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नज़रिया
भारत
राजनीति
भाजपा चाहती है अपनी पसंद का विपक्ष!
आंदोलनों से भाजपा सतर्क है कि कहीं इस देश में कोई नये ढंग का विपक्ष न पैदा हो जाय! मौजूदा किसान आंदोलन से भी इसीलिए उसे डर लग रहा है क्योंकि यहां उसकी कोई पसंदीदा विपक्षी पार्टी नहीं।
उर्मिलेश
18 Dec 2020
modi-amit

भाजपा की सबसे बड़ी चिंता है- कहीं इस देश में कोई नये ढंग का विपक्ष न पैदा हो जाय! देश के ज्यादातर हिस्सों में वह विपक्षी दलों से काफी ‘सहज’ महसूस करती आ रही है। कुछ प्रदेशों में क्षेत्रीय आधार वाले दलों और वामपंथियों से वह हमेशा असहज महसूस करती है। उसका वश चले तो वह पूरे भारत में ‘अपनी पसंद का विपक्ष’ भी चुन ले! ठीक उसी तरह जैसे बड़े अफसरों को चुनती है। संवैधानिक संस्थाओं के ब़ड़े ओहदेदार चुनती है। पर हमारे देश में लोकतंत्र के लिए बड़ा संबल है- इसकी विविधता और इसका बहुलतावादी चरित्र।

आरएस-भाजपा तरह-तरह से इसे बदलने की कोशिश कर रहे हैं। सन् 2014 में बहुमत के साथ सत्ता में आने के बाद से ही वे सामाजिक-राजनीतिक संरचना और स्वरूप को अपने अनुकूल करने के लिए बहुत तरीके और सुनियोजित ढंग से काम कर रहे हैं। उनके इस राजनीतिक अभियान का एक महत्वपूर्ण प्रकल्प हैः अपनी पसंद का विपक्ष तैयार करना! उन्हें अलग सोच और मिजाज का विपक्ष हरगिज पसंद नहीं है। आंदोलनों से उसे चिढ़ है क्योंकि उसे मालूम है कि आंदोलनों से नये ढंग का नेतृत्व उभरता है। उसे न तो मौजूदा संविधान पसंद है और न ही सेक्युलर-लोकतांत्रिक मिजाज वाली पार्टियां या लोग पसंद हैं। अपनी पसंद का विपक्ष हासिल करने का उसका नया प्रकल्प भारत के बड़े कारपोरेट और बड़ी विदेशी कंपनियों को भी अच्छा लग रहा है। यह प्रकल्प आरएसएस की वैचारिकी के अलावा काफी कुछ अमेरिका या इसी तरह के कुछ पश्चिमी मुल्कों से भी प्रभावित है, जहां पक्ष-विपक्ष की वैचारिकी या सैद्धांतिकी में बुनियादी फर्क ज्यादा नहीं रहता।

अपने देश के संविधान में बहुत सारे फेरबदल और संशोधन कांग्रेस की हुकूमतों ने भी किये। उनमें कुछ अच्छे या सकारात्मक थे तो अनेक नकारात्मक भी थे। लेकिन भाजपा बीते कुछ सालों में जितने संशोधन कर रही है, वे ज्यादातर नकारात्मक ही हैं। संविधान या अन्य कानूनों में संशोधन के अलावा उसकी सबसे बड़ी प्राथमिकता हैः अपनी पसंद की सामाजिक-राजनीतिक संरचना को स्थापित करना और समानधर्मा विपक्षी खेमा उभारना! चौंकिये नहीं, आंख खोलकर देखिये- यूपी, बिहार, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, जम्मू-कश्मीर, दिल्ली, और बंगाल, हर प्रमुख प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी का यह अति महत्वाकांक्षी राजनीतिक प्रोजेक्ट तेजी से चल रहा है। यूपी में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी को ‘मनोनुकूल’ बनाने के बाद भी भाजपा को संतोष नहीं। अब वहां एक नया प्रयोग चल रहा है। ओवैसी साहब की एमआईएम और भाजपा के गठबंधन का हिस्सा रहे सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी से एक नया गठबंधन बनता नजर आ रहा है। इस पार्टी के नेता ओम प्रकाश राजभर योगी सरकार में मंत्री रह चुके हैं। यही नहीं, अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी भी यूपी में दाखिल हो रही है। हमारे जैसे लोकतंत्र में हर किसी को कहीं भी संगठन बनाने या राजनीतिक-सामाजिक काम करने का संवैधानिक अधिकार है। लेकिन इस अधिकार का प्रयोग कुछ कुछ क्षेत्रीय शक्तियां हाल के दो-तीन वर्षों में जिस तरह कर रही हैं, उससे मौजूदा सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी को सीधा या प्रकारांतर से फायदा मिल जाता है। अतीत में भी चुनावी कामयाबी के लिए बड़े राजनीतिक दल या बड़े नेता अपनी इच्छानुसार कुछ ऐसे उम्मीदवार खड़ा करते-कराते थे, जिससे उनके वास्तविक विपक्षी की हालत खस्ता हो और कांटे की लड़ाई में उन्हें कामयाबी मिल जाये। पहले यह रणनीति छिटपुट इस्तेमाल की जाती थी। भाजपा के सत्ता-दौर में अब इस रणनीति को सैद्धांतिकी में बदला जा रहा है। अभी हाल में बिहार में इसे मूर्त होते देखा गया। कहीं संभावनाओं के नये ‘चिराग’ जले तो कहीं सीमांचल में नयी सियासत की लौ जली!

