NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
SC ST OBC
आधी आबादी
उत्पीड़न
नज़रिया
महिलाएं
समाज
भारत
राजनीति
सोनी सोरी और बेला भाटिया: संघर्ष-ग्रस्त बस्तर में आदिवासियों-महिलाओं के लिए मानवाधिकारों की लड़ाई लड़ने वाली योद्धा
भारत की सामूहिक उदासीनता ने आदिवासियों के अधिकारों को कुचलने वालों के प्रतिरोध में कुछ साहसी लोगों को खड़ा करने का काम किया है, और उनमें सबसे उल्लेखनीय दो महिलाएं हैं- सोनी सोरी और बेला भाटिया।
सौरव कुमार
10 Mar 2022
SONI SORI
बेला भाटिया और सोनी सोरी (फोटो- द वायर)

मध्य भारत का छत्तीसगढ़ भूगोल का वह टुकड़ा है जिसे माओवादी चरमपंथियों और सुरक्षा बलों के द्वारा बुरी तरह से नोच-खरोंच दिया गया है। “महिला दिवस” को दुनिया भर में बड़ी धूमधाम से मनाया गया, लेकिन दंडकारण्य के घने जंगलों में आदिवासी अधिकारों के लिए लड़ने वाली दो महिला कार्यकर्ताओं की अथक यात्रा को तथ्यात्मक रूप से दोहराए बिना इसे अधूरा ही कहा जा सकता है।

सोनी सोरी और बेला भाटिया, दो ऐसी मानवाधिकार योद्धा हैं, जिन्हें आदिवासी समुदायों के लिए मजबूत स्तंभ और संकट प्रबंधन के तौर पर माना जाता है, जिनकी जिंदगी हमेशा बंदूक की नली के सामने झूलती रहती हैं, वो चाहे राज्य पुलिस हो, या केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) हो या बागी माओवादी हों।

भारत की सामूहिक उदासीनता ने कुछ ऐसे समूहों या व्यक्तियों को खड़ा करने का काम किया जिन्होंने आदिवासियों के बुनियादी अधिकारों का गला घोंटने के प्रयासों का प्रतिरोध किया। सोनी सोरी जो कि दंतेवाड़ा की एक कोया जनजाति से संबद्ध हैं, को अपनी स्कूल अध्यापिका की नौकरी तब छोड़नी पड़ी, जब उन्होंने पुलिस का मुखबिर बनने से इंकार कर दिया था और माओवादियों के साथ उनके संपर्क होने के आरोपों के साथ सुरक्षा बलों के द्वारा उन्हें जबरन चुन लिया गया। उनके परिवार के सदस्यों को मनमाने तरीके से प्रताड़ित किया गया। 2011 में, सोरी को माओवादियों की ओर से एक प्रतिष्ठित औद्योगिक समूह से जबरन वसूली के आरोपों सहित राजद्रोह एवं कई अन्य आरोपों के साथ गिरफ्तार कर लिया गया था।

जिस सीमा तक अभियोजन, हिरासत में यातना, और यौन उत्पीड़न का उन्हें सामना करना पड़ा है, वह मानवाधिकारों के उल्लंघन के सबसे जघन्यतम प्रकरणों से एक बना रहने वाला है और संभवतः यह भारत के सबसे खूंखार क्षेत्र में से एक में मानवाधिकार रक्षक के तौर पर खड़े होने के लिए उकसाने वाला बिंदु रहा है। सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा निर्देशित जांच में पाया गया कि पुलिस हिरासत में रहते हुए सोनी सोरी के साथ जिस प्रकार की शारीरिक प्रताड़ना हुई थी, वह राज्य प्रायोजित बर्बरता का एक पारदर्शी प्रतिबिंब था। व्यवस्था की सबसे भयानक शिकार होने से लेकर आदिवासी महिलाओं के अधिकारों की रक्षक के तौर पर, इस बदलाव में सोरी अडिग खड़ी रही हैं। 

सोरी के परिवार को न तो पुलिस वालों ने और न ही माओवादियों ने बख्शा। 2012 में, यह देखने को मिला कि माओवादियों ने उनके सगे-संबंधियों को तीन वर्षों के लिए भूमि पर खेती करने से प्रतिबंधित करने का फरमान जारी किया था।

