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योगी मंत्रिमंडल विस्तार से दलित और ओबीसी वोटर साधने की कोशिश में भाजपा
योगी के नए मंत्रिमंडल में विस्तार करके एक ब्राह्मण, तीन ओबीसी, दो दलित, और एक अनुसूचित जनजाति के चेहरे को शामिल किया गया है। मंत्रिमंडल में जिन 7 नामों को जगह मिली है, इनमें 2 पूर्वांचल, 2 पश्चिमी उत्तर प्रदेश से, 2 रूहेलखंड, और एक अवध के इलाक़े से हैं। 
असद रिज़वी
27 Sep 2021
UP

काफ़ी समय से टल रहा उत्तर प्रदेश सरकार का विस्तार आख़िर 26 सितंबर को हो गया। योगी आदित्यनाथ सरकार के इस विस्तार को विधानसभा चुनावों यानी 2022 से पहले “जातिगत समीकरण के संतुलन” बनाने की राजनीतिक मजबूरी माना जा रहा है। इस बीच मंत्रीमंडल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के क़रीबी अरविंद शर्मा को जगह ना मिलने से लोग हैरान है।

मंत्रिमंडल में विस्तार कर के 01 ब्राह्मण, 3 ओबीसी, 2 दलित, 01 अनुसूचित जनजाति के चेहरे को 

शामिल किया गया है। मंत्रिमंडल में जिन 7 नामों को जगह मिली है, इनमें 2 पूर्वांचल, 2 पश्चिमी उत्तर प्रदेश से, 2 रूहेलखंड, और एक अवध के इलाक़े से हैं। 

कांग्रेस से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में आये जितिन प्रसाद के अलावा धर्मवीर प्रजापति, संगीता बिंद, संजय कुमार गोंड, छत्रपाल गंगवार, धर्मवीर प्रजापति, और दिनेश खटीक को मंत्री मनाया गया है। कहा जा रहा है की नए मंत्रियों के नामों की सूची बनाने में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) ने अहम भूमिका निभाई है।

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उत्तर प्रदेश सरकार में जिन नामों को शामिल किया गया है, उसमें जितिन प्रसाद अकेले ब्राह्मण हैं। छत्रपाल गंगवार, संगीता बिंद और धर्मवीर प्रजापति “पिछड़े वर्ग” से है। “दलितों” को साधने के लिए 2  चेहरे दिनेश खटीक और पलटूराम को मंत्री बनाया गया है। संजीव गोंड “अनुसूचित जनजाति” से हैं।

योगी सरकार के 24 कैबिनेट मंत्रियों में से 10 'उच्च जाति' से हैं, 5 ब्राह्मण, 5 ठाकुर (योगी समेत), 

7 ओबीसी जिसमें 2 जाट, 2 मौर्य व 1-1 राजभर, कुर्मी और चौहान और 1 दलित कोरी हैं।

चुनावों से कोई चार-पांच महीने पहले हुए मंत्रिमंडल विस्तार को  “जातिगत समीकरण के संतुलन” के अलावा “क्षेत्रीय संतुलन” और भाजपा के नाराज़ केंद्रीय प्रतिनिधित्व को मानने का प्रयास की तरह देखा जा रहा है। कहा यह भी जा रहा है कि भाजपा पश्चिमी प्रदेश में चल रहे किसान आंदोलन के कारण “जाट” समुदाय में जन्मी नाराज़गी से भी परेशान है।

साल 2017 में पार्टी की जीत के पीछे उसका जातीय समीकरण था। विधानसभा चुनाव 2017 में क़रीब-क़रीब सभी जातियों का साथ भाजपा को मिला था। भाजपा ने सहयोगी दलों के साथ मिलकर 325 सीटें जीती थीं। 

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कहा जाता है कि भाजपा को बहुमत दिलाने में “ग़ैर-यादव” की बड़ी भूमिका थी। प्रदेश में इनकी करीब 40% आबादी है। पिछले चुनाव में दलितों ने भी ख़ासकर “ग़ैर-जाटव” ने भाजपा का साथ दिया था। दलित वर्ग प्रदेश की कुल आबादी का करीब 21% है।

भाजपा अब इन्हें नाराज नहीं करना चाहती। कहा जा रहा है कि योगी का इन जातियों के नामों को मंत्रिमंडल में जगह देने का केवल एक ही मक़सद है कि इनके बीच पार्टी का जनाधार बचाया जा सके।

