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ख़बरों के आगे-पीछे: 23 हज़ार करोड़ के बैंकिंग घोटाले से लेकर केजरीवाल के सर्वे तक..
हर हफ़्ते कुछ ऐसी ख़बरें होतीं हैं जो पीछे छूट जाती हैं जिन पर बात करना उतना ही ज़रूरी है। ऐसी ही ख़बरों को एक साथ लाए हैं अनिल जैन..
अनिल जैन
20 Feb 2022
SBI
प्रतीकात्मक फ़ोटो- AFP

देश के सबसे बड़े बैंकिंग घोटाले पर कॉरपोरेट नियंत्रित मीडिया में पूरी तरह सन्नाटा छाया हुआ है। कहीं पर भी इसकी छानबीन नहीं की जा रही है। यहां तक कि घोटाले से जुड़ी मोटी-मोटी बातें भी लोगों को नहीं बताई जा रही हैं। करीब 23 हजार करोड़ रुपए के इस घोटाले में सबसे ज्यादा सात हजार करोड़ रुपया आईसीआईसीआई बैंक का डूबा है। 28 बैंकों के जिस कंसोर्टियम ने एबीजी शिपयार्ड को कर्ज दिया उसकी अगुवाई भी आईसीआईसीआई बैंक कर रहा था। लेकिन चूंकि शिकायत भारतीय स्टेट बैंक की ओर से की गई है इसलिए फोकस भी सारा उसी पर है। आईसीआईसीआई बैंक का जिक्र ही नहीं हो रहा है, जबकि एक तिहाई कर्ज उसका है। उसने एबीजी शिपयार्ड के विदेशी प्रोजेक्ट के लिए भी कर्ज दिया था। एबीजी शिपयार्ड कंपनी को आईसीआईसीआई बैंक से इतना बड़ा कर्ज भी तब दिया गया था जब चंदा कोचर इस बैंक की प्रमुख थीं। वीडियोकॉन कंपनी को दिए कर्ज की तो बहुत चर्चा होती है, जिसमें खुलासा हुआ था कि आईसीआईसीआई बैंक ने वीडियोकॉन को कर्ज दिया और बाद में वीडियोकॉन ने चंदा कोचर के पति दीपक कोचर के भाई की कंपनी में निवेश किया। वही खेल इस मामले में भी हुआ दिख रहा है। एक व्हिसलब्लोअर और सामाजिक कार्यकर्ता अरविंद गुप्ता ने खुलासा किया है कि उद्योगपति रवि रुइया ने अपने दामाद निशांत कनोडिया की कंपनी के जरिए दीपक कोचर की कंपनी में करीब साढ़े चार सौ करोड़ रुपए का निवेश किया। सवाल है कि कर्ज एबीजी शिपयार्ड को मिला तो रुइया के निवेश करने से उसका क्या लेना-देना है? लेना-देना यह है कि एबीजी शिपयार्ड के मालिकों में से सबसे प्रमुख ऋषि अग्रवाल है, जो शशि और रवि रुइया का अपना सगा भांजा है। 

उत्तर प्रदेश का प्रधानमंत्री अब एक मिथक है! 

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के दौरान सभी पार्टियों के नेता मतदाताओं को बता रहे हैं कि उत्तर प्रदेश राजनीतिक रूप से कितना महत्वपूर्ण राज्य है। यह भी कहा जा रहा है कि उत्तर प्रदेश ही प्रधानमंत्री देता है या केंद्र की सत्ता का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर जाता है। ये सब बातें अपनी जगह कुछ-कुछ सही हैं, क्योंकि उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा राज्य है। आबादी 24 करोड़ है और लोकसभा की 80 सीटें हैं। इस लिहाज से केंद्र में सरकार में बनाने में इस सूबे की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। लेकिन यह अब मिथक बन गया है प्रधानमंत्री उत्तर प्रदेश का ही बनता है। हकीकत यह है कि पिछले तीन दशक से उत्तर प्रदेश का कोई नेता प्रधानमंत्री नहीं बना है। प्रधानमंत्री बनने वाले उत्तर प्रदेश के आखिरी नेता चंद्रशेखर थे, जो 1991 में प्रधानमंत्री बने थे। उनसे पहले मोरारजी देसाई और गुलजारी लाल नंदा को छोड़ कर बाकी सारे प्रधानमंत्री उत्तर प्रदेश के थे। लेकिन 1991 में चंद्रशेखर के प्रधानमंत्री बनने के बाद से उत्तर प्रदेश का कोई भी नेता प्रधानमंत्री की कुर्सी तक नहीं पहुंच सका। यहां तक कि पिछले कुछ बरसों से तो केंद्र सरकार के शीर्ष मंत्रियों में भी उत्तर प्रदेश के नेताओं को जगह मिलनी कम हो गई है। जो लोग कहते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी उत्तर प्रदेश से हैं, वे एक भ्रम पैदा कर रहे हैं। नरेंद्र मोदी गुजरात के हैं और उन्होंने उत्तर प्रदेश से लोकसभा का चुनाव लड़ा है। वे उत्तर प्रदेश के नहीं हैं, बल्कि उत्तर प्रदेश के सांसद हैं। 