दंतेवाड़ा में अपने पिता मुंद्रा राम के साथ सोनी सोरी

बस्तर के साथ अपने रिश्ते के बारे में बताते हुए उन्होंने उन दिनों को याद किया जब माओवादियों के द्वारा उनके परिवार पर भयानक हमले किये गए थे, जिसमें उनके पिता मुंद्रा राम को पैर में गोली मार दी गई थी। सोरी ने बताया, “जिस व्यक्ति ने मेरे परिवार पर हमला किया था और मेरे पिता के पाँव में गोली मारकर उन्हें अपंग बना दिया था, ने अब आत्मसमर्पण कर लिया है और जिला रिजर्व ग्रुप (डीआरजी) का हिस्सा बन चुका है। मेरे अनवरत उत्पीड़न और बदनाम करने का श्रेय, दोनों पक्षों, यानी सरकार और माओवादियों को है, और मैं कसम खाती हूँ कि इस प्रकार की कोशिशों के सामने कभी नहीं झुकुंगी।”

तीन बच्चों और पिता के अलावा वे दो किशोर बच्चों (हिंगा और ब्रिशा) के साथ रह रही हैं, जिन्होंने 2017 में सुकमा जिले के बुरकापाल गाँव में सीआरपीएफ के द्वारा एक कथित हमले में अपने माता-पिता को खो दिया था। हिंसा के कारण लोगों को खोने के दर्द ने उन्हें इन दो किशोर अनाथ बच्चों की जीवन को अपनाने के लिए प्रेरित किया। सोरी ने 2013 में बीमारी के कारण अपने पति को खो दिया था; उन पर भी नक्सल का समर्थक होने का आरोप लगाया गया था।

बस्तर उपेक्षा, जहालत, हिंसा और विश्वासघात के ऊँचे चट्टान पर जी रहा है। जहाँ तक उपेक्षा, जहालत और विश्वासघात का प्रश्न है इसे कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के हिस्से के तौर पर देखा जाता है, जबकि हिंसा को राज्य पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा बलों के द्वारा बरपा किया जाता है।

उपरोक्त वर्णित क्रूरताओं के बीच, मानवाधिकारों की खातिर युद्ध छेड़ने का अर्थ है उस समय की सरकार के सामने सीधी चुनौती पेश करना। सोनी सोरी की ही तरह, सामाजिक कार्यकर्ता बेला भाटिया को भी विशेष रूप से महिला अधिकारों की रक्षा की लड़ाई के लिए अनवरत संघर्ष के लिए कई बाधाओं से गुजरना पड़ा है। 

बेला भाटिया बस्तर के जगदलपुर शहर में एक शोधार्थी सह मानवाधिकार वकील के तौर पर रही हैं। जनवरी 2018 से अपनी क़ानूनी प्रैक्टिस के दौरान, उन्होंने आदिवासियों के मामलों की लड़ाई लड़ते हुए जगदलपुर, दंतेवाड़ा और कोंडगांव की अदालतों के बीच में चक्कर लगाया है। ये अधिकांश मामले गुणात्मक रूप से मानवाधिकारों के घोर उल्लंघन के रहे हैं। भाटिया ने कहा, “पेशेवर तौर पर मैं खुद को अन्य वकीलों से भिन्न रूप में देखती हूँ, क्योंकि मेरी एकमात्र चिंता मानवाधिकारों के नजरिये से देखने के अलावा क्रिमिनल लॉ और श्रम कानूनों पर ही रहा है।”

एक वकील के तौर पर, वे पूरी दृढ़ता के साथ बस्तर में न्याय वितरण की धीमी रफ्तार को लेकर कटु आलोचक रही हैं, जो कि आदिवासियों से संबंधित मामलों का मुख्य अड्डा है- जिनमें ज्यादातर मामले विचाराधीन कैदियों और दोष सिद्ध नहीं हुआ है। एक ऐसे समय में जब क़ानूनी प्रैक्टिस एक प्रमुख व्यवसाय हो गया है, मामलों को देखने का उनका मानवीय दृष्टिकोण एक उम्मीद की किरण को जिंदा बनाये रखता है।

