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भारत
राजनीति
दिल्ली चुनाव : बीजेपी हारती दिख रही है लेकिन वह एक ख़तरनाक विरासत छोड़ कर जा रही है
वीभत्स सांप्रदायिक प्रचार ने महानगर को परेशानी, विभाजन और भय के माहौल में धकेल दिया था लेकिन कामकाजी लोग और युवा इस दलदल से ऊपर उठ गए।
सुबोध वर्मा
10 Feb 2020
Translated by महेश कुमार
modi amit shah

अब दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए मतदान समाप्त हो गया है और परिणामों को लेकर आमतौर पर रहने वाली बेसब्री से इंतज़ार है। मतगणना 11 फ़रवरी को होगी। एक्ज़िट पोल ने मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी (आप) की निर्णायक जीत की भविष्यवाणी की है। यह भविष्यवाणी न केवल बहुत से दिल्ली वालों के लिए बल्कि देश भर के लिए एक बड़ी राहत लेकर आई है क्योंकि चुनाव प्रचार के दौरान देखा गया था कि भाजपा का भारतीय चुनावों के इतिहास में यह अब तक का सबसे भड़काऊ और विभाजनकारी अभियानों में से एक था।

पीएम मोदी के दाएं हाथ और गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में, भाजपा ने ‘आप’ पार्टी को मिल रहे स्पष्ट व्यापक समर्थन का मुक़ाबला करने के लिए भय, नफ़रत और चिंता का माहौल पैदा करने की कोशिश की। टीवी चैनलों पर एक्ज़िट पोल की घोषणा के बाद कई इलाक़ों में पटाखे फूटने के ख़बरें मिली हैं। लेकिन, सबको आधिकारिक गणना के लिए दो दिन और इंतज़ार करना होगा।

हालांकि भाजपा को करारी हार मिलने की संभावना है, लेकिन उनके अभियान ने 2 करोड़ से अधिक की आबादी वाले इस महानगर के समाज को बहुत नुक़सान पहुँचाया है। भाजपा का यह अभियान पूरी तरह अनावश्यक और अवसरवादी था। लेकिन सत्ता के लिए बीजेपी का लालच अब इतना बेलगाम हो गया है और उसकी महत्वाकांक्षा इतनी दुस्साहसी हो गई है कि उसने जानबूझकर प्रचार के दौरान सबसे ख़तरनाक मंत्रों तंत्रों का इस्तेमाल किया और समाज में उस नफ़रत पैदा करने की कोशिश की जो अस्तित्व में नहीं थी, कम से कम किसी ख़ास रूप में तो नहीं थी।

भाजपा के अभियान को याद करें…

प्रचार की शुरुआत में, भाजपा ने अपनी चुनावी रणनीति को पिछले वर्षों में मोदी सरकार की कुछ 'चुनिंदा उपलब्धियों’ के आसपास तैयार किया था। जिसमें विशेष रूप से: अनुच्छेद 370 को निरस्त करना, जिसके तहत जम्मू-कश्मीर की संवैधानिक रूप से गारंटीशुदा स्वायत्तता को समाप्त कर उसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में तब्दील कर दिया था; अयोध्या विवाद का ‘समाधान’ (वास्तव में इसका आदेश सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिया गया, लेकिन कौन परवाह करता है!) और नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) का पारित होना जो नागरिकता चाहने वालों मुस्लिम के ख़िलाफ़ भेदभाव करता है।

मुद्दों के चयन से ही पता चल जाता है कि यह सब हिंदू बहुसंख्यकों को अपील करने की रणनीति थी क्योंकि ये सभी क़दम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की, जो मोदी, शाह और अन्य के संरक्षक है, की हिंदू दृष्टि के केंद्र बिंदु थे।

हालाँकि, इस जेनेरिक अपील को किसी अन्य ने नहीं बल्कि ख़ुद अमित शाह ने तेज़ी से एक विकृत सांप्रदायिक प्रचार में बदल दिया। कुछ ही दिनों के अभियान में बीजेपी के नेता देशद्रोहियों को गोली मारने का नारा लगा रहे थे यानी मुस्लिम समुदाय के ख़िलाफ़। एक अन्य स्थानीय सांसद कहा कि शाहीन बाग़ में विरोध करने वाले (मुख्य रूप से मुस्लिम) लोग "आपके घरों पर हमला करेंगे और आपकी बेटियों के साथ बलात्कार करेंगे"।