जैसे मनमोहन सिंह असम के नहीं थे, असम से सांसद थे। क्या कभी किसी के मुंह से सुना है कि असम का आदमी प्रधानमंत्री बना है? सब यही कहते हैं कि पंजाब के मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने। वे असम से राज्यसभा सदस्य थे इसलिए असम के नहीं माने गए। इसी तरह दिल्ली में रहने वाले आईके गुजराल बिहार से सांसद थे और प्रधानमंत्री बने थे। उनके लिए भी कोई नहीं कहता था कि बिहार का नेता प्रधानमंत्री बना है। उसी तरह नरेंद्र मोदी भी उत्तर प्रदेश से सांसद हैं, इसलिए उत्तर प्रदेश के नही मान लिए जाएंगे। वे इतने उत्तर प्रदेश के हैं कि वोट डालने गुजरात जाते हैं! यही बात अटल बिहारी वाजपेयी के बारे में भी है। वे भी उत्तर प्रदेश से सांसद थे और प्रधानमंत्री बने थे। वे रहने वाले मध्य प्रदेश के थे। उनका जन्म वहां हुआ था और पढ़ाई-लिखाई भी वही हुई थी। उनका परिवार और सारी रिश्तेदारियां वहीं थीं। सो, चंद्रशेखर के बाद प्रधानमंत्री बने सारे नेता उत्तर प्रदेश से बाहर के थे। पीवी नरसिंह राव आंध्र प्रदेश के थे तो वाजपेयी मध्य प्रदेश के, एचडी देवगौड़ा कर्नाटक के थे तो आईके गुजराल दिल्ली के, मनमोहन सिंह पंजाब के थे तो नरेंद्र मोदी गुजरात के हैं। इसलिए बार-बार जो प्रचार में कहा जा रहा है कि उत्तर प्रदेश प्रधानमंत्री देने वाला राज्य है, वह एक तरह का छद्म है, फरेब है, जिससे मतदाताओं को बरगलाया जा रहा है।

केजरीवाल पार्टी चलाते हैं या सर्वे एजेंसी?

भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए सर्वे कराने का जिम्मा तो देश के टीवी चैनलों ने ले रखा है। ये चैनल हर चुनाव के समय 'अपने सर्वे’ में भाजपा को बढ़त दिलाते हैं। फिर भले ही चुनाव नतीजे कुछ भी आएं, इससे चैनलों की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता और वे बेशर्मी के साथ कोई नया सर्वे पेश करने के लिए अपने धंधे में जुट जाते हैं। यही सारे चैनल समय-समय पर प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता बरकरार बताने वाले सर्वे भी दिखाते हैं और सरकार के खिलाफ होने वाले आंदोलनों के वक्त भी सर्वे के जरिए आंदोलन को लेकर बेअसर या अलोकप्रिय करार देते हैं। लेकिन दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल किसी टीवी चैनल या सर्वे करने वाली एजेंसी के भरोसे नहीं करते और खुद ही बात-बात में सर्वे करा लेते हैं। इससे सवाल उठता है कि वे राजनीतिक पार्टी चला रहे हैं या सर्वे एजेंसी? उनके पास सर्वे कराने की ऐसी तकनीक है कि वे टोल फ्री की बजाय एक सामान्य मोबाइल नंबर जारी करते हैं और दो-चार दिन में उसी पर लाखों लोगों की प्रतिक्रिया आ जाती है। अभी तो वे ऐसे राज्यों में सर्वे करा रहे हैं, जहां आबादी कम है, वरना करोड़ों में रिस्पांस मिलता। उन्होंने पंजाब में अपनी पार्टी की ओर से मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार तय करने के लिए एक सर्वे कराया, जिसमें एक मोबाइल नंबर पर चार दिन में 23 लाख से ज्यादा रिस्पांस मिल गया था और 93 फीसदी ने भगवंत मान को पसंद किया था। इसी तरह पंजाब के मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी को मालवा क्षेत्र की भदौर सीट से उम्मीदवार बने दो ही हफ्ते हुए और केजरीवाल ने वहां तीन बार सर्वे करा लिया। केजरीवाल ने चन्नी की पारंपरिक सीट चमकौर साहिब पर भी तीन बार सर्वे करा लिया। उनके दोनों सर्वे में चन्नी हार रहे हैं। दिल्ली में भी वे बात-बात में सर्वे कराते रहते हैं और कई बार तो उस कथित सर्वे के नतीजों के पोस्टर और होर्डिंग बनवा कर भी लगाए जाते हैं। एक बार तो उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्र संघ के चुनाव में भी अपनी पार्टी के जीतने के सर्वे का पोस्टर लगवाए थे। यह अलग बात रही कि उनकी पार्टी एक भी सीट नहीं जीत पाई। उनके सर्वे की एक खास बात यह रहती है कि उसमें हर बार उनकी पार्टी जीतती है, विपक्षी पार्टियां हारती हैं। अगर मामला हार-जीत का नहीं होता है तो उसमें भी उनके मनचाहे नतीजे ही आते हैं।

संजय राउत ने अघोषित नियम तोड़ दिया!

दिल्ली से लेकर राज्यों की राजधानी तक में सभी राजनीतिक दलों के नेताओं को पता होता है कि किस पार्टी के सत्ता में आने पर किस व्यक्ति की भूमिका बढ़ सकती है। लोगों के वैध-अवैध काम कराने, धन की वसूली करने, धन का बंदोबस्त करने आदि का काम जो लोग परदे के पीछे से करते हैं, उनके बारे में सबको पता होता है। उसी तरह नेताओं के शौक-शगल के बारे में भी सबको जानकारी रहती है। लेकिन कोई सार्वजनिक रूप से इस बारे में नहीं बोलता है। यह एक अघोषित नियम है, जिसे शिव सेना के राष्ट्रीय प्रवक्ता और सांसद संजय राउत ने तोड़ा है। उन्होंने आधा दर्जन गैर सरकारी और दलगत राजनीतिक से दूर रहने वाले लोगों के नाम लिए हैं और उनका संबंध महाराष्ट्र के भाजपा नेताओं से जोड़ते हुए कहा है कि वे पैसे की वसूली और धनशोधन करते हैं। संजय राउत इससे आगे नही बढ़े लेकिन उन्होंने कहा कि वे सबकी अय्याशियों के बारे में भी जानते हैं। समझा जा सकता है कि अगर राउत ने उसका खुलासा कर दिया तो कितने लोगों के कपड़े उतरेंगे? गौरतलब है कि संजय राउत सहित शिव सेना के कई नेताओं को प्रवर्तन निदेशालय और आयकर जैसी केंद्र सरकार की एजेंसियों ने पिछले कुछ समय से निशाने पर ले रखा है। संजय राउत इसे महाराष्ट्र में शिव सेना की अगुवाई में चल रही महाविकास अघाड़ी की सरकार गिराने की केंद्र सरकार की साजिश करार देते हुए महाराष्ट्र के भाजपा नेताओं पर लगातार जुबानी हमला कर रहे हैं। इसी सिलसिले में उन्होंने भाजपा नेताओं के साथ ही गैर राजनीतिक लोगों के नाम लेते हुए पलटवार करते हुए कहा है, ''मैं नंगा आदमी हूँ, किसी से डरूंगा नहीं और आखिरी तक लडूंगा।’’ बहरहाल, संजय राउत ने कुछ लोगों के नाम लेकर सचमुच कोई गलत काम किया है या नहीं किया, इस बहस में जाने की जरूरत नहीं है, क्योंकि सबको पता है कि न तो उनकी जांच होनी है और न कोई सच सामने आना है। लेकिन उन्होंने हरियाणा के एस नरवर का नाम लेकर कहा है कि एक दूधवाला पांच साल में सात हजार करोड़ रुपए का मालिक कैसे बना? उन्होंने जितेन्द्र नवलानी का नाम लिया और कहा कि उसके साथ चार लोग मिलकर मुंबई के बिल्डरों से सैकड़ों करोड़ की वसूली कर चुके हैं। राउत ने मोहित कंबोज, अमोल काले, विजय धमगाले, राकेश वाधवान और लडानी नामक किसी व्यक्ति का नाम लिया और महाराष्ट्र में भाजपा सरकार के समय हुए कथित घोटालों में शामिल होने का आरोप लगाया। उन्होंने और भी कई नाम लिए लेकिन वे लोग भाजपा के नेता है या जाने-माने कारोबारी है। पर पहली बार ऐसा हुआ कि परदे के पीछे काम करने वाले लोगों के नामों का किसी नेता ने इस तरह खुलासा किया।

