घाटे में चल रही सरकारी कंपनी के लिए खरीदार नहीं है। क्या इसलिए BSNL और MTNL पर जनता का पैसा लगाकर, बेचने से पहले उनकी डेंटिंग और पेंटिंग की जा रही है?
घाटे में चल रही सरकारी कंपनी के लिए खरीदार नहीं है। क्या इसलिए BSNL और MTNL पर जनता का पैसा लगाकर, बेचने से पहले उनकी डेंटिंग और पेंटिंग की जा रही है? सरकार जानती है कि इस वक़्त टेलीकॉम सैक्टर में कोई भी पैसा नहीं बन रहा है। फिर मोदी सरकार का यह आश्वासन कि दो साल में दोनों कंपनियों का घाटा खत्म हो जाएगा क्या माइने रखता है?