क्षेत्रीय समीकरण को साधने के उद्देश्य को भी नाकारा नहीं जा सकता है। संगीता बलवंत बिंद को मंत्रिमंडल में जगह देकर “पूर्वांचल” में “बिंद” जाति के लोगों को भाजपा के क़रीब लाने की कोशिश की गई है। योगी सरकार में अभी तक बिंद समाज का कोई भी मंत्री नहीं था। छत्रपाल गंगवार को “रूहेलखंड” से जगह देकर पार्टी ”गंगवार” जाति को अपने क़रीब करना चाहती है। सांसद संतोष गंगवार को मोदी मंत्रिमंडल से बाहर किये जाने से गंगवार समुदाय में नाराज़गी का एहसास भाजपा को हो रहा था।

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हालाँकि योगी मंत्रिमंडल के विस्तार की चर्चा इस साल के शुरू से हो रही थी। जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के क़रीबी, आईएएस अरविंद कुमार शर्मा, नौकरी छोड़कर पार्टी में शामिल हुए थे। माना जा रहा था कि  उनको प्रदेश सरकार में अहम भूमिका मिलेगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। फिर भी योगी ने मंत्रिमंडल में विस्तार करके नाराज़ केंद्रीय आलाकमान को मनाने का प्रयास ज़रूर किया है।

जबकि शर्मा को मंत्री नहीं बनाये जाने से पार्टी के नेता और राजनीति के जानकार दोनो हैरान हैं। क्यूँकि वह प्रधानमंत्री मोदी की पसंद हैं। अब राजनीति के जानकार यह प्रश्न कर रहे हैं कि अगर शर्मा को कोई जिम्मेदारी नहीं मिलनी थी तो उनको नौकरी छोड़कर प्रदेश की राजनीति में प्रवेश क्यू कराया गया?

जितिन प्रसाद के मंत्री बनाने की चर्चा उस समय ही शुरू हो गई थी जब वह कांग्रेस से भाजपा में आये थे। भाजपा पर विपक्ष लगातार “ब्राह्मण” विरोधी होने का आरोप लगा रहा है। कहा जा रहा है कि आरोप से बचने के लिये भाजपा ने जितिन को मंत्री बनाया है। हालाँकि कहा यह भी जा रहा है कि केवल जितिन को मंत्री बनाने से ब्राह्मण समाज की नाराज़गी दूर करना आसान नहीं होगा। इसके अलावा जितिन कई चुनाव हार भी चुके हैं, इतने कमज़ोर ज़मीनी आधार के साथ वह भाजपा की मदद कैसे कर सकेंगे?

राजनीति के जानकार मानते हैं कि विधानसभा चुनाव से 5 महीने पहले हो रहे मंत्रिमंडल विस्तार का केवल उद्देश्य जातिगत संतुलन है। वरिष्ठ राजनीतिक अतुल चन्द्र कहते हैं कि मंत्रिमंडल विस्तार के नए मंत्रियों को काम के लिए महज कुछ महीने का वक्त मिलेगा। इन मंत्रियों का काम चुनाव प्रचार करना ही बचेगा। चंद्रा मानते हैं कि इस विस्तार से भाजपा का मक़सद केवल ”ग़ैर-यादव ओबीसी” और “ग़ैर-जाटव दलित” को साधना है। 

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राजनीतिक विश्लेषक यह भी मानते हैं कि योगी मंत्रिमंडल के विस्तार में मोदी की बात नहीं चली है। आलोक जोशी कहते हैं कि वैसे तो इस विस्तार का सिर्फ़ एक मक़सद है यानी “ जातिगत समीकरण के संतुलन” बनाना। लेकिन मंत्रिमंडल में अरविंद शर्मा को जगह न मिलना साफ़ बताता है कि मोदी की बात यूपी में नहीं चली है। कहा जा रहा था कि शर्मा उप-मुख्यमंत्री बनेंगे लेकिन उनको मंत्री भी बनाया गया।

बता दें कि योगी सरकार के दूसरे मंत्रिमंडल के विस्तार में शपथ लेने वाले 7 मंत्रियों में केवल जितिन ही कैबिनेट मंत्री हैं तथा बाक़ी 6 राज्य मंत्री हैं।

हालाँकि यह अभी नहीं कहा जा सकता है कि इस मंत्रिमंडल विस्तार से पार्टी को 2022 चुनावों में कितना फ़ायदा होगा। क्यूँकि चुनाव में समय बहुत कम बचा है। मंत्रियों के सामने दो बड़ी चुनौतियां होगी, एक उनका वक्त तो विभाग को ठीक से समझने में ही निकल जाएगा और दूसरी मंत्री बनने के बाद अब सीधे जनता के बीच जाना है।

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