अंबानी-अडानी को पूजने की सलाह

अभी तक तो भाजपा के नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ही दैवीय शक्तियों से युक्त अवतारी पुरुष बताते रहे थे और चाहते थे कि लोग उनकी पूजा करें। इस सिलसिले की शुरुआत केंद्रीय मंत्री के रूप में वैंकेया नायडू ने 2016 में की थी। थोड़े ही दिनों बाद वे उप राष्ट्रपति बना दिए गए। बाद में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, रविशंकर प्रसाद आदि तमाम नेताओं ने भी इसी तरह मोदी का प्रशस्ति गान किया। लेकिन अब देश के उन शीर्ष उद्योगपतियों को भी पूजने की सलाह दी जाने लगी है, जिनसे मोदी के करीबी रिश्ते हैं। जब से प्रधानमंत्री मोदी ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि उन्हें उद्योगपतियों और कारोबारियों के साथ खड़े होने में कोई डर या संकोच नहीं है, तब से भाजपा नेताओं में होड़ लगी है कि कौन ज्यादा समर्पण के साथ कारोबारियों के साथ खड़ा होता है। इस मामले में मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में मंत्री रहे पूर्व आईएएस अधिकारी केजे अल्फोंस ने बाजी मारी है। उन्होंने पिछले दिनों राज्यसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान कहा कि अंबानी और अडानी की पूजा होनी चाहिए क्योंकि वे रोजगार पैदा कर रहे हैं। चूंकि केजे अल्फोंस आईएएस अधिकारी रहे हैं तो जाहिर है कि पढ़े-लिखे तो होंगे ही, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि उन्होंने ऐसी मूर्खतापूर्ण बात अज्ञानतावश कह दी होगी। उन्होंने जान-बूझकर लोगों को गुमराह करने और देश की कीमत पर फल-फूल रहे कारोबारियों की बेहिसाब लूट से लोगों का ध्यान हटाने के लिए यह बात कही। उन्होंने अमेरिकी काराबोरियों से तुलना करके अंबानी-अडानी की संपत्ति में हुई बेहिसाब बढ़ोतरी को न्यायसंगत ठहराया। अल्फोंस ने कहा कि एलन मस्क, जेफ बेजोल, लैरी पेज और बिल गेट्स की संपत्ति में भी बहुत इजाफा हुआ है। इसलिए अगर अंबानी-अडानी की संपत्ति बढ़ी है तो इसमें कुछ भी गलत क्या है। कारोबारियों को पूजने वाले बयान के पीछे उनका मकसद यह भी हो सकता है कोई अडानी-अंबानी में से कोई भी मेहरबान हो जाए तो उनका भला कराए, क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने पिछले कार्यकाल में थोड़े दिन के लिए मंत्री बनाने के बाद दूसरे कार्यकाल में उनको अपनी मंत्रिपरिषद में शामिल नहीं किया है।