राष्ट्रीय राजधानी का परिदृश्य ही देखेः भाजपा-संघ के बड़े रणनीतिकार दिल्ली में अरविंद  केजरीवाल की पार्टी-‘आप’ को अपने लिए ‘बेहतर विपक्ष’ समझते हैं। बड़े राजनीतिक-आर्थिक सवालों पर ‘आप’ और भाजपा के बीच बुनियादी सैद्धांतिक विरोध नहीं उभरता। जो भी विरोध उभरते हैं, वो रणनीतिक या तकनीकी होते हैं। कथित आर्थिक सुधार के बड़े कदम-विनिवेशीकरण-निजीकरण हो या सीएएए-एनआरसी का मुद्दा हो, कश्मीर का सवाल हो या दिल्ली के दंगे से पहले और बाद में अनेक नागरिकों और कार्यकर्ताओं की होने वाली गिरफ्तारियां हों, इन पर दोनों की राय में ज्यादा फर्क नहीं है! उत्पीड़ितों और वंचितों के लिए सकारात्मक कार्रवाई (आरक्षण) के प्रश्न पर भी दोनों पार्टियों के मंसूबों में ज्यादा अंतर नहीं। भाजपा की तरह ‘आप’ हिन्दुत्वादी-समाज की बात नहीं करती, हिन्दू-राष्ट्र की बात नहीं करती। पर ये सब जमीनी असलियत बन जायं तो ‘आप’ के शीर्ष नेतृत्व को उससे खास परहेज नहीं होगा! किसी सुसंगत लोकतंत्र में राजनीति और धर्म के बीच क्या रिश्ता होना चाहिए या हमारे संविधान की सेक्युलरिज्म सम्बन्धी प्रतिबद्धता की व्याख्या पर भी दोनों दलों के बीच बहुत ज्यादा फर्क नजर नहीं आता। चुनाव अभियान में भाजपा की तरह ‘आप’ के नेता भी धार्मिक प्रतीकों और कर्मकांडों का जमकर इस्तेमाल करते हैं। अन्ना-केजरीवाल की अगुवाई वाले लोकपाल-अभियान के मुखर प्रवक्ता रहे मशहूर वकील प्रशांत भूषण के इस रहस्योद्घाटन को अगर हम थोड़ी देर के लिए भूल भी जायें कि ‘अन्ना-आंदोलन’ के पीछे आरएसएस-भाजपा की भूमिका थी तो भी हमें यह मानना पड़ेगा कि आम आदमी पार्टी सोच और मिजाज के स्तर पर भाजपा से बिल्कुल उलट नहीं है।

इस बीच, भाजपा ने अपने लिए असंभव समझे जाने वाले तमिलनाडु जैसे प्रदेश में जिस तरह ‘स्पेस’ बनाया है, वह उसका सर्वथा नया राजनीतिक प्रयोग है। वह स्वयं इस हालत में नहीं कि सत्ताधारी पार्टी बन सके या अपनी हैसियत बना सके। वहां उसने अन्नाद्रमुक के रूप में एक ऐसी पार्टी को हासिल कर लिया है, जिसे वह ‘रिमोट कंट्रोल’ से चला सके और जो चाहे वह करा सके! आज की असलियत ये है कि तमिलनाडु में पलानीसामी की अन्नाद्रमुक अपने हर बड़े फैसले से पहले भाजपा नेतृत्व के संकेतों को महत्व देती है। संसद से विधानसभा तक इसे देखा जा सकता है। इधर, द्रविड़ संस्कृति की जमीन पर अब एक नया प्रयोग आजमाया जा रहा है-फिल्म स्टार रजनीकांत के जरिये। उम्र के इस पड़ाव पर रजनीकांत नयी पार्टी बनाकर चुनाव में कूदने वाले हैं। यह तो वही जानें कि उनका यह निजी फैसला है य़ा उनके फैन क्लबों का या किसी अन्य का? पर निश्चय ही उन्हें प्रेरित करने वाले कई ‘फैक्टर’ होंगे। बहुत संभव है, निकटभविष्य में भाजपा के लिए रजनीकांत की भावी पार्टी एक सहयोगी के रूप में सामने आये। रजनीकांत इन दिनों ‘आध्यात्मिक राजनीति’ की बात बड़े चाव से कर रहे हैं। अभी साफ नहीं किया कि उनकी ‘आध्यात्मिक राजनीति’ का क्या स्वरूप और आकार-प्रकार होगा?