भाजपा नेताओं के बड़े झुंड ने खुले तौर पर शाहीन बाग़ में विरोध कर रहे लोगों पर आरोप लगाया कि शाहीन बाग़ देशद्रोहियों का अड्डा बन गया है और एक दूसरे सांसद ने कहा कि यह आत्मघाती हमलावरों को सींचने का स्कूल बन गया है। संसद के भीतर ही एक सांसद ने चेतावनी दी कि 'हम' सभी आज सतर्क नहीं रहेंगे तो देश में जल्द ही 'मुगल राज' की वापसी हो जाएगी। मोदी जी के कुछ चाहने वालों ने (मोदी के अनुयायी) शाहीन बाग़ में गोली भी चलाई।

ये तथ्य सर्वविदित है और इनका अच्छी तरह से दस्तावेज़ीकरण भी हुआ है कि ज़मीन पर तो भाजपा/ आरएसएस के कैडर और भी कई क़दम आगे थे। उन्होंने बड़े ही साफ़ तौर भारत में मिनी-पाक बनाने को लेकर तथाकथित प्रयासों के बारे में लगातार अभियान चलाया। उन्होंने उस बेबुनियाद ख़बर को फैलाया कि हिंदू आबादी को मुस्लिम आबादी पार कर जाएगी, उन्होंने ‘लव जिहाद’, मुसलमानों का विदेशी होने और गौहत्या के बारे में भी इसी तरह का दुष्प्रचार किया – जब पूछा गया तो दिल्ली में कई लोगों ने ऐसा आरोप लगाया। उनके लिए शाहीन बाग़ इस सब का प्रतीक बन गया था, सारे झूठ को इकट्ठा कर एक ही में झोंक दिया गया। जबकि शाहीन बाग़ में भाजपा की समझ के ठीक विपरीत हो रहा है जहां सभी धर्मों के लोग भारतीय संविधान को बरक़रार रखने की मांग कर रहे हैं- लेकिन बीजेपी को इसकी परवाह नहीं है।

...और इसका प्रभाव देखिए

एक ऐसा महानगर जिसमें मुस्लिम आबादी सिर्फ़ 13 प्रतिशत है, वहाँ यह सब कल्पना करना बेहद मुश्किल है। यहां तक कि पूरे देश के मामले में भी यह अकल्पनीय बात है। लेकिन फिर, भाजपा और आरएसएस वर्षों से लगातार इस तरह के भय को बनाए रखे हुए है, और पिछले छह महीनों से मोदी सरकार के ख़ास संरक्षण के तहत इसे विशेष मज़बूती के साथ चलाया गया है। इस तरह के बेबुनियाद आरोपों को बिना किसी डर के लगाया जा रहा है। यहां तक कि धार्मिक स्थलों पर हमले और लिंचिंग की घटनाएँ भी दंड मुक्ति की भावना से प्रेरित है। इसे कई चुनाव अभियानों में गुप्त रूप से किया गया है। लेकिन दिल्ली में, यह अपने चरम पर पहुंच गया।

नतीजतन, चिंता और भय के इस नए वातावरण ने जनता के कुछ वर्गों के बीच सनसनी पैदा की है। उन्हें लगा, क्या दंगे और हिंसा होने वाली है? क्या विरोध प्रदर्शन या सड़क पर हिंसा होने वाली है? एक बड़े शहर में सभी तरह के भय आसानी से ध्यान केंद्रित करते हैं और इस एकल बिंदु में विलय हो जाते हैं। नफ़रत और दूरी से पैदा हुई घृणा, सद्भाव और दोस्ती की दैनिक जीवित वास्तविकता की अनदेखी कर रही थी।

क्या यह ज़हर चुनावी अभिव्यक्ति में तब्दील हुआ है? यह कहना संदिग्ध है, और एक्ज़िट पोल भी इसकी पुष्टि करते हैं। इस विषैले अभियान ने आक्रामक हिंदुत्व के बैनर के पीछे कुछ लोगों को एकजुट किया हो सकता है – ख़ास कर उनको जो पहले से ही इस तरह की सोच की तरफ़ झुके हुए थे, या जिनको भ्रमित होने पर भाजपा को समर्थन देने के किसी कारण की आवश्यकता थी। दिल्ली में, चुनावी विकल्प इतना कठोर था, जो पारस्परिक रूप से अनन्य था और जिसने भ्रम पैदा किया। जो लोग ‘आप’ सरकार के कल्याणकारी दृष्टिकोण से प्रभावित थे और इससे लाभान्वित हुए थे, वे पूरे दिल से उसके साथ गए और ‘आप’ के पक्ष में मतदान किया। लेकिन ज़हरीले अभियान ने संदेह पैदा कर दिया था। हो सकता है कि इसमें से कुछ लोगों ने यह निर्णय लिया हो - जैसा कि पहले दिल्ली में हुआ था कि दिल्ली में ‘आप’ और केंद्र में भाजपा।