तेलंगाना के मुख्यमंत्री का मोदी पर संगीन आरोप

तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसीआर यानी के चंद्रशेखर राव ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर बड़ा आरोप लगाया है। आमतौर पर विपक्ष के नेता प्रधानमंत्री या केंद्र सरकार की आलोचना करते हैं लेकिन पद पर बैठा कोई मुख्यमंत्री इस तरह के आरोप नहीं लगाता है, जैसा कि केसीआर ने लगाया है। हालांकि यह परंपरा भी प्रधानमंत्री मोदी ने ही शुरू की है। वे देश के प्रधानमंत्री हैं और राज्यों के मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों और विपक्षी नेताओं पर भ्रष्टाचार करने, दंगा करने और आतंकवादियों की मदद करने के आरोप लगाते रहते हैं। वे विपक्षी नेताओं और मुख्यमंत्रियों को चोर-लूटेरा तक भी बताते रहे हैं। इस समय पांच राज्यों के चुनाव प्रचार के दौरान भी यही कर रहे हैं। लगता है उन्हीं से प्रेरणा लेकर तेलंगाना के मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री पर बेहद संगीन आरोप लगाया है। चंद्रशेखर राव ने कहा है कि प्रधानमंत्री मोदी चाहते हैं कि उनकी पार्टी यानी भाजपा को चंदा देने वाली बिजली कंपनियों से ही राज्य सरकारें बिजली खरीदे। उन्होंने कहा कि सोलर कंपनियों से बिजली खरीदने के लिए दबाव बनाया जा रहा है, जबकि तेलंगाना के पास स्वच्छ ऊर्जा का अपना स्रोत है। चंद्रशेखर राव ने बताया कि अकेले कृष्णा नदी पर बनी पनबिजली परियोजना से ढाई हजार मेगावाट बिजली का उत्पादन होता है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया है कि बैंकों से हजारों करोड़ रुपए का घोटाला करके 33 कारोबारी विदेश भाग गए है और ये सब लोग भाजपा को बड़ा चंदा देते थे। ये आरोप लगाने के बाद तेलंगाना के मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि वे यदाद्री लक्ष्मी-नृसिंह स्वामी मंदिर के पुनर्निर्माण के बाद उसके उद्घाटन समारोह में प्रधानमंत्री को बुलाने के फैसले पर फिर से विचार कर रहे हैं। गौरतलब है कि यह मंदिर तेलंगाना का सबसे बड़ा धार्मिक केंद्र है।

पंजाब की राजनीति बदलने का बड़ा संकेत

जिस तरह उत्तर प्रदेश में बार-बार प्रचार में कहा जाता है कि प्रधानमंत्री तो यूपी का ही होता है वैसे ही पंजाब में कहा जाता है कि पंजाब देश का सबसे अमीर राज्य है। लेकिन यह भी एक मिथक है। पंजाब अब देश के सबसे बड़ी गरीब आबादी वाले राज्यों में शामिल हो गया है। किसी जमाने में पंजाब देश की कृषि राजधानी माना जाता था। लेकिन अब यह भी मिथक बन चुका है। अब यह देश का सुसाइड कैपिटल बनता दिख रहा है। महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश के किसानों की खुदकुशी की बहुत बातें होती हैं, लेकिन पंजाब की कम चर्चा होती है, जबकि पंजाब में बड़ी संख्या में कर्जदार किसान सुसाइड कर रहे हैं। पंजाब के अमीर राज्य और कृषि कैपिटल होने का मिथक किस तरह से टूटा है, इसका पता इस बात से भी लगता है कि सत्ता के लिए आमने-सामने लड़ रही कांग्रेस और आम आदमी पार्टी गरीब लोगों के वोट की मारामारी कर रही हैं। कांग्रेस ने पटियाला के पूर्व महाराजा कैप्टन अमरिंदर सिंह को हटा कर चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बनाया तो प्रचार किया कि गरीब के बेटे को मुख्यमंत्री बनाया है। हर सभा में कांग्रेस के नेता चन्नी को गरीब का बेटा बता कर वोट मांग रहे हैं। इसके जवाब में आम आदमी पार्टी का प्रचार है कि उसके मुख्यमंत्री पद के दावेदार भगवंत मान असली आम आदमी हैं। सो, चन्नी और मान में अपने को असली आम आदमी साबित करने की होड़ लगी है। यह राज्य की राजनीति बदलने का बड़ा संकेत है।

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