बस्तर के साथ बेला भाटिया का जुड़ाव 2006 में तब शुरू हुआ जब वे सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ़ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) में एक एसोसिएट फेलो के तौर पर संबद्ध थीं, और “महिलाओं पर हिंसा के खिलाफ समिति” के हिस्से के तौर पर उन्होंने बस्तर का दौरा किया था। यह वह साल था जब माओवाद-विरोधी अभियान ‘सलवा जुडूम’ पूरे जोरों पर था, और उसे खत्म हुए एक साल ही गुजरे थे। बस्तर आने से पहले, उन्होंने 1989 में अपनी कानून की पढ़ाई पूरी की, और 2000 के दशक के शुरूआती वर्षों में कैंब्रिज विश्वविद्यालय से ‘बिहार में नक्सलवाद’ पर अपनी पीएचडी पूरी की, और साथ ही मुंबई के टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंस में मानद प्रोफेसर के तौर पर अपना संक्षिप्त कार्यकाल भी पूरा किया था। 

bela
बेला भाटिया (चित्र साभार: द हिन्दू )

नापाक ‘सलवा जुडूम’ ने लाखों की संख्या में आदिवासियों को विस्थापित करने का काम किया, और इसे देश में सबसे बड़े आंतरिक विस्थापनों के तौर पर माना जाता है, जिसमें सैकड़ों गाँवों को तहस-नहस किया गया, महिलाओं का यौन उत्पीड़न किया गया, हजारों लोगों को सुरक्षा शिविरों में बंधक बनाकर रखा गया था। यातनापूर्ण और विश्वासघाती परिणामों ने संभवतः बेला भाटिया को बस्तर में ही बने रहने और आदिवासी अधिकारों के लिए लड़ने के लिए प्रेरित किया। लेकिन संघर्ष क्षेत्र को एक स्थायी निवास के तौर पर स्वीकार करने के फैसले के सामने कई चुनौतियाँ थीं। 

अक्टूबर 2015 से लेकर मार्च 2016 के बीच में सुरक्षा कर्मियों के द्वारा सामूहिक बलात्कार और भयानक यौन उत्पीड़न के खिलाफ प्राथमिक दर्ज करने में आदिवासी महिलाओं की मदद करने के कारण वे छत्तीसगढ़ प्रशासन की राडार के तहत आ गई थीं; उन्होंने इन हमलों के भुक्तभोगियों के बयानों को दर्ज करने में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) की टीम की मदद की। आदिवासी महिलाओं पर होने वाले निरंतर हमलों में उन्हें लगातार मदद पहुंचाने के निरंतर प्रयास ने उनके यहाँ पर टिके रहने को भाजपा के रमन सिंह के नेतृत्व वाली राज्य सरकार के साथ भिड़ंत में डाल दिया था।

ऐसा करते हुए, उन्हें जगदलपुर के बाहरी इलाके वाले अपने किराए के कमरे को भी छोड़ने के लिए विवश कर दिया गया और सामाजिक एकता मंच नामक एक निगरानी समूह के द्वारा उन्हें माओवादी समर्थक के रूप में बदनाम किया गया था। इस समूह को राज्य सरकार की पहल पर नक्सल विद्रोहियों से निपटने के लिए तैयार किया गया था, लेकिन यह राज्य प्रशासन के प्रति आलोचक रुख रखने वाले पत्रकारों और कार्यकर्ताओं के खिलाफ एक डराने-धमकाने वाली ताकत बन गई थी, और इस समूह ने उन्हें नक्सली के तौर पर कलंकित किया। इस समूह के सदस्य आज के दौर में प्रतिबंधित सलवा जुडूम के पूर्व सदस्य थे।

अंग्रेजी में प्रकाशित इस मूल आलेख को पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें: Soni Sori and Bela Bhatia: Human Rights Crusaders for Tribals and Women in Conflict-ridden Bastar 

BELA BHATIA
soni sori
Chattisgarh
Bastar
tribals
Women Rights

Related Stories

हिमाचल में हाती समूह को आदिवासी समूह घोषित करने की तैयारी, क्या हैं इसके नुक़सान? 