लेकिन आने वाले दिनों में, दिल्ली के निवासियों को प्रतिगामी विचारधारा से प्रभावित इस नाजायज़ मानसिकता से निपटना होगा। ये विचार बार-बार बेहतर नौकरियों, बेहतर कामकाजी परिस्थितियों, बेहतर शिक्षा और बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं की आकांक्षाओं से ध्यान हटाने की कोशिश करेंगे। वे धार्मिक पहचान, जाति पदानुक्रम, आर्थिक असमानता और इस तरह की सोच की बात करेंगे और कहेंगे कि भारत में सदियों पहले हमेशा हवाई जहाज़ और परमाणु बम थे यहाँ तक की प्रागैतिहासिक काल में भी यह सब था और यह कहकर वे भारत को वापस खींचने की कोशिश करेंगे। बेशक, इस चुनाव में भाजपा का नुकसान हो लेकिन वे इस तरह काम करना जारी रखेंगे।

युवा, छात्र जिन्होंने सांप्रदायिक विचारों को ख़ारिज कर दिया

शायद इस सबका सबसे आकर्षक पहलू जो एक शानदार उम्मीद हो सकती है – वह यह कि बीजेपी के मध्ययुगीन दृष्टिकोण से युवा पीढ़ी ने स्पष्ट दूरी बना ली है। वे निश्चित रूप से, अकेले नहीं हैं। इस शहर में लाखों लोग हैं जो भाजपा-आरएसएस की दृष्टि से सहमत नहीं हैं। लेकिन युवा उल्लेखनीय हैं क्योंकि यह वह तबक़ा है जिस पर भाजपा-आरएसएस का प्रचार का असर उन्हें विरासत में मिलेगा। यह वह लड़ाई है जिसे उन्हे भविष्य में लड़ना है - लेकिन वे अब इस लड़ाई में शामिल हो गए हैं।

कोई स्पष्ट डाटा नहीं है लेकिन, युवा लोगों के साथ किसी भी तरह की वास्तविक बातचीत से पता चल जाता है कि उनके भीतर इस तरह के पिछड़ेपन के लिए कोई रुचि नहीं है। साथ ही, उनका मोदी सरकार और भाजपा से बहुत अधिक मोहभंग हो गया है क्योंकि उन्होंने मोदी को भारत को महान बनाने, नौकरियाँ देने, अच्छी शिक्षा देने, सुरक्षा देना, डिजिटल क्रांति की बात में विश्वास किया था। लेकिन पिछले छह सालों के शासन ने इन सपनों को बुरी तरह चकनाचूर कर दिया है। ऐसे में युवाओं में ग़ुस्सा बढ़ रहा है।

दिल्ली में, उन्होंने जेएनयू में फ़ीस बढ़ाने की कोशिशों, जेएनयू छात्रों पर सशस्त्र हमलों और जामिया विश्वविद्यालय पर पुलिस के हमले को देखा है। वे उस क़ानून के पारित होने से नाराज़ थे, जो एक धार्मिक समुदाय के ख़िलाफ़ भेदभाव करता है और उसके ख़िलाफ़ पिछले दिसंबर से अभूतपूर्व संख्या में सड़कों पर निकले हैं। जो लोग नौकरी के बाज़ार में हैं उन्हें अच्छी तरह से पता है कि सब डूब रहा है। योग्य युवा लोग अपने गौरव को निगलते देख रहे हैं और बेचेहरे वाली मशीन की तरह से काम कर रहे हैं।

इस सब की वजह से युवाओं ने मोदी और भाजपा-आरएसएस को छोड़ दिया है। यह मंगलवार को होने वाली मतगणना में दिखेगा। बड़े पैमाने पर अदृश्य और बेचेहरे वाले ग़रीब और मेहनती लोग जो वास्तव में इस शहर को चलाते हैं, आदर्श न सही लेकिन एक बेहतर विकल्प के रूप में ‘आप’ को चुनने के लिए शामिल हो गए। ‘आप’ को भी इन आकांक्षाओं को पूरा करना होगा और कल्याण के नज़रिये से ऊपर उठकर कामकाजी लोगों की आवश्यक ज़रूरतों के साथ अधिक निकटता दिखानी होगी। अन्यथा, वे सांप्रदायिक हमले का विरोध नहीं कर पाएंगे।

इसलिए, 11 फ़रवरी के परिणाम का दिल्ली वालों और देश भर के लोगों को उत्सुकता से इंतज़ार रहेगा। क्योंकि यह नतीजे संकेत देंगे कि भारत अगले कुछ वर्षों में किस तरफ़ जाने वाला है।

अंग्रेजी में लिखा मूल आलेख आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

BJP Likely Getting Severe Drubbing in Delhi But They Leave A Dangerous Legacy

BJP RSS
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BJP MLAs
Modi government
Delhi Voters
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Shaheen Bagh
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