आंध्र में राजनीतिक सहयोगी के रूप में एक समय भाजपा को टीडीपी नेता एन चंद्रबाबू नायडू पसंद थे। आज उसे वाईएसआर कांग्रेस के जगनमोहन रेड्डी पसंद हैं। वह इन दोनों प्रदेशों में फिलहाल सत्ता की दौड़ से बहुत दूर है, इसलिए वह इन दोनों दलों और इनके मुख्यमंत्रियों को अपनी मर्जी के मुताबिक चलाने की कोशिश करती रहती है।

तेलंगाना में तेवर अब बदल रहे हैं। वहां उसकी ताकत पहले से कुछ बढ़ी है। हैदराबाद के स्थानीय चुनावों में भी इसका संकेत मिला। वहां इसकी कोशिश है- टीआरएस को पछाड़ने के लिए ओवैसी की पार्टी का उपयोग करना! वैचारिक रूप से वह तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) को अपनी नजदीकी पार्टी मानती है। ऐसे में उसकी कोशिश होगी, निकट भविष्य में टीआरएस को पछाड़ना। अगर भाजपा एक कट्टर हिंदुत्ववादी पार्टी है तो टीआरएस हिन्दुत्वा-सोच की मध्यमार्गी पार्टी! मुख्यमंत्री खुलेआम करोड़ों के खर्च से यज्ञ कराते हैं! भाजपा को कोई परेशानी नहीं, अगर टीआरएस उसके लिए धीरे-धीरे रास्ता साफ करे और दूसरे नंबर की यानी मुख्य विपक्षी दल बनकर रहे!

जम्मू कश्मीर में भी मुफ्ती साहब की पीडीपी से गठबंधन करने और फिर तोड़ने के पहले और बाद में भाजपा ने कश्मीर घाटी में कुछ नये-नये दलों और समूहों को उभारने की कोशिश की पर उसे वहां ज्यादा कामयाबी नहीं मिली। कुछ साल पहले, घाटी में दो छोटे-छोटे समूहों के गठन को इसी प्रक्रिया का हिस्सा माना गया।

झारखंड में काफी समय तक ‘विपक्ष’ बने रहने के बाद बाबू लाल मरांडी अब भाजपा में लौट आये हैं। अपने शुरुआती राजनीतिक करियर में भी वह भाजपा के ही नेता रहे हैं।

यूपी में भाजपा और उसके शासन के विरूद्ध जबर्दस्त जनता में, खासकर उत्पीड़ित समाजों में गहरी नाराजगी नजर आती है। पर बीते कुछ सालों से वह राजनीतिक-विपक्ष में कभी भी अभिव्यक्त नहीं होती। प्रदेश की दोनों प्रमुख विपक्षी पार्टियां-समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की विपक्षी धार कब की खत्म की जा चुकी है। सत्ताधारी नेताओं ने तमाम सरकारी एजेंसियों और अन्य तरीकों से उन्हें मजबूर किया है। यूपी में इस अघोषित सच को हर कोई जानता-समझता है। सपा-बसपा के शीर्ष नेताओं की नियोजित-निर्देशित विपक्षी-भूमिका ट्विटर पर य़ा यदा-कदा उनके बयानों में दिख जाती है। बहुत हुआ तो वे कभी-कभी सड़क पर भी अवतरित हो जाते हैं। इससे ज्यादा कुछ नहीं!

देश के सबसे बड़े प्रदेश में अब तक की किसी भी सत्ताधारी पार्टी को इससे ज्यादा ‘अच्छा, मुलायम और सहयोगी विपक्ष’ कभी नहीं मिला! भाजपा पूरे देश में अपने लिए ऐसा ही विपक्ष चाहती है। यही कारण है कि वह समाज और राजनीति में वामपंथियों को हरगिज बर्दाश्त नहीं करना चाहती। विश्वविद्यालय़ों और मीडिया में भी नहीं। देश में वामपंथी ले-देकर तीन-चार प्रदेशों में सिमटे हुए हैं पर वह आरएसएस-भाजपा को बड़ा खतरा नजर आते हैं। इसके अलावा वह किसी गैर-पार्टी विपक्षी गतिविधि को भी हरगिज बर्दाश्त नहीं करती। मौजूदा किसान आंदोलन से इसीलिए उसे डर लग रहा है क्योंकि यहां उसकी कोई पसंदीदा विपक्षी पार्टी नहीं, जनता सड़कों पर डटी हुई है। वह हर आंदोलन को जल्दी से जल्दी कुचलने में जुटती है ताकि कोई बड़ा और समर्थ नेतृत्व न उभरे। भाजपा की सबसे बड़ी चिंता है-कहीं इस देश में कोई नये ढंग का विपक्ष न पैदा हो जाय!

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

 

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