दक्षिणी गुजरात में सिंचाई परियोजना के लिए आदिवासियों का विस्थापन

झारखंड : नफ़रत और कॉर्पोरेट संस्कृति के विरुद्ध लेखक-कलाकारों का सम्मलेन! 

राम सेना और बजरंग दल को आतंकी संगठन घोषित करने की किसान संगठनों की मांग

ज़रूरी है दलित आदिवासी मज़दूरों के हालात पर भी ग़ौर करना

‘मैं कोई मूक दर्शक नहीं हूँ’, फ़ादर स्टैन स्वामी लिखित पुस्तक का हुआ लोकार्पण

बाघ अभयारण्य की आड़ में आदिवासियों को उजाड़ने की साज़िश मंजूर नहीं: कैमूर मुक्ति मोर्चा

मध्य प्रदेश के जनजातीय प्रवासी मज़दूरों के शोषण और यौन उत्पीड़न की कहानी

स्पेशल रिपोर्ट: पहाड़ी बोंडा; ज़िंदगी और पहचान का द्वंद्व

यूपी चुनाव: बेदखली के नोटिस मिलने के बाद चित्रकूट के आदिवासियों ने पूछा 'हम कहां जाएंगे?


बाकी खबरें

  • china
    अनीश अंकुर
    चीन को एंग्लो-सैक्सन नज़रिए से नहीं समझा जा सकता
    24 Oct 2021
    आख़िर अमेरिका या पश्चिमी देशों के लिए चीन पहेली क्यों बना हुआ है? चीन उन्हें समझ क्यों नहीं आता? ‘हैज चाइना वॉन' किताब लिखने वाले सिंगापुर के लेखक किशोर महबूबानी के अनुसार "चीन को जब तक एंग्लो-सैक्सन…
  • Rashmi Rocket
    रचना अग्रवाल
    रश्मि रॉकेट : महिला खिलाड़ियों के साथ होने वाले अपमानजनक जेंडर टेस्ट का खुलासा
    24 Oct 2021
    फ़िल्म समीक्षा: किसी धाविका से यह कहना कि वह स्त्री तो है, लेकिन उसके शरीर में टेस्टोस्टेरोन की मात्रा अधिक होने के कारण वह स्त्री वर्ग में नहीं आ सकती अपने आप में उसके लिए असहनीय मानसिक यातना देने…
  • hafte ki baat
    न्यूज़क्लिक टीम
    शाह का कश्मीर दौरा, सत्ता-निहंग संवाद और कांग्रेस-राजद रिश्ते में तनाव
    23 Oct 2021
    अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 के निष्प्रभावी किये जाने के बाद गृहमंत्री अमित शाह पहली बार कश्मीर गये हैं. सुरक्षा परिदृश्य और विकास कार्यो का जायजा लेने के अलावा कश्मीर को लेकर उनका एजेंडा क्या है?…
  • UP Lakhimpur
    अब्दुल अलीम जाफ़री
    ‘अस्थि कलश यात्रा’: लखीमपुर खीरी हिंसा में मारे गए चार किसानों की अस्थियां गंगा समेत दूसरी नदियों में की गईं प्रवाहित 
    23 Oct 2021
    12 अक्तूबर को लखीमपुर खीरी से यह कलश यात्रा शुरू हुई थी, यह देश के कई राज्यों में फिलहाल जारी है। उत्तर प्रदेश में ये यात्रा पश्चिमी यूपी के कई जिलों से निकली, जिनमें मुझफ्फरनगर और मेरठ जिले शामिल थे…
  • Fab and Ceat
    सोनिया यादव
    विज्ञापनों की बदलती दुनिया और सांप्रदायिकता का चश्मा, आख़िर हम कहां जा रहे हैं?
    23 Oct 2021
    विकासवादी, प्रगतिशील सोच वाले इन विज्ञापनों से कंपनियों को कितना फायदा या नुकसान होगा पता नहीं, लेकिन इतना जरूर है कि ये समाज में सालों से चली आ रही दकियानुसी परंपराओं और रीति-रिवाजों के साथ-साथ…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License