awadh
    लाल बहादुर सिंह
    अवध: इस बार भाजपा के लिए अच्छे नहीं संकेत
    23 Feb 2022
    दरअसल चौथे-पांचवे चरण का कुरुक्षेत्र अवध अपने विशिष्ट इतिहास और सामाजिक-आर्थिक संरचना के कारण दक्षिणपंथी ताकतों के लिए सबसे उर्वर क्षेत्र रहा है। लेकिन इसकी सामाजिक-राजनीतिक संरचना और समीकरणों में…
  • रश्मि सहगल
    लखनऊ : कौन जीतेगा यूपी का दिल?
    23 Feb 2022
    यूपी चुनाव के चौथे चरण का मतदान जारी है। इस चरण पर सभी की निगाहें हैं क्योंकि इन क्षेत्रों में हर पार्टी की गहरी हिस्सेदारी है।
  • Aasha workers
    वर्षा सिंह
    आशा कार्यकर्ताओं की मानसिक सेहत का सीधा असर देश की सेहत पर!
    23 Feb 2022
    “....क्या इस सबका असर हमारी दिमागी हालत पर नहीं पड़ेगा? हमसे हमारे घरवाले भी ख़ुश नहीं रहते। हमारे बच्चे तक पूछते हैं कि तुमको मिलता क्या है जो तुम इतनी मेहनत करती हो? सर्दी हो या गर्मी, हमें एक दिन…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License